बच्ची के स्कूल में दाखिले के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण में पहुँचे एक गरीब पिता याचिकाकर्ताओं एवं अधिवक्ताओं  के साथ न्यायमूर्ति श्रीमती बी. वी. नागरत्ना  द्वारा  कोर्टरूम में कथित अपमानजनक दुर्व्यवहार और धमकी की वीडियो वायरल होने पर देशभर में जनता में आक्रोश.

याचिकाकर्ताओं एवं अधिवक्ताओं को ‘डांट-फटकार एवं धमकी’ देने के गंभीर आरोप — अधिवक्ता एवं मानवाधिकार संगठनों द्वारा  राष्ट्रपति तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष  शिकायत दर्ज– कार्रवाई की मांग. [PRSEC/E/2026/12961]

न्यायाधीश के कथित दुर्व्यवहार पर देशभर में रोष, आचरण पर बहस तेज. नागरिकों और वकीलों के निष्पक्ष, गरिमापूर्ण एवं सम्मानजनक सुनवाई के संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया गया है।     

इसी प्रकार, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह द्वारा पतंजलि प्रकरण में प्रयुक्त कथित कठोर एवं धमकीपूर्ण शब्दों को लेकर भी व्यापक विवाद उत्पन्न हुआ था, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों तथा मुख्य न्यायाधीशों ने टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित लेख के माध्यम से सार्वजनिक रूप से कड़ी असहमति एवं गहरी चिंता व्यक्त की थी तथा उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के आदेश C. Ravichandran Iyer v. Justice A.M. Bhattacharjee, (1995) 5 SCC 457 में प्रतिपादित न्यायाधीश के आचरण एवं व्यवहार संबंधी विधिक सिद्धांतों को पढ़ने और उन पर अमल करने की सलाह दी थी।

इसी संदर्भ में, मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जस्टिस नागरत्ना के कथित आचरण की तुलना की जा रही है। हाल ही में संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर रिट याचिका Mathe Nedumpara v. Supreme Court of India की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा के अनुरूप याचिकाकर्ता का पक्ष पूर्ण शांति और धैर्य के साथ सुना। उन्होंने न्यायालय की मर्यादा बनाए रखते हुए याचिकाकर्ता को यह भी सूचित किया कि यदि उसे विधिक सहायता की आवश्यकता हो, तो वरिष्ठ अधिवक्ता की सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं — ताकि उसका पक्ष उचित एवं प्रभावी रीति से प्रस्तुत हो सके। तत्पश्चात् विधि और अभिलेखों के आधार पर याचिका निरस्त कर दी गई।

उस सुनवाई में यद्यपि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के मत से असहमति व्यक्त की, तथापि उनका आचरण किसी भी रूप में असम्मानजनक नहीं था। आदेश याचिकाकर्ता के विरुद्ध गया, फिर भी सुनवाई के दौरान कोई व्यक्तिगत टिप्पणी, भर्त्सना या ऐसा शब्द-प्रयोग नहीं हुआ जो याचिकाकर्ता की गरिमा को आहत करता। न ही किसी प्रकार का दंडात्मक जुर्माना, जैसे एक लाख रुपये, अधिरोपित किया गया।

इसके सर्वथा विपरीत, जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयाँ का आचरण उस गरीब  शिकायतकर्ता के प्रति पूर्णतः भिन्न एवं अपमानजनक रहा।

 इसी तुलना के माध्यम से शिकायतकर्ता पक्ष यह तर्क प्रस्तुत करता है कि न्यायालय की शक्ति केवल आदेश पारित करने तक सीमित नहीं है — सुनवाई की भाषा और वातावरण भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। यदि मुख्य न्यायाधीश की पीठ याचिका निरस्त करने का कठोर आदेश देते हुए भी शालीनता, संयम और संवेदनशीलता के साथ सुनवाई संपन्न कर सकती है, तो किसी अन्य प्रकरण में कठोर शब्दों, अपमानजनक लहजे या अत्यधिक दंडात्मक रवैये को “न्यायिक आवश्यकता” बताकर किसी भी दशा में उचित नहीं ठहराया जा सकता।

शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार यही मूलभूत अंतर है — “न्याय” और “न्याय के साथ गरिमा” के बीच का। और इसीलिए यह प्रकरण केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि न्यायपालिका के व्यापक संस्थागत मानकों एवं न्यायालयीन शिष्टाचार (Courtroom Decorum) के सुदृढ़ीकरण का प्रश्न है।

जस्टिस नागरत्ना शायद यह भूल गईं — अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी हैंउनके अधीनस्थ नहीं

कानून का एक मूलभूत सिद्धांत हैजिसे जस्टिस नागरत्ना ने नज़रअंदाज़ किया प्रतीत होता है — अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी होते हैं। वे किसी जज के सामने याचक बनकर नहीं खड़े होते। वे न्याय की तलाश में एक समान भागीदार के रूप में खड़े होते हैं। और कानून बिल्कुल स्पष्ट है — न्यायाधीश बाध्य हैं कि वे अधिवक्ताओं को वही सम्मान और गरिमा देंजिसकी वे स्वयं अपेक्षा रखते हैं।

किसी अधिवक्ता के साथ न्यायाधीश द्वारा दुर्व्यवहारधमकी या अपमान — यह न्यायिक विवेक का मामला नहीं है। यह एक दंडनीय कृत्य है। ऐसा आचरण करने वाला न्यायाधीश निम्नलिखित के अंतर्गत कार्यवाही का भागी होता है:

— न्यायालय की अवमानना — मानहानि — आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) — पीड़ित अधिवक्ता को हर्जाना देने का दायित्व

यह कोई नया कानूनी तर्क नहीं है। यह सुस्थापित विधि हैजिसे इस देश के न्यायालयों ने बारबार दोहराया है:

Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh, 1949 SCC OnLine Lah 14 Bidhi Singh v. M.S. Mandyal, 1993 Cri LJ 499 B.S. Sambhu v. T.S. Krishnaswamy, (1983) 1 SCC 11 Mehmood Nayyar Azam v. State of Chhattisgarh, (2012) 8 SCC 1 Latief Ahmad Rather v. Shafeeqa Bhat, 2022 SCC OnLine J&K 249 Ghanshyam Upadhyay v. State of Maharashtra, 2017 SCC OnLine Bom 9984 Harish Chandra Mishra v. Hon’ble Mr. Justice S. Ali Ahmed, 1985 SCC OnLine Pat 213 R. Muthukrishnan v. High Court of Madras, (2019) 16 SCC 407 Chetak Construction Ltd. v. Om Prakash, (1998) 4 SCC 577; Ramesh Lawrence Maharaj v. Attorney General of Trinidad & Tobago, (1978) 2 WLR 902 ; McLeod v. St. Aubyn, [1899] AC 549 ; Walmik Bobde v. State of Maharashtra, 2001 ALL MR (Cri) 1731 Sailajanand Pande v. Suresh Chandra Gupta, 1968 SCC OnLine Pat 49 : AIR 1968 Pat 194.

इस प्रकरण ने पूरे देश में जनाक्रोश की लहर उत्पन्न कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के कथित अभद्र एवं अपमानजनक आचरण की हर वर्ग का नागरिक मुखरता से निंदा कर रहा है। एक निर्धन पिता की आँखों से बहते अश्रु आज केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं — वे करोड़ों उन आम नागरिकों की वेदना के प्रतीक हैं, जो न्याय की उम्मीद लेकर इस देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज़ पर पहुँचते हैं।

यह जन-आक्रोश अब एक व्यापक जन-चेतना का रूप ले रहा है। देश की जनता यह स्पष्ट संदेश दे रही है कि न्यायपालिका की कुर्सी किसी को भी आम इंसान की गरिमा को रौंदने का अधिकार नहीं देती।

जस्टिस नागरत्ना मुख्य न्यायाधीश पद की दावेदार हैं — लेकिन एक ऐसे व्यक्ति के नयनों के अश्रु, जिसने इस देश की सर्वोच्च न्यायपालिका से न्याय माँगा था और बदले में अपमान पाया, उनकी इस राह में एक गंभीर नैतिक एवं संवैधानिक प्रश्न बनकर खड़े हैं।

यह देश अपने आम नागरिक के अपमान को कभी नहीं भूलता — और न ही भूलने देता है।

शिकायत में जस्टिस नागरत्ना के विरुद्ध लगभग चार दुर्व्यवहार के प्रकरणों के विस्तृत साक्ष्य एवं वीडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत की गई हैं, जिनके आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि जस्टिस नागरत्ना ने सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा पारित आदेशों एवं निर्देशों का उल्लंघन किया है, सर्वोच्च न्यायालय की संस्थागत गरिमा को आघात पहुँचाया है और इस प्रकार वे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना तथा न्यायालय की अवमानना के अंतर्गत कार्यवाही के लिए उत्तरदायी हैं।

 इससे पूर्व भी कुछ न्यायाधीशों द्वारा कथित अभद्र, अशिष्ट या धमकीपूर्ण व्यवहार के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कठोर टिप्पणियाँ की हैं और स्पष्ट किया है कि न्यायिक पद पर आसीन व्यक्ति से उच्चतम स्तर की संयमता, शालीनता और निष्पक्षता अपेक्षित है और अशिष्ट न्यायाधीश का न्यायपालिका में कोई स्थान नहीं है, उसे हटा देना चाहिए तथा उनके विरुद्ध न्यायालय अवमानना एवं अन्य विधिक एवं आपराधिक कार्यवाही भी की जानी चाहिए। [ R.K. Garg v. State of Himachal Pradesh, (1981) 3 SCC 166; C. Ravichandran Iyer v. Justice A.M. Bhattacharjee, (1995) 5 SCC 457,Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh, 1949 SCC OnLine Lah 14;  Bidhi Singh v. M.S. Mandyal, 1993 Cri LJ 499. ]

इस पूरे घटनाक्रम ने न्यायालयीन आचरण, न्यायिक जवाबदेही तथा नागरिकों के सम्मानजनक सुनवाई के अधिकार पर पुनः राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दिया है।

 इंडियन लॉयर्स एंड ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स एसोसिएशन (ILHRAA) ने राष्ट्रपति भवन एवं भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तृत शिकायत प्रेषित कर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के दौरान कथित रूप से “अपमानजनक, भयभीत करने वाले एवं अवमाननापूर्ण” व्यवहार का आरोप लगाया है। शिकायत में कहा गया है कि एक गरीब वादी के साथ न्यायालय में ऐसा वातावरण निर्मित किया गया, जो निष्पक्ष एवं सम्मानजनक सुनवाई के संवैधानिक अधिकार के सर्वथा विरुद्ध है। यह शिकायत केस संख्या PRSEC/E/2026/0012961 के अंतर्गत राष्ट्रपति कार्यालय में पंजीकृत हो चुकी है।

किन पर आरोप, क्या कहा गया?

शिकायत में न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां के आचरण पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दस्तावेज़ में आगे न्यायमूर्ति आर. महादेवन का भी संदर्भ आता है, यह कहते हुए कि कुछ आदेशों में वे भी पीठ के सदस्य रहे एवं सह-हस्ताक्षरकर्ता बताए गए हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि यह प्रकरण न्यायालय कक्ष की मर्यादा एवं गरिमापूर्ण सुनवाई के मानकों से सीधे जुड़ा हुआ है।

“वीडियो रिकॉर्डिंग” को बताया आधार

शिकायत में दावा किया गया है कि सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध है, जो कथित आचरण को प्रमाणित करती है। यही रिकॉर्डिंग शिकायत का प्रमुख एवं मूलभूत आधार बताई गई है।

शिकायत में क्या मांगें?

दस्तावेज़ के अनुसार ILHRAA ने मुख्यतः तीन प्रकार की मांगें प्रस्तुत की हैं:

  1. कथित आचरण एवं निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन पर तत्काल हस्तक्षेप एवं कठोर कार्रवाई।
  2. राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को “न्यायिक आचरण” विषय पर एक व्यापक हस्तपुस्तिका तैयार कर उसे प्रसारित करने के निर्देश।
  3. महान्यायवादी Attorney General for India जैसे संबंधित विधि अधिकारियों एवं केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी जाँच एजेंसियों द्वारा विधिक संज्ञान लेते हुए न्यायालय अवमानना तथा आपराधिक प्रकरण पंजीकृत कर कार्रवाई की मांग।

कानून और मिसालों का हवाला

शिकायत में “fair trial”, “judicial calm”, “impartial judge” और “courtesy” जैसे सिद्धांतों पर आधारित अनेक न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए यह स्थापित किया गया है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए।

इससे पूर्व भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अभद्र एवं अपमानजनक व्यवहार के अनेक प्रकरणों में न्यायमूर्तियों, मुख्य न्यायाधीशों, वकील संगठनों और मीडिया ने मुखरता से आवाज़ उठाई है। शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि अदालत की गरिमा और “सम्मानजनक सुनवाई” महज़ एक आदर्श नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की आधारशिला और नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है।

दस्तावेज़ में कई ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं, जहाँ वर्तमान और पूर्व न्यायाधीशों, मुख्य न्यायाधीशों, बार एसोसिएशनों तथा मीडिया ने बेंच से की जाने वाली भयभीत करने वाली भाषा, अपमानजनक टिप्पणियों और असभ्य व्यवहार की खुलकर निंदा की है और न्यायालय की गरिमा की रक्षा का कार्य किया है।

शिकायत के अनुसार, ऐसी घटनाएँ कानून के शासन को कमज़ोर करती हैं, सर्वोच्च न्यायालय की संस्थागत छवि को आघात पहुँचाती हैं और आम नागरिक के न्यायपालिका पर विश्वास को डिगाती हैं।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मुंबई में अपने संबोधन में न्यायपालिका को संयम, शिष्टाचार, सम्मान और करुणा के मूल्यों की याद दिलाई थी — विशेषकर समाज के कमज़ोर और हाशिए पर खड़े वर्गों के प्रति। उन्होंने कहा था कि अदालत केवल एक इमारत नहीं, बल्कि एक “जीवंत संस्थागत संस्कृति” है, जहाँ असहमति कभी असम्मान में नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि वकीलों के साथ व्यवहार और सुनवाई की शैली ही प्रतिदिन न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बनाती या तोड़ती है, और बेंच व बार के बीच सहयोग तथा परस्पर सम्मान अनिवार्य है।

दस्तावेज़ में कुछ चर्चित प्रकरणों का विशेष उल्लेख है — जैसे जस्टिस नरीमन द्वारा न्यायालय में एक वकील को बाहर निकालने की धमकी दिए जाने पर जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा लिखा गया पत्र और सभ्यतापूर्वक पेश आने की नसीहत; तथा जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की मध्यस्थता और आपत्ति के पश्चात जस्टिस मिश्रा द्वारा बड़े दिल से सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगा जाना।

इसके अतिरिक्त, शिकायत में हालिया घटनाओं का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि मुंबई उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा एक युवा वकील को धमकाए जाने के कारण वह अदालत में बेहोश हो गया। इस प्रकरण के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने कहा था कि न्यायाधीश “सामंती स्वामी” (feudal lords) नहीं हैं। इसी भावना को दोहराते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका नागरिकों की सेवा के लिए है।

शिकायत में सर्वोच्च न्यायालय के अनेक landmark निर्णयों के आधार पर यह भी तर्क दिया गया है कि यदि न्यायाधीश अनुचित रूप से बहस को बाधित करें या पक्षकार को यह अनुभव हो कि उसकी बात नहीं सुनी गई, तो ऐसी सुनवाई को पक्षपातपूर्ण (biased hearing) माना जा सकता है, जो निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार को प्रभावित करती है — और इस आधार पर संबंधित आदेश निरस्त भी हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में इंसाफ़ माँगने आए और मिला अपमान — अब कानून पूछ रहा है, क्या यही है न्याय?

शिकायत में साफ़ कहा गया है — “fair trial” यानी निष्पक्ष सुनवाई, “judicial calm” यानी न्यायिक संयम, “impartial judge” यानी निष्पक्ष न्यायाधीश और “courtesy” यानी शिष्टाचार। ये महज़ शब्द नहीं — ये हर उस गरीब नागरिक के संवैधानिक अधिकार हैं, जो न्याय की उम्मीद लेकर इस देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज़ पर पहुँचता है।

दर्जनों अदालती फ़ैसलों का हवाला देते हुए शिकायत में एक ही बात कही गई है — न्याय सिर्फ़ होना काफ़ी नहीं, दिखना भी ज़रूरी है। और जब एक गरीब पिता आँसू बहाते हुए कोर्ट से लौटे — तो न “judicial calm” दिखी, न “courtesy”, न “fair trial” का एहसास हुआ — और एक “impartial judge” की उम्मीद भी टूटती नज़र आई।

इससे पूर्व भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा अभद्र एवं अपमानजनक व्यवहार के अनेक प्रकरणों में न्यायमूर्तियों, मुख्य न्यायाधीशों, वकील संगठनों और मीडिया ने मुखरता से आवाज़ उठाई है। शिकायत में स्पष्ट किया गया है कि अदालत की गरिमा और “सम्मानजनक सुनवाई” महज़ एक आदर्श नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की आधारशिला और प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

दस्तावेज़ में कई ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं, जहाँ वर्तमान एवं पूर्व न्यायाधीशों, मुख्य न्यायाधीशों, बार एसोसिएशनों तथा मीडिया ने बेंच से की जाने वाली भयभीत करने वाली भाषा, अपमानजनक टिप्पणियों और असभ्य व्यवहार की खुलकर निंदा की है और न्यायालय की गरिमा की रक्षा का कार्य किया है।

शिकायत के अनुसार ऐसी घटनाएँ कानून के शासन को कमज़ोर करती हैं, सर्वोच्च न्यायालय की संस्थागत छवि को गहरा आघात पहुँचाती हैं और आम नागरिक के न्यायपालिका पर विश्वास को डिगाती हैं।

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने मुंबई में अपने संबोधन में न्यायपालिका को संयम, शिष्टाचार, सम्मान और करुणा के मूल्यों की याद दिलाई थी — विशेषकर समाज के कमज़ोर और हाशिए पर खड़े वर्गों के प्रति। उन्होंने कहा था कि अदालत केवल एक इमारत नहीं, बल्कि एक “जीवंत संस्थागत संस्कृति” है, जहाँ असहमति कभी असम्मान में नहीं बदलनी चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि वकीलों के साथ व्यवहार और सुनवाई की शैली ही प्रतिदिन न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बनाती या तोड़ती है, और बेंच व बार के बीच सहयोग तथा परस्पर सम्मान सर्वथा अनिवार्य है।

दस्तावेज़ में कुछ चर्चित प्रकरणों का विशेष उल्लेख है — जैसे जस्टिस नरीमन द्वारा न्यायालय में एक वकील को बाहर निकालने की धमकी दिए जाने पर जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा लिखा गया पत्र और सभ्यतापूर्वक पेश आने की नसीहत; तथा जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता शंकरनारायणन के साथ कथित दुर्व्यवहार के मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की मध्यस्थता एवं आपत्ति के पश्चात जस्टिस मिश्रा द्वारा बड़े दिल से सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगा जाना।

इसी संदर्भ में, शिकायत में सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन के साथ कथित अशिष्ट एवं धमकीभरे व्यवहार का भी हवाला दिया गया है। इसके अतिरिक्त, इसी प्रकार के कथित दुर्व्यवहार के शिकार अन्य 16 अधिवक्ताओं का भी उल्लेख किया गया है — जिनमें अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग की महिला अधिवक्ताएँ, इंडियन बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नीलेश ओझा सम्मिलित हैं। इन सभी प्रकरणों के संबंध में पूर्व में ही संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष औपचारिक शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं।

इसके अतिरिक्त, शिकायत में हालिया घटनाओं का संदर्भ देते हुए बताया गया है कि मुंबई उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा एक युवा वकील को धमकाए जाने के कारण वह अदालत में बेहोश हो गया। इस मर्मस्पर्शी प्रकरण के पश्चात पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि न्यायाधीश “सामंती स्वामी” (feudal lords) नहीं हैं। इसी भावना को दोहराते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका नागरिकों की सेवा के लिए है — न कि उन्हें भयभीत करने के लिए।

शिकायत में सर्वोच्च न्यायालय के अनेक landmark निर्णयों के आधार पर यह भी सशक्त तर्क दिया गया है कि यदि न्यायाधीश अनुचित रूप से बहस को बाधित करें या पक्षकार को यह अनुभव हो कि उसकी बात नहीं सुनी गई, तो ऐसी सुनवाई को पक्षपातपूर्ण (biased hearing) माना जा सकता है — जो निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार को प्रत्यक्षतः प्रभावित करती है। और इस आधार पर संबंधित आदेश निरस्त भी किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, शिकायतकर्ता और उनके अधिवक्ताओं का पक्ष इस समूचे विषय को न्यायालयीन मर्यादा, शालीनता और “fair hearing” के व्यापक संवैधानिक सिद्धांत के साथ जोड़कर प्रस्तुत करता है।

शिकायत का स्वरूप एवं कानूनी आधार

यह शिकायत एक औपचारिक आरोप-पत्र एवं प्रतिनिधित्व है, जिस पर संबंधित संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत विचार किया जा सकता है। यह दस्तावेज़ इस विषय को न्यायपालिका में “सम्मानजनक सुनवाई” के संवैधानिक अधिकार से जोड़कर प्रस्तुत करता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार, किसी पक्षकार या अधिवक्ता से धमकीभरे लहजे में बात करना अथवा भरी अदालत में उनका अपमान करना, न्यायालय की अवमानना तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 352 (पूर्व IPC धारा 504) जैसे प्रावधानों के अंतर्गत दंडनीय अपराध है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया है कि न्यायाधीश के लिए संयम अनिवार्य है। यदि कोई न्यायाधीश संयम खो देता है, तो वह निष्पक्ष न्यायाधीश की कसौटी पर खरा नहीं उतरता और उसके द्वारा पारित आदेश निरस्त किए जा सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना करने वाला न्यायाधीश, न्यायालय अवमानना अधिनियम की धाराओं 2(b) एवं 12 के अंतर्गत तथा IPC की धाराओं 166, 167, 218, 219, 107, 34 एवं 120(B) के अनुसार दंड का भागी है। साथ ही वह पीड़ित पक्षकार एवं अधिवक्ता को क्षतिपूर्ति देने के लिए भी उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

[Re M.P. Dwivedi, (1996) 4 SCC 152, Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh, 1949 SCC OnLine Lah 14, Bidhi Singh v. M.S. Mandyal, 1992 SCC OnLine HP 28, Ramesh Lawrence Maharaj vs Attorney Generel of Trinidad and Tobago (1978) 2 WLR 902, S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews, (2018) 10 SCC 804, Mahabir v. State of Haryana, 2025 SCC OnLine SC 184]

सुप्रीम कोर्ट ने R.K. Garg v. State of H.P., (1981) 3 SCC 166 मामले में स्पष्ट किया है की अशिष्ट और बदतमीजी से व्यवहार करनेवाला जज न्यायव्यवस्था में नहीं रह सकता, उसे बरखास्त कर देना चाहिए।

Watch the video of Court hearing: –

link: https://youtu.be/xUoMa99UPgg?si=KEY7qDGnDJ6HIaJY

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