“खोटे पुरावे तयार करणारा — समाजाचा शत्रू आणि सामाजिक प्रदूषण”: ना जामीन, ना माफी, ना सुटकेचा मार्ग — खोट्या साक्षीदाराला संरक्षण देणे म्हणजे सामाजिक प्रदूषणाला आमंत्रण; सर्वोच्च न्यायालयाचा इशारा — खोट्या साक्षींवर अनिवार्य कारवाई आणि कोठडीत खटला चालवण्याचे निर्देश

केजरीवाल आणि संजय सिंह यांनी न्यायालयीन पुराव्यांमध्ये फेरफार केल्याचे आरोप आणि उच्च न्यायालयाने त्यांच्याविरोधात अवमाननेची दखल घेतल्याच्या पार्श्वभूमीवर, सर्वोच्च न्यायालयाच्या त्या कठोर, स्पष्ट आणि निर्विवाद […]

“झूठे सबूत गढ़ने वाला — समाज का दुश्मन और सामाजिक प्रदूषण ” न जमानत, न माफी, न बचाव का रास्ता — झूठे गवाह को संरक्षण देना सामाजिक प्रदूषण को निमंत्रण देना है: सर्वोच्च न्यायालय ने झूठी गवाही पर अनिवार्य कार्यवाही और हिरासत में मुकदमे का आदेश दिया — केजरीवाल और संजय सिंह द्वारा न्यायालय में साक्ष्य के साथ जालसाजी तथा उच्च न्यायालय द्वारा उनके विरुद्ध अवमानना का संज्ञान लिया जाना, उन्हें सर्वोच्च न्यायालय की उस कठोर, स्पष्ट और असंदिग्ध चेतावनी के दायरे में लाता है कि किसी अपराधी को उसके अपराध के लिए दंडित करना एक अनिवार्य सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति है — क्योंकि समाज किसी अपराधी को उसकी देनदारी से बचने का अवसर नहीं दे सकता, क्योंकि ऐसा होने पर सामाजिक प्रदूषण की एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी जो न वांछनीय है, न उचित है, और न ही किसी सभ्य एवं विधि-शासित समाज से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह इसे सहन करे या सहन करने के लिए बाध्य हो। [राज्य बनाम मंगेश चव्हाण, 2020 SCC OnLine Bom 672; मनोहर लाल बनाम विनेश आनंद, 2001 (5) SCC 407]

जब न्यायालय को गुमराह किया जाता है, तो न्याय स्वयं पीड़ित बन जाता है — सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश: झूठी गवाही के अभियुक्तों पर […]

“Perjurer — A Threat to Society”: No Bail, No Pardon, No Escape — To Shield a Perjurer Is to Invite Social Pollution: Supreme Court Mandates Compulsory Perjury Action and Trial in Custody — Fabrication of Court Evidence by Kejriwal and Sanjay Singh, Coupled with Cognizance of Contempt Taken Against Them by the High Court, Places Them Squarely Within the Supreme Court’s Stern, Categorical, and Unambiguous Warning That to Pursue an Offender Upon Commission of an Offence Is to Sub-Serve a Vital Social Need — for Society Cannot Afford to Have a Criminal Escape His Liability, Since Such Escape Would Inevitably Bring About a State of Social Pollution Which Is Neither Desired, Nor Warranted, Nor Can Any Civilised and Law-Governed Society Be Expected or Required to Endure [State v. Mangesh Chavan, 2020 SCC OnLine Bom 672; Manohar Lal v. Vinesh Anand, 2001 (5) SCC 407, ]

When Courts Are Misled, Justice Itself Becomes the Victim. – Supreme Court Declares Accused in Perjury Must Be Tried in Custody — Kejriwal, Sanjay Singh […]

केजरीवाल, संजय सिंह और AAP के लिए बड़ी मुसीबत? दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश ने झूठे नैरेटिव को किया उजागर

 हाईकोर्ट जज को बदनाम करने के लिए कथित फर्जी वीडियो अभियान पर कोर्ट अवमानना का संज्ञान; आगे पर्जरी और जालसाजी से जुड़े गंभीर मामलों में […]

“कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, निवृत्त न्यायमूर्ती ए.एस. ओका, लाईव्ह लॉ आणि द हिंदू यांच्या विरोधात स्फोटक घटनात्मक तक्रार — प्रलंबित न्यायालयीन कार्यवाहीवर प्रभाव टाकण्यासाठी आणि ‘इकोसिस्टम’ विरोधात निर्णय देणाऱ्या न्यायाधीशांना लक्ष्य करण्याचा आरोप”

कपिल सिब्बल, मीनाक्षी अरोरा, संजय हेगडे, विवेक तन्खा, कलीश्वरम राज, लाईव्ह लॉ आणि द हिंदू यांच्या विरोधात फौजदारी कारवाई, न्यायालयाचा अवमान, वकिली परवाना रद्द करणे […]

“Kapil Sibal, Arvind Kejriwal, Retd. Justice A.S. Oka, Meenakshi Arora, Sanjay Hegade, Live Law, and The Hindu Named in Explosive  Complaint Alleging Organised Legal-Media Conspiracy to Influence Pending Judicial Proceedings and Target Judges Delivering Adverse Orders Against the Ecosystem”

Complaint Seeks Criminal Prosecution, Contempt Action, Cancellation of Licence to Practice, and Withdrawal of Senior Advocate Designation Against Kapil Sibal, Meenakshi Arora, Sanjay Hegde, Vivek […]

“कपिल सिब्बल, अरविंद केजरीवाल, रिटायर्ड जस्टिस ए.एस. ओका, लाइव लॉ और द हिंदू के खिलाफ विस्फोटक संवैधानिक शिकायत — लंबित न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने और ‘इकोसिस्टम’ के खिलाफ आदेश देने वाले जजों को निशाना बनाने की साजिश का आरोप”

शिकायत में कपिल सिब्बल, मीनाक्षी अरोड़ा, संजय हेगड़े, विवेक तन्खा, कलीश्वरम राज, लाइव लॉ और द हिंदू के खिलाफ आपराधिक मुकदमा, अवमानना कार्रवाई, वकालत का […]

जजों के खिलाफ न्यायपालिका पर गंभीर आरोपों में भी जेल नहीं, बल्कि चेतावनी या ₹1 जुर्माना ही  सजा — प्रशांत भूषण केस में सुप्रीम कोर्ट ने तय की कोर्ट अवमानना की संवैधानिक सीमा, जो देश की सभी अदालतों और जजों पर बाध्यकारी नियम है।  [  Prashant Bhushan (Contempt Matter), In re, , (2021) 1 SCC 745 ]

प्रशांत भूषण केस ने उस भूले हुए लेकिन बाध्यकारी कानून को पुनर्जीवित किया, जिसके अनुसार न्यायपालिका की आलोचना अथवा “scandalisation” से जुड़े अवमानना मामलों में […]