न्यायालय के आदेशों के संबंध में भ्रामक जानकारी देकर अवमानना करने के आरोप में Contempt कार्यवाही हेतु याचिका दायर होने के संकेत मिले हैं।
अपने ही दावों का झूठ उजागर होने के बाद फ्लैट खरीदने वाले भोले नागरिकों को कानूनी जवाब देने में असमर्थ रहने पर, खरीदारों द्वारा मुआवज़ा व ब्याज सहित रकम वापस मांगने तथा धोखाधड़ी के आपराधिक मामले दर्ज होने की आशंका के चलते, न्यायालयीन “फैक्ट–चेक” को “misleading and mischievous” बताने वाले व्हाट्सऐप संदेश प्रसारित करने के मामले में गोदरेज कंपनी और सेल्स एग्जीक्यूटिव माधिया कापाडिया को यह नोटिस भेजा गया है।
मुंबई उच्च न्यायालय के आदेशों तथा सरकारी व न्यायालयीन रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ है कि गोदरेज द्वारा झूठे, मनगढ़ंत और फर्जी दावे किए गए, बनावटी दस्तावेज तैयार किए गए और शासन व न्यायालय को गुमराह करने का एक पैटर्न सामने आया है। 12 मार्च 2026 के आदेश के बाद Godrej Horizon परियोजना के खरीदारों को भ्रामक जानकारी भेजने की यह ताज़ा घटना है।
इससे पूर्व भी मुंबई उच्च न्यायालय ने Godrej & Boyce Manufacturing Co. Pvt. Ltd. v. Union of India, 1992 Cri. L.J. 3752 प्रकरण में गोदरेज एंड बॉयस के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, झूठी गवाही देने और करोड़ों रुपये के सरकारी राजस्व से बचने हेतु न्यायालय के साथ धोखाधड़ी करने के आरोपों पर आपराधिक अभियोजन चलाने का आदेश दिया था। न्यायालय ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार को स्वयं शिकायतकर्ता के रूप में आपराधिक शिकायत दर्ज करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
उस निर्णय में न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा था— “यदि ऐसे फर्जी कृत्यों के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और गोदरेज कंपनी के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई के आदेश देने में न्यायालय विफल रहता है और उन्हें यूँ ही छोड़ देता है, तो आने वाली पीढ़ियाँ न्यायपालिका को कभी माफ नहीं करेंगी।”
(Godrej & Boyce Manufacturing Co. Pvt. Ltd. v. Union of India, 1992 Cri. L.J. 3752)
कानूनी शोधकर्ता एवं ब्लॉगर आयुष तिवारी — अंतिम वर्ष के विधि छात्र तथा स्वतंत्र विधि विश्लेषक — ने अधिवक्ता ईश्वरलाल एस. अग्रवाल, अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन के माध्यम से दिनांक 16 मार्च 2026 को M/s. Godrej Projects Development Ltd. तथा सुश्री माधिया कापाडिया, सीनियर एग्जीक्यूटिव – सेल्स एंड मार्केटिंग को कानूनी नोटिस जारी किया है। इस नोटिस में बदनामी, भ्रामक प्रतिपादन (misrepresentation) तथा खरीदारों और आम जनता के बीच जानबूझकर झूठी एवं भ्रामक जानकारी प्रसारित करने के आरोपों के आधार पर प्रतीकात्मक हर्जाने के रूप में ₹10,000 करोड़ की मांग की गई है।
जिन वकीलों को कभी “गांव के वकील” कहकर कम आंका गया, उन्हीं वकीलों ने तथाकथित ऑक्सफर्ड–हार्वर्ड की अंग्रेज़ी का रौब दिखाने वाले ‘एलिट’ वकीलों को अदालत में करारा जवाब देते हुए गोदरेज जैसी बड़ी कंपनी को भी अरबों रुपये का झटका दे दिया। यह केवल एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि आम वकीलों के आत्मविश्वास की ऐतिहासिक विजय बनकर सामने आई है।
बड़ी-बड़ी डिग्रियों और दिखावटी अंग्रेज़ी के सामने सत्य, तथ्य और कानून की ताकत कितनी प्रभावशाली होती है, यह इस मामले से स्पष्ट हो गया है। इस घटनाक्रम ने वर्षों से हाशिये पर रखे गए सामान्य वकीलों का मनोबल जबरदस्त तरीके से बढ़ाया है और न्याय के लिए लड़ने वाले हर वकील को नई ऊर्जा दी है।
सामान्य वकीलों का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता निलेश ओझा और उनके साथियों ने इस लड़ाई में जो दृढ़ता दिखाई, वह केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे विधि समुदाय के लिए प्रेरणा बन गई है। उनके इस साहसिक संघर्ष के लिए आम नागरिकों और वकीलों के बीच अभूतपूर्व समर्थन और सराहना देखने को मिल रही है, जिससे यह विश्वास और मजबूत हुआ है कि “सच्चा न्याय अभी भी जिंदा है।”
अधिवक्ता निलेश ओझा — “संविधानी” — एक ऐसा नाम, जिसने सीधे व्यवस्था को चुनौती दी है।
मराठी माध्यम से पुसद के एक साधारण स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने वाले निलेश ओझा ने आगे चलकर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनिकेशन में बी.ई. इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और बाद में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने न्याय व्यवस्था की बड़ी लड़ाइयों के केंद्र में अपनी सशक्त पहचान बनाई। दिखावटी अंग्रेज़ी के बजाय कानून की गहरी समझ और समाज के अंतिम व्यक्ति के अधिकारों के लिए लड़ने की प्रतिबद्धता ही उनकी असली ताकत है।
बिना सूट-बूट, कोल्हापुरी चप्पल पहनकर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में पेश होने वाले अधिवक्ता ओझा तथाकथित ‘एलिट’ अंग्रेज़ी बोलने वाले वकीलों की छवि को सीधे चुनौती देते हैं। उनकी अंग्रेज़ी भले ही ऑक्सफर्ड-हार्वर्ड जैसी न हो, लेकिन कानून के मैदान में उन्होंने कई बड़े वकीलों और यहां तक कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ तक की गलतियों को उजागर कर उनके खिलाफ कार्रवाई करवाई — यह एक स्थापित तथ्य है।
अधिवक्ता ओझा ने केवल अदालतों में ही नहीं, बल्कि कई विधिक पुस्तकें लिखकर आम नागरिकों को कानून की समझ भी दी है। वे इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन तथा राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे दिग्गज वकीलों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई कर यह संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
कोरोना काल के प्रतिबंधों और वैक्सीन मृत्यु मामलों में उनकी कानूनी लड़ाई हो, या दिशा सालियन और सुशांत सिंह राजपूत प्रकरणों में उनका आक्रामक संघर्ष — हर मोर्चे पर उन्होंने निर्भीकता और न्याय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया है।
यह संघर्ष केवल एक वकील का नहीं, बल्कि आम आदमी के न्याय के अधिकार की लड़ाई है। और यही कारण है कि अधिवक्ता निलेश ओझा आज “सिस्टम से सवाल करने वाले” और “सत्य के लिए लड़ने वाले” एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरे हैं।
अधिवक्ता निलेश ओझा — “संविधानी” नाम से उभरता नया सामाजिक संदेश!
राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को स्वीकार करने के बाद अधिवक्ता निलेश ओझा ने केवल पद की जिम्मेदारी नहीं संभाली, बल्कि अपने जीवन के माध्यम से एक बड़ा सामाजिक संदेश भी दिया है। उन्होंने अपने नाम के साथ “संविधानी” जोड़कर जाति, पंथ और वंश की सीमाओं को चुनौती देते हुए एक नई पहचान स्थापित की—एक ऐसा भारतीय परिवार जो संविधान आधारित, समता पर टिका हुआ और बंधुत्व को सशक्त करने वाला हो। यह संकल्प उन्होंने केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने आचरण से भी स्पष्ट किया है।
यह केवल नाम बदलने का प्रयास नहीं, बल्कि एक वैचारिक क्रांति है। “मैं कौन हूँ?” इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने “मैं संविधानी हूँ” कहकर दिया, और यह स्पष्ट किया कि संविधान ही हमारा धर्म है तथा न्याय, समता और बंधुत्व ही हमारी वास्तविक पहचान है।
अधिवक्ता ओझा के इस साहसिक कदम का प्रभाव अब समाज में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। उनके सहयोगियों ने भी अपने नाम के साथ “संविधानी” जोड़ना शुरू कर दिया है और यह पहल अब एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर जनआंदोलन का रूप लेती जा रही है। समाज के विभिन्न वर्ग—वकील, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता—इस नई पहचान को अपनाने लगे हैं।
“जाति नहीं, संविधान ही पहचान” का संदेश अब सड़कों से लेकर न्यायालयों तक और समाज के हर स्तर पर पहुंचने लगा है। विभाजनकारी सोच को चुनौती देते हुए एक समरस, न्यायपूर्ण और संविधाननिष्ठ भारत के निर्माण की दिशा में यह प्रयास तेजी से आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है।
गोदरेज का “फैक्ट–चेक” पर हमला; न्यायालयीन रिकॉर्ड छिपाने की कोशिश — खरीदारों को गुमराह करने का मामला उजागर
- संबंधित ब्लॉग में पूरे मामले की पृष्ठभूमि, न्यायालयीन रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों तथा डिवीजन बेंच के आदेश से उत्पन्न कानूनी परिणामों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
- ब्लॉग की सामग्री बॉम्बे उच्च न्यायालय की कार्यवाही का हिस्सा रहे न्यायालयीन रिकॉर्ड और सार्वजनिक दस्तावेजों पर आधारित है, जिसे कोई भी नागरिक या सोसायटी का सदस्य आसानी से परख सकता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि गोदरेज को दी गई अनुमति शर्तों (conditional) के साथ थी और वह सीधे उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय पर निर्भर थी। इसलिए “status quo ante” बहाल होने के बाद उन अनुमतियों पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
- इसके बावजूद, इस स्पष्ट कानूनी स्थिति को नज़रअंदाज़ करते हुए गोदरेज ने माधवी कापाडिया के माध्यम से खरीदारों को संदेश भेजकर “Godrej Horizon” परियोजना में फ्लैट खरीदने में कोई बाधा नहीं होने का दावा किया।
- आरोप है कि यह संदेश जानबूझकर फैलाया गया, ताकि परियोजना को पूरी तरह कानूनी रूप से सुरक्षित दिखाकर खरीदारों को भ्रमित किया जा सके।
- इतना ही नहीं, इस संदेश में “फैक्ट-चेक” लेख को ही “misleading and mischievous” बताकर चल रही न्यायालयीन कार्यवाही को परियोजना से असंबंधित दिखाने की कोशिश की गई। इससे न्यायालयीन आदेशों के महत्व को कमतर करके खरीदारों में झूठी सुरक्षा की भावना पैदा करने का प्रयास सामने आता है।
- माधवी कापाडिया द्वारा प्रसारित संदेश वास्तव में जनता को गुमराह करने वाला और न्यायालयीन रिकॉर्ड के विपरीत होने का आरोप है।
- वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। उच्च न्यायालय में चल रहा विवाद केवल ट्रांजिट रेंट तक सीमित नहीं है, बल्कि ईस्ट एंड वेस्ट डेवलपर्स की टर्मिनेशन की वैधता और उसके बाद गोदरेज को दी गई अनुमतियों की वैधता से सीधे जुड़ा हुआ है।
- इसलिए “परियोजना से कोई संबंध नहीं” का दावा न केवल गलत है, बल्कि जानबूझकर किया गया भ्रामक प्रस्तुतीकरण है, जिससे खरीदारों और आम जनता के सामने परियोजना की कानूनी स्थिति को गलत तरीके से पेश किया गया।
- माधवी कापाडिया के उक्त बयान की असत्यता स्वयं न्यायालयीन रिकॉर्ड से स्पष्ट रूप से उजागर होती है, जिससे इसकी सत्यता पर किसी अतिरिक्त जांच की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
गोदरेज की अनुमतियाँ “शर्तों के साथ” — खरीदार सावधान रहें
- गोदरेज को परियोजना हेतु दी गई अनुमति दिनांक11.2020 को मुंबई महानगरपालिका द्वारा प्रदान की गई थी। किन्तु यह अनुमति न तो अंतिम थी और न ही बिना शर्त। बल्कि यह स्पष्ट रूप से उच्च न्यायालय में लंबित वादों के अंतिम निर्णय पर निर्भर थी।
- अर्थात, परियोजना में गोदरेज का प्रवेश प्रारंभ से ही अस्थायी था और पूर्णतः न्यायालय के अंतिम निर्णय पर आधारित था। कंपनी ने परियोजना को अपने जोखिम पर आगे बढ़ाया।
- विधिक दृष्टि से, लंबित वाद के दौरान संपत्ति खरीदने वाले व्यक्तियों को “बोनाफाइड खरीदार” नहीं माना जा सकता — यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित किया जा चुका है।
- Chinnammal v. P. Arumugham (1990) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि यदि किसी व्यक्ति को लंबित वाद की जानकारी होने के बावजूद उसने संपत्ति खरीदी, तो उसे निर्दोष खरीदार का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
- वर्तमान मामले में:
- विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में लंबित है,
- गोदरेज को दी गई अनुमतियाँ शर्तों के अधीन हैं,
- और यह समस्त तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।
- अतः, इस परियोजना में फ्लैट खरीदने वाले किसी भी व्यक्ति को “बोनाफाइड खरीदार” नहीं माना जा सकता तथा उनकी निवेश राशि न्यायालय के अंतिम निर्णय पर निर्भर रहेगी।
- ऐसी स्थिति में “कोई जोखिम नहीं है” जैसे दावे करना न केवल भ्रामक है, बल्कि न्यायालयीन रिकॉर्ड के प्रतिकूल भी है।
खरीदारों के साथ धोखाधड़ी? — भ्रामक जानकारी देकर निवेश आकर्षित करने का आरोप
14.1. उपर्युक्त स्पष्ट कानूनी स्थिति के बावजूद गोदरेज द्वारा खरीदारों को यह बताया गया कि परियोजना में “कोई भी बाधा नहीं है।”
14.2. इस पूरे प्रकरण में निम्नलिखित तत्व स्पष्ट रूप से सामने आते हैं:
• शर्तों के साथ दी गई अनुमतियों को छिपाना
• लंबित न्यायालयीन मामलों को दबाना
• पूर्ण कानूनी सुरक्षा का झूठा आभास उत्पन्न करना
14.3. इस प्रकार prima facie यह आचरण:
• गलत प्रतिपादन (misrepresentation)
• महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन (suppression)
• तथा भ्रामक जानकारी देकर निवेश के लिए प्रेरित करना
जैसे गंभीर आरोपों के दायरे में आता है।
₹10,000 करोड़ का नोटिस; Contempt की तलवार सिर पर
जो “adventure” साहस समझा गया था, वही अब “misadventure” यानी खतरनाक दुस्साहस साबित हो रहा है। गोदरेज पर ₹10,000 करोड़ का नोटिस और Contempt की कार्रवाई का खतरा—कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है।
गोदरेज का झूठ बेनकाब — अपने ही दस्तावेज बने सबसे बड़े सबूत
गोदरेज के पास अब कोई ठोस बचाव शेष नहीं बचा है। उसके अपने ही दस्तावेज उसके खिलाफ खड़े हो गए हैं। यह दावा कि उच्च न्यायालयीन कार्यवाही और दी गई अनुमतियों के बीच कोई संबंध नहीं है, पूरी तरह असत्य है और एक भ्रामक “strawman” तर्क का उदाहरण है।
मुंबई महानगरपालिका की दिनांक 05.11.2020 की अनुमति स्वयं स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि वह न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन है। इस प्रकार गोदरेज का दावा उसके अपने ही रिकॉर्ड से ध्वस्त हो जाता है।
न्यायालयीन रिकॉर्ड भी यह स्पष्ट करते हैं कि मामले लंबित हैं और उनके परिणाम बाध्यकारी होंगे। ऐसी स्थिति में गोदरेज का संपूर्ण बचाव केवल दिखावा प्रतीत होता है, जिसमें न तो कोई ईमानदारी बचती है और न ही कोई ठोस कानूनी आधार।
संक्षेप में — “झूठ के सहारे खड़ा गोदरेज का कानूनी किला”, अब सच सामने आने पर उसके अपने ही कागजों से ढहने लगा है!