मुख्य न्यायाधीश के बाद राहुल गांधी–शरद पवार भी अनिवार्य FIR के पक्ष में — दिशा केस में आदित्य ठाकरे चौतरफा घिरे, संकट गहराया

🔥 एफआईआर पर बनती राष्ट्रीय सहमति: दिशा केस में बढ़ता राजनीतिक और कानूनी दबाव
मुंबई | विशेष रिपोर्ट
दिशा सालियान मामले में न्याय की मांग अब एक नए निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है। मुख्य न्यायाधीश की कड़ी फटकार के बाद अब राहुल गांधी और शरद पवार ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि हर नागरिक को आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने का अटल अधिकार है। इस बयान ने पूरे मामले में एक नया राजनीतिक और कानूनी तूफान खड़ा कर दिया है।

सिर्फ बयान ही नहीं — अजित पवार मृत्यु मामले में मुंबई पुलिस द्वारा FIR दर्ज करने से इनकार किए जाने के बाद, राहुल गांधी द्वारा कर्नाटक में ‘ज़ीरो FIR’ दर्ज करवाने में दी गई मदद यह स्पष्ट करती है कि कांग्रेस ने अपनी स्थिति साफ कर दी है कि FIR दर्ज करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि कानूनन अनिवार्य कर्तव्य है।
इससे यह संदेश भी गया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं, चाहे मामला कितना ही हाई-प्रोफाइल क्यों न हो।
ठाकरे खेमे पर बढ़ा सीधा दबाव
इन घटनाक्रमों ने आदित्य ठाकरे और उद्धव ठाकरे के लिए गंभीर राजनीतिक और कानूनी संकट खड़ा कर दिया है।
क्योंकि:
दिशा सालियान मामले में एफआईआर दर्ज कराने की मांग अब और मजबूत हो गई है
मुंबई पुलिस पर कार्रवाई करने का दबाव बढ़ गया है
और सबसे बड़ा संकेत — कांग्रेस और शरद पवार इस मुद्दे पर आदित्य ठाकरे के साथ खड़े नजर नहीं आ रहे
यह उल्लेखनीय है कि आदित्य ठाकरे ने स्वयं हाई कोर्ट में एफआईआर दर्ज करने का विरोध करते हुए प्रोटेस्ट पिटीशन / इंटरवेंशन आवेदन दायर किया है, जो अब उनके खिलाफ एक राजनीतिक और नैतिक सवाल बनता जा रहा है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी — पुलिस की कहानी खारिज
हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर ने मुंबई पुलिस की पिछले 5 वर्षों से चल रही धारा 174 सीआरपीसी की ‘एक्सीडेंटल डेथ’ जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए उसे खारिज कर दिया।

हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर ने मुंबई पुलिस द्वारा पिछले 5 वर्षों से चलाई जा रही धारा 174 सीआरपीसी की तथाकथित ‘एक्सीडेंटल डेथ’ जांच पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा:
धारा 174 की जांच 24 घंटे के भीतर पूरी हो जानी चाहिए
यह केवल घटनास्थल की प्राथमिक जांच तक सीमित होती है
इसमें हत्या या अन्य संज्ञेय अपराधों की विस्तृत जांच का कोई स्थान नहीं है
और सतीश सालियान द्वारा दिया गया पेन ड्राइव भी इस जांच का हिस्सा नहीं बन सकता
इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने Sindhu Nagargoje (2023) और Amit Kumar (2025) मामलों में भी स्पष्ट कर दिया है कि धारा 174 का दायरा सीमित है और इसे संज्ञेय अपराधों की जांच के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
👉 स्पष्ट कानून यह है:
हत्या जैसे अपराधों की शिकायत की जांच धारा 174 के अंतर्गत नहीं की जा सकती
ऐसी जांच रिपोर्ट का कानून की नजर में कोई महत्व नहीं है
और एफआईआर दर्ज करके ही जांच करना अनिवार्य है
इसके बावजूद, गंभीर आरोप यह है कि मुंबई पुलिस और सरकारी वकीलों द्वारा पिछले 3 वर्षों से एफआईआर दर्ज किए बिना ही धारा 174 की आड़ में जांच चलाकर मामले को दबाने और आरोपी आदित्य ठाकरे को बचाने का प्रयास किया जा रहा था।
लेकिन अब मुख्य न्यायाधीश की कड़ी फटकार और स्पष्ट टिप्पणियां इस पूरे घटनाक्रम पर सीधा सवाल खड़ा करती हैं—
👉 क्या वर्षों तक जांच के नाम पर सच को दबाया गया?
यह टिप्पणी साफ संकेत देती है कि मामले को जानबूझकर लंबा खींचकर और सीमित जांच के दायरे में बांधकर वास्तविक अपराधों की जांच से बचने की कोशिश की गई।

🔥 अब सवाल सीधा है — FIR क्यों नहीं?
जब:
देश के मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस को फटकार लगाई
राहुल गांधी और शरद पवार ने FIR को नागरिक अधिकार बताया
और कानून भी यही कहता है
👉 तो फिर दिशा सालियान केस में FIR दर्ज क्यों नहीं?

**FIR का विरोध कर मुश्किल में आदित्य ठाकरे!

कांग्रेस–पवार ने बनाई दूरी, बढ़ा दबाव**

दिशा सालियान मामले में FIR दर्ज करने का विरोध करते हुए हाईकोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने वाले आदित्य ठाकरे अब घिरते नजर आ रहे हैं।

एक तरफ मुख्य न्यायाधीश की कड़ी फटकार, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और शरद पवार की यह स्पष्ट भूमिका कि FIR नागरिक का अधिकार है — इन दोनों के कारण ठाकरे पर न्यायिक और राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।

⚖️ कानून की कसौटी पर कमजोर पड़ती दलील

सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों और हाईकोर्ट की टिप्पणियों के चलते
👉 FIR का विरोध करने वाली यह स्थिति अब कानून की कसौटी पर टिकती हुई नहीं दिख रही है।

🧨 राजनीति बनाम न्याय — कौन जीतेगा?
यह मामला अब केवल एक आपराधिक जांच नहीं रहा —
यह न्याय बनाम सत्ता,
कानून बनाम दबाव,
और सच्चाई बनाम चुप्पी की लड़ाई बन चुका है।
👉 अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सवाल और जोर से उठेगा:
क्या कानून सभी के लिए समान है, या कुछ लोग उससे ऊपर हैं?

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