दिशा सालियन मामले में मुख्य न्यायाधीश की पुलिस को फटकार धारा 174 की आड़ में FIR टालने का मुंबई पुलीस खेल बेनकाब, पेन ड्राइव की सामग्री उस जांच का हिस्सा नहीं हो सकती

मुंबई: दिशा सालियन मामले में आज उच्च न्यायालय में हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर ने कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए मुंबई पुलिस की देरी की चालबाजी पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने साफ कहा कि पेन ड्राइव की सामग्री या बाद में सामने आए किसी नए साक्ष्य की जांच दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 174 के तहत नहीं की जा सकती। यह प्रावधान केवल घटनास्थल पर दिखाई देने वाली परिस्थितियों को दर्ज करने तक सीमित है, उससे आगे नहीं।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 174 के तहत की जाने वाली ऐसी कार्यवाही कुछ घंटों में पूरी हो सकती है और अधिकतम 24 घंटे में समाप्त हो जानी चाहिए। ऐसे में यह और भी चौंकाने वाली बात है कि मुंबई पुलिस पिछले 5 वर्ष 6 महीने से धारा 174 की जांच लंबित होने का बहाना बनाकर FIR दर्ज करने से बचती रही है।

दिशा सालियन के पिता श्री सतीश सालियन ने उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर कर आदित्य ठाकरे और अन्य के विरुद्ध सामूहिक बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की है। याचिका में इतने गंभीर आरोप लगाए जाने के बावजूद पुलिस ने कानूनन FIR दर्ज करने के बजाय बार-बार धारा 174 Cr.P.C. की रिपोर्ट का सहारा लिया और एक के बाद एक नए कारण देकर मामले को अंतिम निर्णय तक पहुँचने से रोकने की कोशिश की।

सुनवाई के दौरान मामला माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और माननीय न्यायमूर्ति श्री सुमन श्याम की खंडपीठ के समक्ष रखा गया। जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, मुख्य न्यायाधीश ने सरकारी वकिल से सीधा सवाल किया कि “क्या इस मामले में FIR दर्ज की गई है?”

इस पर राज्य की ओर से उपस्थित लोक अभियोजक ने कहा कि SIT धारा 174 Cr.P.C. के तहत जांच कर रही है और लगभग दो महीने पहले श्री सतीश सालियन द्वारा सौंपे गए पेन ड्राइव की सामग्री की जांच की जा रही है।

राज्य का यह पक्ष रखते ही अदालत ने स्पष्ट नाराजगी जाहिर की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि धारा 174 की कार्यवाही केवल अस्वाभाविक मृत्यु के मामलों में घटनास्थल पर दिखाई देने वाली परिस्थितियों के प्राथमिक लेखे-जोखे तक सीमित होती है। इस सीमित दायरे में बाद में मिले दस्तावेज़, पेन ड्राइव, नए साक्ष्य या विस्तृत जांच को शामिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ संकेत दिया कि धारा 174 को एक खुली, अनंत और व्यापक जांच में नहीं बदला जा सकता, खासकर तब जब सवाल गंभीर मामले में FIR दर्ज करने के वैधानिक कर्तव्य का हो।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि पेन ड्राइव की सामग्री धारा 174 की जांच का हिस्सा नहीं बन सकती। इन टिप्पणियों के बाद लोक अभियोजक और जांच अधिकारी के पास कोई ठोस उत्तर नहीं बचा। अंततः अदालत ने लोक अभियोजक को निर्देश दिया कि वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से स्पष्ट निर्देश प्राप्त करें और मामले को दो सप्ताह बाद के लिए स्थगित कर दिया।

इस सुनवाई ने मामले को बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर ला खड़ा किया है। मुख्य न्यायाधीश ने साफ कर दिया कि धारा 174 की आड़ लेकर FIR दर्ज करने से बचना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। अदालत की टिप्पणियों से यह भी स्पष्ट हो गया कि पुलिस अब तक जिस आधार पर FIR टालती रही, वह न्यायिक जांच की कसौटी पर टिकता नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय भी पहले ही कानून स्पष्ट कर चुका है कि जब हत्या या अन्य संज्ञेय अपराधों के आरोप सामने आते हैं, तब पुलिस पर FIR दर्ज करना अनिवार्य हो जाता है। धारा 174 की कार्यवाही से सामने आई सामग्री के आधार पर FIR दर्ज करने से इंकार नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में Amit Kumar v. Union of India, 2025 SCC OnLine SC 631 तथा Sindhu Janak Nagargoje v. State of Maharashtra, 2023 SCC OnLine SC 1833 के निर्णय महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

आज की सुनवाई के बाद एक बात पूरी तरह साफ हो गई है कि धारा 174 का सहारा लेकर FIR दर्ज करने से बचने की पुलिस की कोशिश को मुख्य न्यायाधीश ने सिरे से खारिज कर दिया है। अब यह मामला सीधे न्यायिक निगरानी के दायरे में आ गया है और पुलिस की भूमिका पर गंभीर प्रश्न खड़े हो चुके हैं।

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