बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद ईस्ट एंड वेस्ट डेवलपर्स ने बीएमसी को अल्टीमेटम जारी किया है कि वडाला प्रोजेक्ट से 7 दिनों के भीतर गोदरेज को हटाकर मूल कब्जा बहाल किया जाए, अन्यथा अवमानना (Contempt) की कार्यवाही शुरू की जाएगी।

हाई कोर्ट के स्टेटस क्वो एंटे आदेश के बाद गोदरेज की इस प्रोजेक्ट में एंट्री ही अवैध हो गई है, और साइट पर उसकी लगातार मौजूदगी हर दिन जारी रहने वाली अवमानना मानी जाएगी।

सरकार और स्वयं उच्च न्यायालय के साथ धोखाधड़ी करने के कारण, बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच पहले ही गोदरेज के निदेशकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के आदेश दे चुकी है।

स्पष्ट न्यायिक निर्देशों के बावजूद, गोदरेज द्वारा जनता को गुमराह किए जाने का आरोप है। इसी के चलते गोदरेज और उसकी विधिक प्रतिनिधि माधिया कापड़िया को ₹10,000 करोड़ की क्षतिपूर्ति की कानूनी नोटिस जारी की गई है, तथा कंपनी के खिलाफ दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही प्रस्तावित है।

अधिक कड़े कदम के रूप में, सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर 38 रूल 5 और धारा 151 के तहत एक याचिका दायर की जाने वाली है, जिसमें गोदरेज से ₹10,000 करोड़ की बैंक गारंटी जमा कराने, उसकी सभी संपत्तियों को कुर्क करने तथा आदेश के पूर्ण अनुपालन तक कंपनी के निदेशकों को हिरासत में लेने के निर्देश मांगे जाएंगे।

इन सभी घटनाक्रमों की पुष्टि वादी आयुष तिवारी के अधिवक्ता, एडवोकेट ईश्वरलाल अग्रवाल ने की है।

 

मुंबई : वडाला स्थित हजारों करोड़ के पुनर्विकास प्रोजेक्ट में बड़ा कानूनी विस्फोट सामने आया है। 12 मार्च 2026 को डिवीजन बेंच के आदेश के अनुसार, ईस्ट & वेस्ट डेवलपर्स ने बीएमसी को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट शब्दों में 7 दिनों का अल्टीमेटम दिया है—गोदरेज को तत्काल साइट से हटाकर मूल कब्जा बहाल किया जाए, अन्यथा न्यायालयीन अवमानना (Contempt) की कार्यवाही शुरू की जाएगी।

डिवीजन बेंच के 12 मार्च 2026 के आदेश के अनुसार, 23 जनवरी 2020 के सिंगल जज के आदेश सहित उसके बाद दिए गए सभी आदेश और अनुमतियां रद्द कर दी गई हैं।

गोदरेज को इस प्रोजेक्ट में मिली एंट्री, अनुमति और सभी अधिकार पूरी तरह उसी सिंगल जज के आदेश पर आधारित थे। अतः उस आदेश के रद्द होते ही संबंधित सभी अधिकार और अनुमतियां कानून की दृष्टि में पूर्णतः शून्य (void ab initio) हो गई हैं।

इसके अतिरिक्त, यदि उक्त आदेश के विरुद्ध कोई आपत्ति लेने या उसकी अवहेलना कर उसके पालन से बचने का प्रयास किया जाता है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध अवमानना कानून की धारा 2(b), 2(c) एवं 12 के तहत दीवानी और आपराधिक—दोनों प्रकार की कार्रवाई की जा सकती है। यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से स्थापित किया जा चुका है।

न्यायालय के आदेश की अवहेलना करने हेतु उसका गलत या सुविधानुसार अर्थ निकालना, पालन में टालमटोल करना, जानबूझकर देरी करना, प्रक्रिया को लंबित रखना, प्रशासनिक बहाने बनाकर बाधाएं उत्पन्न करना, अथवा आदेश को निष्प्रभावी करने का कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रयास—ये सभी कृत्य स्वयं में न्यायालय की अवमानना माने जाते हैं।

ऐसा आचरण केवल न्यायालय के आदेश का उल्लंघन नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है। इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और जनता का विश्वास कमजोर होता है। परिणामस्वरूप, ऐसे मामलों में न्यायालय कठोर दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है, जिसमें जुर्माना, कारावास या दोनों शामिल हो सकते हैं।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Celir LLP v. Sumati Prasad Bafna, 2024 SCC OnLine SC 3727 में यह कहा है:

“Any contumacious conduct of the parties to bypass or nullify the decision of the court or render it ineffective, or to frustrate the proceedings of the court, or to enure any undue advantage therefrom would amount to contempt.”

“Thus, the mere conduct of parties aimed at frustrating the court proceedings or circumventing its decisions, even without an explicit prohibitory order, constitutes contempt. Such actions interfere with the administration of justice, undermine the authority of the judiciary, and threaten the rule of law.”

सशर्त अनुमति पर खेला गया दांव — अब पूरी तरह उलट गया

बीएमसी द्वारा 05 नवंबर 2020 को गोदरेज को दी गई अनुमति स्पष्ट रूप से न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन (conditional) थी। अब हाई कोर्ट ने ईस्ट & वेस्ट के पक्ष में स्टेटस क्वो एंटे बहाल करते हुए निर्णय दिया है, जिससे गोदरेज की परियोजना में एंट्री का कानूनी आधार पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

परिणामस्वरूप, ऐसी सशर्त अनुमति के आधार पर दी गई सभी अनुमतियां, किए गए करार और हुए लेन-देन स्वतः ही निष्प्रभावी और निरस्त माने जाएंगे।

15.05.2022 की प्रकाशित जाहीर नोटिस के बावजूद लेन-देन — गोदरेज और खरीदारों के पास कोई बचाव नहीं; आपराधिक कार्रवाई के लिए मजबूत सबूत

ईस्ट & वेस्ट डेवलपर्स ने अपने वकील एडवोकेट निलेश ओझा के माध्यम से दिनांक 15.05.2022 को Free Press Journal, Mid-Day और Loksatta जैसे प्रमुख समाचारपत्रों में विस्तृत सार्वजनिक ‘कौशन नोटिस’ प्रकाशित की थी। इस नोटिस में जनता को स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि गोदरेज को दी गई अनुमतियां सशर्त हैं और मामला न्यायालय में विचाराधीन (sub judice) है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि गोदरेज और उसके सेल्स एक्जीक्यूटिव्स द्वारा किए जा रहे दावे तथ्यहीन, भ्रामक, कपटपूर्ण और धोखाधड़ीपूर्ण (unscrupulous, fraudulent and deceitful) हैं।

इस स्पष्ट सार्वजनिक चेतावनी के बावजूद, गोदरेज द्वारा परियोजना को आगे बढ़ाते हुए अनेक खरीदारों के साथ लेन-देन करने, कई फ्लैट्स बेचने और हजारों करोड़ रुपये एकत्र करने के आरोप लगाए गए हैं। विशेष रूप से, परियोजना को किसी भी कानूनी बाधा से मुक्त बताकर किए गए ये लेन-देन, उक्त नोटिस और लंबित न्यायिक कार्यवाही के संदर्भ में गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं।

महत्वपूर्ण यह है कि गोदरेज ने वर्ष 2022 में उच्च न्यायालय में झूठा शपथपत्र दाखिल कर न्यायालय को जानबूझकर गुमराह करते हुए, कपटपूर्ण तरीके से उक्त कौशन नोटिस को वापस लेने के लिए याचिका दायर की थी। हालांकि, जब ईस्ट & वेस्ट कंपनी ने ठोस और निर्विवाद साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर गोदरेज के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की, तब गोदरेज उस मांग पर आगे बढ़ने का साहस नहीं दिखा सका और पीछे हटने का रास्ता अपनाया।

न्यायालय ने भी कौशन नोटिस वापस लेने के लिए गोदरेज को कोई राहत प्रदान नहीं की। इतना ही नहीं, पिछले चार वर्षों में गोदरेज ने इस संबंध में अंतरिम राहत प्राप्त करने हेतु कोई प्रभावी कार्यवाही भी आगे नहीं बढ़ाई।

इन समस्त घटनाक्रमों से गोदरेज का झूठ, कपटपूर्ण आचरण, न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास तथा न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग पूरी तरह उजागर हो चुका है, और यह स्पष्ट हो गया है कि उनकी स्थिति कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं है।

परिणामस्वरूप, उक्त कौशन नोटिस को अब अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी दर्जा प्राप्त हो गया है और यह गोदरेज के विरुद्ध तथा बाद के खरीदारों के अधिकारों, दायित्वों और जिम्मेदारियों के निर्धारण में एक प्रभावी और निर्णायक साक्ष्य के रूप में स्थापित होती है।

सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट चेतावनी — निवेश किया तो जोखिम आपका

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब कोई मामला न्यायालय में लंबित (sub judice) हो, तब उस दौरान किया गया निवेश, निर्माण या फ्लैट की बिक्री किसी भी प्रकार का वैध कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं करती। ऐसे सभी लेन-देन को शून्य (null and void) घोषित किया जा सकता है।

इसका सीधा अर्थ है — न पैसा सुरक्षित है, न संपत्ति पर कोई वैध अधिकार।

गोदरेज के लिए ‘एडवेंचर’ बना ‘मिसएडवेंचर’

गोदरेज ने सशर्त अनुमतियों के आधार पर हजारों करोड़ रुपये का निवेश कर बड़ा दांव खेला, लेकिन अब वही दांव उल्टा पड़ गया है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद पूरे प्रोजेक्ट की कानूनी नींव हिल गई है और उससे जुड़े सभी लेन-देन गंभीर कानूनी संकट में आ गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने विभिन्न निर्णयों में स्पष्ट किया है कि ऐसी परिस्थितियों में खरीदारों के साथ किए गए लेन-देन कानून की दृष्टि में दोषपूर्ण (vitiated) माने जाते हैं। ऐसे खरीदारों को ‘बोना फाइड’ (सद्भावनापूर्ण) खरीदार का दर्जा नहीं मिलता। परिणामस्वरूप, उन्हें किसी प्रकार का स्टे या अंतरिम संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता और वे संपत्ति पर कोई वैध अधिकार भी दावा नहीं कर सकते।

कोर्ट ने आगे यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसी स्थिति में खरीदारों का एकमात्र उपाय यह है कि वे विक्रेता, जैसे कि गोदरेज, से अपनी निवेशित राशि, ब्याज और क्षतिपूर्ति की वसूली करें। साथ ही, यदि आवश्यक हो तो धोखाधड़ी और गलत प्रतिपादन (misrepresentation) के लिए आपराधिक कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है। विशेष रूप से तब, जब परियोजना को किसी भी कानूनी बाधा से मुक्त और सभी अनुमतियों को बिना शर्त बताया गया हो, तो यह गंभीर आपराधिक दायित्व उत्पन्न करता है।

⚖️ हाई कोर्ट ने उजागर किया गोदरेज का  धोखाधड़ी का मामला

बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने Godrej & Boyce Manufacturing Co. Pvt. Ltd. v. Union of India (1992) मामले में गोदरेज की कथित धोखाधड़ी की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। न्यायालय ने दर्ज किया कि कंपनी ने जाली दस्तावेज तैयार किए, झूठे साक्ष्य प्रस्तुत किए और न्यायालय को गुमराह किया—जो गंभीर अपराध हैं।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि इन कृत्यों का उद्देश्य सरकारी राजस्व के करोड़ों रुपये से बचना था, जो कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा है।

हाई कोर्ट ने इस मामले में गोदरेज और उसके निदेशकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के स्पष्ट निर्देश दिए और हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को स्वयं शिकायतकर्ता के रूप में मामला दर्ज करने का आदेश दिया।

माननीय न्यायालय ने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा:

“यदि न्यायालय ऐसे गंभीर धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार गोदरेज और उसके निदेशकों   के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहता है और उन्हें खुला छोड़ देता है, तो आने वाली पीढ़ियां न्यायपालिका को इस तरह की चूक के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।”

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