सुप्रीम कोर्ट की सभी अधिवक्ताओं को सख्त चेतावनी – बाध्यकारी पूर्व निर्णयों के विरुद्ध कोई तर्क स्वीकार्य नहीं — वकालत का उद्देश्य न्याय में सहयोग करना है, न कि स्थापित कानून के विरुद्ध निरर्थक बहस कर न्यायालय का समय बर्बाद करना। [Roma Ahuja v. State, 2026 INSC 336]

उक्त आदेश माननीय न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया तथा   प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ द्वारा पारित किया गया है।

 सुप्रीम कोर्ट ने पूर्णतः स्पष्ट और बाध्यकारी रूप से यह कानून स्थापित कर दिया है कि बाध्यकारी पूर्व निर्णयों (binding precedents) के विरुद्ध तर्क करना, अथवा ओवररूल्ड (overruled) या per incuriam निर्णयों पर निर्भर रहना, न्यायालय को जानबूझकर गुमराह करने के समान है और यह सीधे-सीधे न्यायालय की अवमानना (contempt of court) का गंभीर अपराध है।

ऐसा आचरण केवल अवैध ही नहीं बल्कि दंडनीय अपराध है, और यदि कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल के साथ मिलकर या उसकी सहायता से न्यायालय को गुमराह करता है, तो वह स्वयं भी समान रूप से अपराध का भागीदार बनता है और अभियोजन (prosecution) के लिए उत्तरदायी होता है।

यह आचरण अधिवक्ता के पक्ष में सबसे गंभीर और निंदनीय प्रकार का पेशेवर कदाचार (grossest form of professional misconduct) है, जो न केवल अधिवक्ता की विश्वसनीयता को समाप्त करता है बल्कि न्याय व्यवस्था की नींव को भी कमजोर करता है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में निर्देशित किया है कि सभी न्यायालय वकीलों के ऐसे आचरण को अत्यंत गंभीरता से लें, उसकी स्पष्ट निंदा करें और उसे अपने न्यायिक आदेशों में विधिवत दर्ज करें, ताकि ऐसे दुराचार पर प्रभावी रोक लगाई जा सके। [Lal Bahadur Gautam v. State of U.P., (2019) 6 SCC 441; Sajid Khan Moyal v. State of Rajasthan, 2014 SCC OnLine Raj 1450, ; State of Orissa v. Nalinikanta Muduli, (2004) 7 SCC 19,  E.S. Reddi , T.V. Choudhary, In re, (1987) 3 SCC 258; Sunita Pandey v. State of Uttarakhand, 2018 SCC OnLine Utt 933 Hindustan Organic Chemicals Ltd. v. ICI India Ltd., 2017 SCC OnLine Born 74,   Kusha Duruka v. State of Odisha, (2024) 4 SCC 432]

पूर्व में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा को अपमानजनक तरीके से प्रकरण से हटा दिया और भरी अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि वे अब Amicus Curiae के रूप में आवश्यक नहीं हैं। तत्पश्चात अधिवक्ता प्रशांत भूषण, अधिवक्ता विजय कुरले, अधिवक्ता निलेश ओझा तथा राशिद खान पठान द्वारा दायर रिट याचिकाओं से उत्पन्न मामलों में भारत के अटॉर्नी जनरल की नियुक्ति की गई।

 इसके अतिरिक्त, अधिवक्ता लूथरा के विरुद्ध बार काउंसिल ऑफ इंडिया के समक्ष गंभीर पेशेवर कदाचार (grave professional misconduct) की शिकायत दर्ज की गई है, जिसमें उन पर न्यायालय के साथ धोखाधड़ी (fraud upon the Court) करने का आरोप है, जो उन्होंने झूठे एवं भ्रामक कथनों के आधार पर न्यायालय से आदेश प्राप्त कर किया।

यह भी आरोप है कि उन्होंने बार-बार न्यायालय को गुमराह करने हेतु जानबूझकर अप्रासंगिक, ओवररूल्ड (overruled) तथा per incuriam निर्णयों का हवाला दिया, तथा बड़ी पीठों के बाध्यकारी पूर्व निर्णयों के प्रतिकूल छोटे पीठों के निर्णयों पर निर्भरता दिखाई, जो न केवल न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन है बल्कि न्यायालय के साथ धोखाधड़ी (fraud on the Court) तथा अधिवक्ता के पक्ष में सबसे गंभीर प्रकार का पेशेवर कदाचार (grossest form of professional misconduct) भी है।

Ahmad Asrab Vakil, AIR 1927 All 45 के मामले में एक अधिवक्ता को अपने मुवक्किल के साथ न्यायालय में झूठे निवेदन पर हस्ताक्षर करने के लिए दस वर्ष के कारावास की सजा दी गई थी। M. Veerbhadra Rao v. Tek Chand, AIR 1985 SC 28 में एक अधिवक्ता को झूठे दस्तावेजों पर काउंटरसाइन करने के कारण पाँच वर्ष के लिए निलंबित किया गया। Ashok Sarogi v. State, 2016 में दस्तावेजों की जालसाजी में अपने मुवक्किल के साथ संलिप्त पाए जाने पर अधिवक्ता की अग्रिम जमानत याचिका (anticipatory bail) खारिज कर दी गई।

इसी प्रकार, Badhuvan Kunhi v. K.M. Abdulla, MANU/KE/0828/2016 में न्यायालय ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने वाले अधिवक्ता के विरुद्ध अवमानना कार्यवाही प्रारंभ की तथा बार काउंसिल को संदर्भ भेजा, जबकि Ranbeer Singh v. State, 1990 (3) Crimes 207 में उच्च न्यायालय ने जालसाजी में संलिप्त अधिवक्ता के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन का निर्देश दिया।

इसके अतिरिक्त, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Roma Ahuja v. State, 2026 INSC 336 में स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया है कि अधिवक्ता बाध्यकारी पूर्व निर्णयों का सम्मान करने के लिए बाध्य हैं और केवल अपनी वकालत कौशल दिखाने के लिए स्थापित कानून के विरुद्ध तर्क नहीं दे सकते।

न्यायालय ने यह भी बलपूर्वक कहा कि अधिवक्ता न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग हैं और उन्हें निष्पक्षता, उत्तरदायित्व तथा स्थापित विधिक सिद्धांतों के प्रति पूर्ण निष्ठा के साथ कार्य करना अनिवार्य है। यह भी स्पष्ट किया गया कि स्थापित कानून के विरुद्ध तर्क करना या बाध्यकारी पूर्व निर्णयों की अवहेलना करना न केवल न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है बल्कि न्यायालय के बहुमूल्य समय की भी बर्बादी है।

 

Hindustan Organic Chemicals Ltd. v. ICI India Ltd., 2017 SCC OnLine Bom 74 में माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अधिवक्ताओं का यह कठोर दायित्व है कि वे न्यायालय को अनजाने में भी गुमराह न करें तथा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने से पूर्व उपलब्ध ऑनलाइन संसाधनों के माध्यम से विधिक शोध (legal research) कर यह सुनिश्चित करें कि जिन निर्णयों का वे हवाला दे रहे हैं, वे वर्तमान में प्रभावी (good law) हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऑनलाइन डेटाबेस की उपलब्धता अधिवक्ताओं को उनके इस दायित्व से मुक्त नहीं करती, बल्कि इसके विपरीत यह दायित्व और अधिक कठोर हो जाता है, और लापरवाहीपूर्ण शोध (slipshod research) पूर्णतः अक्षम्य है ।

अतः यह निर्विवाद रूप से स्थापित है कि अधिवक्ताओं पर यह अटल और अपरिहार्य दायित्व है कि वे केवल वैध और प्रभावी कानून का ही हवाला दें, और इस दायित्व का उल्लंघन—चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में—न्यायालय को गुमराह करने के समान है तथा गंभीर पेशेवर कदाचार का गठन करता है।

इसके अतिरिक्त, In Re: N. Peddi Raju, 2025 SCC OnLine SC 1694 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने यह प्रतिपादित किया कि अधिवक्ता, विशेषकर वरिष्ठ अधिवक्ता, न्याय प्रणाली का अभिन्न अंग होते हैं और उन पर न्यायालय के प्रति सर्वोपरि दायित्व (overriding duty) होता है, जो उनके मुवक्किल के प्रति दायित्व से भी ऊपर है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक आक्रामक, भावनात्मक अथवा अतिशयोक्तिपूर्ण तर्क (rhetoric) न्यायसंगत वकालत का स्थान नहीं ले सकते, और अधिवक्ताओं को सदैव न्यायालय के प्रति सम्मान, संयम और निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।

यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया कि अधिवक्ता का कर्तव्य है कि वह न्यायालय को गुमराह न करे, प्रासंगिक विधिक प्राधिकारों को न छिपाए, और आवश्यकता पड़ने पर अपने मुवक्किल के निर्देशों की अवहेलना करते हुए भी न्यायालय के प्रति अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दे।

इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि इससे न्यायालयों का बहुमूल्य समय सुरक्षित रहेगा, न्याय प्रक्रिया के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक लगेगी और निरर्थक (frivolous) मुकदमों में उल्लेखनीय कमी आएगी, जिससे न्याय वितरण प्रणाली की दक्षता और विश्वसनीयता और अधिक सुदृढ़ होगी।

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