मुंबई, 6 अगस्त। दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता निलेश ओझा ने बॉम्बे हाईकोर्ट में 3 अगस्त 2026 को हुई सुनवाई के बाद मुख्य लोक अभियोजक (Chief Public Prosecutor) तथा जांच अधिकारी (Investigating Officer) को एक विस्तृत कानूनी पत्र भेजकर तीन दिनों के भीतर जांच से संबंधित सभी दस्तावेज़, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य एवं रिकॉर्ड उपलब्ध कराने की मांग की है।
पत्र में कहा गया है कि 3 अगस्त 2026 की सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्वयं रिकॉर्ड किया कि याचिकाकर्ता की यह शिकायत है कि पुलिस द्वारा तैयार की गई दोनों Accidental Death Reports (ADR) तथा उनसे संबंधित आवश्यक दस्तावेज़ अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया कि दिशा सालियन के अधिवक्ता द्वारा मांगे गए सभी दस्तावेज़ों एवं रिकॉर्ड की सूची पहले से मुख्य लोक अभियोजक तथा जांच अधिकारी को उपलब्ध कराई जाए, ताकि अगली सुनवाई से पूर्व संबंधित सामग्री का आदान-प्रदान किया जा सके। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि मांगी गई सामग्री उपलब्ध नहीं कराई जाती है अथवा उसके संबंध में विवाद बना रहता है, तो इस मुद्दे पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा।
अधिवक्ता निलेश ओझा ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि यदि बॉम्बे हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों और निर्देशों के बावजूद पुलिस अथवा जांच एजेंसी निर्धारित अवधि के भीतर आवश्यक दस्तावेज़, रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड एवं अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराती, तो इस तथ्य को अगली सुनवाई में न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा। उन्होंने कहा है कि यदि बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणियों एवं निर्देशों के बावजूद पुलिस अथवा जांच एजेंसी निर्धारित अवधि के भीतर आवश्यक दस्तावेज़, रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड एवं अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराती, तो इस तथ्य को अगली सुनवाई में न्यायालय के समक्ष रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति संबंधित पुलिस अधिकारियों द्वारा आरोपित व्यक्तियों को बचाने के उद्देश्य से अपने वैधानिक एवं संवैधानिक कर्तव्यों का जानबूझकर निर्वहन न करने, न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में अवैध हस्तक्षेप, न्यायालय की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करने, न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना, न्यायिक प्रक्रिया के अनुपालन में विफलता तथा गंभीर सरकारी कदाचार (Serious Misconduct) का मामला बन सकती है। ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court), प्रतिकूल आदेश (Adverse Orders), दंडात्मक लागत (Punitive Costs) तथा कानून के अनुसार अन्य उपयुक्त न्यायिक एवं दंडात्मक कार्रवाई किए जाने का अनुरोध करेंगे।
याचिकाकर्ताओं द्वारा भेजे गए पत्र में अत्यंत व्यापक रिकॉर्ड की मांग की गई है। इनमें वर्ष 2021 में तैयार की गई मूल ADR जांच का पूरा रिकॉर्ड, हाल ही में SIT द्वारा की गई पुनः जांच का संपूर्ण रिकॉर्ड, सभी गवाहों के बयान, सभी गवाहों को जारी किए गए समन एवं नोटिस, सभी आरोपितों, संदिग्ध व्यक्तियों, संबंधित व्यक्तियों तथा जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों के मोबाइल टावर लोकेशन रिकॉर्ड (Tower Location), कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), IPDR, डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक डेटा, पोस्टमार्टम वीडियो, मेडिकल रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट, घटनास्थल पुनर्निर्माण (Scene Reconstruction) की रिपोर्ट एवं वीडियो, मूल फोटोग्राफ, फोटो नेगेटिव, अपराध स्थल पंचनामा, मोबाइल फोन की क्लोन इमेज (Forensic Clone Images), डिजिटल फोरेंसिक रिकॉर्ड तथा बिहार पुलिस, सीबीआई (CBI), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) एवं अन्य केंद्रीय एवं राज्य सरकारी एजेंसियों के साथ हुए समस्त पत्राचार, फाइल नोटिंग, कानूनी राय एवं संचार अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई हैं।
याचिकाकर्ताओं ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(4) के अनुपालन से संबंधित समस्त रिकॉर्ड भी मांगा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पहले स्थानीय पुलिस द्वारा की गई ADR जांच तथा बाद में SIT द्वारा की गई पुनः जांच के दौरान दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन को जांच के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण में उपस्थित रहने हेतु विधि के अनुसार नोटिस जारी किया गया था या नहीं। धारा 176(4) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संदिग्ध मृत्यु की मजिस्ट्रियल/ADR जांच मृतक के निकट संबंधियों की उपस्थिति एवं सहभागिता के साथ पारदर्शी ढंग से की जाए। इसलिए यदि स्थानीय पुलिस अथवा SIT ने सतीश सालियन को किसी भी महत्वपूर्ण जांच चरण—जैसे गवाहों के बयान, घटनास्थल निरीक्षण, साक्ष्य संकलन, फोरेंसिक कार्यवाही, पुनर्निर्माण (Scene Reconstruction) अथवा अन्य महत्वपूर्ण जांच कार्यवाही—में उपस्थित रहने का अवसर नहीं दिया, तो उसके कारणों, फाइल नोटिंग, आदेश, अनुमोदन तथा संबंधित समस्त रिकॉर्ड की भी मांग की गई है।
पत्र में स्पष्ट किया गया है कि ये सभी दस्तावेज़ आगामी सुनवाई में न्यायालय की प्रभावी सहायता करने तथा निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं। इसी कारण जांच अधिकारी एवं लोक अभियोजक से तीन दिनों के भीतर समस्त रिकॉर्ड उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है।