भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली इस मूलभूत सिद्धांत पर आधारित है कि
“भले ही सौ अपराधी छूट जाएँ, परंतु एक भी निर्दोष को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।”
फिर भी अंकुश मारुति शिंदे बनाम महाराष्ट्र राज्य का यह प्रकरण इस कटु सत्य का भयावह उदाहरण बन गया कि कभी-कभी सर्वोच्च न्यायालय जैसी सर्वोच्च संस्था से भी गंभीर न्यायिक त्रुटियाँ हो सकती हैं।
इस मामले में निर्दोष व्यक्तियों को दी गई मृत्युदंड की सज़ा सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय—तीनों स्तरों पर कायम रही। परंतु बाद में सर्वोच्च न्यायालय की एक वरिष्ठ पीठ ने इस गंभीर गलती को पहचाना, सभी आरोपियों को निर्दोष घोषित किया और उन्हें हुए अपार मानसिक, सामाजिक तथा व्यक्तिगत नुकसान के लिए ₹30 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया। साथ ही संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जाँच कर कठोर कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए।
यह मामला छह गरीब, अशिक्षित और घुमंतू–विमुक्त जातियों से आने वाले मजदूरों को झूठे मामले में फँसाकर उन्हें फाँसी की सज़ा तक पहुँचाने की एक अत्यंत पीड़ादायक कथा है—जिन्हें पूरे दस वर्षों के संघर्ष के बाद निर्दोष घोषित किया गया।
घटना और जाँच की पृष्ठभूमि
5 जून 2003 की रात नासिक जिले में सटोटे परिवार की झोपड़ी पर कथित रूप से कुछ अज्ञात लोगों द्वारा हमला कर लूट, सामूहिक बलात्कार और हत्या किए जाने का आरोप लगाया गया। इस घटना से समाज में भारी आक्रोश फैला और पुलिस पर “अपराधियों को तुरंत पकड़ने” का जबरदस्त दबाव बना।
वास्तविक अपराधियों का पता न चल पाने के कारण पुलिस ने घुमंतू–विमुक्त समाज के छह गरीब मजदूरों को बिना किसी ठोस सबूत के आरोपी बना लिया। डीएनए और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य उनकी निर्दोषता की ओर स्पष्ट संकेत दे रहे थे, परंतु इन्हें न्यायालय के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुत ही नहीं किया गया।
तफ्तीश एजेंसी की गंभीर त्रुटियों, दबाव में लिए गए कथित कबूलनामों और झूठे गवाहों के आधार पर पूरा मुकदमा खड़ा किया गया—जिसके परिणामस्वरूप निर्दोष व्यक्तियों को मृत्युदंड की सज़ा सुना दी गई।
सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
सत्र न्यायालय ने संदिग्ध साक्ष्यों के आधार पर सभी छह आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सज़ा सुनाई।
इसके बाद मामला मुंबई उच्च न्यायालय पहुँचा। न्यायमूर्ति बी.एच. मार्लापल्ले और न्यायमूर्ति आर.एस. मोहिते की खंडपीठ ने 22 मार्च 2007 को सत्र न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। तीन आरोपियों—अंकुश मारुति शिंदे, राज्या शिंदे और राजू म्हसु शिंदे—को फाँसी की सज़ा दी गई और बाकी तीन को आजीवन कारावास।
पूरा मामला लगभग पूरी तरह संदिग्ध पहचान परेड पर आधारित था, और फॉरेंसिक साक्ष्य आरोपियों को अपराध से जोड़ने में विफल रहे, फिर भी उच्च न्यायालय ने मृत्युदंड के मामलों में अनिवार्य “संदेह का लाभ” देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। 2009 में अंकुश मारुति शिंदे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009) 6 SCC 667 के तहत न्यायमूर्ति डॉ. अरिजित पसायत और न्यायमूर्ति डॉ. मुकुंदकम शर्मा की दो-सदस्यीय पीठ ने राज्य की अपील स्वीकार करते हुए मृत्युदंड की पुष्टि कर दी। इस प्रकार अविश्वसनीय और कानूनी रूप से अस्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर छह निर्दोष गरीब व्यक्तियों को फाँसी के कगार पर पहुँचा दिया गया।
दस वर्ष बाद सत्य की जीत
लगभग दस वर्ष बाद आखिरकार सत्य उजागर हुआ। अंकुश मारुति शिंदे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) 15 SCC 470 में न्यायमूर्ति एम.आर. शाह, न्यायमूर्ति ए.के. सीकरी और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नज़ीर की तीन-सदस्यीय पीठ ने पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा की।
इस पुनर्मूल्यांकन में यह सामने आया कि—
- अभियोजन पक्ष का पूरा मामला झूठा और विरोधाभासों से भरा था
- पहचान परेड अविश्वसनीय और विलंबित थी
- निर्दोषता दर्शाने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य दबाए गए थे
- डीएनए और अन्य फॉरेंसिक साक्ष्य आरोपियों को अपराध से जोड़ने में पूरी तरह विफल थे
इन तथ्यों के आधार पर वरिष्ठ पीठ ने सभी छह आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया।
मुआवज़ा और जाँच के आदेश
केवल निर्दोष घोषित करने पर ही न्यायालय नहीं रुका। दस वर्षों तक फाँसी की आशंका में जीवन बिताने वाले इन निर्दोष लोगों के साथ हुए घोर अन्याय को देखते हुए—
- प्रत्येक आरोपी को ₹30 लाख मुआवज़ा देने का आदेश दिया गया
- संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जाँच के निर्देश दिए गए
- दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश दिए गए
न्याय व्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न
यह मामला कई गंभीर प्रश्न उठाता है—
- यदि सर्वोच्च न्यायालय से भी ऐसी गलती हो सकती है, तो गरीब नागरिकों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है?
- दबाव में काम करने वाली जाँच एजेंसियाँ कितनी घातक साबित हो सकती हैं?
- मृत्युदंड जैसे मामलों में साक्ष्यों की कड़ी जाँच क्यों नहीं हुई?
- निर्दोषों के वर्षों तक जेल में सड़ने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
यह मामला दिखाता है कि किस प्रकार कमजोर और हाशिये पर पड़े लोग बेईमान पुलिस अधिकारियों के आसान शिकार बन सकते हैं, और किस प्रकार कुछ न्यायाधीश गरीबों के मामलों में आवश्यक सावधानी नहीं बरतते।
कानूनी उत्तरदायित्व का सिद्धांत
भारतीय कानून के अनुसार, जो पुलिस अधिकारी झूठे सबूत गढ़ते हैं, फर्जी गवाह पेश करते हैं या निर्दोषों को गंभीर अपराधों में फँसाते हैं—वे सभी भारतीय दंड संहिता की धाराओं 192, 193, 194, 211, 120-बी और 34 के अंतर्गत दंडनीय हैं।
साथ ही, जो सरकारी अधिकारी निराधार अपीलें दाखिल कराकर जनता के धन का दुरुपयोग करते हैं, उन्हें भी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।
न्यायालयों ने कई महत्वपूर्ण निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए दोषी अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूली की जा सकती है, जिनमें प्रमुख निर्णय इस प्रकार हैं—
- Mehmood Nayyar Azam v. State of Chhattisgarh, (2012) 8 SCC 1
- S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews, (2018) 10 SCC 804
- Union of India v. Pirthwi Singh, (2018) 16 SCC 363
- Walmik Bobde v. State of Maharashtra, 2001 ALL MR (Cri) 1731
- Ramesh Lawrence Maharaj v. Attorney General of Trinidad & Tobago, (1978) 2 WLR 902
ये सभी निर्णय यह स्पष्ट करते हैं कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में किसी भी सार्वजनिक अधिकारी को संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।
फौजदारी कानून का एक साफ़ और कड़ा सिद्धांत है—अगर किसी जांच अधिकारी ने झूठा मामला बनाया, फर्जी सबूत गढ़े, या जानबूझकर सच छिपाया, तो सिर्फ वही नहीं, बल्कि उसका साथ देने वाला हर व्यक्ति अपराधी माना जाएगा। इसमें वो लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिन्होंने जानते-बूझते ऐसे गैरकानूनी कामों को संरक्षण दिया—यहाँ तक कि अगर कोई जज भी ऐसे काम को जानबूझकर बढ़ावा देता है, तो कानून की नजर में वो भी जवाबदेह होगा।
कानून में इसे कहा जाता है—“डॉक्ट्रिन ऑफ कॉन्सपिरेसी” यानी साजिश का सिद्धांत।
कट-रचना (doctrine of conspiracy) के सिद्धांत के अनुसार आपराधिक उत्तरदायित्व के लिए पात्र ठहरते हैं। कानून किसी भी पद या अधिकार को संरक्षण प्रदान नहीं करता, और न्यायिक प्रक्रिया का जानबूझकर दुरुपयोग करने वाले सभी घटक समान रूप से उत्तरदायी होते हैं।
Raman Lal v. State, 2001 Cri LJ 800 के महत्वपूर्ण निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया है कि जहाँ किसी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करके झूठे मामले में फँसाया जाता है, वहाँ ऐसे अवैध कृत्य में सम्मिलित सभी व्यक्ति—चाहे वे जाँच अधिकारी हों, अभियोजक हों या न्यायिक प्रक्रिया में सहायता करने वाले अन्य अधिकारी—कानूनी रूप से उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं। इस निर्णय ने यह सिद्धांत दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित किया कि न्याय प्रणाली का दुरुपयोग मात्र प्रक्रियागत त्रुटि नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक प्रकृति का अपराध है, और इसके लिए जिम्मेदार प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध कठोर कार्रवाई अनिवार्य है।
Shivnarayan Laxminarayan Joshi v. State of Maharashtra, (1980) 2 SCC 465 के निर्णय पर आधारित रहते हुए न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“कट-रचना के संबंध में प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करना प्रायः असंभव होता है, इसलिए ऐसा अपराध मुख्य रूप से कट-रचना के उद्देश्य से किए गए कृत्यों अथवा अवैध कार्यों या चूक से निकाले गए निष्कर्षों के माध्यम से सिद्ध होता है। एक बार कट-रचना सिद्ध हो जाने पर, एक कट-रचनाकार का कृत्य अन्य सभी का कृत्य माना जाता है। जो व्यक्ति बाद में कट-रचना में शामिल होकर उसे आगे बढ़ाने के उद्देश्य से स्पष्ट कृत्य करता है, वह सह-कट-रचनाकार भी उतना ही उत्तरदायी ठहरता है।”
जब न्यायिक आदेश बाध्यकारी कानूनी सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए पारित किए जाते हैं और उनके परिणामस्वरूप नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तब ऐसे कृत्यों पर “कानूनी दुर्भावना” (legal malice) का सिद्धांत लागू होता है। यह विधिस्थापित सिद्धांत है कि अवैध आदेशों के कारण अधिकारों के उल्लंघन को “निर्दोष त्रुटि” के बहाने उचित नहीं ठहराया जा सकता।
Sama Aruna v. State of Telangana, (2018) 12 SCC 150 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कानूनी दुर्भावना की अवधारणा को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया है—
“जो व्यक्ति कानून के विरुद्ध किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुँचाता है, वह यह दावा नहीं कर सकता कि उसने ऐसा निर्दोष मन से किया। कानून सभी को ज्ञात माना जाता है और प्रत्येक व्यक्ति को कानून की सीमाओं के भीतर ही कार्य करना चाहिए। अतः वह कानूनी दुर्भावना का दोषी ठहराया जाएगा, भले ही उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार उसने अज्ञानता या निरपराध भाव से कार्य किया हो।”
इसके अतिरिक्त, स्थापित कानूनी मानकों का स्पष्ट उल्लंघन करते हुए आदेश पारित करना भारतीय दंड संहिता की धारा 219 के अंतर्गत दायित्व उत्पन्न कर सकता है, जो कानून के विरुद्ध भ्रष्ट या दुर्भावनापूर्ण न्यायिक कृत्यों से संबंधित है। जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित अनिवार्य सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना मृत्युदंड की सज़ा सुनाई जाती है, तब ऐसे आदेश नागरिकों पर गंभीर अन्याय करने वाले अवैध न्यायिक कृत्यों की श्रेणी में आते हैं।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री अरिजित पसायत का पूर्व कदाचार : ज़ाहिरा शेख को अवैध कारावास – अरिजित पसायत का कृत्य धारा 219 और 220 IPC के अंतर्गत दंडनीय
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री अरिजित पसायत द्वारा अनेक मामलों में गंभीर न्यायिक अवैधता और अधिकारों के दुरुपयोग के उदाहरण सामने आए हैं। इसका एक प्रमुख और स्पष्ट उदाहरण Zahira Habibullah Sheikh v. State of Gujarat, (2006) 3 SCC 374 का मामला है। इस प्रकरण में उन्होंने ज़ाहिरा शेख को न्यायालय की अवमानना के लिए एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई, जबकि Contempt of Courts Act, 1971 के अंतर्गत अधिकतम दंड केवल छह माह तक ही सीमित है।
छह माह से अधिक दी गई यह सजा इसलिए प्रत्यक्ष रूप से अवैध, अधिकार क्षेत्र से परे और विधि की दृष्टि में शून्य (void) थी। परिणामस्वरूप, ज़ाहिरा शेख को अतिरिक्त छह माह के लिए रखा गया कारावास पूर्णतः अवैध निरोध की श्रेणी में आता है। इस प्रकार का कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 219 और 220 के अंतर्गत प्रत्यक्ष रूप से दायित्व उत्पन्न करता है, जो क्रमशः दुर्भावनापूर्ण और अवैध न्यायिक आदेश पारित करने तथा न्यायिक अधिकार के अंतर्गत गलत तरीके से निरुद्ध रखने से संबंधित अपराधों से जुड़ी धाराएँ हैं।
यह दंड भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(1) का सीधा उल्लंघन था, जो स्पष्ट रूप से यह निषेध करता है कि किसी व्यक्ति को अपराध के समय प्रचलित विधि द्वारा निर्धारित दंड से अधिक कठोर दंड नहीं दिया जा सकता। भले ही यह माना जाए कि अवमानना अधिकार का प्रयोग संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत किया गया था, फिर भी वह अनुच्छेद 20(1) में निहित संवैधानिक प्रतिबंध को निरस्त या उपेक्षित नहीं कर सकता। यही संरक्षण अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अनुबंध (ICCPR) के अनुच्छेद 15(1) के अंतर्गत भी प्रदान किया गया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि लागू दंड से अधिक कठोर दंड किसी भी स्थिति में आरोपित नहीं किया जा सकता।
Supreme Court Bar Association v. Union of India, (1998) 4 SCC 409 तथा Pallav Seth v. Custodian, (2001) 7 SCC 549 के निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित किया है कि Contempt of Courts Act, 1971 में जो दंड निर्धारित नहीं है, उसे स्वयं सर्वोच्च न्यायालय भी आरोपित नहीं कर सकता। इसी विधिक सिद्धांत को आगे Vijay Singh v. State of U.P., (2012) 5 SCC 242 में पुनः सुदृढ़ किया गया, जहाँ यह स्पष्ट कहा गया कि “कानून द्वारा निर्धारित न किया गया दंड किसी भी परिस्थिति में लागू नहीं किया जा सकता।”
अतः, ज़ाहिरा शेख के मामले में दी गई एक वर्ष की सजा असंवैधानिक, मनमानीपूर्ण और न्यायिक अधिकारों के स्पष्ट दुरुपयोग का उदाहरण थी, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विधि के शासन के मूलभूत सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन सिद्ध होती है।
कानून के शासन (Rule of Law) के मूलभूत सिद्धांत के अनुसार, कोई भी प्राधिकारी—चाहे वह कार्यपालिका हो या न्यायपालिका—संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं है। जब प्रणालीगत विफलताओं के कारण निर्दोष व्यक्तियों को गलत दोषसिद्धि का सामना करना पड़ता है और उन्हें वर्षों तक कारावास झेलना पड़ता है, तब कानून न केवल पीड़ितों को मुआवज़ा प्रदान करने का आदेश देता है, बल्कि उस अन्याय के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने की भी अनिवार्यता स्थापित करता है।
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अंकुश मारुति शिंदे प्रकरण की कथा हमें यह सिखाती है कि न्यायिक त्रुटियाँ सर्वोच्च स्तर पर भी हो सकती हैं; परंतु न्याय व्यवस्था की वास्तविक शक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की क्षमता में निहित है—चाहे वह सुधार विलंब से ही क्यों न हो। छह निर्दोष व्यक्तियों के खोए हुए जीवन के वर्ष यह गंभीर चेतावनी देते हैं कि जीवन और मृत्यु से जुड़े मामलों में कानून कभी भी लापरवाह, यांत्रिक या संदेह के प्रति उदासीन नहीं हो सकता।