UBT के 6 सांसदों के विलय को चुनौती देने वाली याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पर बड़ा कानूनी पेच

UBT की याचिका में मुख्य और निर्णायक मुद्दा यह है कि क्या मूल राजनीतिक दल (Original Political Party) की सहमति अथवा उसके स्तर पर merger के बिना, दो-तिहाई विधायक/सांसद केवल अपने संख्याबल के आधार पर किसी दूसरे राजनीतिक दल में merger कर सकते हैं?

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ठीक यही मूल कानूनी प्रश्न Girish Chodankar v. Goa Legislative Assembly मामले में CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बड़ी बेंच के समक्ष पहले से विचाराधीन है।

Girish Chodankar v. Goa Legislative Assembly, 2022 SCC OnLine Bom 377 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कांग्रेस विधायकों के BJP में merger को मान्यता देने वाले निर्णय को बरकरार रखा था। उस फैसले के विरुद्ध कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और SLP (C) No. 5256 of 2025 में उठाया गया मूल प्रश्न भी यही है—क्या मूल राजनीतिक दल की सहमति अथवा merger के बिना दो-तिहाई विधायक अपने संख्याबल के आधार पर किसी दूसरे राजनीतिक दल में merger कर सकते हैं?

विशेष रूप से, 23 जुलाई 2026 को CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बेंच ने गोवा मामले की सुनवाई दिसंबर 2026 में निर्धारित की है।

बड़ी बेंच के समक्ष वही प्रश्न लंबित रहते हुए छोटी बेंच द्वारा उसी मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय Judicial Discipline के विरुद्ध — एड. निलेश ओझा

राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति के चेयरमैन एड. निलेश ओझा का स्पष्ट और दृढ़ दावा है कि, जब UBT मामले का वही निर्णायक कानूनी प्रश्न CJI की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बड़ी बेंच के समक्ष पहले से विचाराधीन है, तब दो-जजों की छोटी बेंच द्वारा उसी प्रश्न पर स्वतंत्र रूप से सुनवाई करके अंतिम निर्णय देना Judicial Discipline, Judicial Propriety, Bench Propriety और Certainty of Law के सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित मूल सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।

ऐसी परिस्थिति में न्यायिक अनुशासन के अनुरूप छोटी बेंच के सामने सीमित रास्ते हैं—या तो मामले को CJI/बड़ी बेंच के समक्ष उचित आदेश के लिए रखा जाए, अथवा बड़ी बेंच के निर्णय की प्रतीक्षा की जाए।

Co-ordinate Bench भी परस्पर-विरोधी निर्णय नहीं दे सकती

हाल ही में Confederation of Real Estate Developers of India v. Vanashakti, 2025 SCC OnLine SC 2474 में सुप्रीम कोर्ट की तीन-जजों की बेंच ने दो-जजों की बेंच के निर्णय को रद्द करते हुए Judicial Discipline के महत्व को रेखांकित किया। समान संख्या वाली Co-ordinate Bench of Equal Strength द्वारा लिए गए binding view के विपरीत दूसरी co-ordinate Bench का स्वतंत्र विरोधी दृष्टिकोण अपनाना न्यायिक अनुशासन के अनुरूप नहीं है; बड़ी बेंच द्वारा घोषित कानून का पालन करना तो छोटी बेंच पर अनिवार्य है।

इसके पीछे कारण अत्यंत गंभीर है। यदि समान संख्या वाली बेंचों को भी एक ही कानूनी प्रश्न पर परस्पर-विरोधी निर्णय देने की छूट दी जाए, तो कानून में certainty समाप्त होगी और उससे judicial anarchy पैदा होने का खतरा उत्पन्न होगा। बड़ी बेंच की प्रधानता केवल न्यायिक परंपरा नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय की संस्थागत न्यायिक व्यवस्था और अनुशासन की बुनियाद है।

बड़ी बेंच के binding आदेश में हस्तक्षेप करने का छोटी बेंच को अधिकार नहीं

इससे भी महत्वपूर्ण, Subrata Roy Sahara v. Union of India, (2014) 8 SCC 470 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट की छोटी बेंच को बड़ी बेंच द्वारा पारित अंतिम और binding आदेश में हस्तक्षेप करने, उसमें बदलाव करने अथवा उसकी शर्तों को शिथिल करने का अधिकार या jurisdiction नहीं है; ऐसा किया जाना छोटी बेंच की ओर से भी Contempt of Court का विषय बन सकता है।

वरिष्ठ न्यायालय में मामला लंबित रहते हुए जल्दबाजी में अंतिम आदेश — Technical Contempt

इसी प्रकार S. Abdul Karim v. M.K. Prakash, (1976) 1 SCC 975 : AIR 1976 SC 859 में तीन-जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि जब संबंधित न्यायिक अधिकारी को यह जानकारी हो कि उसी विषय से संबंधित कार्यवाही वरिष्ठ न्यायालय में लंबित है, तब जल्दबाजी में अंतिम आदेश पारित करने के बजाय वरिष्ठ न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करना विवेकपूर्ण और न्यायोचित रास्ता है।

उस मामले में वरिष्ठ न्यायालय में कार्यवाही लंबित रहने के बावजूद अंतिम आदेश पारित करने वाले संबंधित न्यायिक अधिकारी की कार्रवाई को “technical contempt” माना गया था; हालांकि mens rea के अभाव में उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई आवश्यक नहीं मानी गई।

सुप्रीम कोर्ट की प्रत्येक बेंच की जिम्मेदारी—Conflicting Decisions पैदा न हों

Som Mittal v. Govt. of Karnataka, (2008) 3 SCC 574 में तीन-जजों की बेंच ने रेखांकित किया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश के सभी न्यायालयों पर binding है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की सभी बेंचों को भी यह विशेष सावधानी बरतनी आवश्यक है कि उनके निर्णय मौजूदा कानून अथवा सुप्रीम कोर्ट के अन्य binding decisions के साथ किसी प्रकार का संघर्ष, भ्रम या असंगति पैदा न करें।

असहमति होने पर भी बड़ी Bench के कानून को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

हाल ही में Sayed Iftikhar v. NIA, 2026 INSC 503 में सुप्रीम कोर्ट ने पुनः स्पष्ट किया कि Judicial Discipline और Certainty of Law के अनुसार छोटी बेंच बड़ी बेंच द्वारा घोषित कानून से पूर्णतः बंधी हुई है। यदि छोटी बेंच बड़ी बेंच द्वारा निर्धारित ratio से सहमत नहीं है, तब भी उसे नजरअंदाज करके अपना अलग कानून घोषित करना कोई विकल्प नहीं है; उचित रास्ता CJI के समक्ष reference करके मामले को और बड़ी बेंच के विचारार्थ रखना है।

इसी प्रकार New India Assurance Co. Ltd. v. Dolly Satish Gandhi, 2026 INSC 498 में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालयों की स्वतंत्र जिम्मेदारी बताते हुए स्पष्ट किया कि उन्हें सही कानून लागू करना, binding precedents के साथ consistency बनाए रखना और per incuriam decisions से बचना आवश्यक है।

तो दो-जजों की बेंच के सामने कानूनसम्मत रास्ता क्या है?

यदि UBT के छह सांसदों के मामले का निर्णायक प्रश्न और Girish Chodankar मामले में CJI की तीन-जजों की बेंच के समक्ष लंबित प्रश्न एक ही अथवा substantially identical है, तो दो-जजों की बेंच को उसी मुद्दे पर स्वतंत्र अंतिम निर्णय देकर संभावित conflicting adjudication की स्थिति पैदा करने से बचना चाहिए, ऐसा एड. ओझा का दावा है।

उनके अनुसार, ऐसी परिस्थिति में Judicial Discipline के अनुरूप रास्ता है—Registry के माध्यम से मामले को Hon’ble CJI के समक्ष रखकर संबंधित बड़ी बेंच के समक्ष सुनवाई के लिए उचित आदेश प्राप्त किए जाएं, अथवा Girish Chodankar मामले में बड़ी बेंच का निर्णय आने तक उसी निर्णायक प्रश्न पर अंतिम adjudication को स्थगित रखा जाए।

UBT के सामने एक और कानूनी अड़चन—Bombay High Court का मौजूदा फैसला उसके तर्क के विपरीत

UBT के लिए एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Girish Chodankar में बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला आज की तारीख में रद्द नहीं हुआ है। वह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के अधीन अवश्य है, लेकिन केवल appeal/SLP लंबित होने से मूल निर्णय स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।

इसलिए UBT जिस interpretation पर अपनी पूरी याचिका खड़ी कर रहा है, उसी interpretation की correctness अब CJI की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बड़ी बेंच के समक्ष परीक्षण के लिए लंबित है। ऐसे में छोटी बेंच द्वारा बड़ी बेंच से पहले उसी प्रश्न पर स्वतंत्र अंतिम interpretation देने के बजाय बड़ी बेंच के निर्णय की प्रतीक्षा करने का judicial और institutional justification और अधिक मजबूत हो जाता है।

एक Supreme Court, एक कानून—एक ही प्रश्न पर दो परस्पर-विरोधी निर्णयों की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए

इस पूरे विवाद का मूल अत्यंत स्पष्ट है—सुप्रीम कोर्ट एक ही है। उसी न्यायालय की अलग-अलग बेंचों द्वारा एक ही निर्णायक कानूनी प्रश्न पर परस्पर-विरोधी निष्कर्ष देने की स्थिति पैदा होने पर Certainty of Law, Consistency of Judicial Decisions और सुप्रीम कोर्ट की Institutional Credibility प्रभावित हो सकती है।

इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं रह गया कि “UBT के छह सांसदों का merger वैध है या अवैध?” उससे पहले एक अधिक बुनियादी सवाल खड़ा है—

“जिस मुद्दे पर CJI की अध्यक्षता वाली तीन-जजों की बड़ी बेंच पहले से निर्णय के लिए seized है और जिसकी सुनवाई दिसंबर 2026 में निर्धारित है, उसी मुद्दे पर दो-जजों की छोटी बेंच उससे पहले स्वतंत्र अंतिम निर्णय देने की जल्दबाजी क्यों करे?”

एड. निलेश ओझा के अनुसार, Judicial Discipline कोई विकल्प नहीं है; यह सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक व्यवस्था का अनिवार्य अनुशासन है। बड़ी बेंच के समक्ष वही निर्णायक प्रश्न लंबित रहते हुए छोटी बेंच को conflicting adjudication की स्थिति पैदा करने के बजाय बड़ी बेंच के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए अथवा मामले को उचित आदेश के लिए CJI/बड़ी बेंच के समक्ष रखना चाहिए—यही स्थापित कानून और न्यायिक अनुशासन के अनुरूप रास्ता है।

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