कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने किसानों पर अत्याचार करने वाले अपने एक विधायक को बचाने के लिए संविधान के विरुद्ध आदेश पारित किया, तो सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना ठोक दिया। [State of Maharashtra v. Sarangdharsingh Chavan, (2011) 1 SCC 577]

सरकार ने यह राशि जनता और किसानों के पैसों से जमा कर दी। अब सवाल यह है कि जनता के उन ₹10 लाख की वसूली कांग्रेस तथा इस अवैध निर्णय के लिए जिम्मेदार दोषियों से कब होगी?

वर्तमान सरकार के पास किसानों और संविधान में विश्वास रखने वाले नागरिकों का भरोसा जीतने का सुनहरा अवसर है। उसे तत्काल कांग्रेस तथा जिम्मेदार व्यक्तियों से इस राशि की वसूली की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।

दिशा सालियान प्रकरण में भी सत्ता का दुरुपयोग करके एफआईआर दर्ज नहीं होने दी गई थी। इसलिए उस समय की महाविकास आघाड़ी सरकार के मंत्री उद्धव ठाकरे एवं अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध भी इसी प्रकार की कार्रवाई की मांग की जा रही है।

 महाराष्ट्र में जब कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने अपने एक विधायक दिलीप सनंदा को किसानों द्वारा दायर आपराधिक मामलों में बचाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 की भावना के विपरीत अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एक गैरकानूनी आदेश पारित किया, उस आदेश के माध्यम से पुलिस को किसानों की शिकायत पर संबंधित कांग्रेस विधायक के विरुद्ध सीधे एफआईआर दर्ज करने से रोक दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को असंवैधानिक तथा मुख्यमंत्री द्वारा पद के दुरुपयोग और दुराचार का मामला मानते हुए निरस्त कर दिया तथा महाराष्ट्र सरकार पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विलासराव देशमुख को व्यक्तिगत रूप से उत्तरवादी (Respondent) बनाने का निर्देश दिया, उनसे जवाबी शपथपत्र मंगवाया और उसके आधार पर उनके आचरण की न्यायिक समीक्षा करते हुए उनके विरुद्ध आदेश पारित किया।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कानून स्थापित किया है कि जब किसी मंत्री, अधिकारी या लोकसेवक की अवैध कार्रवाई के कारण न्यायालय सरकार पर जुर्माना या लागत (Costs) लगाता है, तो प्रारंभिक भुगतान सरकार तत्काल करती है। इसके बाद वह राशि दोषी मंत्री अथवा अधिकारी से वसूल की जाती है, क्योंकि सरकार का पैसा वास्तव में जनता और करदाताओं का पैसा होता है। किसी दोषी व्यक्ति की गलती का बोझ आम आदमी और करदाताओं पर नहीं पड़ना चाहिए।  [Directions in the Matter of Demolition of Structures, In re, (2025) 5 SCC 1; Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta, AIR 1994 SC 787; and S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews & Ors., (2018) 10 SCC 804]

मगर उस समय की कांग्रेस सरकार ने ₹10 लाख का यह जुर्माना जनता और किसानों के पैसों से सर्वोच्च न्यायालय में जमा कर दिया। परंतु यह कथित अवैध निर्णय लेने वाले मंत्री तथा उनका साथ देने वाले अधिकारियों से इस राशि की वसूली नहीं की गई।

अब प्रश्न यह है कि इस अवैध निर्णय के लिए जिम्मेदार कांग्रेस तथा संबंधित दोषी व्यक्तियों से जनता के वे ₹10 लाख, अब तक के ब्याज सहित, आखिर कब वसूल किए जाएंगे?

उल्लेखनीय है कि Shiv Sagar Tiwari v. Union of India, (1996) 6 SCC 558 प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस की दिल्ली सरकार के एक मंत्री की कथित अवैध कार्रवाई के संबंध में व्यक्तिगत आर्थिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत लागू किया था तथा भ्रष्टाचार से हुई पूरी आर्थिक हानि की व्यक्तिगत वसूली के आदेश दिए थे। इसी प्रकार T.N. Godavarman Thirumulpa  vs. Ashok Khot, (2006) 5 SCC 1 , मामले में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मंत्री स्वरूप सिंह नाईक को असंवैधानिक एवं गैरकानूनी कार्य करने तथा न्यायालय के आदेशों की अवमानना के लिए एक माह के कारावास की सजा भी सुनाई गई थी।

अब केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे देश की जनता की निगाह इस बात पर है कि जनता और किसानों का पैसा कब वापस आएगा तथा संविधान और किसानों के हितों के विरुद्ध कार्य करने वालों के खिलाफ प्रभावी एवं व्यक्तिगत कार्रवाई कब होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *