दिल्ली शराब कमिशन घोटाले पर बड़ा सवाल! जनता के ₹338 करोड़ कौन लौटाएगा?  जनता के ₹338 करोड़ वापस करो — केजरीवाल, सिसोदिया और आम आदमी पार्टी की संपत्ति जब्त करो. राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति ने राष्ट्रपति को सौंपा विस्तृत संवैधानिक प्रतिवेदन

नई दिल्ली: राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति ने दिल्ली आबकारी नीति 2021–22 से संबंधित कथित अनियमितताओं के मामले में ₹338 करोड़ से अधिक की नागरिक (सिविल) वसूली की मांग करते हुए भारत के महामहिम राष्ट्रपति, दिल्ली के उपराज्यपाल एवं मुख्यमंत्री को एक विस्तृत संवैधानिक प्रतिवेदन सौंपा है।

यह प्रतिवेदन महासचिव राशिद खान पठान द्वारा प्रस्तुत किया गया है तथा समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिवक्ता निलेश ओझा द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया है।

समिति ने “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” की कथित राशि को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले Manish Sisodia v. CBI, 2023 SCC OnLine SC 1393,   का हवाला दिया है। समिति का कहना है कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग ₹338 करोड़ के कथित “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” के संबंध में गंभीर टिप्पणियाँ दर्ज की थीं और इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।

न्यायालय द्वारा दर्ज ये टिप्पणियाँ सार्वजनिक धन के संभावित दुरुपयोग और बड़े वित्तीय प्रभाव की ओर संकेत करती हैं, जो नागरिक (सिविल) वसूली की कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान करती हैं।

  समिति ने Shiv Sagar Tiwari v. Union of India, (1996) 6 SCC 558, के ऐतिहासिक फैसले का भी सहारा लिया है। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था — लोक पद कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि जनता के प्रति एक संवैधानिक ट्रस्ट है। यदि कोई मंत्री ऐसी नीति बनाता या लागू करता है जिससे जनता या सरकारी खजाने को नुकसान हो, तो उस नुकसान की भरपाई संबंधित पदाधिकारी से व्यक्तिगत रूप से की जा सकती है — और यह प्रक्रिया आपराधिक मुकदमे के नतीजे पर निर्भर नहीं होती।

दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कनाडा के चर्चित फैसले Roncarelli v. Duplessis (1959) का भी हवाला दिया था। वहां क्यूबेक के प्रीमियर को एक शराब लाइसेंस को मनमाने और अवैध तरीके से रद्द करने के लिए व्यक्तिगत रूप से हर्जाना भरने का आदेश दिया गया था। अदालत ने साफ संदेश दिया था — कानून से ऊपर कोई नहीं। अगर सत्ता का दुरुपयोग होगा, तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होगी।

  यही संवैधानिक सिद्धांत भारत में भी लागू होता है — और अगर सार्वजनिक नीति के कारण जनता के पैसों को नुकसान पहुंचा है, तो जवाबदेही तय होना ही चाहिए।

इन न्यायिक टिप्पणियों में जांच एजेंसियों द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सामग्री के आधार पर प्रथमदृष्टया निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं। इनमें दिल्ली आबकारी नीति के अंतर्गत कमीशन दर 5% से बढ़ाकर 12% किए जाने, उससे उत्पन्न कथित अतिरिक्त लाभ, तथा तथाकथित “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” के सृजन और उपयोग से संबंधित उल्लेख शामिल हैं।

समिति का तर्क है कि न्यायालयों द्वारा दर्ज ये प्रथमदृष्टया निष्कर्ष स्वतंत्र सिविल रिकवरी कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए पर्याप्त संवैधानिक और विधिक आधार प्रदान करते हैं। प्रतिवेदन में कहा गया है कि नागरिक प्रतिपूर्ति (Civil Restitution) की कार्यवाही आपराधिक मुकदमे के अंतिम परिणाम से स्वतंत्र होती है, क्योंकि सिविल दायित्व और आपराधिक दायित्व अलग-अलग विधिक आधारों पर संचालित होते हैं।

प्रतिवेदन में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 35 तथा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय P.C. Reddiar v. State of Madras, (1972) 1 SCC 9 का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि विधिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान सक्षम प्राधिकरणों द्वारा तैयार किए गए आधिकारिक अभिलेख और रिपोर्टें न्यायिक कार्यवाहियों में प्रासंगिक एवं ग्राह्य साक्ष्य मानी जाती हैं। अतः ईडी और सीबीआई की जांच रिपोर्टें, जो वैधानिक शक्तियों के तहत तैयार आधिकारिक दस्तावेज हैं, सिविल वसूली और प्रतिपूर्ति की कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए विधिक रूप से पर्याप्त और प्रासंगिक आधार प्रदान करती हैं, बशर्ते कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनका परीक्षण किया जाए।

शिकायत के अनुसार, जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय न्यायालयों ने निम्नलिखित तथ्यों का उल्लेख किया:

  • नई आबकारी नीति के संचालन के दौरान थोक वितरकों ने लगभग ₹581 करोड़ अर्जित किए।
    • कमीशन दर 5% से बढ़ाकर 12% किए जाने से लगभग ₹338 करोड़ का कथित अतिरिक्त लाभ हुआ।
    • जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया है कि इस लाभ का एक हिस्सा “प्रोसीड्स ऑफ क्राइम” के रूप में प्रयुक्त हुआ।
    • लगभग ₹100 करोड़ की राशि के गोवा में चुनावी उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने के आरोप भी दर्ज किए गए हैं।

समिति का कहना है कि ये सभी तथ्य सार्वजनिक कोष को संभावित क्षति तथा निजी लाभ की प्रथमदृष्टया स्थिति को दर्शाते हैं, जिसके आधार पर सिविल रिकवरी की प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिए।

शिकायतकर्ता का कहना है कि जांच एजेंसियों की रिपोर्ट और अदालतों की टिप्पणियों से पहली नजर में यह साफ होता है कि सरकारी खजाने को भारी नुकसान हुआ है और कुछ निजी लोगों को गलत तरीके से फायदा पहुंचा है।

शिकायत में ये मांगें रखी गई हैं:

  • भारत के अटॉर्नी जनरल को सिविल वसूली की कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया जाए।
    • सीबीआई और ईडी से पूरा वित्तीय ऑडिट कराकर कुल नुकसान की सही रकम तय की जाए।
    • जिन लोगों पर जिम्मेदारी बनती है, उनकी निजी संपत्ति जब्त कर वसूली की जाए।
    • कम से कम ₹338करोड़, या उससे अधिक राशि, ब्याज सहित वसूली की जाए।
    • यह वसूली जमीन राजस्व बकाया की तरह की जाए, जैसा कि Shiv Sagar Tiwari मामले में सिद्धांत तय किया गया था।

प्रतिवेदन में कहा गया है कि सिविल जिम्मेदारी, आपराधिक केस से अलग होती है। यानी अगर जनता के पैसे का नुकसान हुआ है, तो उसकी भरपाई के लिए आपराधिक केस के फैसले का इंतजार जरूरी नहीं है।

देरी करने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई की मांग

शिकायत में यह भी कहा गया है कि जांच सामग्री और अदालत की टिप्पणियां सामने होने के बावजूद समय पर वसूली की कार्रवाई शुरू नहीं की गई। इसलिए संबंधित अधिकारियों की जांच कर उन पर कार्रवाई की जाए। साथ ही दो महीने के भीतर फैसला लेकर जनता का पैसा वापस दिलाने की मांग की गई है।

Shiv Sagar Tiwari v. Union of India, (1996) 6 SCC 558 (आदेश दिनांक 11.10.1996) में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीमती शीला कौल द्वारा किए गए विवेकाधीन आवंटनों की वैधता की जांच की थी। न्यायालय ने पाया कि शक्तियों का प्रयोग प्रथमदृष्टया मनमाना प्रतीत होता है और इसका उद्देश्य अनुचित लाभ पहुँचाना था।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि सार्वजनिक शक्ति का दुरुपयोग या दुरुपयोग विधि की दृष्टि में दंडनीय एवं कार्रवाई योग्य है। न्यायालय ने पुनः दोहराया कि लोक पद एक संवैधानिक न्यास (constitutional trust) है। इस न्यास से हटकर यदि कोई निर्णय बाहरी या अप्रासंगिक कारणों से लिया जाता है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और उससे संबंधित पदाधिकारी पर व्यक्तिगत दायित्व तय हो सकता है।

‘Misfeasance in Public Office’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने संबंधित मंत्री को व्यक्तिगत रूप से उदाहरणात्मक क्षतिपूर्ति (exemplary damages) के भुगतान के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक शक्ति का प्रयोग निजी लाभ, पक्षपात या व्यक्तिगत संबंधों के लिए नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कोई भी सार्वजनिक प्राधिकारी कानून से ऊपर नहीं है और यदि कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग मनमाने या दुर्भावनापूर्ण (mala fide) तरीके से किया जाता है, तो उसके लिए व्यक्तिगत सिविल दायित्व निर्धारित किया जा सकता है, ताकि यह एक निवारक (deterrent) और संवैधानिक जवाबदेही का साधन बन सके।

महत्वपूर्ण रूप से, सर्वोच्च न्यायालय ने कनाडा के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय Roncarelli v. Duplessis (1959) 16 DLR (2d) 689 का भी संदर्भ दिया, जिसमें क्यूबेक के प्रीमियर को अवैध और मनमाने कारणों से शराब लाइसेंस रद्द करने के लिए व्यक्तिगत रूप से क्षतिपूर्ति देने हेतु उत्तरदायी ठहराया गया था। 

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