लड़की का शव निर्वस्त्र मिला, पुलिस की आत्महत्या की कहानी स्वीकार्य नहीं: पिता द्वारा हत्या के आरोपों की शिकायत दिए जाने के बावजूद FIR दर्ज किए बिना आत्महत्या की थ्योरी बनाने और शक्तिशाली आरोपियों को बचाने के उद्देश्य से की गई पुलिस कार्रवाई की हाईकोर्ट ने निंदा की; जांच CBI को सौंपी; दिशा सालियन मामले से चौंकाने वाली समानताएं [Devanand Oraon v. State of Jharkhand, 2021 SCC OnLine Jhar 594]

दिशा सालियन का शव भी बिना कपड़ों के पाया गया था और उनके पिता की शिकायत आज तक FIR के रूप में दर्ज नहीं की गई है। हालांकि, दिशा के मामले में इसके अलावा भी कई गंभीर गैरकानूनी कृत्य, विसंगतियां और गंभीर जांच संबंधी खामियां सामने रखी गई हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी पुलिस द्वारा पेश की गई दिशा सालियन की आत्महत्या की थ्योरी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सरकारी वकील का ध्यान दिशा की तस्वीर की ओर दिलाते हुए कहा कि उसके चेहरे पर कोई स्पष्ट चोट दिखाई नहीं दे रही है और प्रथम दृष्टया यह 12वीं मंजिल से गिरने के कारण हुई मृत्यु का मामला प्रतीत नहीं होता। न्यायालय ने पुलिस से यह महत्वपूर्ण सवाल भी पूछा कि दिशा के पिता द्वारा शिकायत दिए जाने के बावजूद FIR दर्ज क्यों नहीं की गई और ऐसा करने से पुलिस को किसने रोका था?

याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष यह भी बताया कि इतनी ऊंचाई से गिरने का दावा किए जाने के बावजूद दिशा के चेहरे पर अपेक्षित गंभीर बाहरी चोटें दिखाई नहीं देती हैं। दूसरी ओर, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि दिशा के सामने के सभी दांत गिर गए थे; जबकि अंतिम संस्कार के समय की तस्वीर न्यायालय के समक्ष पेश कर यह दिखाया गया कि दिशा के सामने के दांत सही-सलामत थे और उसके चेहरे पर कोई स्पष्ट गंभीर चोट दिखाई नहीं दे रही थी। इन गंभीर और प्रत्यक्ष विसंगतियों ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत आत्महत्या की थ्योरी तथा अब तक की जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

दिशा सालियन मृत्यु प्रकरण में उठाए जा रहे मुद्दों से समानता रखने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने Devanand Oraon v. State of Jharkhand, 2021 SCC OnLine Jhar 594 में संदिग्ध मृत्यु की जांच में कई गंभीर और अस्पष्ट परिस्थितियों तथा जांच संबंधी खामियों को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी।

हाईकोर्ट ने इस तथ्य को गंभीरता से लिया कि मृतका का शव निर्वस्त्र अवस्था में पाया गया था, उसके शरीर पर चोटें पाई गई थीं, विसरा सुरक्षित नहीं रखा गया था और इसके बावजूद पुलिस ने घटना के पहले ही दिन से आत्महत्या की थ्योरी पर आगे बढ़ना शुरू कर दिया था। न्यायालय ने यह भी पाया कि FIR दर्ज किए बिना प्रभावशाली व्यक्तियों से संबंधित बयान दर्ज किए गए, जांच अधिकारियों को बार-बार बदला गया और राज्य के उच्च एवं प्रभावशाली व्यक्तियों” (high ups of the State) के संबंध में गंभीर आरोप लगाए गए थे।

इन सभी परिस्थितियों को समग्र रूप से देखते हुए हाईकोर्ट ने जांच को मौजूदा जांच एजेंसी के पास छोड़ना उचित नहीं माना। जांच CBI को सौंपे जाने के विरोध को खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा कि यह “CBI को जांच सौंपने के लिए उपयुक्त मामला है, बल्कि यह दुर्लभतम मामलों में से एक है, और CBI को तत्काल जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दिया।

दिशा सालियन का शव भी बिना कपड़ों के पाया गया था और उनके पिता द्वारा गंभीर एवं विशिष्ट आरोप लगाए जाने के बावजूद उनकी शिकायत आज तक FIR के रूप में दर्ज नहीं की गई है। हालांकि, दिशा के मामले में न्यायालय के समक्ष उठाए गए मुद्दे इससे कहीं आगे जाते हैं और इनमें कई अन्य गंभीर गैरकानूनी कृत्य, महत्वपूर्ण विसंगतियां, जांच एवं फॉरेंसिक स्तर की गंभीर खामियां तथा महत्वपूर्ण साक्ष्यों के संग्रह, संरक्षण और उनके रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल शामिल हैं।

इसलिए यह फैसला दिशा सालियन मामले के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां न्यायालय के समक्ष आत्महत्या की थ्योरी, पिता की शिकायत के बावजूद FIR दर्ज किया जाना, गंभीर जांच एवं फॉरेंसिक खामियां, महत्वपूर्ण भौतिक, जैविक एवं डिजिटल साक्ष्यों को एकत्रित एवं सुरक्षित किया जाना, आधिकारिक रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां तथा राजनीतिक रूप से प्रभावशाली आरोपी आदित्य ठाकरे एवं अन्य आरोपियों की भूमिका जैसे गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

याचिकाकर्ता सतीश सालियन ने आरोप लगाया है कि दिशा सालियन के साथ गैंगरेप कर उसकी हत्या की गई और इस मामले में उन्होंने आदित्य ठाकरे को मुख्य आरोपी बताया है। उनका आरोप है कि घटना के समय आदित्य ठाकरे मंत्री थे और उनके पिता राज्य के मुख्यमंत्री थे, जिसके कारण राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर पुलिस जांच को प्रभावित किया गया और मामले को आत्महत्या का रूप देकर वास्तविक अपराध तथा आरोपियों को बचाने के लिए कवर-अप किया गया

सतीश सालियन के अनुसार, ये केवल सामान्य या अलग-अलग प्रक्रियागत त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि गंभीर परिस्थितियों और कथित जांच संबंधी विफलताओं की एक पूरी श्रृंखला है, जिसकी सच्चाई सामने लाने के लिए गहन, स्वतंत्र और न्यायालय की निगरानी में जांच (Court-monitored Investigation) आवश्यक है। ऐसी जांच में न केवल दिशा सालियन की मृत्यु की वास्तविक परिस्थितियों का पता लगाया जाना चाहिए, बल्कि यह भी सामने आना चाहिए कि क्या महत्वपूर्ण साक्ष्यों को दबाया, नष्ट या उनमें हेरफेर किया गया; क्या जानबूझकर महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की गई; किसने जांच को प्रभावित अथवा बाधित किया; कथित कवर-अप के पीछे कौन-कौन जिम्मेदार था; आदित्य ठाकरे के साथ अन्य कितने आरोपी कथित अपराध में शामिल थे; तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की क्या भूमिका थी।

इसी आधार पर सतीश सालियन ने न्यायालय की निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग की है, ताकि संपूर्ण सत्य सामने आए, कथित अपराध, साक्ष्यों से छेड़छाड़ तथा कथित कवर-अप में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की जांच हो और यह सुनिश्चित किया जा सके कि राजनीतिक प्रभाव, पद अथवा शक्ति के कारण आरोपी आदित्य ठाकरे अथवा कोई अन्य व्यक्ति कानून की प्रक्रिया से बच सके।

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