यदि अमन चोपड़ा को पुलिस ने उनकी इच्छा के विरुद्ध यह कहकर अपने साथ चलने के लिए बाध्य किया कि “आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा” और वे उस समय अपनी इच्छा से वहां से जाने के लिए स्वतंत्र नहीं थे, तो केवल पुलिस द्वारा उस कार्रवाई को “पूछताछ” या “जांच” का नाम देने से उसका कानूनी स्वरूप नहीं बदल जाता। कानून की दृष्टि में वास्तविक कसौटी यह है कि क्या संबंधित व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आवाजाही पर पुलिस द्वारा restraint लगाया गया था। यदि उत्तर हां है, तो वह कार्रवाई de facto arrest/detention के दायरे में आ सकती है।
इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय Ashak Hussain Allah Detha v. Assistant Collector of Customs, 1990 SCC OnLine Bom 3 अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “arrest” उस क्षण से शुरू हो जाती है जब किसी प्राधिकारी द्वारा व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर वास्तविक restraint लगाया जाता है। जांच अधिकारी अपनी कार्रवाई को क्या नाम देता है, यह निर्णायक नहीं है। इसी प्रकार पुलिस रिकॉर्ड में गिरफ्तारी का कौन-सा समय लिखा गया है, उससे वास्तविक गिरफ्तारी का समय तय नहीं होता। निर्णायक प्रश्न यह है कि व्यक्ति अपनी इच्छा से जहां चाहे वहां जाने के लिए स्वतंत्र था या नहीं।
अर्थात, यदि अमन चोपड़ा से कहा गया कि “आपको हमारे साथ चलना ही पड़ेगा”, उन्हें जाने से रोका गया और पुलिस अपने साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध ले गई, तो यह कह देना पर्याप्त बचाव नहीं हो सकता कि “हमने उन्हें formally arrest नहीं किया था।” इसके विपरीत, यदि वास्तव में liberty restrained हुई थी, तो formal arrest न दिखाना और साथ ही गिरफ्तारी के लिए निर्धारित safeguards का पालन न करना स्वयं गंभीर कानूनी प्रश्न पैदा करता है।
FIR दर्ज होना गिरफ्तारी का लाइसेंस नहीं
Joginder Kumar v. State of U.P., (1994) 4 SCC 260 और Arnesh Kumar v. State of Bihar, (2014) 8 SCC 273 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल FIR दर्ज होने या पुलिस के पास गिरफ्तारी की शक्ति होने का अर्थ यह नहीं है कि गिरफ्तारी आवश्यक रूप से की ही जाए।
विशेष रूप से सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी को routine या mechanical exercise नहीं बनाया जा सकता। जहां गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, वहां कानून में निर्धारित notice देकर जांच/पूछताछ के लिए बुलाने की प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। गिरफ्तारी की आवश्यकता को statutory conditions पर परखा जाना और उसके कारण दर्ज किया जाना आवश्यक है।
इसलिए जांच के नाम पर पुलिस के पास किसी नागरिक को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ ले जाने का कोई असीमित या मनमाना अधिकार नहीं है।
D.K. Basu safeguards को formal arrest न दिखाकर दरकिनार नहीं किया जा सकता
यदि वास्तव में व्यक्ति की liberty restrained करके उसे custody में लिया गया था, तो गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक और वैधानिक safeguards का प्रश्न भी पैदा होता है। D.K. Basu v. State of West Bengal, (1997) 1 SCC 416 में निर्धारित arrest safeguards का उद्देश्य ही secret, undocumented और arbitrary detention को रोकना है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध पुलिस अपने साथ ले जाए, लेकिन arrest memo, गिरफ्तारी का रिकॉर्ड तथा अन्य अनिवार्य safeguards का पालन न करे और बाद में यह कहा जाए कि उसे गिरफ्तार ही नहीं किया गया था, तो ऐसी कार्रवाई की वैधता को केवल पुलिस द्वारा दिए गए label से निर्धारित नहीं किया जा सकता।
Dr. Rini Johar मामला—अवैध गिरफ्तारी पर ₹5 लाख मुआवजा
Dr. Rini Johar v. State of M.P., (2016) 11 SCC 703 इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी संबंधी संवैधानिक और वैधानिक safeguards के उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए दोनों याचिकाकर्ताओं को ₹5-₹5 लाख compensation देने का निर्देश दिया था।
इससे यह सिद्धांत मजबूत होता है कि arrest power का मनमाना प्रयोग अथवा निर्धारित safeguards की अवहेलना केवल procedural irregularity नहीं है; यह Article 21 द्वारा संरक्षित personal liberty के उल्लंघन का विषय बन सकता है।
Illegal detention Article 21 का उल्लंघन—राज्य पर compensation की जिम्मेदारी
यदि यह तथ्य स्थापित होता है कि अमन चोपड़ा को बिना वैधानिक गिरफ्तारी, बिना आवश्यक statutory procedure और बिना किसी अन्य lawful authority के उनकी इच्छा के विरुद्ध पुलिस अपने साथ ले गई, तो यह prima facie उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर restraint तथा illegal/de facto detention का मामला बन सकता है।
ऐसी स्थिति में Article 21 के उल्लंघन के लिए constitutional/public-law compensation का दावा भी उठ सकता है।
Rudul Sah v. State of Bihar, (1983) 4 SCC 141; Bhim Singh v. State of J&K, (1985) 4 SCC 677; Nilabati Behera v. State of Orissa, (1993) 2 SCC 746; तथा D.K. Basu v. State of West Bengal, (1997) 1 SCC 416 में सुप्रीम कोर्ट ने unlawful deprivation of personal liberty के मामलों में constitutional courts की compensation प्रदान करने की शक्ति को मान्यता दी है।
इसी प्रकार Nambi Narayanan v. Siby Mathews, (2018) 10 SCC 804 में सुप्रीम कोर्ट ने wrongful arrest, detention और गंभीर उत्पीड़न के संदर्भ में ₹50 लाख compensation देने का निर्देश दिया था।
इसलिए यदि अमन चोपड़ा के मामले में उपरोक्त तथ्य प्रमाणित होते हैं, तो झारखंड राज्य के विरुद्ध constitutional compensation की मांग का गंभीर कानूनी आधार उपलब्ध हो सकता है।
जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों की व्यक्तिगत आपराधिक जवाबदेही का भी प्रश्न
यदि detention कानून द्वारा अधिकृत नहीं थी, तो compensation के अतिरिक्त संबंधित पुलिस अधिकारियों की departmental तथा criminal liability का प्रश्न भी उठ सकता है।
IPC के तहत Sections 341 (Wrongful Restraint), 342 (Wrongful Confinement) तथा उपयुक्त तथ्यों में Section 220—किसी व्यक्ति को कानून के विपरीत जानते हुए confinement में रखने वाले Public Servant— जैसे दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं। विशेष रूप से Section 220 IPC के तहत दोषी पाए जाने वाले संबंधित पुलिस अधिकारी को सात वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने से दंडित किए जाने का प्रावधान है।