पंजाब में मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या से जुड़े बहुचर्चित मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) प्रारंभिक जांच के दौरान हत्या का प्रत्यक्ष प्रमाण जुटाने में असफल रही और उसने आरोपपत्र मुख्यतः अपहरण, अवैध हिरासत तथा गलत तरीके से बंधक बनाकर रखने जैसे आरोपों तक सीमित रखा। चूंकि पीड़ित को पुलिस हिरासत में लेने के बाद उसका कोई पता नहीं चला, इसलिए हत्या का स्पष्ट साक्ष्य तत्काल उपलब्ध नहीं था।
मामले की दिशा उस समय पूरी तरह बदल गई जब एक पुलिस अधिकारी की अंतरात्मा जाग उठी और उसने साहस दिखाते हुए अदालत में महत्वपूर्ण गवाही दी तथा अंदरूनी घटनाओं का खुलासा किया। इस गवाही से सामने आया कि पीड़ित को अवैध हिरासत में रखकर अमानवीय यातनाएं दी गईं और अंततः वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, विशेष रूप से एक डीएसपी के निर्देश पर उसकी हत्या कर दी गई। गवाह ने यह भी बताया कि अपराध को छिपाने के लिए शव को पानी की नहर (कैनाल) में बहा दिया गया, ताकि कोई ठोस सबूत शेष न रहे।
अदालत ने इस प्रत्यक्ष एवं परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर भरोसा करते हुए निष्कर्ष निकाला कि यह साधारण हिरासत या अपहरण का मामला नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग से की गई सुनियोजित हिरासत में हत्या है। परिणामस्वरूप, डीएसपी जस्पाल सिंह तथा एएसआई अमरजीत सिंह सहित अन्य आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी इन सजाओं को बरकरार रखा, यह स्पष्ट करते हुए कि कानून के रक्षक यदि स्वयं अपराधी बन जाएँ तो उन्हें किसी प्रकार की रियायत नहीं दी जा सकती।
यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि यदि जांच एजेंसी अपराध की पूरी सच्चाई उजागर करने में विफल भी हो जाए, तब भी न्यायालय विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर वास्तविक अपराध का निर्धारण कर दोषियों को कठोर दंड दे सकता है — विशेषकर तब, जब अपराध स्वयं कानून लागू करने वाली एजेंसियों के हाथों किया गया हो।