CJP (Cockroach Janta Party) द्वारा सभी FIR वापस लेने की मांग न केवल असंवैधानिक है, बल्कि न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में अवैध हस्तक्षेप भी है। ऐसी मांग भारतीय कानून के अंतर्गत, विशेष रूप से भारतीय न्याय संहिता (BNS) तथा न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) संबंधी विधि के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकती है।

यदि कोई मंत्री, लोक सेवक या सक्षम प्राधिकारी ऐसी असंवैधानिक एवं अवैध मांग के दबाव में आकर कानून के विपरीत सभी FIR वापस लेने का निर्णय लेता है, तो वह भी अपने कृत्यों के लिए भारतीय कानून के अनुसार उत्तरदायी है।

GenZ Lawyers Association ने केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा तथा कानून के विपरीत कार्य करने वाले अन्य मंत्रियों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना याचिका दायर करने की घोषणा की।

सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में भी स्पष्ट किया है कि कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री, वरिष्ठ अधिकारी अथवा सरकार कानून और न्यायालय के आदेशों से ऊपर नहीं है। T.N. Godavarman Thirumulpad v. Ashok Khot, (2006) 5 SCC 1 में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन कांग्रेस सरकार के वन मंत्री श्री स्वरूप सिंह नाइक तथा तत्कालीन प्रधान सचिव (वन) श्री अशोक खोट को न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना तथा न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में हस्तक्षेप का दोषी ठहराते हुए एक माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी। इसी प्रकार, State of Maharashtra and Ors. v. Sarangdharsingh Shivdassingh Chavan and Ors., (2011) 1 SCC (Cri) 477 में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार के विरुद्ध कठोर रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री पर ₹10 लाख का दंड (Costs) लगाया। इन निर्णयों से यह विधिक सिद्धांत पुनः स्थापित होता है कि संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति, मंत्री, मुख्यमंत्री अथवा कोई भी लोक सेवक न्यायालय के आदेशों तथा विधि के शासन (Rule of Law) से ऊपर नहीं है और उल्लंघन की स्थिति में उसके विरुद्ध व्यक्तिगत उत्तरदायित्व निर्धारित किया जा सकता है।

जो मीडिया संस्थान, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, तथाकथित इकोसिस्टम, प्रभावशाली व्यक्ति (Influencers) अथवा अन्य व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से असंवैधानिक अथवा अवैध मांगों का प्रचार-प्रसार, समर्थन, औचित्य सिद्ध (Legitimise) या महिमामंडन (Glorify) करते हैं, अथवा कानून-विहीनता (Lawlessness) को बढ़ावा देते हैं, वे भी विधिक उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हैं। we sabhi भारतीय न्याय संहिता (BNS), न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court), न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में अवैध हस्तक्षेप, दुष्प्रेरण (Abetment), आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy), उकसावे (Incitement) के आरोपी हैं।

 

 

संविधान से ऊपर कोई नहीं: बहुमत कानून के शासन (Rule of Law) को पराजित नहीं कर सकता

संवैधानिक लोकतंत्र का अर्थ है कानून का पालन, न कि संख्या बल का शासन

कोई भी व्यक्ति, राजनीतिक दल, बहुसंख्यक समूह या सरकार सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों की अवहेलना नहीं कर सकती

  • संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि तथा उसके बाध्यकारी निर्देश सरकारों, राजनीतिक दलों, सार्वजनिक प्राधिकरणों और प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू होते हैं। कोई भी सरकार, राजनीतिक दल, बहुसंख्यक समूह अथवा व्यक्ति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि या उसके बाध्यकारी न्यायिक दृष्टांतों (Binding Judicial Precedents) की अवहेलना नहीं कर सकता।
  • संविधान केवल शांतिपूर्ण एवं विधिसम्मत विरोध-प्रदर्शन (Peaceful and Lawful Protest) की रक्षा करता है—हिंसा, आगज़नी, तोड़फोड़, सार्वजनिक संपत्ति का विनाश, पुलिसकर्मियों, लोक सेवकों, पत्रकारों अथवा आम नागरिकों पर हमलों की नहीं। केवल इस आधार पर कि कथित अपराध किसी आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुए हैं, प्रदर्शनकारी आपराधिक कानून या सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों से प्रतिरक्षा (Immunity) का दावा नहीं कर सकते।
  • सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी दिशा-निर्देशों या न्यायिक आदेशों का उल्लंघन करते हुए किए गए विरोध-प्रदर्शन संवैधानिक संरक्षण खो सकते हैं और उनके परिणामस्वरूप सामान्य आपराधिक कानून के अंतर्गत कार्यवाही तथा, जहाँ वैधानिक शर्तें पूरी हों, अवमानना अधिनियम (Contempt of Courts Act) के तहत कार्यवाही भी हो सकती है।
  • हिंसा, आगज़नी, तोड़फोड़, लोक सेवकों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों, सरकार समर्थकों अथवा अन्य गंभीर अपराधों से संबंधित FIR को बिना किसी भेदभाव के सामूहिक रूप से वापस लेने (Blanket Withdrawal) की मांग कानून के शासन (Rule of Law) को निष्प्रभावी नहीं कर सकती। आपराधिक दायित्व का निर्धारण केवल संविधान, वैधानिक कानून तथा सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों के अनुसार ही किया जा सकता है।
  • बहुमत का समर्थन या राजनीतिक लोकप्रियता संविधान अथवा सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों द्वारा निषिद्ध कार्यों को वैधता प्रदान नहीं कर सकती। एक संवैधानिक लोकतंत्र में संख्या बल नहीं, बल्कि कानून का शासन (Rule of Law) सर्वोपरि होता है।

संवैधानिक अधिकारों का निर्धारण कानून से होता है, संख्या बल से नहीं

संवैधानिक लोकतंत्र का एक मूलभूत सिद्धांत यह है कि किसी कार्य की वैधता या अवैधता का निर्धारण सड़कों पर एकत्रित लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि संविधान और कानून के शासन (Rule of Law) से होता है। न तो संख्यात्मक बहुमत और न ही राजनीतिक लोकप्रियता यह तय कर सकती है कि क्या वैध है और क्या अवैध। संवैधानिक अधिकारों, कानूनी दायित्वों तथा राज्य की शक्तियों का निर्धारण केवल संविधान, संसद द्वारा बनाए गए विधानों तथा संवैधानिक न्यायालयों द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि (Binding Law) के अनुसार ही होता है।

इस सिद्धांत की दार्शनिक अभिव्यक्ति प्रसिद्ध विचारक जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) के उस सुप्रसिद्ध कथन में मिलती है, जिसे R. v. Kopyto, [1987] O.J. No. 1052; (1987) 39 CCC (3d) 1 में अनुमोदन के साथ उद्धृत किया गया था—

“यदि समस्त मानवजाति में केवल एक व्यक्ति को छोड़कर सभी लोग एक ही मत के हों, और वह एक व्यक्ति विपरीत मत रखता हो, तो मानवजाति को उस एक व्यक्ति को चुप कराने का उतना ही अधिकार होगा, जितना उस एक व्यक्ति को, यदि उसके पास शक्ति हो, समस्त मानवजाति को चुप कराने का होगा।”

यह उद्धरण संवैधानिक लोकतंत्र के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है कि सत्य, न्याय और वैधता का निर्धारण बहुमत की राय से नहीं होता। संवैधानिक लोकतंत्र का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति के अधिकार तथा कानून का शासन (Rule of Law) प्रचंड जनमत, राजनीतिक दबाव या बहुसंख्यक समूह की इच्छा के सामने भी सुरक्षित रहें।

इसी कारण, चाहे कोई सार्वजनिक आंदोलन कितना भी व्यापक, प्रभावशाली या लोकप्रिय क्यों न हो, उसमें भाग लेने वाले लोग सरकार को संविधान, वैधानिक कानून अथवा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। किसी भी FIR के पंजीकरण, जांच, अभियोजन, वापसी अथवा निरस्तीकरण (Quashing) से संबंधित निर्णय संविधान, प्रचलित आपराधिक कानून तथा स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार ही लिए जाने चाहिए, न कि संख्या बल, राजनीतिक दबाव या जनआंदोलन के प्रभाव में।

निस्संदेह, शांतिपूर्ण और विधिसम्मत विरोध-प्रदर्शन संविधान द्वारा संरक्षित है। किन्तु शांतिपूर्ण सभा की संवैधानिक गारंटी किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह अधिकार नहीं देती कि वह सार्वजनिक प्राधिकारियों पर सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों की अवहेलना करने, अपने वैधानिक कर्तव्यों का परित्याग करने अथवा कानून के विपरीत किसी आरोपी को आपराधिक जांच या अभियोजन से प्रतिरक्षा (Immunity) प्रदान करने के लिए दबाव डाले।

जहाँ आपराधिक कार्यवाही गंभीर अपराधों—जैसे हत्या, हत्या के प्रयास, आगज़नी, हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश, पुलिस या लोक सेवकों पर हमले—से संबंधित हो, वहाँ उन मामलों की जांच, अभियोजन, वापसी अथवा निरस्तीकरण का निर्णय केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Procedure Established by Law) के अनुसार ही किया जा सकता है। ऐसे मामलों का निर्णय न तो भीड़ के आकार से और न ही किसी आंदोलन की तीव्रता से प्रभावित हो सकता है।

संवैधानिक गणराज्य में सर्वोच्च स्थान संख्या बल (Rule of Numbers) का नहीं, बल्कि कानून के शासन (Rule of Law) का होता है।

 

न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में हस्तक्षेप: संवैधानिक एवं विधिक परिणाम

आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं विधि के अनुसार कार्य करने दिया जाना चाहिए। जहाँ किसी घटना से संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के घटित होने का प्रथम दृष्टया खुलासा होता है, वहाँ FIR दर्ज की जाए या नहीं, जांच की जाए या नहीं, अभियोजन चलाया जाए, FIR रद्द (Quash) की जाए अथवा अभियोजन वापस लिया जाए—इन सभी प्रश्नों का निर्णय संविधान, प्रचलित दंड कानून तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के अनुसार होना चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव, सार्वजनिक आंदोलनों अथवा जनभावनाओं के आधार पर।

यदि कोई व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक नेता आपराधिक जांच, अभियोजन अथवा न्यायिक प्रक्रिया को डराने, बाधित करने, प्रभावित करने या अवैध रूप से मोड़ने का प्रयास करता है, तो ऐसा आचरण गंभीर विधिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है। यदि ऐसा आचरण न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता अथवा न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) में वास्तविक अथवा संभावित रूप से बाधा उत्पन्न करता है, तो वह अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के अंतर्गत आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का स्वरूप ग्रहण कर सकता है, बशर्ते कि संबंधित वैधानिक तत्व (Statutory Ingredients) सिद्ध हों।

इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल सार्वजनिक प्राधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि अथवा न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों की अवहेलना करने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित या दबाव डालता है, तो ऐसा आचरण अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(b) के अंतर्गत सिविल अवमानना (Civil Contempt) के प्रश्न उत्पन्न कर सकता है, यदि जानबूझकर न्यायालय के बाध्यकारी आदेश या विधि की अवज्ञा के आवश्यक तत्व सिद्ध हों।

इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति केवल सार्वजनिक समर्थन तक सीमित न रहकर गंभीर अपराध करने की योजना बनाने, उसे सुविधाजनक बनाने, वित्तीय सहायता देने, आरोपियों को संरक्षण देने, अपराधियों को बचाने, साक्ष्य छिपाने, अपराधियों को न्यायिक प्रक्रिया से बच निकलने में सहायता करने अथवा वैध जांच को विफल करने के उद्देश्य से सक्रिय भूमिका निभाता है, तो उसके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) अथवा अन्य लागू विधियों के अंतर्गत आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy), दुष्प्रेरण (Abetment), अपराधियों को शरण देना (Harbouring Offenders), अपराधियों को बचाना (Screening Offenders), न्याय में बाधा उत्पन्न करना (Obstruction of Justice) अथवा अन्य उपयुक्त अपराधों के लिए कार्यवाही की जा सकती है, यदि उनके आवश्यक वैधानिक तत्व उपलब्ध साक्ष्यों से सिद्ध होते हों।

आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) सामान्यतः प्रत्यक्ष साक्ष्य से सिद्ध नहीं होता, क्योंकि षड्यंत्र प्रायः गोपनीय रूप से रचा जाता है। इसलिए न्यायालय परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence), संबंधित व्यक्तियों के आचरण, उनके वक्तव्यों, बैठकों, प्रेस कॉन्फ्रेंस, समन्वित अभियानों, साक्ष्य छिपाने के प्रयासों तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों से षड्यंत्र का अनुमान लगा सकता है।

Shyni Varghese v. State (Govt. of NCT of Delhi), 2008 SCC OnLine Del 204 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेना तथा मीडिया के समक्ष गलत तथ्य प्रस्तुत करना प्रथम दृष्टया इस बात का संकेत था कि वे अपराध को छिपाने तथा अपराधियों को बचाने की साजिश का हिस्सा थे। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के State v. Nalini निर्णय का अनुसरण करते हुए कहा कि षड्यंत्र सामान्यतः सिद्ध परिस्थितियों से ही अनुमानित किया जाता है, क्योंकि षड्यंत्र के संबंध में प्रत्यक्ष साक्ष्य सामान्यतः उपलब्ध नहीं होते।

इसी प्रकार, Raman Lal v. State of Rajasthan, 2000 SCC OnLine Raj 226 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के Shivnarayan Laxminarayan Joshi v. State of Maharashtra के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि षड्यंत्र का अपराध सामान्यतः षड्यंत्रकारियों द्वारा समान उद्देश्य की पूर्ति के लिए किए गए कार्यों अथवा अवैध चूकों से निकाले गए निष्कर्षों द्वारा सिद्ध किया जाता है। एक बार षड्यंत्र सिद्ध हो जाने पर, एक षड्यंत्रकारी का कार्य अन्य सभी षड्यंत्रकारियों का कार्य माना जाता है, और जो व्यक्ति बाद में षड्यंत्र में शामिल होकर उसके उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई प्रत्यक्ष कार्य (Overt Act) करता है, वह भी समान रूप से उत्तरदायी होता है।

अतः यदि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि कोई राजनीतिक नेता, संगठन अथवा अन्य व्यक्ति वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमा से आगे बढ़कर भाषणों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों, मीडिया साक्षात्कारों, समन्वित सार्वजनिक अभियानों अथवा अन्य प्रत्यक्ष कृत्यों के माध्यम से गंभीर अपराधों के आरोपियों को बचाने, वैध जांच में बाधा डालने, न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने अथवा उन्हें कानून से प्रतिरक्षा दिलाने के उद्देश्य से किसी साझा योजना (Common Design) का जानबूझकर हिस्सा बना, तो ऐसी परिस्थितियाँ आपराधिक षड्यंत्र के अस्तित्व का अनुमान लगाने के लिए प्रासंगिक परिस्थितिजन्य साक्ष्य हो सकती हैं। अंतिम निर्णय, तथापि, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर सक्षम न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों की अवहेलना : अवमानना एवं विधिक परिणाम

सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर स्पष्ट किया है कि उसके निर्णय केवल संबंधित पक्षकारों पर ही नहीं, बल्कि उन सभी व्यक्तियों, संस्थाओं, सरकारों एवं सार्वजनिक प्राधिकरणों पर भी बाध्यकारी होते हैं जिन पर न्यायालय द्वारा घोषित विधि (Law Declared) लागू होती है। संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि सम्पूर्ण भारत में बाध्यकारी है और उसका पालन करना प्रत्येक नागरिक तथा प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकारी का संवैधानिक दायित्व है।

Priya Gupta v. Additional Secretary, Ministry of Health & Family Welfare, (2013) 11 SCC 404 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा—

“इस न्यायालय द्वारा घोषित विधि को सभी संबंधित व्यक्तियों द्वारा ज्ञात माना जाता है। इस न्यायालय द्वारा जारी सामान्य निर्देशों (General Directions) का उल्लंघन भी अवमानना अधिनियम के प्रावधानों को आकर्षित करेगा।”

न्यायालय ने आगे कहा कि न्यायालय के सामान्य निर्देशों और पक्षकारों के मध्य पारित विशिष्ट आदेशों (Specific Orders) के उल्लंघन में कोई अंतर नहीं है। यदि किसी न्यायिक आदेश या निर्देश की जानबूझकर अवज्ञा (Wilful Disobedience) की जाती है, तो अवमानना अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही की जा सकती है। न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायालयों के आदेशों के प्रति सम्मान बनाए रखना कानून के शासन (Rule of Law) की आधारशिला है और उनका उल्लंघन जनता के न्यायपालिका पर विश्वास को कमजोर करता है।

इसी प्रकार, T.N. Godavarman Thirumulpad v. Ashok Khot, (2006) 5 SCC 1 में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि सरकार के प्रत्येक अधिकारी को यह ज्ञात माना जाएगा कि न्यायालयों के आदेशों का अक्षरशः पालन किया जाना अनिवार्य है। न्यायालय ने B.M. Bhattacharjee v. Russel Estate Corporation का अनुमोदन करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय सहित किसी भी न्यायालय के आदेशों की उपेक्षा या अवमानना नहीं की जा सकती।

उक्त निर्णय में न्यायालय ने प्रसिद्ध विधिवेत्ता प्रोफेसर ए.वी. डाइसी (A.V. Dicey) के Rule of Law संबंधी सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार—

“कानून के समक्ष सभी समान हैं। कोई भी व्यक्ति—चाहे उसका पद, प्रतिष्ठा या राजनीतिक शक्ति कितनी भी बड़ी क्यों न हो—कानून से ऊपर नहीं है।”

इस प्रकार, यदि कोई व्यक्ति, राजनीतिक दल, संगठन या सरकार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि की अवहेलना करने, उसके निर्देशों का पालन न करने, अथवा सार्वजनिक प्राधिकारियों पर न्यायालय के आदेशों के विपरीत कार्य करने का दबाव डालने का अभियान चलाता है, तो ऐसे आचरण के गंभीर संवैधानिक एवं विधिक परिणाम हो सकते हैं।

विशेष रूप से, यदि किसी आंदोलन, प्रेस कॉन्फ्रेंस, सार्वजनिक भाषण, मीडिया अभियान या अन्य माध्यम से सरकार पर यह दबाव बनाया जाता है कि वह सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों की उपेक्षा करते हुए सभी FIR बिना किसी कानूनी आधार के वापस ले ले, तो ऐसा आचरण न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्याय के समुचित प्रशासन (Due Administration of Justice) तथा कानून के शासन के सिद्धांतों के प्रतिकूल माना जा सकता है। यदि ऐसे आचरण में अवमानना अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (BNS) अथवा अन्य लागू कानूनों के आवश्यक वैधानिक तत्व सिद्ध होते हैं, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही की जा सकती है।

अंततः, संवैधानिक लोकतंत्र में किसी भी सरकार का दायित्व भीड़, राजनीतिक दबाव या सड़क पर एकत्रित संख्या के आधार पर निर्णय लेना नहीं है। उसका प्रथम और सर्वोच्च दायित्व संविधान, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि का पालन करना है।

भारत में सर्वोच्च है—संविधान, उसके अधीन कानून का शासन (Rule of Law), और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी विधि; न कि भीड़ का दबाव, राजनीतिक लोकप्रियता या संख्या बल।

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