निखिल वागळे ने अपने वीडियो के माध्यम से दिशा सालियन प्रकरण के संदर्भ में निम्नलिखित ठोस दावे जनता के सामने रखे हैं। ये दावे उपलब्ध आधिकारिक एवं न्यायालयीन रिकॉर्ड से विसंगत हैं और जनता के सामने गलत तस्वीर प्रस्तुत करने वाले हैं।
इस प्रकरण में कुछ तथाकथित ‘पेड पत्रकार’ लगातार एक ही नैरेटिव चला रहे हैं—“यह पूरा प्रकरण राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है।” विशेष बात यह है कि यही तर्क Aaditya Thackeray की ओर से High Court में शपथपत्र और बहस के माध्यम से रखा गया था। लेकिन न्यायालय ने उन आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया। और इस मामले में FIR दर्ज करके CBI को जांच कर कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है। इसलिए Aaditya Thackeray और उनके समर्थकों का यह नैरेटिव खारिज हो चुका है।
दूसरा दावा : — CBI ने दिशा सालियन की मृत्यु की पहले ही जांच करके यह निष्कर्ष निकाला था कि उसकी मृत्यु दुर्घटनावश हुई थी।
लेकिन उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड निखिल वागळे के इस दावे के ठीक विपरीत है। CBI ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर 2022 में ही स्पष्ट किया है कि दिशा सालियन प्रकरण स्वतंत्र रूप से जांच के लिए CBI को सौंपा ही नहीं गया था। दिशा सालियन की मृत्यु वास्तव में कैसे और किन परिस्थितियों में हुई, इस संबंध में CBI ने कोई स्वतंत्र जांच नहीं की थी और उसकी मृत्यु ‘दुर्घटनावश’ हुई थी, ऐसा कोई निष्कर्ष भी CBI ने नहीं निकाला था।
इसलिए “CBI ने दिशा सालियन प्रकरण की जांच की और यह निष्कर्ष निकाला कि उसकी मृत्यु accidental death थी तथा इसमें कोई foul play नहीं था” यह दावा पूरी तरह झूठा है। उपलब्ध मसौदे में भी 2022 की CBI की इस भूमिका का उल्लेख है।
इस प्रकरण में Aaditya Thackeray ने High Court में शपथपत्र दाखिल किया। उसमें उन्होंने कहा कि CBI ने दिशा सालियन प्रकरण की जांच करके उन्हें clean chit दी है। इस पर CBI के वकील द्वारा रखी गई बात को न्यायालय ने अपने आदेश में दर्ज किया और स्पष्ट किया कि वास्तविक स्थिति वैसी नहीं है जैसी Aaditya Thackeray ने बताई थी, क्योंकि इस प्रकरण में CBI ने दिशा सालियन की मृत्यु की स्वतंत्र जांच नहीं की थी। Aaditya Thackeray के वकीलों ने बाद में इस मुद्दे पर न्यायालय से माफी भी मांगी है।
लेकिन इसके बावजूद उनके अंधभक्त निखिल वागळे, चाहे उन्हें मिलने वाले किसी पैकेज के लिए हो, आर्थिक या अन्य किसी लाभ के लिए हो, ऐसे किसी भी फायदे के बदले झूठी अथवा भ्रामक जानकारी या नैरेटिव प्रसारित कर रहे हैं और ऐसे बेतुके, झूठे तथा भ्रामक बयान दे रहे हैं, यह स्पष्ट होता है।
इस प्रकरण में CBI को दिशा की मृत्यु के सभी angles की जांच करनी चाहिए, ऐसा न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि निखिल वागळे झूठ बोल रहे हैं।
Aaditya Thackeray माफी मांग चुके हैं, High Court के आदेश में सभी बातें स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं; फिर भी निखिल वागळे की ‘अदालत’ में आज भी CBI ने इस प्रकरण में Aaditya Thackeray को clean chit दे ही रखी है!
तीसरा दावा — High Court ने FIR/जांच का आदेश केवल Lalita Kumari judgment के आधार पर दिया।
निखिल वागळे का दूसरा ठोस दावा यह है कि High Court के आदेश के पीछे प्रकरण के सबूत या गंभीर विसंगतियां नहीं थीं, बल्कि केवल Lalita Kumari v. Government of U.P. के निर्णय में FIR दर्ज करने के कानूनी सिद्धांत के कारण यह आदेश दिया गया।
लेकिन 2 सितंबर 2026 के पूरे आदेश में Lalita Kumari के निर्णय का उल्लेख ही नहीं है। इसके विपरीत, High Court ने इस प्रकरण की पूर्व पुलिस जांच में मौजूद गंभीर विसंगतियों का विस्तार से उल्लेख किया है। उपलब्ध मसौदे के अनुसार न्यायालय ने जांच को “inadequate and ineffective” कहा है और यह भी स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि इसमें “too many glaring discrepancies” हैं।
न्यायालय ने post-mortem एवं forensic material में विसंगतियां, swab/smear discrepancy, कपड़ों के संबंध में अलग-अलग versions, spot panchnama में देरी, ADR की timing से जुड़े सवाल, mobile और laptop को देर से जब्त करना तथा पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने के समय को लेकर उत्पन्न गंभीर सवालों का उल्लेख किया है।
अर्थात High Court का आदेश केवल किसी कानूनी technicality पर आधारित नहीं है, बल्कि पूर्व जांच में मौजूद गंभीर त्रुटियों और विसंगतियों पर विचार करके substantive investigation आवश्यक होने के निष्कर्ष पर आधारित है, ऐसा उपलब्ध आदेश के रिकॉर्ड से दिखाई देता है। Paragraph 39 के संबंध में उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, उचित substantive investigation नहीं होने के कारण FIR दर्ज करके cognizable offence की जांच आवश्यक होने की बात न्यायालय ने कही है।
इसलिए “High Court ने केवल Lalita Kumari judgment के आधार पर FIR/जांच का आदेश दिया” निखिल वागळे का यह दावा उपलब्ध न्यायालयीन रिकॉर्ड से विसंगत है और पूरी तरह झूठा साबित होता है।
तीसरा दावा — “मुझे नहीं लगता कि Aaditya Thackeray ऐसा अपराध कर सकते हैं।”
निखिल वागळे का यह बयान किसी forensic report, CDR, CCTV footage, mobile-tower-location report, eyewitness statement अथवा न्यायालयीन निष्कर्ष पर आधारित नहीं है, बल्कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है। लेकिन ऐसी राय व्यक्त करते समय इस प्रकरण में Aaditya Thackeray की भूमिका को लेकर लगाए गए गंभीर आरोपों और जांच के दायरे में मौजूद material को वे जानबूझकर नजरअंदाज कर रहे हैं।
Aaditya Thackeray का mobile-tower location उस स्थान पर पाया गया है जहां दिशा सालियन की मृत्यु हुई थी। NCB Crime No. 15/2020 में Aaditya Thackeray और Dino Morea के फोन surveillance पर रखे जाने के दौरान यह बात सामने आई है कि वे दोनों मुंबई में drugs का business करते हैं और Aaditya Thackeray स्वयं hydroponic weed का सेवन करते हैं। इस संदर्भ का affidavit High Court में प्रस्तुत किया गया है और यह material CBI को भी दिया गया है। इन सभी आरोपों की सत्यता की CBI जांच कर रही है, ऐसे में निखिल वागळे द्वारा पहले ही निर्दोषता का प्रमाणपत्र देने का आधार क्या है, यह मूलभूत प्रश्न है।
मुंबई पुलिस द्वारा इस प्रकरण की जांच में की गई कथित गड़बड़ी, बनाए गए झूठे रिकॉर्ड, गायब किए गए रिकॉर्ड तथा तैयार किए गए कथित झूठे बयान—इन सभी गंभीर बातों का High Court ने अपने आदेश में विस्तार से उल्लेख किया है। न्यायालय ने जांच में कई गंभीर विसंगतियों का उल्लेख करते हुए पूर्व जांच को “inadequate and ineffective” बताया है और “too many glaring discrepancies” होने का भी अवलोकन दर्ज किया है।
साथ ही, दर्ज FIR में संबंधित पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है और मर्डर तथा गैंगरेप के मामले के सबूत नष्ट करने, आरोपियों को बचाने तथा वास्तविकता छिपाने के लिए झूठे रिकॉर्ड तैयार करने के गंभीर आरोप उनके विरुद्ध लगाए गए हैं।