मुंबई: दिशा सालियान मामले में एक बार फिर आदित्य ठाकरे ने दावा किया है कि “मैं उससे कभी नहीं मिला, मैं उसे नहीं जानता।” 16 सितंबर 2026 को किए गए सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “I have never met or known Disha Salian.” साथ ही, आदित्य ठाकरे का दावा है कि उनका नाम इस मामले से जोड़ना राजनीतिक और व्यक्तिगत उद्देश्यों से चलाया जा रहा बदनामी का प्रयास है।
दिशा सालियान मामले में भी आदित्य ठाकरे ने यह दावा किया था कि, “8 जून को मैं वहां था ही नहीं। मेरे नानाजी पाटणकर का निधन हो गया था। मैं डोंबिवली में था, मुंबई के बाहर था।”
लेकिन इस दावे का झूठ इस तथ्य से उजागर हुआ है कि उनके नानाजी पाटणकर 8 जून को जीवित थे और उनका निधन 14 जून को हुआ था। साथ ही, 8 जून को आदित्य ठाकरे की मोबाइल टावर लोकेशन उसी इलाके में पाई गई, जहां दिशा सालियान की मृत्यु हुई
इसके अतिरिक्त, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों ने आरोप लगाया है कि आदित्य ठाकरे और अन्य आरोपियों ने दिशा सालियान के साथ अत्याचार कर उसकी हत्या की और उसके बाद उसकी मृत्यु को आत्महत्या का रूप देने के लिए पुलिस के साथ मिलकर षड्यंत्र रचा। प्रत्यक्षदर्शी गवाहों द्वारा इस पूरे घटनाक्रम के संबंध में दी गई विस्तृत जानकारी/बयानों का वीडियो वाला पेनड्राइव CBI को सौंपा जा चुका है।
इसलिए, 8 जून को मुंबई से बाहर होने का दावा, नानाजी के निधन के संबंध में दिया गया कारण और उसके विपरीत सामने आई मोबाइल टावर लोकेशन की जानकारी, साथ ही प्रत्यक्षदर्शी गवाहों द्वारा दी गई जानकारी—इन सभी बातों से यह दिखाई देता है कि यह व्यक्ति कितना झूठ बोलता है। इसके बावजूद उनके अंधभक्त उनका गुणगान कर रहे हैं।
इससे पहले भी आदित्य ठाकरे बार-बार ‘मैं इसे नहीं जानता’, ‘मैं रिया चक्रवर्ती को नहीं जानता’, ‘मैं संजय गुप्ता को नहीं जानता’ जैसे दावे कर चुके हैं। लेकिन उसके बाद सामने आए सबूतों से इन दावों का झूठ उजागर हुआ है।
हाईकोर्ट में ‘CBI Clean Chit’ का दावा
आदित्य ठाकरे ने हाईकोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में दावा किया था कि CBI ने दिशा सालियान मामले की जांच करके उन्हें ‘clean chit’ दे दी है। लेकिन इस पर CBI के वकीलों द्वारा न्यायालय के सामने रखी गई वास्तविक स्थिति को हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया और यह सामने आया कि वास्तविकता आदित्य ठाकरे द्वारा हलफनामे में किए गए दावे के अनुरूप नहीं थी। इसका कारण यह था कि CBI ने दिशा सालियान की मृत्यु की स्वतंत्र जांच ही नहीं की थी।
इसके बाद इसी मुद्दे पर आदित्य ठाकरे के वकीलों ने हाईकोर्ट से माफी भी मांगी।
इससे हमारा आरोप है कि आदित्य ठाकरे समय-समय पर झूठे दावे करते रहे हैं और विशेष रूप से दिशा सालियान मामले में स्वयं को बचाने के लिए झूठा बचाव खड़ा कर रहे हैं।
कानून की दृष्टि से भी यह मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी आरोपी द्वारा लिया गया बचाव सबूतों से झूठा सिद्ध होता है, तो ऐसा false defence पहले से मौजूद incriminating circumstances की श्रृंखला को अतिरिक्त मजबूती देने वाला सबूत है और कानून के अनुसार ऐसे झूठे बचाव को इस निष्कर्ष के लिए भी विचार में लिया जा सकता है कि वह व्यक्ति अपराध का दोषी है और हत्या उसी ने की है।
[Prem Singh v. State (NCT of Delhi), (2023) 3 SCC 372 (paragraph 44) and Bajirao v. State of Maharashtra, 2004 SCC OnLine Bom 121]
रिया चक्रवर्ती मामले में भी आया था यही ‘नहीं जानती’ वाला दावा!
सुशांत सिंह राजपूत मामला चर्चा में रहने के दौरान अगस्त 2020 में रिया चक्रवर्ती ने अपने वकील के माध्यम से जारी बयान में स्पष्ट रूप से कहा था कि वह आदित्य ठाकरे को नहीं जानती, उनसे कभी नहीं मिली और उनसे फोन या किसी अन्य माध्यम से कभी बात नहीं की। Indian Express, India Today और Times of India ने उस समय इस बयान को रिपोर्ट किया था।
रिया ने NDTV को दिए इंटरव्यू में भी दावा किया था कि वह आदित्य ठाकरे से कभी नहीं मिली और न ही उनसे कभी बात की।
आगे, NCB की जांच में रिया चक्रवर्ती के मोबाइल और उसके द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले दूसरे मोबाइल के WhatsApp chats की जांच की गई। उन chats से आदित्य ठाकरे और रिया चक्रवर्ती एक-दूसरे को कई वर्षों से जानते थे, यह सिद्ध हुआ।
साथ ही, ड्रग्स डीलिंग के मामले में जमानत मिलने के बाद रिया चक्रवर्ती दिनो मोरिया से मिलने गई थी। इसके अतिरिक्त, दिनो मोरिया और आदित्य ठाकरे दोनों मुंबई में ड्रग्स का व्यवसाय करते हैं, यह NCB के Crime No. 15/2020 के फोन सर्विलांस रिकॉर्ड और फोन रिकॉर्डिंग से सिद्ध हुआ है।
संजय गुप्ता के मामले में भी—‘फ्रॉड’ कहकर झाड़ लिया पल्ला!
यह मामला केवल दिशा सालियान या रिया चक्रवर्ती तक सीमित नहीं है।
27 जनवरी 2025 को आदित्य ठाकरे ने सोशल मीडिया पर “a fraud named Sanjay Gupta” कहकर संजय गुप्ता को शिवसेना (UBT) का आधिकारिक प्रवक्ता बताए जाने पर मीडिया के उल्लेखों का विरोध किया और संबंधित मीडिया संस्थानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी थी।
इसके बाद संजय गुप्ता ने उन्हें पार्टी द्वारा प्रवक्ता नियुक्त किए जाने का नियुक्ति-पत्र और आदित्य ठाकरे के साथ अपने फोटो मीडिया के सामने प्रस्तुत किए। इसके बाद आदित्य ठाकरे की ओर से कोई ठोस प्रतिवाद नहीं किया गया और न ही उन दस्तावेजों का कोई जवाब दिया गया।
इतना ही नहीं, India Today सहित विभिन्न समाचार चैनलों की कई बहसों में संजय गुप्ता को आदित्य ठाकरे की पार्टी के प्रवक्ता के रूप में ही आमंत्रित किया गया था और उन्होंने उसी हैसियत से अनेक debates में भाग लिया था।
इस पूरे घटनाक्रम से उनके दावों की सत्यता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
मतलब पैटर्न देखिए—
विवाद खड़ा हुआ तो सामने वाला व्यक्ति ही अनजान?
रिश्ते पर सवाल उठा तो—‘मैं नहीं जानता’?
सबूत सामने आए तो उन पर चुप्पी?
और सबूत मांगे गए तो—राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप?
हाईकोर्ट में ‘CBI Clean Chit’ का दावा तो और भी गंभीर!
दिशा सालियान मामले के सबसे गंभीर मुद्दों में से एक है आदित्य ठाकरे की न्यायालयीन भूमिका को लेकर उठा “CBI clean chit” विवाद।
सतीश सालियान की ओर से आरोप लगाया गया कि आदित्य ठाकरे ने न्यायालय में दाखिल हलफनामे में दावा किया था कि CBI ने दिशा सालियान मामले की जांच करके उन्हें clean chit दे दी है। मार्च 2025 में भी एडवोकेट निलेश ओझा ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि CBI ने आदित्य ठाकरे को दिशा सालियान मामले में कोई clean chit नहीं दी है।
सितंबर 2026 में सतीश सालियान द्वारा भेजे गए ₹500 करोड़ के मानहानि नोटिस में भी यह मुद्दा स्पष्ट रूप से उठाया गया है—नोटिस में आरोप है कि आदित्य ठाकरे ने CBI द्वारा मामले की जांच करके उन्हें clean chit दिए जाने का गलत representation किया।
हलफनामे में दिया गया बयान कोई साधारण राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होता। न्यायालय के सामने शपथ पर दिए गए प्रत्येक बयान की जिम्मेदारी होती है।
‘मैं आमदार नहीं; Businessman/Social Worker’—यह मुद्दा भी जवाब मांगता है!
सतीश सालियान की कानूनी टीम की ओर से एक और गंभीर आपत्ति दर्ज की गई है—आरोप है कि आदित्य ठाकरे ने अपने हलफनामे में स्वयं को “Businessman and Social Worker” बताया और विधायक के रूप में अपनी स्थिति का उल्लेख नहीं किया। यह आरोप सार्वजनिक इंटरव्यू में भी लगाया गया है।
इस पर सवाल बिल्कुल सीधा है—
हलफनामा दाखिल किए जाने के संबंधित दिन आदित्य ठाकरे विधायक थे या नहीं?
यदि थे, तो affidavit में उनका occupation/status वास्तव में किस प्रकार दर्ज किया गया और क्यों—यह मूल हलफनामे से जांचा जा सकता है। इसके लिए किसी राजनीतिक भाषण की आवश्यकता नहीं है—दस्तावेज स्वयं बोल सकता है।
आदित्य ठाकरे द्वारा हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में अपने विधायक (MLA) होने की बात छिपाकर स्वयं को “Businessman/व्यापारी” बताने का झूठा उल्लेख किया गया, ऐसा भी गंभीर आरोप है।
ऐसा झूठा हलफनामा देने के पीछे उद्देश्य यह था कि यदि उन्होंने अपना व्यवसाय/पद “विधायक” के रूप में लिखा होता, तो संबंधित मामला MP-MLA Court/Fast Track Court के समक्ष चलाए जाने का प्रश्न पैदा होता और मामले का तत्काल फैसला होने की संभावना बनती।
इसलिए, CBI द्वारा ‘clean chit’ दिए जाने का कथित झूठा दावा, हलफनामे में अपने विधायक पद की बात छिपाकर स्वयं को ‘Businessman’ के रूप में दिखाना और इसके पीछे मामले को MP-MLA Court/Fast Track Court के सामने जाने से रोकने का उद्देश्य होने का आरोप—इन सभी बातों को एक साथ देखने पर उनका झूठ बार-बार सिद्ध होता जा रहा है और न्यायालयीन कार्यवाही में भी झूठा बचाव खड़ा करने का एक लगातार pattern सामने आ रहा है।
तो अब सिर्फ एक ही मांग—‘मैं नहीं जानता’ पर विश्वास मत कीजिए; सबूतों की जांच कीजिए! AU I dont know Disha