सभी सरकारी संस्थानों, स्कूल–कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में समावेश कर लोकसेवकों व न्यायाधीशों में विनम्र, सेवाभावी और नागरिक–केंद्रित आचरण विकसित करने का व्यापक अभियान
लोकसेवक, पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और न्यायाधीश नागरिकों से कैसे व्यवहार करें — देशभर में सिखाने की तैयारी
“इस पहल का उद्देश्य वर्तमान और भावी लोकसेवकों में संवैधानिक मूल्य, विनम्रता, सेवा–भाव तथा नागरिकों, पक्षकारों और अधिवक्ताओं के प्रति सम्मानजनक एवं गरिमापूर्ण व्यवहार की चेतना और संस्कारों को दृढ़ता से स्थापित करना है।”
मुंबई / नई दिल्ली : नैतिक शासन और सार्वजनिक सेवा के मानकों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में राज्य सरकार के विधि विभाग ने इंडियन बार एसोसिएशन (IBA) से प्राप्त प्रतिनिधित्व को आगे की आवश्यक कार्रवाई एवं अनुशंसाओं के क्रियान्वयन हेतु बॉम्बे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को प्रेषित किया है।
विधि विभाग के अतिरिक्त सचिव द्वारा भेजे गए इस पत्राचार के पीछे IBA के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा द्वारा प्रस्तुत विस्तृत निवेदन है। इस निवेदन में भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा एक युवा अधिवक्ता को लिखे गए ऐतिहासिक उत्तर-पत्र को देशभर में संस्थागत स्तर पर अपनाने की मांग की गई है।
पृष्ठभूमि : CJI के विनम्र उत्तर का विधि जगत द्वारा स्वागत
यह पहल मुख्य न्यायाधीश द्वारा हाल ही में विधि की पढ़ाई पूरी करने वाले युवा अधिवक्ता एडवोकेट शिवम गुप्ता को दिए गए उत्तर से प्रेरित है। देशभर के विधि समुदाय ने इस पत्र में व्यक्त विनम्रता, संवेदनशीलता और सम्मानजनक भाषा की व्यापक सराहना की। इसे संवैधानिक पदाधिकारियों और लोकसेवकों से अपेक्षित आदर्श आचरण का प्रभावी उदाहरण माना गया।
कई विधि विशेषज्ञों के अनुसार, देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन सरन्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा प्रदर्शित नागरिक-सम्मान और विनम्रता आज के समय में अत्यंत दुर्लभ है। भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है जहाँ नागरिक सर्वोच्च है; अतः नागरिक-केंद्रित, विनम्र और सेवा-भाव आधारित आचरण को सभी लोकसेवकों द्वारा अपनाया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप माना गया है और इसके व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता व्यक्त की गई है।
सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय के माध्यम से भेजे गए उत्तर में CJI ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक न्यायिक निर्णय के पीछे “न्याय, समानता और निष्पक्षता की अपेक्षा रखने वाले राष्ट्र की आशाएँ” निहित होती हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संविधान की वास्तविक शक्ति जनता में और न्याय के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता में निहित है।
IBA की देशव्यापी अंगीकरण की मांग
पत्र में निहित नैतिक, संवैधानिक और नागरिक-केंद्रित संदेश का उल्लेख करते हुए एडवोकेट निलेश ओझा ने भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर इस संदेश को देशभर में सार्वजनिक प्रशासन के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से शामिल करने का अनुरोध किया है।
प्रस्ताव में केवल न्यायिक, प्रशासनिक और पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों तक सीमित न रहकर इसे स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में भी शामिल करने की सिफारिश की गई है।
निवेदन में कहा गया है कि इस पहल का उद्देश्य वर्तमान और भावी सार्वजनिक सेवकों में संवैधानिक मूल्य, विनम्रता, नैतिक जिम्मेदारी और सेवा-भाव पर आधारित दृष्टिकोण विकसित करना है। साथ ही नागरिकों, पक्षकारों और अधिवक्ताओं के साथ सम्मानजनक, मानवीय और संवेदनशील संवाद की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
IBA के अनुसार, इस पत्र में व्यक्त सिद्धांतों के व्यापक प्रसार और अंगीकरण से संस्थाओं में जनविश्वास बढ़ेगा, शासन में उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता सुदृढ़ होगी तथा सार्वजनिक जीवन में गरिमा, निष्पक्षता और संवैधानिक निष्ठा की संस्कृति विकसित होगी।
प्रशिक्षण, शिक्षा और सार्वजनिक प्रसार के माध्यम से कार्यान्वयन
राज्य विधि मंत्रालय द्वारा अग्रेषित टिप्पणी में CJI के संदेश को संस्थागत स्तर पर लागू करने हेतु निम्न उपाय सुझाए गए हैं :
- न्यायिक, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों सहित सभी लोकसेवकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम
• सरकारी प्रशिक्षण अकादमियों के आधारभूत एवं पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में समावेश
• नागरिक शास्त्र, विधि, शासन और नैतिकता से संबंधित स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों में शामिल करना
• सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक विमर्श मंचों के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार
टिप्पणी में बॉम्बे उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से अनुरोध किया गया है कि प्रस्ताव पर विधिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से विचार कर आवश्यक कदम उठाए जाएँ तथा की गई कार्रवाई की सूचना इंडियन बार एसोसिएशन को दी जाए।