पत्र याचिका में छात्रों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों—सभी के संवैधानिक अधिकारों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि पुलिस पर हमला करने वाले, हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ एवं सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले असामाजिक तत्वों, अत्यधिक या अवैध बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों, पुलिस को अपना वैधानिक कर्तव्य निभाने से रोकने वाले नेताओं एवं अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों, तथा एकतरफा, भ्रामक या झूठी खबरें एवं सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार (मिसइन्फॉर्मेशन) फैलाकर हिंसा, वैमनस्य या अराजकता भड़काने वाले मीडिया कर्मियों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और अन्य व्यक्तियों—सभी के विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के निष्पक्ष, समयबद्ध एवं सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन नेताओं, सांसदों अथवा अन्य जनप्रतिनिधियों ने अपने राजनीतिक हितों, निजी लाभ एवं सत्ता संबंधी महत्वाकांक्षाओं को संविधान और कानून से ऊपर रखते हुए, कानून एवं संविधानसम्मत मार्ग अपनाने के बजाय प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पुलिस के विरुद्ध हिंसा, पुलिसकर्मियों पर हमले, आगजनी, तोड़फोड़ तथा कानून-व्यवस्था भंग करने वाली गतिविधियों को प्रोत्साहित, उकसाया, उनका समर्थन किया अथवा उनमें किसी भी प्रकार की भूमिका निभाई है, वे केवल आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) एवं अन्य संबंधित अपराधों के ही आरोपी नहीं हैं, बल्कि उन्होंने संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा एवं निष्ठा बनाए रखने तथा अपने पद का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने की अपनी संवैधानिक शपथ का भी गंभीर उल्लंघन किया है।
याचिका में यह भी मांग की गई है कि जब पुलिस द्वारा स्पष्ट रूप से अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था, तब भी संसद मार्ग की ओर मार्च निकालने की योजना अथवा आपराधिक साजिश किसने रची, उसके पीछे कौन-कौन से असामाजिक, संगठित एवं राष्ट्रविरोधी तत्व सक्रिय थे, किसने भीड़ को उकसाया, किसने वित्तीय, लॉजिस्टिक अथवा अन्य प्रकार की सहायता उपलब्ध कराई, किसने सोशल मीडिया अथवा अन्य माध्यमों से लोगों को भड़काया तथा किसने जानबूझकर कानून-व्यवस्था को चुनौती देने और सार्वजनिक शांति भंग करने का प्रयास किया—इन सभी पहलुओं की निष्पक्ष, स्वतंत्र, वैज्ञानिक एवं समयबद्ध जांच कर वास्तविक मास्टरमाइंड, षड्यंत्रकारियों, सहयोगियों, वित्तपोषकों तथा अन्य सभी सह-अभियुक्तों की पहचान की जाए।
पत्र में कहा गया है कि प्रत्येक सांसद एवं विधायक पद ग्रहण करने से पूर्व संविधान की निर्धारित शपथ लेता है कि वह संविधान और कानून के अनुसार, बिना किसी भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेगा। इसलिए जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे कानून के शासन (Rule of Law) और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करें, न कि उसे चुनौती दें।
पत्र में कहा गया है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि संविधान एवं कानूनसम्मत मार्ग अपनाने के बजाय स्वयं कानून तोड़ने, हिंसा भड़काने, पुलिस पर हमलों को प्रोत्साहित करने, आगजनी एवं तोड़फोड़ को बढ़ावा देने अथवा राज्य की विधिसम्मत कार्यवाही में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बाधा उत्पन्न करने का कार्य करता है, तो वह केवल दंडनीय अपराध ही नहीं करता, बल्कि अपने पद की संवैधानिक शपथ का भी घोर उल्लंघन करता है। ऐसा आचरण लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक शासन तथा विधि के शासन (Rule of Law) पर सीधा आघात है।
पत्र में इस संदर्भ में R. C. Pollard v. Satya Gopal Mazumdar, 1943 SCC OnLine Cal 153 के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना था कि यद्यपि सार्वजनिक पद ग्रहण करते समय ली गई promissory oath (पद एवं कर्तव्य संबंधी शपथ) के उल्लंघन के लिए प्रत्येक मामले में पृथक दंड का प्रावधान नहीं हो सकता, किन्तु ऐसी शपथ का स्पष्ट उल्लंघन संबंधित व्यक्ति को सार्वजनिक पद धारण करने के अयोग्य (unfit for public office) सिद्ध करता है। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि राज्य के उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा ली गई गंभीर संवैधानिक शपथ को मात्र औपचारिकता मानकर उसकी अवहेलना की जाने लगे, तो सुशासन (Good Governance) की कोई संभावना शेष नहीं रह जाती।
इसी आधार पर पत्र में मांग की गई है कि जिन सांसदों, विधायकों अथवा अन्य निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध जांच में यह स्थापित हो कि उन्होंने अपनी संवैधानिक शपथ का उल्लंघन करते हुए हिंसा, दंगा, पुलिस पर हमले, सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति की क्षति, अथवा कानून-व्यवस्था भंग करने की घटनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका निभाई है, उन्हें व्यक्तिगत रूप से आरोपी बनाया जाए तथा उनके विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 एवं अन्य लागू कानूनों के अंतर्गत कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
पत्र में आगे मांग की गई है कि ऐसे जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध उपलब्ध संवैधानिक एवं वैधानिक प्रावधानों के अनुसार उनकी सदस्यता समाप्त करने, उन्हें सार्वजनिक पद धारण करने के लिए अयोग्य घोषित करने अथवा अन्य उपयुक्त संवैधानिक कार्रवाई प्रारंभ करने की प्रक्रिया भी तत्काल आरंभ की जाए। पत्र में कहा गया है कि संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाला व्यक्ति यदि स्वयं संविधान और कानून के विरुद्ध कार्य करता है, तो उसे जनप्रतिनिधि बने रहने का नैतिक एवं संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं रह जाता। लोकतंत्र में यह सिद्धांत दृढ़तापूर्वक स्थापित होना चाहिए कि संविधान और कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या उच्च पद पर आसीन क्यों न हो।
पत्र में कहा गया है कि इस मामले में श्री राहुल गांधी के विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया यह दर्शाते हैं कि उन्होंने परिस्थितियों को शांत करने और कानून एवं संविधानसम्मत मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित करने के बजाय अपने वक्तव्यों एवं आचरण से विवाद को और अधिक भड़काने का कार्य किया।**
पत्र में कहा गया है कि जब परिस्थितियाँ अत्यंत संवेदनशील एवं तनावपूर्ण थीं और हिंसा फैलने की आशंका स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी, तब एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि का प्रथम संवैधानिक एवं नैतिक दायित्व यह था कि वह **हिंसा और कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति की, चाहे वह किसी भी पक्ष द्वारा की गई हो, स्पष्ट एवं निष्पक्ष शब्दों में निंदा करता तथा सभी पक्षों से संयम बरतने, न्यायिक एवं संवैधानिक उपायों का सहारा लेने और शांति बनाए रखने की सार्वजनिक अपील करता।**
पत्र में कहा गया है कि इसके विपरीत, यदि कोई जनप्रतिनिधि ऐसे समय में ऐसे वक्तव्य देता है या ऐसा आचरण करता है जो भीड़ को उत्तेजित करे, कानून-व्यवस्था को और अधिक बिगाड़े अथवा पुलिस एवं प्रशासन के वैधानिक कार्य में बाधा उत्पन्न करने के लिए लोगों को प्रेरित करे, तो ऐसा आचरण उसके संवैधानिक दायित्वों एवं पद की शपथ के प्रतिकूल है और उसकी भूमिका की निष्पक्ष आपराधिक जांच की जानी आवश्यक है।
पत्र में यह भी कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा केवल राजनीतिक नेतृत्व की नहीं, बल्कि **संवैधानिक नेतृत्व (Constitutional Leadership)** की होती है। इसलिए संकट की घड़ी में उनका प्रत्येक सार्वजनिक वक्तव्य शांति, विधि के शासन और संवैधानिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने वाला होना चाहिए, न कि ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला जिससे हिंसा, अराजकता या सार्वजनिक व्यवस्था के और अधिक बिगड़ने का खतरा बढ़े।
पत्र में यह भी मांग की गई है कि यदि निष्पक्ष जांच के उपरांत यह स्थापित होता है कि किसी सांसद ने अपनी संवैधानिक शपथ का उल्लंघन करते हुए हिंसा, दंगा, पुलिस पर हमले, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति अथवा कानून-व्यवस्था भंग करने की घटनाओं में प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका निभाई है, तो लोकसभा अध्यक्ष संविधान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा अन्य लागू विधिक प्रावधानों के अनुसार ऐसे सांसद के विरुद्ध सदस्यता समाप्त करने सहित सभी उपयुक्त संवैधानिक एवं संसदीय कार्यवाही प्रारंभ करें।
पत्र में कहा गया है कि संसद की गरिमा, संविधान की सर्वोच्चता तथा जनप्रतिनिधियों की संवैधानिक जवाबदेही बनाए रखना लोकसभा अध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व है। यदि कोई सांसद संविधान के प्रति निष्ठा की अपनी शपथ का उल्लंघन कर कानून-व्यवस्था को कमजोर करने वाली गतिविधियों में संलिप्त पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध उपलब्ध संवैधानिक एवं वैधानिक उपायों का निष्पक्ष और समयबद्ध उपयोग किया जाना आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की पवित्रता तथा जनता का विश्वास अक्षुण्ण बना रहे।
याचिका में कहा गया है कि जांच के दौरान उपलब्ध प्रत्यक्ष, परिस्थितिजन्य, डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पोस्ट, डिजिटल संचार तथा अन्य प्रासंगिक साक्ष्यों के आधार पर दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 61(2), भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 8 तथा अन्य सभी लागू दंडात्मक एवं विधिक प्रावधानों के अंतर्गत, बिना किसी राजनीतिक, सामाजिक अथवा अन्य प्रभाव के, कठोर एवं निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि कानून के शासन (Rule of Law) और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समान विधिक संरक्षण के सिद्धांत का प्रभावी पालन सुनिश्चित हो सके।
याचिका में आगे मांग की गई है कि हिंसा, आगजनी, पथराव, तोड़फोड़ तथा सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को हुई क्षति का स्वतंत्र एजेंसी से वैज्ञानिक मूल्यांकन कराया जाए तथा ‘पोल्यूटर पे’ (Polluter Pays) एवं ‘रॉन्गडूअर पे’ (Wrongdoer Pays) के सिद्धांतों के अनुरूप समस्त आर्थिक क्षति, पुलिस एवं प्रशासन द्वारा किए गए अतिरिक्त व्यय, सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग तथा पुनर्स्थापन (Restoration) की पूरी लागत दोषियों से ही वसूल की जाए। याचिका में कहा गया है कि कानून तोड़ने वालों का आर्थिक बोझ ईमानदार करदाताओं पर डालना विधि के शासन के विपरीत होगा। दोषियों से वास्तविक क्षति की वसूली न केवल न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होगी, बल्कि भविष्य में इस प्रकार की सुनियोजित हिंसा, अराजकता और सार्वजनिक संपत्ति के विनाश पर प्रभावी निवारक (Deterrent) के रूप में भी कार्य करेगी।
इंडियन बार एसोसिएशन (Indian Bar Association) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक विस्तृत पत्र भेजकर परीक्षा-पत्र लीक, छात्र आंदोलनों, जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन, पुलिस एवं प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव तथा कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की अपील की है। पत्र में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल विवादों का अंतिम निर्णय देने वाली संस्था नहीं है, बल्कि संविधान का सर्वोच्च संरक्षक होने के नाते समय रहते हस्तक्षेप करना भी उसका संवैधानिक दायित्व है। यदि संवैधानिक न्यायालय प्रारंभिक स्तर पर हस्तक्षेप करें तो अनेक विवाद हिंसा, अराजकता और कानून-व्यवस्था के संकट में बदलने से पहले ही रोके जा सकते हैं।
“न्यायपालिका ही जनता की अंतिम उम्मीद”
मुख्य न्यायाधीश को संबोधित पत्र की शुरुआत सर्वोच्च न्यायालय के दो महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख करते हुए की गई है। पत्र में कहा गया है कि स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम सारंगधरसिंह चव्हाण, (2011) 1 SCC 577 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का सर्वोपरि संवैधानिक दायित्व विधि के शासन (Rule of Law) को अक्षुण्ण रखना तथा प्रत्येक नागरिक को संविधान द्वारा प्रदत्त कानून के समान संरक्षण के अधिकार की प्रभावी रक्षा सुनिश्चित करना है।
इसी प्रकार, तारक सिंह बनाम ज्योति बसु, (2005) 1 SCC 201 मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की विशिष्ट संवैधानिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि आज न्यायपालिका जनता के विश्वास की सबसे बड़ी धरोहर है। वह जनता की न्यासी (Trustee) है और आम नागरिक की अंतिम आशा है। जब प्रत्येक द्वार पर दस्तक देने के बाद भी किसी व्यक्ति को न्याय नहीं मिलता, तब वह अंतिम उम्मीद के रूप में न्यायपालिका की शरण में आता है। न्यायालय ने आगे कहा कि न्यायपालिका ऐसा एकमात्र मंदिर है, जहाँ इस देश का प्रत्येक नागरिक—धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान की परवाह किए बिना—समान आस्था और विश्वास के साथ न्याय की अपेक्षा लेकर पहुँचता है।
“समय पर न्यायिक हस्तक्षेप भी उतना ही आवश्यक”
पत्र में कहा गया है कि कई बार घटनाएं इतनी तेजी से विकसित होती हैं कि यदि समय पर संवैधानिक हस्तक्षेप न हो तो स्थिति हिंसा, जनहानि और व्यापक सार्वजनिक अव्यवस्था में बदल जाती है। ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका केवल बाद में निर्णय देने तक सीमित नहीं रह सकती। संविधान ने न्यायालयों को मौलिक अधिकारों की रक्षा, प्रशासनिक विफलताओं पर नियंत्रण और कानून के शासन को बनाए रखने का दायित्व भी सौंपा है। इसलिए बड़े पैमाने पर पेपर लीक, छात्रों के अधिकारों का उल्लंघन, सार्वजनिक अशांति अथवा संवैधानिक संकट की स्थिति में न्यायालयों को आवश्यकतानुसार स्वतः संज्ञान लेकर समयबद्ध हस्तक्षेप करना चाहिए।
केवल जंतर-मंतर नहीं, पूरे देश की संवैधानिक व्यवस्था का सवाल
पत्र में कहा गया है कि यह मामला केवल एक प्रदर्शन या एक दिन की हिंसा तक सीमित नहीं है। इसके मूल में छात्रों का भविष्य, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार, पुलिसकर्मियों की सुरक्षा, आम नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही तथा सार्वजनिक व्यवस्था जैसे अनेक संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं।
याचिका में कहा गया है कि यदि ऐसी घटनाओं पर समय रहते संस्थागत और न्यायिक सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में भी विभिन्न जनआंदोलनों के दौरान इसी प्रकार के टकराव बार-बार देखने को मिल सकते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को इस अवसर का उपयोग व्यापक राष्ट्रीय दिशानिर्देश तैयार करने के लिए करना चाहिए।
“छात्रों, पुलिस और आम नागरिक—सभी के अधिकार समान”
इंडियन बार एसोसिएशन ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि संविधान किसी एक पक्ष के अधिकारों की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करता है।
पत्र के अनुसार, छात्रों को निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली का अधिकार है। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार है। पुलिसकर्मियों को बिना किसी हिंसा, हमले या अवरोध के अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने का अधिकार है। वहीं आम नागरिकों को निर्बाध आवागमन, सामान्य जीवन जीने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार प्राप्त है।
पत्र में कहा गया है कि किसी एक वर्ग के अधिकारों की रक्षा के नाम पर दूसरे वर्ग के संवैधानिक अधिकारों का बलिदान नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना ही संविधान और Rule of Law की मूल भावना है।
दोषी कोई भी हो, कार्रवाई सब पर हो
पत्र की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें किसी एक पक्ष के विरुद्ध कार्रवाई की मांग नहीं की गई है, बल्कि सभी दोषियों के विरुद्ध समान रूप से कानून लागू करने की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि कानून का शासन (Rule of Law) तभी प्रभावी माना जा सकता है जब कानून का समान रूप से पालन और प्रवर्तन सभी पर हो, चाहे वह आम नागरिक हो, राजनीतिक नेता, सरकारी अधिकारी, पुलिसकर्मी, मीडिया संस्थान या सोशल मीडिया पर प्रभाव रखने वाला कोई व्यक्ति। इसलिए पुलिस पर हमला करने वाले, हिंसा, आगजनी, पथराव, तोड़फोड़ तथा सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले असामाजिक तत्वों, अत्यधिक, अनावश्यक या अवैध बल प्रयोग करने वाले पुलिसकर्मियों, पुलिस एवं अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को उनका वैधानिक कर्तव्य निभाने से रोकने, उन पर अनुचित दबाव डालने या कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करने वाले नेताओं एवं अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों, तथा एकतरफा, झूठी, भ्रामक या अपुष्ट खबरें, भड़काऊ सामग्री, फर्जी वीडियो, संपादित (मॉर्फ्ड) क्लिप, अफवाहें या सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार (मिसइन्फॉर्मेशन/डिसइन्फॉर्मेशन) फैलाकर हिंसा, वैमनस्य, भीड़तंत्र या अराजकता को बढ़ावा देने वाले मीडिया कर्मियों, डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालकों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स एवं अन्य व्यक्तियों—सभी के विरुद्ध बिना किसी भेदभाव, राजनीतिक प्रभाव या चयनात्मक कार्रवाई के, निष्पक्ष, स्वतंत्र, समयबद्ध और कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
याचिका में आगे कहा गया है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं और किसी भी व्यक्ति, संगठन या संस्था को उसकी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा मीडिया प्रभाव के कारण विशेष संरक्षण या दंड से छूट नहीं मिल सकती। यदि कानून का पालन चयनात्मक रूप से किया जाता है, तो इससे न केवल जनता का न्याय व्यवस्था और प्रशासन पर विश्वास कमजोर होता है, बल्कि भविष्य में हिंसक तत्वों, झूठे प्रचार तथा कानून हाथ में लेने की प्रवृत्ति को भी प्रोत्साहन मिलता है। इसलिए हिंसा भड़काने, कानून-व्यवस्था को बाधित करने अथवा अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के विरुद्ध समान और प्रभावी कानूनी कार्रवाई ही संविधान के अनुच्छेद 14 तथा विधि के शासन (Rule of Law) की वास्तविक भावना के अनुरूप होगी।
पेपर लीक की SIT जांच और छात्रों को राहत
पत्र में मांग की गई है कि परीक्षा-पत्र लीक की निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराई जाए। यदि आवश्यक हो तो स्वतंत्र Special Investigation Team (SIT) गठित कर पूरे षड्यंत्र की जांच की जाए और शिक्षा विभाग से लेकर मुख्य सचिव स्तर तक जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आए, उनके विरुद्ध भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
इसके साथ ही प्रभावित छात्रों की शिकायतों का समयबद्ध समाधान, पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया तथा आवश्यक होने पर राहत और मुआवजा देने की भी मांग की गई है।
हर पुलिसकर्मी के लिए बॉडी कैमरा अनिवार्य करने की मांग
पत्र में कहा गया है कि भविष्य में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच होने वाले विवादों को रोकने के लिए कानून-व्यवस्था ड्यूटी पर तैनात प्रत्येक पुलिसकर्मी के लिए Body-Worn Camera अनिवार्य किया जाए।
इसके अलावा सीसीटीवी, ड्रोन कैमरे, वाहन कैमरे, जीपीएस रिकॉर्ड, वायरलेस लॉग, कंट्रोल रूम रिकॉर्ड, कॉल लॉग और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की बाध्यकारी व्यवस्था बनाई जाए ताकि किसी भी घटना की निष्पक्ष जांच वस्तुनिष्ठ डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर हो सके। यदि अनिवार्य रिकॉर्डिंग गायब मिले या जानबूझकर नष्ट की जाए तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय एवं आपराधिक कार्रवाई की भी मांग की गई है।
सोशल मीडिया पर हिंसा भड़काने वालों पर निगरानी
पत्र में YouTube, Facebook, Instagram, WhatsApp और X जैसे प्लेटफॉर्म पर हिंसा भड़काने, अफवाह फैलाने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने वाली सामग्री की कानूनी निगरानी की भी मांग की गई है। हालांकि स्पष्ट किया गया है कि इस व्यवस्था का उपयोग सरकार की वैध आलोचना, स्वतंत्र पत्रकारिता, व्यंग्य अथवा शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए।
देशभर के लिए राष्ट्रीय गाइडलाइन बनाने की मांग
इंडियन बार एसोसिएशन ने अपने पत्र में सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया है कि वह केवल वर्तमान विवाद तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे देश के लिए सार्वजनिक प्रदर्शन, छात्र आंदोलनों, पुलिस कार्रवाई, डिजिटल साक्ष्यों के संरक्षण, भीड़ नियंत्रण, सोशल मीडिया के दुरुपयोग और संवैधानिक अधिकारों के संतुलित संरक्षण से संबंधित एक समान राष्ट्रीय गाइडलाइन जारी करे।
पत्र में कहा गया है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय समय रहते ऐसे व्यापक राष्ट्रीय दिशानिर्देश तैयार करता है, तो भविष्य में परीक्षा-पत्र लीक, छात्र आंदोलनों, सार्वजनिक प्रदर्शनों तथा कानून-व्यवस्था से जुड़े विवादों के दौरान उत्पन्न होने वाली हिंसा, टकराव, प्रशासनिक भ्रम और अनावश्यक तनाव को काफी हद तक रोका जा सकेगा। इससे न केवल छात्रों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि बार-बार उत्पन्न होने वाली ऐसी परिस्थितियों पर प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका और अन्य सरकारी संस्थाओं के समय, ऊर्जा और संसाधनों के अनावश्यक व्यय को भी रोका जा सकेगा।
पत्र में आगे कहा गया है कि जब शासन-प्रशासन को बार-बार हिंसा, अव्यवस्था और टकराव जैसी स्थितियों से निपटने में अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़ेगी, तब वही संसाधन, प्रशासनिक क्षमता और सरकारी मशीनरी देश के विकास, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, रोजगार सृजन, बुनियादी ढांचे के निर्माण, कानून-व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने तथा जनकल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में लगाए जा सकेंगे। इससे शासन की प्राथमिकताएं संकट प्रबंधन से हटकर राष्ट्र निर्माण और विकास पर केंद्रित होंगी।
याचिका का मूल उद्देश्य केवल वर्तमान घटनाओं पर न्यायिक हस्तक्षेप प्राप्त करना नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए एक स्थायी संवैधानिक एवं संस्थागत व्यवस्था विकसित करना है। पत्र में कहा गया है कि यदि सभी संबंधित पक्षों के अधिकारों और दायित्वों को स्पष्ट करने वाली राष्ट्रीय गाइडलाइन बनाई जाती है, तो कानून का शासन और मजबूत होगा, जनता का संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास बढ़ेगा, प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग कम होगा, सार्वजनिक संसाधनों का अधिक विवेकपूर्ण उपयोग होगा तथा राष्ट्र की ऊर्जा टकराव और अव्यवस्था में नष्ट होने के बजाय विकास, सुशासन और भारत को अधिक समृद्ध, सुरक्षित एवं प्रगतिशील बनाने की दिशा में नियोजित की जा सकेगी।