सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना विधि छात्रों प्रबल प्रताप और चंदर भान की गिरफ्तारी असंवैधानिक : इंडियन बार एसोसिएशन और राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में दायर की याचिका

इंडियन बार एसोसिएशन तथा राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति (RSRS) की मांग – दोनों विधि छात्रों की तत्काल रिहाई, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर मुआवजा तथा पुलिस, सरकारी वकील और मजिस्ट्रेट के विरुद्ध कार्रवाई

 नई दिल्ली: इंडियन बार एसोसिएशन (IBA) तथा राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति (RSRS) ने अपने चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा के माध्यम से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है। प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया है कि विधि के दो छात्रों प्रबल प्रताप सिंह और चंदर भान की गिरफ्तारी, जांच तथा न्यायिक हिरासत भारतीय संविधान, संसद द्वारा निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित बाध्यकारी कानून के विपरीत है।

प्रतिवेदन में दोनों छात्रों को तत्काल न्यायिक हिरासत से रिहा करने, संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के उल्लंघन के लिए उन्हें उचित संवैधानिक मुआवजा दिलाने तथा इस मामले में भूमिका निभाने वाले पुलिस अधिकारियों, सरकारी वकील (Public Prosecutor) और संबंधित मजिस्ट्रेट के विरुद्ध विधि सम्मत कार्रवाई करने की मांग की गई है।

यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष हुई एक घटना से जुड़ा है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्वयं पैरवी कर रहे प्रबल प्रताप सिंह ने कथित रूप से न्यायालय कक्ष में कागज़ फेंके तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया।

प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया है कि प्रबल प्रताप का आचरण निंदनीय है और किसी भी प्रकार से उसका समर्थन नहीं किया जा सकता। किंतु साथ ही यह भी कहा गया है कि जिस पीठ के समक्ष यह कथित घटना हुई, उसने न्यायिक संयम (Judicial Restraint) का परिचय देते हुए न तो अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ की और न ही न्यायालय के समक्ष घटित अपराधों के लिए संसद द्वारा निर्धारित विशेष वैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत अभियोजन का निर्देश दिया। प्रतिवेदन का कहना है कि ऐसी स्थिति में पुलिस द्वारा बाद में स्वतंत्र रूप से की गई कार्रवाई तभी वैध मानी जा सकती थी जब उसे संसद द्वारा निर्धारित विशेष वैधानिक प्रक्रिया का स्पष्ट अधिकार प्राप्त होता तथा वह उसी प्रक्रिया के अनुरूप होती।

प्रतिवेदन में यह भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि केवल किसी व्यक्ति पर आरोप लग जाने से वह अपने संवैधानिक अथवा वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं हो जाता। आरोप चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, वह पुलिस या किसी अन्य राज्य प्राधिकरण को यह अधिकार नहीं देता कि वह कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया की अवहेलना करे या संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करे। प्रतिवेदन के अनुसार, विधि का शासन (Rule of Law) यही अपेक्षा करता है कि प्रत्येक आरोपी के साथ, आरोपों की प्रकृति चाहे जो भी हो, संविधान और संसद द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही व्यवहार किया जाए।

प्रतिवेदन में आगे कहा गया है कि घटना के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने न तो अपनी अवमानना अधिकारिता का प्रयोग किया और न ही विशेष वैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत अभियोजन का निर्देश दिया। इसके बावजूद दिल्ली पुलिस ने स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज कर दोनों छात्रों को गिरफ्तार कर लिया।

प्रतिवेदन के अनुसार यह कार्रवाई संसद द्वारा निर्धारित वैधानिक व्यवस्था के विपरीत है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई कथित अपराध न्यायिक कार्यवाही के दौरान न्यायालय की उपस्थिति में घटित होता है, तो उसका अभियोजन केवल भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 267 तथा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराओं 215, 384 और 385 में निर्धारित विशेष प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है। पुलिस स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज कर सामान्य आपराधिक प्रक्रिया का सहारा नहीं ले सकती। चूँकि सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने न तो अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ की और न ही विशेष प्रक्रिया के अंतर्गत अभियोजन का निर्देश दिया, इसलिए प्रतिवेदन के अनुसार पुलिस के पास उस प्रक्रिया को दरकिनार कर स्वतंत्र रूप से एफआईआर दर्ज करने और गिरफ्तारी करने का अधिकार नहीं था। 

प्रतिवेदन में कहा गया है कि ऐसे अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करके दर्ज की गई एफआईआर को रद्द किया है तथा उपयुक्त मामलों में आरोपियों को मुआवज़ा भी प्रदान किया है। प्रतिवेदन में सर्वोच्च न्यायालय के अनेक बाध्यकारी निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया है कि जब संसद ने किसी अपराध के अभियोजन के लिए एक विशेष वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित की है, तो उसे अन्य दंडात्मक प्रावधानों का सहारा लेकर दरकिनार नहीं किया जा सकता।

Dr. S. Dutt v. State of Uttar Pradesh, AIR 1966 SC 523 में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अभियोजन पक्ष सक्षम प्राधिकारी की शिकायत की अनिवार्य वैधानिक शर्त से बचने के लिए संबंधित अपराध को जानबूझकर छोड़कर किसी अन्य प्रावधान के तहत अभियोजन नहीं चला सकता। इसी सिद्धांत को C. Muniappan v. State of Tamil Nadu, (2010) 9 SCC 567 में पुनः दोहराया गया। इसके बाद Shrinath Gangadhar Giram v. State of Maharashtra, 2017 SCC OnLine Bom 10118 तथा State of Haryana v. Shagun, 2024 SCC OnLine P&H 1 में भी यह माना गया कि जहाँ कानून सक्षम प्राधिकारी की लिखित शिकायत को अनिवार्य बनाता है, वहाँ पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर उसका विकल्प नहीं हो सकती। ऐसे मामलों में वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन कर शुरू की गई कार्यवाही रद्द किए जाने योग्य है तथा राज्य पर लागत (Costs) भी लगाई जा सकती है।

 

प्रतिवेदन का एक महत्वपूर्ण भाग सरकारी वकील (Public Prosecutor) के संवैधानिक दायित्वों से संबंधित है। Sheonandan Paswan v. State of Bihar के संविधान पीठ के निर्णय सहित अनेक सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सरकारी वकील सरकार या पुलिस का प्रवक्ता नहीं, बल्कि न्यायालय का अधिकारी (Officer of the Court) तथा न्याय का संरक्षक (Minister of Justice) होता है। उसका सर्वोपरि कर्तव्य न्यायालय के समक्ष सही तथ्य, सही वैधानिक प्रावधान और सही कानूनी स्थिति प्रस्तुत करना है। यदि बचाव पक्ष किसी बाध्यकारी निर्णय या वैधानिक सुरक्षा का उल्लेख न भी करे, तब भी सरकारी वकील का दायित्व है कि वह न्यायालय को सही कानून से अवगत कराए और किसी भी नागरिक की अवैध हिरासत या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन को रोके।

प्रतिवेदन में Dr. Manoj Kumar Rawat v. State of Uttar Pradesh के हालिया निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि राज्य के अधिकारी और सरकारी अधिवक्ता न्यायालय को वास्तविक तथ्य एवं सही कानूनी स्थिति से अवगत कराने के लिए बाध्य हैं। वे स्थापित कानून के विपरीत कार्रवाई का बचाव नहीं कर सकते और न ही ऐसे हलफनामे प्रस्तुत कर सकते हैं जो विधि की सही स्थिति से मेल न खाते हों।

प्रतिवेदन में यह भी कहा गया है कि रिमांड देने वाले मजिस्ट्रेट पर भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का स्वतंत्र संवैधानिक दायित्व होता है। सर्वोच्च न्यायालय बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि मजिस्ट्रेट जांच एजेंसी का केवल “डाकघर” (Post Office) नहीं है। न्यायिक हिरासत में भेजने से पूर्व मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह स्वतंत्र रूप से संतुष्ट हो कि गिरफ्तारी कानून के अनुरूप हुई है, जांच विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार प्रारंभ की गई है, जांच एजेंसी के पास अधिकार क्षेत्र है तथा सभी अनिवार्य वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन किया गया है। यदि गिरफ्तारी स्वयं कानून के विपरीत हो, तो मजिस्ट्रेट का दायित्व नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, न कि यांत्रिक रूप से न्यायिक हिरासत देकर उस कथित अवैधता को आगे बढ़ाना।

प्रतिवेदन के अनुसार, इन परिस्थितियों में दोनों विधि छात्रों की निरंतर न्यायिक हिरासत संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों का निरंतर उल्लंघन है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष इंडियन बार एसोसिएशन और राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति ने पुलिस अधिकारियों, सरकारी वकील तथा संबंधित मजिस्ट्रेट की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने तथा दोषी पाए जाने पर उनके विरुद्ध विधि सम्मत कार्रवाई करने की मांग की है।

प्रतिवेदन में दोनों विधि छात्रों के लिए संवैधानिक मुआवजे (Constitutional Compensation) की भी मांग की गई है। इसके समर्थन में S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews, Rini Johar v. State of Madhya Pradesh तथा Mahabir v. State of Haryana जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला दिया गया है। प्रतिवेदन के अनुसार, जब किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना छीनी जाती है, तब संवैधानिक न्यायालय सार्वजनिक विधि (Public Law) के अंतर्गत मुआवजा प्रदान कर सकते हैं तथा राज्य को दोषी अधिकारियों से वह राशि वसूलने की स्वतंत्रता भी दे सकते हैं।

प्रतिवेदन में कहा गया है कि यह मामला केवल दो विधि छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि विधि के शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पुलिस शक्तियों की संवैधानिक सीमाओं, अभियोजन की निष्पक्षता, रिमांड के समय न्यायिक निगरानी तथा संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा से जुड़े अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। यदि संवैधानिक न्यायालयों के समक्ष घटित घटनाओं के लिए संसद द्वारा निर्धारित विशेष वैधानिक सुरक्षा उपायों को सामान्य आपराधिक प्रक्रिया अपनाकर दरकिनार किया जाने लगे, तो इसके दूरगामी और गंभीर परिणाम देश की नागरिक स्वतंत्रताओं तथा न्याय प्रशासन पर पड़ेंगे।

प्रतिवेदन में यह भी कहा गया है कि इसकी पूरी नींव केवल सैद्धांतिक कानूनी तर्कों पर नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के अनेक बाध्यकारी निर्णयों पर आधारित है। प्रतिवेदन के अनुसार, कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के विपरीत दर्ज की गई एफआईआर और आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त किया है, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली की कठोर आलोचना की है, सरकारी वकीलों को उनके निष्पक्ष एवं स्वतंत्र दायित्वों की याद दिलाई है तथा उन मजिस्ट्रेटों को भी फटकार लगाई है जिन्होंने गिरफ्तारी की वैधता या जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र की जांच किए बिना यांत्रिक रूप से न्यायिक हिरासत प्रदान कर दी।

प्रतिवेदन में ऐसे अनेक निर्णयों का भी उल्लेख किया गया है जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अथवा अन्य उपयुक्त कार्रवाई के निर्देश दिए, आवश्यक समझे जाने पर उनके विरुद्ध आगे की कार्यवाही का मार्ग प्रशस्त किया तथा अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के कारण अवैध गिरफ्तारी और हिरासत के शिकार व्यक्तियों को संवैधानिक मुआवजा प्रदान किया। साथ ही राज्य को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह उक्त मुआवजे की राशि दोषी अधिकारियों से वसूल करे। प्रतिवेदन में कहा गया है कि इन्हीं बाध्यकारी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी समान राहत प्रदान करने का अनुरोध किया गया है।

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