“इंसान की पहचान उसकी संगत से होती है”: GenZ Lawyers Association ने CJP के सौरव दास और रत्ना सिंह को घेरा; संविधान पर राजनीतिक निष्पक्षता की शपथ के बाद आदित्य ठाकरे से मुलाकात पर मांगा जवाब

“हम BJP के सदस्य नहीं; हमने खुद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया” — जंतर-मंतर आंदोलन का समर्थन किया था, लेकिन हिंसा, गाली-गलौज, देशविरोधी नारों और पुलिस पर हमलों का नहीं: GZLA

GZLA का तीखा सवाल—“बर्गर खाने पर विजेता दहिया को प्रवक्ता पद से हटाया, तो गैंगरेप, हत्या और ड्रग्स ट्रैफिकिंग सहित कई गंभीर आरोपों का सामना कर रहे आदित्य ठाकरे के घर जाकर मुलाकात करने वाले CJP नेतृत्व के सौरव दास और रत्ना सिंह के लिए अलग पैमाना क्यों?”

GZLA ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा और न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन के मामलों में उनके संबंधित पारिवारिक सदस्यों से कथित रूप से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर अलग-अलग रुख अपनाने पर सौरव दास की चयनात्मक आलोचना (Selective Criticism) और स्पष्ट दोहरे मापदंडों (Apparent Double Standards) की भी कड़ी निंदा की।

यह पत्र GenZ Lawyers Association (GZLA) के Convenor, अधिवक्ता आयुष तिवारी ने भेजा है।

 संविधान पर हाथ रखकर सौरव दास ने ली थी राजनीतिक स्वतंत्रता की शपथ; GZLA का आरोप—बाद का आचरण उसी सार्वजनिक शपथ के विपरीत, अब देना होगा जवाब

दिशा सालियन मामले की बॉम्बे हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई के बीच हुई मुलाकात पर जताई गंभीर आपत्ति;   सवालों का सार्वजनिक जवाब मांगा

GZLA के अनुसार, इन परिस्थितियों और मुलाकात की अत्यंत महत्वपूर्ण timing को देखते हुए किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि क्या CJP नेतृत्व को किसी राजनीतिक अथवा सार्वजनिक समर्थन, backing या coordination के उद्देश्य से बुलाया गया था, अथवा क्या CJP या उसके पदाधिकारियों का कथित drug mafia या उससे जुड़े व्यक्तियों से किसी प्रकार का sponsorship, connection, understanding या coordination है?

मात्र मुलाकात से ऐसा कोई संबंध सिद्ध नहीं होता, लेकिन अब CJP नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह आम जनता, युवाओं और अपने समर्थकों के मन में उठ रहे इन गंभीर सवालों और आशंकाओं को नजरअंदाज करने के बजाय स्पष्ट, विश्वसनीय और पारदर्शी सार्वजनिक जवाब देकर उनका निराकरण करे। विशेष रूप से तब, जब CJP स्वयं राजनीतिक निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की सार्वजनिक घोषणा कर चुका है।

मुंबई: GenZ Lawyers Association (GZLA) ने Cockroach Janta Party (CJP) के Co-Convenor सौरव दास और Legal Affairs Lead रत्ना सिंह को एक विस्तृत पत्र भेजकर शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे से उनके निवास पर हुई मुलाकात पर गंभीर आपत्ति दर्ज की है। एसोसिएशन ने विशेष रूप से सौरव दास द्वारा संविधान पर हाथ रखकर CJP की पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता की सार्वजनिक घोषणा और उसके बाद हुई इस मुलाकात के बीच कथित विरोधाभास पर स्पष्टीकरण मांगा है। पत्र सौरव दास और रत्ना सिंह को संबोधित है।

पत्र की शुरुआत एक प्रसिद्ध उक्ति से की गई है:

“A man is known by the company he keeps, the language he speaks, and the company he avoids.” — A well-known maxim often attributed to Abraham Lincoln

अर्थात, “किसी व्यक्ति की पहचान इस बात से भी होती है कि वह किन लोगों की संगत रखता है, कैसी भाषा बोलता है और किन लोगों की संगत से दूरी बनाता है।”

GZLA ने कहा है कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति द्वारा चुनी गई संगत और जिन व्यक्तियों अथवा मुद्दों से वह दूरी बनाए रखता है, वह कई बार उसकी सार्वजनिक घोषणाओं से अधिक प्रभावशाली संदेश देती है। एसोसिएशन के अनुसार यह सिद्धांत उन लोगों के मामले में और महत्वपूर्ण हो जाता है जो देशव्यापी युवा आंदोलन का नेतृत्व करने, संविधान के प्रति निष्ठा और राजनीतिक दलों से पूर्ण स्वतंत्रता का दावा करते हैं।

जंतर-मंतर आंदोलन का समर्थन किया था, हिंसा का नहीं: GZLA

पत्र में स्पष्ट किया गया है कि GZLA और Indian Bar Association ने जंतर-मंतर आंदोलन में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की वैध एवं संवैधानिक मांगों और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का समर्थन किया था। साथ ही, हिंसा, पुलिसकर्मियों पर हमले, आगजनी, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई की मांग भी की थी।

एसोसिएशन ने कहा कि उसका विरोध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों की वापसी से नहीं, बल्कि हिंसा में शामिल व्यक्तियों के मामलों को भी बिना भेदभाव वापस लेने से था। इस संबंध में Chief Justice of India को भी लिखित representations भेजे गए थे।

पत्र के अनुसार, बाद में संबंधित मामले सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचे और राहत दी गई। GZLA ने इसे अपने लगातार अपनाए गए उस रुख का हिस्सा बताया जिसमें एक ओर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा और दूसरी ओर हिंसा में शामिल लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की गई।

संविधान पर हाथ रखकर सौरव दास ने ली थी राजनीतिक स्वतंत्रता की शपथ; GZLA का आरोप—बाद का आचरण उसी सार्वजनिक शपथ के विपरीत, अब देना होगा जवाब

पत्र में 13 जुलाई 2026 के एक वीडियो का विशेष उल्लेख किया गया है। GZLA के अनुसार सौरव दास ने पत्रकार आरफा खानम शेरवानी के साथ एक इंटरव्यू/वीडियो के दौरान संविधान की प्रति पर हाथ रखकर CJP की राजनीतिक स्वतंत्रता की सार्वजनिक घोषणा की थी।

पत्र में उनके कथन को इस प्रकार उद्धृत किया गया है:

“मैं सौरव दास, भारत के संविधान की शपथ लेकर यह घोषणा करता हूँ कि कॉकरोच आंदोलन पूरी तरह स्वतंत्र है…”

GZLA के अनुसार इस सार्वजनिक घोषणा का आशय यह था कि आंदोलन पूरी तरह स्वतंत्र है; उसका किसी राजनीतिक दल, संगठन अथवा विचारधारा से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है; और उसकी निष्ठा केवल भारत के संविधान, लोकतंत्र और देश के युवाओं के प्रति है।

“हम BJP के सदस्य नहीं; हमने खुद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का समर्थन किया”

राजनीतिक पक्षपात के किसी संभावित आरोप को लेकर GZLA ने पत्र में साफ कहा है कि उसके पदाधिकारी न तो BJP के सदस्य हैं और न ही BJP से संबद्ध हैं। एसोसिएशन ने याद दिलाया कि उसने स्वयं CJP की वैध मांगों का समर्थन किया था और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग का भी समर्थन किया था

इसके बावजूद एसोसिएशन ने सवाल उठाया कि यदि CJP पूरी तरह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष है, तो Karnataka, Jharkhand, Punjab और Kerala जैसे गैर-BJP शासित राज्यों में paper leaks, examination irregularities और छात्रों की समस्याओं पर उसी स्तर का आक्रामक, निरंतर और राष्ट्रव्यापी अभियान क्यों दिखाई नहीं दिया।

पत्र में यहां तक कहा गया है कि विभिन्न वर्गों और मीडिया के लगातार दबाव के बाद ही Jharkhand के प्रदर्शनकारी छात्रों को देर से समर्थन दिया गया दिखाई पड़ा। GZLA के अनुसार इससे घोषित राजनीतिक निष्पक्षता और आंदोलन के वास्तविक आचरण के बीच consistency पर सवाल खड़े होते हैं।

सबसे गंभीर सवाल: गैंगरेप, हत्या, ड्रग्स ट्रैफिकिंग सहित कई गंभीर आरोपों का सामना कर रहे आदित्य ठाकरे के घर जाकर मुलाकात क्यों?

GZLA ने कहा है कि उसकी आपत्ति केवल किसी राजनीतिक नेता से मुलाकात करने तक सीमित नहीं है। असली और कहीं अधिक गंभीर सवाल यह है कि मुलाकात किस व्यक्ति से हुई, उसके निजी निवास पर क्यों हुई, किस समय हुई और उस समय उसके विरुद्ध किस प्रकृति के गंभीर आरोप एवं न्यायिक कार्यवाही लंबित थीं। पत्र में विशेष रूप से उल्लेख है कि दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अन्य लोगों के विरुद्ध अपनी बेटी की मृत्यु के संबंध में गंभीर आरोप लगाए हैं, और उनसे जुड़े मुद्दे वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन हैं।

GZLA के अनुसार, सतीश सालियन द्वारा गैंगरेप और हत्या सहित गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जबकि पत्र में आदित्य ठाकरे के विरुद्ध drug trafficking, perjury, forgery, cannibalism और child trafficking जैसे अन्य अत्यंत गंभीर आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। मुरसलीन शेख और राशिद खान पठान द्वारा लगाए गए आरोपों का उल्लेख उपलब्ध पत्र के इन अंशों में नहीं है; यदि उनकी शिकायतें/हलफनामे उपलब्ध हों, तो उन्हें अलग दस्तावेजी आधार के साथ जोड़ा जाना अधिक मजबूत होगा।

पत्र के अनुसार, इस मुलाकात को लेकर किसी प्रकार की अटकल की भी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आदित्य ठाकरे ने स्वयं सोशल मीडिया पर सौरव दास और रत्ना सिंह के साथ हुई मुलाकात को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया और अपने पोस्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि बैठक के दौरान CJP protest के highlights पर चर्चा हुई। इसलिए GZLA का कहना है कि सवाल केवल यह नहीं है कि मुलाकात हुई या नहीं, बल्कि यह है कि ऐसी संवेदनशील परिस्थितियों में यह मुलाकात क्यों हुई, इसका उद्देश्य क्या था और इसमें किन विषयों पर चर्चा हुई।

GZLA ने स्पष्ट किया है कि किसी राजनीतिज्ञ से मिलना अपने-आप में संविधान पर ली गई राजनीतिक स्वतंत्रता की सार्वजनिक शपथ का उल्लंघन है या नहीं, इसका स्पष्ट जवाब सौरव दास को देना होगा। लेकिन इससे कहीं अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि CJP के वरिष्ठ पदाधिकारी उस व्यक्ति के निजी निवास पर जाकर उससे मिले जिसे दिशा सालियन के पिता ने अपनी बेटी की कथित गैंगरेप और हत्या से संबंधित शिकायत में नामित किया है, जबकि इन्हीं गंभीर मुद्दों से संबंधित proceedings बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष लंबित हैं।

GZLA के अनुसार, मुलाकात का समय इस विवाद को और गंभीर बनाता है। पत्र में कहा गया है कि 3 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण developments हुईं और उसके बाद मामला 24 अगस्त 2026 को दोपहर 3 बजे महत्वपूर्ण सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया। ऐसे महत्वपूर्ण intervening period में हुई मुलाकात को केवल “casual” या “private meeting” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता; CJP नेतृत्व को इसकी timing, purpose, political implications और pending judicial proceedings के संदर्भ में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

3 अगस्त की हाईकोर्ट कार्यवाही का भी पत्र में उल्लेख—“आपको FIR दर्ज करने से किसने रोका?”

GZLA ने अपने पत्र में 3 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई महत्वपूर्ण सुनवाई का विशेष उल्लेख किया है। पत्र के अनुसार, दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन की शिकायत पर FIR दर्ज नहीं किए जाने को लेकर हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस से सवाल किए। इस संबंध में Young Advocates Council, Dainik Bhaskar और LiveLaw सहित विभिन्न मीडिया एवं कानूनी पोर्टलों की रिपोर्टों का भी पत्र में उल्लेख किया गया है।

पत्र में LiveLaw की रिपोर्ट का यह महत्वपूर्ण शीर्षक उद्धृत किया गया है:

“‘What Stops You From Registering FIR When Someone Raises Suspicion?’ Bombay High Court To Mumbai Police In Disha Salian Death Case”

अर्थात—“जब कोई व्यक्ति संदेह व्यक्त करते हुए शिकायत करता है, तो आपको FIR दर्ज करने से किसने रोका?” पत्र के अनुसार, इस सुनवाई से संबंधित अन्य मीडिया रिपोर्टों में भी दिशा सालियन की मृत्यु की जांच और पिता की शिकायत पर FIR दर्ज नहीं किए जाने को लेकर हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए सवालों का उल्लेख किया गया है।

एसोसिएशन का कहना है कि सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे और अन्य लोगों के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करने और स्वतंत्र जांच की मांग की है, और इनसे जुड़े प्रश्न वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष विचाराधीन हैं। ऐसे में, हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण developments के तुरंत बाद और मामले के एक संवेदनशील चरण में आदित्य ठाकरे के निजी निवास पर CJP नेतृत्व की सार्वजनिक रूप से स्वीकार की गई मुलाकात neutrality, propriety, consistency और public perception को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

 

 खुद का MLA स्टेटस छिपाने और कथित झूठे शपथपत्र के सबूतों का हवाला देकर GZLA ने आदित्य ठाकरे की नीयत पर उठाए गंभीर सवाल; कहा—रिकॉर्ड से बेईमानी और दुर्भावना प्रथमदृष्टया स्पष्ट

पत्र में दिशा सालियन मामले में आदित्य ठाकरे द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल affidavit और उसकी सत्यता को चुनौती देने वाले लंबित आवेदन का विस्तार से उल्लेख किया गया है।  एसोसिएशन ने विशेष रूप से निम्न तीन मुद्दे उठाए हैं:

पहला—MLA होते हुए खुद को केवल “Businessman” बताया: पत्र के अनुसार, आदित्य ठाकरे ने sitting MLA होते हुए अपने affidavit में occupation “Businessman” बताया और अपने निर्वाचित MLA होने की स्थिति का उल्लेख नहीं किया। Applicant का आरोप है कि यह material fact जानबूझकर छिपाया गया, ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार MPs/MLAs से संबंधित आपराधिक मामलों में लागू expeditious/fast-track hearing procedure से बचा जा सके।

दूसरा—CBI की “clean chit” का कथित झूठा दावा: पत्र में कहा गया है कि आदित्य ठाकरे ने अपने affidavit में दावा किया कि CBI उन्हें दिशा सालियन मामले में clean chit दे चुकी है। इसके विपरीत, Applicant द्वारा भरोसा की गई CBI की लिखित clarification के अनुसार, एजेंसी ने दिशा सालियन मामले की जांच ही नहीं की और आदित्य ठाकरे अथवा किसी अन्य व्यक्ति को कोई clean chit नहीं दी।  

तीसरा—जिस मामले में आरोपी के रूप में नाम, उसी में intervention की कोशिश: GZLA ने इस बात पर भी गंभीर आपत्ति जताई है कि आदित्य ठाकरे ने उसी writ petition में हस्तक्षेप करने की कोशिश की जिसमें दिशा सालियन के पिता FIR दर्ज करने और जांच CBI को सौंपने की मांग कर रहे हैं और जिसमें उन्होंने आदित्य ठाकरे को आरोपी के रूप में नामित किया है। पत्र में Soumen Nandy v. State of West Bengal & Ors., 2023 SCC OnLine Cal 1191 सहित न्यायिक precedents का उल्लेख करते हुए Abhishek Banerjee से संबंधित proceedings में ₹50 लाख exemplary costs लगाए जाने का भी संदर्भ दिया गया है।

GZLA का कहना है कि MLA status का कथित concealment, CBI clean chit संबंधी कथित रूप से असत्य statement और आरोपी के रूप में नामित होने के बावजूद जांच की मांग वाली proceedings में intervention की कोशिश—इन तीनों परिस्थितियों को एक साथ देखने पर affidavit की bona fides, नीयत और सत्यता पर अत्यंत गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि न्यायिक कार्यवाही में जानबूझकर झूठा साक्ष्य देना अथवा false evidence fabricate करना IPC की Sections 191, 192 और 193 के अंतर्गत perjury/false evidence से संबंधित गंभीर अपराधों को आकर्षित कर सकता है। Section 193 के तहत judicial proceeding में जानबूझकर false evidence देने अथवा fabricate करने पर सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। न्यायालयों ने भी न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य, झूठे शपथपत्र और न्यायालय को गुमराह करने जैसे कृत्यों को अत्यंत गंभीर मानते हुए इन्हें न्याय-प्रशासन की बुनियाद पर प्रहार करने वाले गंभीर अपराधों (henius crime) के रूप में देखा है।

GZLA के अनुसार, इन्हीं परिस्थितियों के कारण CJP नेतृत्व से यह और भी गंभीर सवाल पूछा गया है कि जब आदित्य ठाकरे के न्यायालयीन आचरण और affidavit को लेकर लगाए गए गंभीर आरोप प्रथमदृष्टया उपलब्ध दस्तावेजी सामग्री से प्रमाणित हो चुके हैं और अब उन पर आगे की न्यायिक कार्रवाई से संबंधित proceedings लंबित हैं, तब ऐसे अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण समय में CJP के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा उनके निजी निवास पर जाकर मुलाकात करने का वास्तविक उद्देश्य आखिर क्या था?

GZLA ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा और न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन के मामलों में उनके संबंधित पारिवारिक सदस्यों से कथित रूप से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर अलग-अलग रुख अपनाने पर सौरव दास की चयनात्मक आलोचना (Selective Criticism) और स्पष्ट दोहरे मापदंडों (Apparent Double Standards) की भी कड़ी निंदा की।

GZLA के अनुसार, सौरव दास ने कथित रूप से अरविंद केजरीवाल के समर्थन में न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की इस आधार पर आलोचना की कि उन्होंने केजरीवाल से संबंधित CBI के एक मामले की सुनवाई की, जबकि उनके बच्चे कथित रूप से भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार/CBI के पैनल में सूचीबद्ध थे अथवा उससे पेशेवर रूप से जुड़े हुए थे। GZLA ने कहा कि हितों के संभावित टकराव (Conflict of Interest) अथवा पक्षपात की उचित आशंका (Reasonable Apprehension of Bias) पर आधारित आपत्ति सिद्धांततः वैध रूप से उठाई जा सकती है। हालांकि, न्यायमूर्ति शर्मा के मामले में जिस संबंध का आरोप लगाया गया, वह तुलनात्मक रूप से अप्रत्यक्ष था, क्योंकि वह स्वयं न्यायमूर्ति शर्मा की किसी प्रत्यक्ष व्यक्तिगत संलिप्तता के बजाय उनके बच्चों की स्वतंत्र पेशेवर गतिविधियों पर आधारित था।

इसके ठीक विपरीत, GZLA ने आरोप लगाया कि न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन से संबंधित स्थिति में पारिवारिक संबंध कहीं अधिक प्रत्यक्ष और गंभीर था। GZLA के अनुसार, न्यायमूर्ति नरीमन ने अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुमपारा, अधिवक्ता विजय कुर्ले, राशिद खान पठान और अधिवक्ता नीलेश ओझा से संबंधित कार्यवाहियों में भाग लिया, जिनमें उनके पिता, वरिष्ठ अधिवक्ता फली एस. नरीमन, को कथित रूप से आरोपी के रूप में नामित किया गया था अथवा वे उन कार्यवाहियों की विषय-वस्तु से सीधे जुड़े हुए थे। GZLA ने आगे कहा कि न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने In Re: Vijay Kurle में दिनांक 27.04.2020 के अपने आदेश में न्यायमूर्ति नरीमन की भागीदारी को यह तर्क देते हुए उचित ठहराने का प्रयास किया कि माता-पिता और उनकी वयस्क संतान अलग-अलग एवं स्वतंत्र पहचान रखते हैं।

GZLA के अनुसार, बाद वाला मामला कहीं अधिक प्रत्यक्ष पारिवारिक संबंध से जुड़ा होने के बावजूद, दास ने कथित रूप से न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन के संबंध में मौन बनाए रखा, जो बाद में भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार की विभिन्न कार्रवाइयों और नीतियों के प्रमुख आलोचकों में से एक रहे; जबकि दूसरी ओर, उन्होंने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के विरुद्ध उनके बच्चों के तुलनात्मक रूप से अप्रत्यक्ष पेशेवर संबंध के आधार पर अत्यंत कठोर रुख अपनाया।

GZLA के अनुसार, यह स्पष्ट विरोधाभास इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन बाद में भाजपा-नेतृत्व वाली सरकार की अनेक कार्रवाइयों और नीतियों के प्रमुख आलोचक रहे, जबकि न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल और अन्य AAP नेताओं के विरुद्ध महत्वपूर्ण न्यायिक आदेश पारित किए। अतः इन दोनों परिस्थितियों के प्रति सौरव दास के व्यवहार में दिखाई देने वाला यह स्पष्ट अंतर एक वैध और गंभीर प्रश्न खड़ा करता है कि क्या उनकी आलोचना वास्तव में न्यायिक औचित्य (Judicial Propriety) के किसी निष्पक्ष, तटस्थ और समान रूप से लागू होने वाले सिद्धांत पर आधारित थी, अथवा उस सिद्धांत का चयनात्मक रूप से उपयोग संबंधित न्यायाधीश की कथित राजनीतिक या वैचारिक स्थिति तथा संबंधित वादी/पक्षकार की पहचान के आधार पर किया गया।

GZLA ने कहा कि न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से संबंधित कथित रूप से छेड़छाड़ किए गए, परिवर्तित (Doctored) अथवा Manipulated वीडियो के प्रसार को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही के संदर्भ में यह मामला और भी गंभीर महत्व ग्रहण करता है, जिसमें कथित रूप से अरविंद केजरीवाल तथा अन्य AAP नेता/समर्थक शामिल हैं। जहां तक न्यायिक रिकॉर्ड में उक्त वीडियो की कथित जालसाजी, हेरफेर अथवा छेड़छाड़ से संबंधित आरोप या निष्कर्ष दर्ज हैं, GZLA ने सवाल उठाया कि न्यायमूर्ति शर्मा के विरुद्ध गंभीर आलोचना करने के बावजूद दास ने कथित रूप से इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की उसी प्रकार निंदा क्यों नहीं की। GZLA के अनुसार, ऐसा चयनात्मक मौन उनकी सार्वजनिक भूमिका की सद्भावना (Bona Fides), निरंतरता और निष्पक्षता पर और अधिक गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

GZLA ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा का दावा करने वाला कोई भी व्यक्ति उन न्यायाधीशों के लिए एक मापदंड नहीं अपना सकता जिन्हें वह राजनीतिक या वैचारिक रूप से अपने अनुकूल समझता है और उन न्यायाधीशों के लिए दूसरा मापदंड, जिनके न्यायिक निर्णय उसके समर्थित राजनीतिक नेताओं के प्रतिकूल हों। न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) और न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) चयनात्मक सिद्धांत नहीं हो सकते। यदि किसी न्यायाधीश की वयस्क संतान की स्वतंत्र पेशेवर गतिविधियों को उस न्यायाधीश के मामले में हितों के टकराव अथवा पक्षपात की आशंका उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त माना जाता है, तो वही कसौटी प्रत्येक न्यायाधीश पर समान रूप से लागू होनी चाहिए—चाहे उसकी राजनीतिक या वैचारिक छवि कुछ भी हो, उसके संबंध में सार्वजनिक धारणा कैसी भी हो, अथवा न्यायालय के समक्ष उपस्थित पक्षकारों की पहचान कुछ भी हो।

GZLA के अनुसार, सौरव दास की चयनात्मक आलोचना, तथ्यात्मक रूप से तुलनीय अथवा कथित रूप से कहीं अधिक गंभीर मामलों में उनका मौन, तथा गंभीर आपराधिक अवमानना के आरोपों का सामना कर रहे AAP से जुड़े व्यक्तियों की कथित रूप से निंदा न करना, एक वैध और गंभीर आशंका उत्पन्न करता है कि उनके हस्तक्षेप न्यायिक जवाबदेही के किसी सुसंगत, निष्पक्ष, न्यायसंगत एवं तटस्थ सिद्धांत पर आधारित न होकर राजनीतिक अथवा वैचारिक विचारों से प्रभावित हो सकते हैं।

अतः GZLA ने सौरव दास से इन स्पष्ट दोहरे मापदंडों का स्पष्टीकरण देने, अपनी राजनीतिक अथवा वैचारिक संबद्धता—यदि कोई हो—को स्पष्ट करने तथा न्यायपालिका के सदस्यों के विरुद्ध एसोसिएशन द्वारा वर्णित उनकी चयनात्मक आलोचना के पीछे की सद्भावना (Bona Fides) और निष्पक्षता को स्पष्ट करने की मांग की।

“बर्गर पर विजेता दहिया को हटाया, फिर अपने नेताओं के लिए दूसरा नियम क्यों?”

पत्र का सबसे तीखा हिस्सा CJP के पूर्व spokesperson विजेता दहिया से जुड़ा है।

GZLA के अनुसार, विरोध प्रदर्शन के दौरान एक burger outlet पर दिखाई देने वाला वीडियो सामने आने के बाद CJP ने विजेता दहिया को spokesperson के पद से हटा दिया था। एसोसिएशन ने सवाल किया कि यदि protest के दौरान अनुपस्थिति और burger outlet पर मौजूद होना पद से हटाने जितना गंभीर माना गया, तो CJP के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा ऐसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति के निजी निवास पर जाकर मुलाकात करने के लिए कहीं अधिक स्पष्ट और पारदर्शी जवाब क्यों नहीं होना चाहिए, जिसके विरुद्ध पत्र में वर्णित अत्यंत गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

GZLA ने खास तौर पर मुलाकात के समय पर आपत्ति जताई है। पत्र के अनुसार, बॉम्बे हाईकोर्ट में 3 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण developments हुए और मामला 24 अगस्त 2026 को दोपहर 3 बजे महत्वपूर्ण सुनवाई के लिए रखा गया। इसी intervening period में आदित्य ठाकरे के निवास पर हुई मुलाकात को एसोसिएशन ने neutrality, propriety और timing के लिहाज से गंभीर बताया है।

एसोसिएशन ने तीखे शब्दों में कहा:

“Equality, accountability and justice must begin within the movement itself.”

अर्थात, समानता, जवाबदेही और न्याय की शुरुआत स्वयं आंदोलन के भीतर से होनी चाहिए।

GZLA का कहना है कि विजेता दहिया के लिए एक नियम और CJP के वरिष्ठ नेतृत्व के लिए दूसरा, अधिक सुविधाजनक नियम नहीं हो सकता। यदि कोई आंदोलन सरकारों और संस्थाओं से accountability मांगता है, तो उसे अपने नेतृत्व पर भी वही standards लागू करने होंगे।

क्या ऐसी मुलाकात लंबित न्यायिक कार्यवाही पर प्रभाव डाल सकती है?

पत्र में एक और संवेदनशील पहलू उठाया गया है। GZLA के अनुसार मुलाकात का समय, स्वरूप और उसका सार्वजनिक प्रचार complainant, witnesses और आम जनता के मन में यह impression पैदा कर सकता है कि स्वयं को स्वतंत्र राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोग लंबित मामले में नामित व्यक्ति के प्रति proximity अथवा support प्रदर्शित कर रहे हैं।

एसोसिएशन ने हालांकि कानूनी परिणामों को conditional रूप में रखते हुए कहा कि यदि कोई conduct किसी complainant या witness को influence, intimidate, discourage या pressure करने, लंबित न्यायिक कार्यवाही को prejudice करने, निष्पक्ष जांच में हस्तक्षेप करने अथवा truth की discovery में बाधा डालने के उद्देश्य से किया गया हो, तो तथ्यों और intention के आधार पर criminal law तथा Contempt of Courts Act, 1971 के तहत गंभीर परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।

इसके समर्थन में पत्र ने Nilesh Navalakha & Ors. v. Union of India, 2021 SCC OnLine Bom 56; Bhupinder Singh Patel v. CBI, 2008 SCC OnLine Del 711; और Shyni Varghese v. State (Government of NCT of Delhi), 2008 SCC OnLine Del 204 का उल्लेख किया है।

GZLA ने सौरव दास और रत्ना सिंह से पूछे पांच सीधे सवाल

GenZ Lawyers Association ने अंततः CJP नेतृत्व से सार्वजनिक रूप से पांच मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है:

  1. आदित्य ठाकरे के साथ मुलाकात का वास्तविक उद्देश्य और पूरी परिस्थितियां क्या थीं?
  2. क्या बैठक में CJP अथवा उसके आंदोलन से संबंधित किसी राजनीतिक समर्थन, सहयोग, रणनीति, funding, understanding अथवा future coordination पर चर्चा हुई?
  3. यह मुलाकात आंदोलन की पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता की संविधान पर ली गई सार्वजनिक शपथ से किस प्रकार संगत है?
  4. क्या मुलाकात से पहले सौरव दास और रत्ना सिंह को सतीश सालियन द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों तथा बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित proceedings की जानकारी थी?
  5. क्या CJP अपने वरिष्ठ नेतृत्व पर भी वही accountability standards लागू करेगा जो विजेता दहिया को हटाते समय लागू किए गए थे?

“संविधान की शपथ केवल दूसरों से जवाबदेही मांगने के लिए नहीं”

पत्र के निष्कर्ष में GZLA ने सौरव दास और रत्ना सिंह से पूर्ण transparency, political neutrality और constitutional principles के अनुरूप consistency बनाए रखने को कहा है। साथ ही ऐसे किसी act या omission से बचने को कहा गया है जिससे political alignment, preferential treatment, selective accountability अथवा constitutional courts में लंबित मामलों में interference का impression पैदा हो।

एसोसिएशन ने कहा कि युवाओं और संविधान की आवाज बनने का दावा करने वाले किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं होगी कि वह दूसरों से कितनी जोर से accountability मांगता है, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि वह अपने नेताओं को उन्हीं standards of transparency, equality and accountability के अधीन रखने को तैयार है या नहीं

पत्र के अंतिम शब्दों में GZLA ने उम्मीद जताई है कि “good conscience, constitutional values and a commitment to truth and justice shall prevail” और CJP नेतृत्व उन गंभीर आशंकाओं को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा जो इन परिस्थितियों से उत्पन्न हुई हैं। पत्र पर GenZ Lawyers Association की ओर से Adv. Ayush Tiwari, Convenor का नाम दर्ज है।

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