जजों के खिलाफ न्यायपालिका पर गंभीर आरोपों में भी जेल नहीं, बल्कि चेतावनी या ₹1 जुर्माना ही  सजा — प्रशांत भूषण केस में सुप्रीम कोर्ट ने तय की कोर्ट अवमानना की संवैधानिक सीमा, जो देश की सभी अदालतों और जजों पर बाध्यकारी नियम है।  [  Prashant Bhushan (Contempt Matter), In re, , (2021) 1 SCC 745 ]

प्रशांत भूषण केस ने उस भूले हुए लेकिन बाध्यकारी कानून को पुनर्जीवित किया, जिसके अनुसार न्यायपालिका की आलोचना अथवा “scandalisation” से जुड़े अवमानना मामलों में सामान्य सजा जेल नहीं, बल्कि चेतावनी, फटकार या जुर्माना है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवमानना में कारावास केवल हिंसा, न्यायिक कार्यवाही में प्रत्यक्ष शारीरिक बाधा, या अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है। केवल “defiant stand” अपनाना या माफी देने से इंकार करना कारावास का वैध आधार नहीं हो सकता।

दुर्भाग्यपूर्ण रूप से अनेक न्यायाधीश और अधिवक्ता आज भी अवमानना में सजा संबंधी इस बाध्यकारी संवैधानिक न्यायशास्त्र से अनभिज्ञ हैं। प्रशांत भूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट अवमानना की संवैधानिक सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित की हैं, और यह कानून देश की सभी अदालतों तथा न्यायाधीशों पर अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी है।

लेखक —   एडवोकेट ईश्वरलाल अग्रवाल, प्रेसिडेंट, सुप्रीम कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन

Prashant Bhushan, In re का निर्णय केवल एक अवमानना मामले में Re.1/- का सांकेतिक जुर्माना लगाने तक सीमित नहीं था। इस निर्णय ने भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र के उस भूले हुए लेकिन बाध्यकारी सिद्धांत को पुनर्जीवित किया, जिसके अनुसार “scandalisation” अर्थात न्यायपालिका की आलोचना/आक्षेप वाले आपराधिक अवमानना मामलों में कारावास सामान्य नियम नहीं है। सामान्य और संवैधानिक रूप से स्वीकार्य दंड केवल चेतावनी, फटकार या जुर्माना है। कारावास केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों — जैसे शारीरिक हिंसा, न्यायिक कार्यवाही में प्रत्यक्ष बाधा, या न्यायालय की कार्यवाही को बलपूर्वक रोकने — में ही उचित माना गया है।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि आज भी अनेक न्यायाधीश और अधिवक्ता अवमानना में सजा संबंधी इस बाध्यकारी संवैधानिक न्यायशास्त्र से पूर्णतः परिचित नहीं हैं। परिणामस्वरूप, कई मामलों में कारावास की मांग, धमकी या सजा ऐसे दी जाती है मानो न्यायालय को असीमित दंडात्मक शक्ति प्राप्त हो, जबकि वास्तविक स्थिति इसके विपरीत है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने Bar Council of India v. High Court of Kerala में यह स्वीकार किया था कि अवमानना कानून से अधिक “misconstrued” और “misutilised” शायद ही कोई अन्य विधिक शाखा रही हो।

प्रशांत भूषण केस का वास्तविक महत्व

प्रशांत भूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं यह माना कि आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के थे, क्योंकि वे किसी एक न्यायाधीश के विरुद्ध नहीं बल्कि संपूर्ण न्यायपालिका और संस्था के विरुद्ध बताए गए थे।

फिर भी, इतनी गंभीर टिप्पणियों के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने कारावास नहीं दिया। केवल Re.1/- का सांकेतिक जुर्माना लगाया गया।

यह कोई दया या उदारता मात्र नहीं थी। यह बाध्यकारी संवैधानिक सिद्धांतों का पालन था।

भारतीय संविधान और अवमानना कानून का संतुलन

भारतीय अवमानना कानून दो महत्वपूर्ण संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करता है:

  1. न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखना;
  2. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना।

सुप्रीम कोर्ट ने अनेक बार कहा है कि अवमानना की शक्ति अत्यंत संयम, संवैधानिक अनुशासन और proportionality के साथ प्रयोग की जानी चाहिए।

इस सिद्धांत की संवैधानिक नींव Brahma Prakash Sharma v. State of Uttar Pradesh में रखी गई थी।

उस मामले में बार एसोसिएशन ने औपचारिक प्रस्ताव पारित कर न्यायिक अधिकारियों को incompetent, discourteous और confidence inspire न करने वाला बताया था। इसके बावजूद संविधान पीठ ने कहा कि यदि कोई अवमानना बनी भी, तो वह केवल “technical contempt” थी और किसी दंड की आवश्यकता नहीं थी। यहां तक कि निचली अदालत द्वारा लगाया गया जुर्माना भी रद्द कर दिया गया।

धारा 13 — अदालत की शक्ति पर संवैधानिक सीमा

बाद में संसद ने इन्हीं सिद्धांतों को Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 13 में शामिल कर दिया।

धारा 13 स्पष्ट कहती है:

“कोई भी न्यायालय तब तक सजा नहीं देगा जब तक वह संतुष्ट न हो जाए कि कथित अवमानना ने न्याय प्रशासन में substantial interference किया है या करने की प्रवृत्ति रखती है।”

यह शब्द “no court shall” अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह कोई सलाह नहीं बल्कि अनिवार्य संवैधानिक प्रतिबंध है। यदि substantial interference सिद्ध नहीं होती, तो अदालत के पास दंड देने की शक्ति ही नहीं बचती।

Murray & Co. — सजा पर सर्वोच्च बाध्यकारी निर्णय

Murray & Co. v. Ashok Kumar Newatia अवमानना में सजा संबंधी सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है।

इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल technical contempt पर्याप्त नहीं है। दंड तभी दिया जा सकता है जब न्याय प्रशासन में वास्तविक और substantial interference सिद्ध हो।

महत्वपूर्ण बात यह है कि Murray & Co. में भी सुप्रीम कोर्ट ने कारावास नहीं दिया। केवल सीमित जुर्माना लगाया गया।

यही सिद्धांत बाद में प्रशांत भूषण केस में पुनः लागू किया गया।

प्रशांत भूषण निर्णय ने क्या स्थापित किया?

Prashant Bhushan, In re में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा:

“While sentencing, we have to act with objectivity in relation to the person and the actual effect…”

अर्थात सजा तय करते समय अदालत को दो बातों पर ध्यान देना होगा:

  1. कथित अवमानना का वास्तविक प्रभाव क्या पड़ा;
  2. सजा proportional और objective है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि:

  • प्रशांत भूषण ने माफी नहीं मांगी;
  • अपने आरोपों पर कायम रहे;
  • मीडिया इंटरव्यू दिए;
  • पूरे संस्थान पर आरोप लगाए;
  • और अदालत के अनुसार उनका आचरण गंभीर था।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने केवल Re.1/- का जुर्माना लगाया और कारावास देने से इंकार कर दिया।

यही इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश है।

कारावास कब संभव है?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कारावास केवल अत्यंत असाधारण मामलों में ही उचित है, जैसे:

  • न्यायालय में शारीरिक हिंसा;
  • कार्यवाही में प्रत्यक्ष बाधा;
  • न्यायपालिका के विरुद्ध बलपूर्वक हमला;
  • या न्यायिक पद का असाधारण दुरुपयोग।

उदाहरणस्वरूप:

  • Leila David v. State of Maharashtra — न्यायाधीश पर चप्पल फेंकना;
  • In Re: C.S. Karnan — कार्यरत न्यायाधीश द्वारा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के विरुद्ध कथित वारंट जारी करना।

इन परिस्थितियों के अतिरिक्त सामान्य scandalisation मामलों में कारावास संवैधानिक रूप से अपवाद है, नियम नहीं।

अनुच्छेद 14 का सीधा प्रभाव

प्रशांत भूषण मामले का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रभाव अनुच्छेद 14 से जुड़ा है।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं उस मामले में, जिसे उसने “gravest” कहा, केवल Re.1/- का जुर्माना लगाया, तो अन्य comparatively less serious मामलों में कठोर सजा या कारावास देना अनुच्छेद 14 के तहत भेदभावपूर्ण और मनमाना माना जा सकता है।

कानून का सबसे बुनियादी सिद्धांत है:

समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए।

यदि पूरे संस्थान के विरुद्ध आरोपों वाले मामले में कारावास आवश्यक नहीं था, तो केवल किसी व्यक्तिगत न्यायाधीश के विरुद्ध आरोपों वाले मामलों में कठोर सजा देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन होगा।

न्यायिक गरिमा का अर्थ प्रतिशोध नहीं

Amicus Curiae v. Prashant Bhushan में सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“Magnanimity and restraint are also facets of the majesty of this Court.”

इसी प्रकार Rajesh Singh v. High Court of Madhya Pradesh में सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि न्यायालय सम्मान “power demonstration” द्वारा प्राप्त नहीं कर सकते।

न्यायपालिका की वास्तविक गरिमा उसकी संवैधानिक संयम, निष्पक्षता और सहिष्णुता में निहित है — न कि कठोर दंड में।

निष्कर्ष

Prashant Bhushan, In re ने भारतीय अवमानना कानून के उस बाध्यकारी संवैधानिक सिद्धांत को पुनर्जीवित किया कि:

  • scandalisation contempt में कारावास सामान्य नियम नहीं है;
  • चेतावनी, फटकार या जुर्माना ही सामान्य दंड है;
  • माफी न मांगना मात्र कारावास का आधार नहीं हो सकता;
  • defiant stand मात्र कठोर सजा का आधार नहीं हो सकता;
  • और न्यायपालिका की आलोचना मात्र से कारावास उचित नहीं हो जाता।

यह सिद्धांत केवल न्यायिक विवेक का प्रश्न नहीं बल्कि:

  • अनुच्छेद 14,
  • अनुच्छेद 19(1)(a),
  • अनुच्छेद 21,
  • Contempt of Courts Act की धारा 13,
  • तथा Brahma Prakash Sharma v. State of Uttar Pradesh से लेकर Murray & Co. v. Ashok Kumar Newatia और Prashant Bhushan, In re तक के बाध्यकारी न्यायिक निर्णयों से उत्पन्न होता है।

अतः भविष्य में यदि कोई न्यायालय इन बाध्यकारी संवैधानिक सीमाओं की अवहेलना करते हुए scandalisation मामलों में अनावश्यक कारावास देता है, तो वह केवल न्यायिक त्रुटि नहीं बल्कि संविधान, अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21, तथा Contempt of Courts Act की  धारा 13 की अवहेलना मानी जा सकती है।

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