“किसी एक के साथ अन्याय, पूरे न्याय तंत्र के लिए खतरा है” “Injustice anywhere is a threat to justice everywhere”
देशभर के बार संगठनों का यह अब साझा नारा बन चुका है, क्योंकि आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज द्वारा कथित रूप से जूनियर वकील को हिरासत और जेल भेजने की धमकी देने के बाद पूरे देश की कानूनी बिरादरी में भारी आक्रोश फैल गया है।
Junior Lawyers and Law Students Association of India ने राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश को विस्तृत शिकायत भेजकर संबंधित जज के खिलाफ:
- BNS के तहत आपराधिक कार्रवाई,
- Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कार्यवाही,
- न्यायिक कार्य वापस लेने,
- तथा संस्थागत कार्रवाई
की मांग की है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित जज ने सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी गाइडलाइंस के विपरीत आदेश पारित किया।
इस विवाद ने अब राष्ट्रीय स्तर का रूप ले लिया है। Indian Bar Association, Supreme Court Bar Association और Bar Council of India सहित कई प्रमुख बार संगठनों ने कथित घटना की निंदा की है तथा संबंधित जज के न्यायिक कार्य वापस लेने और ट्रांसफर की मांग की है।
इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन Adv. Nilesh Ojha ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“ऐसे मामले में संबंधित जज के खिलाफ अभियोजन (prosecution) से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है।”
उन्होंने कहा कि अधिवक्ता कोर्ट के अधिकारी (Officers of the Court) हैं और उन्हें वही सम्मान, गरिमा तथा संस्थागत व्यवहार मिलना चाहिए जिसकी अपेक्षा जज स्वयं वकीलों से करते हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संवैधानिक संस्थाओं ने उचित कार्रवाई नहीं की, तो देशभर के बार संगठन दिल्ली में विशाल राष्ट्रीय आंदोलन शुरू कर सकते हैं, जिसमें लाखों वकीलों के शामिल होने की संभावना है।
जूनियर वकील को जेल भेजने की धमकी के खिलाफ देशभर के बार संगठन एकजुट — “अब जजों की गुंडागर्दी नहीं चलेगी”, दिल्ली में लाखों वकीलों के प्रदर्शन की चेतावनी
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज पर देशभर में कानूनी बवाल!
देश की न्यायपालिका और बार के रिश्तों को लेकर एक अभूतपूर्व संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस टारलाडा राजशेखर राव पर एक जूनियर वकील को कोर्ट में कथित रूप से हिरासत और जेल भेजने की धमकी देने के आरोप के बाद पूरे देश की कानूनी बिरादरी में भारी आक्रोश फैल गया है।
अब यह मामला केवल एक कोर्टरूम घटना नहीं रह गया है, बल्कि “न्यायपालिका बनाम स्वतंत्र बार” की राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुका है।
देशभर के बार संगठन, जूनियर वकीलों के संगठन, लॉ स्टूडेंट्स एसोसिएशन, वरिष्ठ अधिवक्ता, और मानवाधिकार संगठन इस मुद्दे पर एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं।
राष्ट्रपति और CJI को भेजी गई बड़ी शिकायत
Junior Lawyers and Law Students Association of India ने राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक विस्तृत संवैधानिक शिकायत भेजी है, जिसमें आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस टारलाडा राजशेखर राव के खिलाफ:
- BNS के तहत आपराधिक कार्रवाई,
- Contempt of Courts Act, 1971 के तहत कार्यवाही,
- न्यायिक कार्य तत्काल वापस लेने,
- ट्रांसफर,
- तथा न्यायिक प्रशिक्षण अनिवार्य करने
की मांग की गई है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित जज ने एक जूनियर वकील को खुले कोर्ट में अपमानित किया, हिरासत और जेल भेजने की धमकी दी, तथा ऐसा आदेश पारित किया जो सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी गाइडलाइंस और संवैधानिक सीमाओं के प्रत्यक्ष विरुद्ध है।
याचिका में कहा गया है कि:
“यदि अदालतों में केवल बहस करने, कानूनी प्रतिवाद रखने या सुनवाई की मांग करने पर वकीलों को हिरासत की धमकी दी जाएगी, तो यह स्वतंत्र वकालत (fearless advocacy) और संवैधानिक न्याय प्रणाली दोनों के लिए गंभीर खतरा बन जाएगा।”
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित कार्रवाई न केवल कानून के शासन (Rule of Law) के खिलाफ है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित उन बाध्यकारी सिद्धांतों का भी उल्लंघन है जिनमें स्पष्ट कहा गया है कि Contempt powers का उपयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
याचिका में आगे Ravichandran Iyer v. Justice A.M. Bhattacharjee 1995 SCC का भी हवाला दिया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि:
“केवल एक जज का अनुचित व्यवहार भी पूरी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव डाल सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि न्यायिक पद की गरिमा के प्रतिकूल आचरण संविधान द्वारा निर्मित संपूर्ण न्यायिक ढाँचे को हिला सकता है। इसलिए बेंच से की गई असंयमित, अपमानजनक या धमकीपूर्ण टिप्पणियों को “छोटी या व्यक्तिगत घटना” मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
“वकील कोर्ट के अधिकारी हैं, गुलाम नहीं”
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स ने बार-बार स्पष्ट किया है कि:
“वकील कोर्ट के अधिकारी (Officers of the Court) हैं। उन्हें वही सम्मान, गरिमा और संवैधानिक व्यवहार मिलना चाहिए जिसकी अपेक्षा जज स्वयं वकीलों से करते हैं।”
यह सिद्धांत अनेक महत्वपूर्ण फैसलों में दोहराया गया है, जिनमें:
[R. Muthukrishnan v. High Court of Madras, (2019) 16 SCC 407; Latief Ahmad Rather v. Shafeeqa Bhat, 2022 SCC OnLine J&K 249; Ghanshyam Upadhyay v. State of Maharashtra, 2017 SCC OnLine Bom 9984; Jai Chaitanya Dasa, 2015 SCC OnLine Kar 549; Harish Chandra Mishra v. Hon’ble Mr. Justice S. Ali Ahmed, 1985 SCC OnLine Pat 213; Chetak Construction Ltd. v. Om Prakash, (1998) 4 SCC 577; Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh, 1949 SCC OnLine Lah 14 ]
जैसे मामले शामिल हैं।
याचिका में कहा गया है कि:
- यदि वकीलों को केवल बहस करने,
- सुनवाई मांगने,
- तीखी कानूनी दलील रखने,
- या न्यायिक आदेश का कानूनी विरोध करने
पर जेल भेजने या हिरासत की धमकी दी जाएगी, तो यह न्याय प्रशासन में सीधा हस्तक्षेप होगा।
शिकायत के अनुसार ऐसी प्रवृत्ति पूरी बार को भयभीत, दब्बू और “गुलाम मानसिकता” वाली बना देगी, जिससे स्वतंत्र वकालत (fearless advocacy) समाप्त हो जाएगी।
याचिका में विशेष रूप से Muhammad Shafi v. Choudhary Qadir Bakhsh का उल्लेख किया गया है, जिसमें हाईकोर्ट की फुल बेंच ने एक ऐसे जज को Contempt में दंडित किया था जिसने एक वकील का अपमान किया था। यह फैसला इस सिद्धांत को स्थापित करता है कि जज द्वारा वकीलों का अपमान स्वयं न्याय प्रशासन पर हमला माना जा सकता है।
इसी प्रकार H. Syama Sundara Rao v. Union of India H. Syama Sundara Rao v. Union of India, 2007 Cri. L. J. 2626, में यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि:
“यदि किसी वकील को उसके मुवक्किल की ओर से निर्भीकता से बहस करने, वैध बचाव उठाने या अपने पेशेवर कर्तव्य निभाने से रोकने के लिए धमकाया, डराया या दबाव डाला जाता है, तो यह स्वयं न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप है और Contempt of Court माना जाएगा।”
याचिका में कहा गया है कि:
“कोर्ट की गरिमा भय पैदा करके नहीं, बल्कि न्याय, संयम, शालीनता और बार के प्रति सम्मान से कायम रहती है।”
Court on Its Own Motion v. Jayant Kashmiri 2017 SCC में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्याय प्रशासन को इस आधार पर बाधित नहीं माना जा सकता कि कोई अधिवक्ता सद्भावना (good faith) में, निष्पक्ष और संयमित तरीके से न्यायालय के आदेशों या निर्णयों की आलोचना करता है। न्यायालय ने माना कि वकीलों को कानूनी व्यवस्था के भीतर रहकर न्यायिक आदेशों की उचित आलोचना करने की स्वतंत्रता प्राप्त है, और ऐसी आलोचना को Contempt powers के माध्यम से दबाया नहीं जा सकता।
“जज कानून से ऊपर नहीं”
शिकायत में कहा गया है कि भारत का संविधान और सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णय देश के प्रत्येक न्यायाधीश पर समान रूप से लागू होते हैं, और कोई भी न्यायिक पद कानून से ऊपर नहीं हो सकता। याचिका के अनुसार, यदि कोई जज जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी आदेशों और संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करता है, तो उसके विरुद्ध:
- Contempt of Courts Act, 1971 के तहत सिविल कंटेम्प्ट की कार्रवाई,
- तथा IPC/BNS की धाराओं 219 और 220 के तहत आपराधिक कार्रवाई
दोनों संभव हैं। शिकायत में कहा गया है कि ऐसे मामलों में छह माह तक की Contempt सजा तथा IPC/BNS के तहत सात वर्ष तक की सजा का भी प्रावधान मौजूद है।
शिकायत में कई ऐसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया है जिनमें स्वयं जजों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी। इनमें प्रमुख रूप से: M.P. Dwivedi AIR 1996 SC 2299, C.S. Karnan, In re, (2017) 7 SCC 1 , का उल्लेख किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि इन मामलों ने यह संवैधानिक सिद्धांत स्थापित किया कि:
“न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायिक निरंकुशता नहीं है, और यदि कोई जज संवैधानिक सीमाओं, बाध्यकारी न्यायिक दिशानिर्देशों या कानून का खुलेआम उल्लंघन करता है, तो वह भी न्यायिक और कानूनी उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं रह सकता।”
“असभ्य जज पूरी न्यायपालिका को बदनाम करता है” — सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
याचिका में R.K. Garg v. State of Himachal Pradesh और R. Muthukrishnan v. High Court of Madras जैसे महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में माना है कि एक असभ्य, क्रोधित और अपमानजनक व्यवहार करने वाला जज पूरी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाता है और ऐसी प्रवृत्ति का न्याय व्यवस्था में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट की उस प्रसिद्ध टिप्पणी का उल्लेख किया गया है जिसमें कहा गया था:
“एक असभ्य और क्रोधित जज न्याय व्यवस्था में बिगड़े हुए वाद्य यंत्र (ill-tuned instrument) जैसा होता है।”
शिकायत में कहा गया है कि:
- जज वकीलों का सार्वजनिक अपमान नहीं कर सकते,
- उन्हें धमका नहीं सकते,
- भय और आतंक का वातावरण नहीं बना सकते,
- और कोर्टरूम को दमन का मंच नहीं बना सकते।
याचिका में यह भी कहा गया है कि:
“न्यायपालिका का सम्मान डर, धमकी या Contempt powers के भय से नहीं बल्कि संयम, निष्पक्षता, शालीनता और संवैधानिक मर्यादा से कायम रहता है।”
इंडियन बार एसोसिएशन का बड़ा ऐलान
Indian Bar Association के चेयरमैन Adv. Nilesh Ojha ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“ऐसे मामले में जज के खिलाफ अभियोजन (prosecution) से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संवैधानिक संस्थाओं ने समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की, तो Indian Bar Association और देशभर के अन्य बार संगठन दिल्ली में लाखों वकीलों का विशाल आंदोलन खड़ा करेंगे।
सूत्रों के अनुसार:
- राष्ट्रीय हस्ताक्षर अभियान,
- बार एसोसिएशनों के प्रस्ताव,
- देशव्यापी विरोध प्रदर्शन,
- प्रेस कॉन्फ्रेंस,
- और व्यापक आंदोलन
की तैयारी शुरू हो चुकी है।
कानूनी हलकों में यह भी चर्चा है कि विभिन्न राज्यों के बार संगठन इस मुद्दे को “स्वतंत्र वकालत बचाओ आंदोलन” के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की रणनीति बना रहे हैं। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मानना है कि यदि इस प्रकार की घटनाओं पर कठोर संस्थागत कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में युवा वकीलों के बीच भय का वातावरण पैदा होगा, जो अंततः न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
SCBA और BCI भी मैदान में
मामला अब और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि Supreme Court Bar Association और Bar Council of India ने भी कथित घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए संबंधित जज के आचरण की निंदा की है तथा उनके न्यायिक कार्य तत्काल वापस लेने और ट्रांसफर की मांग की है।
कानूनी जगत में इसे बेहद असाधारण स्थिति माना जा रहा है, क्योंकि सामान्यतः सर्वोच्च बार संस्थाएँ किसी कार्यरत हाईकोर्ट जज के विरुद्ध इतनी कठोर सार्वजनिक मांग बहुत कम अवसरों पर करती हैं। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और बार नेताओं का मानना है कि यह मामला अब केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका और बार के संवैधानिक संबंधों से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बन चुका है।
वरिष्ठ वकीलों का कहना है:
“यदि जूनियर वकील कोर्ट में सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ जाएगी।”
कई अधिवक्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि युवा वकीलों के मन में यह भय बैठ गया कि तीखी बहस, कानूनी प्रतिवाद या न्यायिक आदेश पर असहमति जताने पर उन्हें हिरासत, अपमान या दमन का सामना करना पड़ सकता है, तो “fearless advocacy” की पूरी संवैधानिक अवधारणा समाप्त हो जाएगी।
बार संगठनों का कहना है कि:
- स्वतंत्र न्यायपालिका तभी संभव है जब बार भी स्वतंत्र और निर्भीक हो,
- डर और दमन के वातावरण में निष्पक्ष न्याय संभव नहीं,
- और अदालतों की गरिमा भय से नहीं बल्कि न्याय, संतुलन और शालीनता से कायम रहती है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का खुला उल्लंघन?
शिकायत में विशेष रूप से State of U.P. v. Association of Retired Supreme Court & High Court Judges का हवाला देते हुए कहा गया है कि संबंधित जज की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित बाध्यकारी संवैधानिक सीमाओं के प्रत्यक्ष उल्लंघन के समान है।
शिकायत के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट और कठोर शब्दों में कहा था कि:
- केवल तीखी दलील,
- विवादित या आक्रामक प्लीडिंग,
- जज को अप्रिय लगने वाली बहस,
- जोरदार कानूनी प्रतिवाद,
- या बार-बार सुनवाई की मांग
के आधार पर किसी वकील, पक्षकार या नागरिक को हिरासत में लेना कानूनन अस्वीकार्य है।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि Contempt of Courts Act की शक्तियाँ “असाधारण” प्रकृति की हैं और उनका उपयोग केवल अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। विशेष रूप से Section 14 के तहत किसी व्यक्ति को तत्काल हिरासत में लेने जैसी कठोर शक्ति का प्रयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जा सकता है जहाँ:
- कोर्ट के भीतर वास्तविक शारीरिक हिंसा हुई हो,
- न्यायिक कार्यवाही को बलपूर्वक रोका गया हो,
- जज या कोर्ट स्टाफ पर हमला हुआ हो,
- या न्याय प्रशासन पर प्रत्यक्ष और गंभीर शारीरिक हमला हुआ हो।
शिकायत में विशेष रूप से Leila David v. State of Maharashtra का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उस मामले में कोर्ट के भीतर जजों पर चप्पल फेंकी गई थी, और सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया था कि हिरासत और कठोर Contempt powers का उपयोग केवल ऐसे असाधारण और हिंसात्मक मामलों में ही किया जा सकता है — न कि केवल अप्रिय बहस या कानूनी असहमति के कारण।
याचिका में आगे कहा गया है:
“यदि केवल कोर्ट में की गई दलीलों, बहस या असहमति के कारण वकीलों को जेल भेजने या हिरासत में लेने की प्रवृत्ति शुरू हो गई, तो स्वतंत्र वकालत (fearless advocacy) समाप्त हो जाएगी और न्यायपालिका भय आधारित संस्था बन जाएगी।”
शिकायत के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की बाध्यकारी गाइडलाइंस के बावजूद यदि किसी जज द्वारा केवल कथित “अप्रिय बहस” के कारण हिरासत की धमकी दी जाती है, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा, और निष्पक्ष न्याय के अधिकार पर सीधा हमला भी है।
यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान घटना पहली बार नहीं है जब बेंच से वकीलों को धमकाने, अपमानित करने या भयभीत करने के आरोपों ने पूरे कानूनी जगत में गंभीर संस्थागत चिंता उत्पन्न की हो। इससे पूर्व भी एक व्यापक रूप से चर्चित विवाद में, स्वयं सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान अधिवक्ताओं के प्रति कथित धमकीपूर्ण और दबावपूर्ण व्यवहार को लेकर कई वकील संगठनों ने Justice Vikram Nath तथा Justice Sandeep Mehta के विरुद्ध अभियोजन की अनुमति तथा संस्थागत कार्रवाई की मांग की थी।
इन आरोपों में वरिष्ठ अधिवक्ता Raju Ramachandran सहित सोलह अधिवक्ताओं को कथित रूप से भयभीत और अपमानित किए जाने की बात कही गई थी, जिनमें पिछड़े वर्ग तथा अनुसूचित जाति समुदायों से आने वाली महिला अधिवक्ता भी शामिल थीं।
कानूनी हलकों में इस प्रकरण को इस बात के उदाहरण के रूप में देखा गया कि बार ने समय-समय पर न्यायिक पद की ऊँचाई या संवैधानिक स्थिति की परवाह किए बिना, उपलब्ध संवैधानिक और वैधानिक उपायों का उपयोग करते हुए ऐसे कथित आचरण के विरुद्ध आवाज उठाई है।
याचिका में कहा गया है कि वर्तमान शिकायत कोई व्यक्तिगत या अलग-थलग विवाद नहीं, बल्कि “fearless advocacy” अर्थात निर्भीक वकालत की संवैधानिक गारंटी की रक्षा करने, न्यायिक शक्तियों की बाध्यकारी सीमाओं को बनाए रखने, तथा यह सुनिश्चित करने के लिए बार द्वारा चलाया जा रहा एक सिद्धांत आधारित और सतत प्रयास है कि किसी भी अधिवक्ता को बेंच से धमकी, अपमान, भय या दबाव का सामना न करना पड़े।