नोटिस में आरोप— न्यायमूर्ति ए. पी. शाह ने आंदोलन को केवल शांतिपूर्ण बताकर तथा FIR को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत कर व्यापक रूप से रिपोर्ट एवं वीडियो में दर्ज हिंसा, पुलिस पर हमलों, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ तथा पुलिसकर्मियों के घायल होने की घटनाओं की अनदेखी की। GZLA ने बिना शर्त सार्वजनिक माफ़ी तथा सभी मीडिया संस्थानों के माध्यम से लिखित स्पष्टीकरण जारी करने की मांग की।
नई दिल्ली, 1 अगस्त: जेनज़ी लॉयर्स एसोसिएशन (GZLA) ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए. पी. शाह (सेवानिवृत्त) को एक कानूनी नोटिस जारी किया है। यह नोटिस 31 जुलाई 2026 को गोवा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन में दिए गए उनके भाषण के संबंध में जारी किया गया है, जिसे द इंडियन एक्सप्रेस ने 1 अगस्त 2026 को “All kinds of laws and tools being used to silence activists, dissenters”: Former Delhi High Court Chief Justice शीर्षक से प्रकाशित किया था।
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि न्यायमूर्ति शाह के भाषण में हालिया छात्र आंदोलन का एक चयनात्मक, अधूरा और भ्रामक चित्रण प्रस्तुत किया गया। एसोसिएशन का कहना है कि उन्होंने आंदोलन को पूरी तरह शांतिपूर्ण बताया, जबकि व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई एवं वीडियो में दर्ज हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़ तथा आंदोलन के दौरान लगभग 250 पुलिसकर्मियों के घायल होने जैसी महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख नहीं किया।
नोटिस के अनुसार, इस प्रकार की एकतरफा सार्वजनिक टिप्पणी न केवल हिंसा के पीड़ितों, विशेषकर घायल पुलिसकर्मियों के संवैधानिक अधिकारों की उपेक्षा करती है, बल्कि हिंसक घटनाओं में कथित रूप से शामिल व्यक्तियों के विरुद्ध पुलिस द्वारा की गई वैधानिक कार्रवाई को भी लोकतांत्रिक असहमति के दमन के रूप में प्रस्तुत करती है। एसोसिएशन का कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध संविधान द्वारा संरक्षित है, किंतु हिंसा, तोड़फोड़, पुलिसकर्मियों पर हमले और सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने वाले कृत्यों को किसी भी स्थिति में संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता और उनकी स्पष्ट एवं बिना शर्त निंदा की जानी चाहिए।
नोटिस में आगे कहा गया है कि यह संपूर्ण विवाद वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन (Sub Judice) है। ऐसी स्थिति में किसी पूर्व संवैधानिक न्यायाधीश द्वारा सार्वजनिक मंच से एक पक्षीय और अधूरी तथ्यात्मक कथा प्रस्तुत करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखता है। एसोसिएशन ने Nilesh Navalakha & Ors. v. Union of India, 2021 SCC OnLine Bom 56 तथा अन्य निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले पर इस प्रकार का चयनात्मक एवं भ्रामक सार्वजनिक भाषण न केवल न्याय के समुचित प्रशासन में हस्तक्षेप करता है, बल्कि प्रथमदृष्टया Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c) के अंतर्गत आपराधिक न्यायालय-अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में भी आता है, क्योंकि इसका स्वाभाविक प्रभाव लंबित न्यायिक कार्यवाही के संबंध में जनमत को प्रभावित करना तथा न्यायिक प्रक्रिया को पूर्वाग्रहग्रस्त करना है।
एसोसिएशन ने Shyni Varghese v. State (Govt. of NCT of Delhi), 2008 SCC OnLine Del 204 के निर्णय का भी उल्लेख किया है, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति प्रेस सम्मेलन या मीडिया के माध्यम से जानबूझकर गलत तथ्य प्रस्तुत करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर उसे अपराध को छिपाने अथवा अपराधियों को संरक्षण देने की साजिश का हिस्सा मानने का प्रथमदृष्टया आधार बन सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि षड्यंत्र सामान्यतः प्रत्यक्ष साक्ष्य से नहीं, बल्कि सिद्ध परिस्थितियों और आचरण से सिद्ध किया जाता है।
GZLA का कहना है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी सार्वजनिक जीवन में अत्यधिक संस्थागत विश्वसनीयता रखते हैं और इसलिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे लंबित न्यायिक मामलों पर टिप्पणी करते समय संवैधानिक निष्पक्षता, न्यायिक संयम तथा बौद्धिक ईमानदारी के सर्वोच्च मानकों का पालन करें।
नोटिस के माध्यम से एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति ए. पी. शाह से बिना शर्त सार्वजनिक माफ़ी मांगने तथा प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के माध्यम से एक लिखित स्पष्टीकरण जारी करने का आग्रह किया है। प्रस्तावित स्पष्टीकरण में यह स्वीकार करने की मांग की गई है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, आंदोलन के दौरान हुई हिंसा की स्पष्ट निंदा की जाए, घायल पुलिसकर्मियों सहित सभी पीड़ितों के अधिकारों को समान रूप से स्वीकार किया जाए तथा यह स्पष्ट किया जाए कि प्रदर्शनकारियों और पुलिस—दोनों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्णय केवल सक्षम न्यायालय ही साक्ष्यों के आधार पर करेगा।
एसोसिएशन ने कहा कि यह नोटिस न्यायपालिका में जनविश्वास बनाए रखने, न्याय के समुचित प्रशासन की रक्षा करने तथा सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों के संबंध में सार्वजनिक विमर्श में संवैधानिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जारी किया गया है।