किरण यादव बनाम महाराष्ट्र राज्य | क्रिमिनल रिट पिटीशन नं. 6159/2021 | आदेश दिनांक 22.04.2026
इस मामले को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी सहयोगी रॉबर्ट केनेडी जूनियर का भी समर्थन प्राप्त हुआ है, और उनके संगठन चिल्ड्रन्स हेल्थ डिफेंस, USA ने इस प्रकरण को विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया है!
उच्च न्यायालय के आदेश के पश्चात सभी प्रकरण अब ट्रायल कोर्ट में संचालित होंगे, तथा याचिकाकर्त्री श्रीमती Kiran Yadav द्वारा अपने एकमात्र कमाऊ 23 वर्षीय पुत्र की मृत्यु के कारण आरोपियों से ₹100 करोड़ की क्षतिपूर्ति की मांग, Section 357(3) CrPC के अंतर्गत ट्रायल कोर्ट द्वारा विचाराधीन होगी।
इसके अतिरिक्त, उन्हें Rachna Gangu v. Union of India प्रकरण में दिए गए निर्देशों के अनुसार केंद्र सरकार से “नो फॉल्ट मुआवजा (No Fault Compensation)” प्राप्त करने का भी अधिकार होगा।
वैक्सीन से हुई मौतें — अब होगा इंसाफ!
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में याचिकाकर्ता किरण यादव को इजाजत दी है कि वो बिल गेट्स, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, गूगल के सुंदर पिचाई, यूट्यूब, अदार पूनावाला, सीरम इंस्टीट्यूट और कई सरकारी अधिकारियों के खिलाफ मर्डर का मुकदमा दर्ज कराएं. खंडपीठ ने 22 अप्रैल 2026 को यह आदेश पारित किया.
क्या है पूरा मामला?
किरण यादव ने 25 अक्टूबर 2021 को परिवाद दाखिल किया था? उनका आरोप है कि कोविड वैक्सीन को जानबूझकर “पूरी तरह सुरक्षित” बताकर जनता को गुमराह किया गया, जबकि इसके मौत का कारण बनने वाले खतरनाक साइड इफेक्ट्स को जानबूझकर छुपाया गया. यूट्यूब ने षड्यंत्र में शामिल होकर वैक्सीन के घातक दुष्प्रभावों को दिखाने वाले वीडियो हटाए और एकतरफा झूठा प्रचार फैलाया? किरण यादव का कहना है — यह सामूहिक हत्या है.
IPC की इन धाराओं में दर्ज होगा केस
धारा 302 (हत्या), 409 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), 120-B (आपराधिक षड्यंत्र), 34 और 107 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा. आरोपियों में शामिल हैं — डॉ. वी.जी. सोमानी (DCGI), डॉ. रणदीप गुलेरिया (पूर्व निदेशक AIIMS), डॉ. गगनदीप कांग, डॉ. बलराम भार्गव और तत्कालीन महाराष्ट्र मुख्य सचिव संताराम कुंटे.
हाईकोर्ट ने विभिन्न अधिवक्ताओं को सुनने के पश्चात् तथा अवेकन इंडिया मूवमेंट की ओर से अधिवक्ता नीलेश ओझा द्वारा प्रस्तुत भौतिक साक्ष्यों पर विचार करते हुए, याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302, 409, 420, 120-B, 34 और 107 के अंतर्गत वैक्सीन निर्माताओं, कुछ सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थाओं, तकनीकी प्लेटफार्मों तथा वरिष्ठ सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों — जिनमें डॉ. वी.जी. सोमानी, डॉ. रणदीप गुलेरिया, डॉ. गगनदीप कांग और डॉ. बलराम भार्गव सहित अन्य शामिल हैं — के विरुद्ध परिवाद दर्ज करने की स्वतंत्रता प्रदान की है.
प्रस्तावित परिवाद के अंतर्गत यह आरोप है कि टीकाकरण को प्रभावी रूप से अनिवार्य बना दिया गया, और जनता को यह झूठा आश्वासन दिया गया कि वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है — जबकि जानबूझकर उन मृत्युकारक और अन्य खतरनाक दुष्प्रभावों को छुपाया गया जो वैक्सीन से जुड़े थे? यह भी आरोप है कि यूट्यूब ने अन्य अभियुक्तों के साथ षड्यंत्र करते हुए वैक्सीन के घातक और गंभीर दुष्प्रभावों को प्रकट करने वाले वीडियो व्यवस्थित रूप से हटा दिए, और जनता को भ्रमित करने तथा सामूहिक टीकाकरण के पक्ष में झूठा प्रचार फैलाने के उद्देश्य से एकपक्षीय आख्यान को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया?
सीरम इंस्टीट्यूट, अदार पूनावाला और साइरस पूनावाला के खिलाफ पहले से ही आपराधिक मामला दर्ज कराने का आदेश है? दरअसल, इन्होंने न्यायालय के समक्ष झूठा हलफनामा दाखिल कर न्यायालय के साथ ही धोखाधड़ी की और इस स्थापित तथ्य को सिरे से नकार दिया कि कोविशील्ड वैक्सीन को उसके मौत का कारण बनने वाले खतरनाक दुष्प्रभावों की वजह से 21 यूरोपीय देशों में पहले ही प्रतिबंधित किया जा चुका था? जब न्यायालय के समक्ष उनका यह झूठ पूरी तरह साबित हो गया, तब नागपुर की अदालत ने स्वयं परिवादी बनकर इनके विरुद्ध मामला दर्ज करने का आदेश दिया? यह अपने आप में एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक न्यायिक कदम था, जो दर्शाता है कि न्यायालय को भी इनकी करतूतों की गंभीरता का पूरा एहसास था? उस न्यायालय द्वारा अभिलिखित निष्कर्ष और आदेश आज तक अविचलित हैं?
वैक्सीन मैंडेट था गैरकानूनी — हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने माना
तत्कालीन सरकार ने लोकल ट्रेन, मॉल, दफ्तर और सार्वजनिक स्थानों में प्रवेश के लिए वैक्सीन अनिवार्य कर दी थी — जिससे गरीब और आम जनता को मजबूरन वैक्सीन लेनी पड़ी. बाद में जैकब पुलियल, फिरोज मिठीबोरवाला और योहान तेंगरा की PIL में इस हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने इन वैक्सीन मैंडेट्स को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित किया.
जस्टिस गडकरी का सवाल — अधिवक्ता ओझा का जवाब- कैसे खंडपीठ को किया कायल.
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गडकरी ने एक तीखा सवाल दागा — अगर वैक्सीन सच में मौत का कारण बन भी सकती है, तो मर्डर का मुकदमा कैसे चलेगा? खुद जजों ने भी वैक्सीन ली है, करोड़ों लोगों ने ली है और वे जिंदा हैं — तो सबूत क्या है और कानूनी प्रावधान क्या है?
अधिवक्ता नीलेश ओझा ने अदालत के सामने ठोस तथ्य और सुप्रीम कोर्ट के case laws रखे. उन्होंने बताया कि कई देशों ने कोविशील्ड वैक्सीन को उसके मौत का कारण बनने वाले दुष्प्रभावों की वजह से प्रतिबंधित किया है, और भारत सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट के सामने यह स्वीकार किया है कि वैक्सीन मौत का कारण बन सकती है? उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने रचना गंगू बनाम भारत संघ, 2026 INSC 218 में स्पष्ट रूप से कहा है कि वैक्सीन से हुई मौत के मामलों में हर नागरिक को कानूनी उपाय का अधिकार है — जिसमें मुआवज़ा मांगने का अधिकार भी शामिल है.
अधिवक्ता निलेश ओझा ने सबसे महत्त्वपूर्ण और झकझोर देने वाला तर्क रखते हुए कहा कि यदि आरोपितों को यह स्पष्ट जानकारी थी कि इस वैक्सीन से गंभीर दुष्प्रभाव, यहाँ तक कि मृत्यु का जोखिम भी हो सकता है, तो उनका पहला और अनिवार्य कर्तव्य था कि वे इसे तत्काल रोकते और जनता को पूरी सच्चाई बताते। लेकिन इसके विपरीत, उन्होंने इस संभावित खतरे को सुनियोजित तरीके से दबाया गया, वैक्सीन को “पूर्णतः सुरक्षित” बताकर आक्रामक प्रचार किया गया, और विभिन्न प्रतिबंधों, शर्तों तथा दबावपूर्ण उपायों के माध्यम से आम नागरिकों को इसे लगवाने के लिए बाध्य किया गया। — और यही तथ्य इस पूरे मामले को वैक्सीन मास मर्डर का मामला बनाता है.
ओझा के अनुसार, यह मात्र लापरवाही या चूक का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह “वैक्सीन के माध्यम से सामूहिक हत्याओं (mass murders through vaccines)” जैसा अत्यंत गंभीर, सुनियोजित और व्यापक अपराध बनता है—जिसमें सीधे-सीधे जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया है।
गवाह हैं विश्वस्तरीय विशेषज्ञ
परिवादी ने अपने साक्ष्य में विश्वप्रसिद्ध महामारी विशेषज्ञ डॉ. अमिताव बनर्जी, IIT प्रोफेसर भास्कर रमन, और शोधकर्ता अम्बर कोइरी, योहान तेंगरा तथा अन्य को गवाह के रूप में नामित किया है.
आंदोलन की असली ताकत: अधिवक्ता दीपाली ओझा ने दिया अंतरराष्ट्रीय स्वरूप
इस पूरे आंदोलन को गति देने, अधिवक्ता निलेश ओझा को इसमें जोड़ने और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अधिवक्ता दीपाली ओझा की रही है। उन्होंने एक साधारण कानूनी लड़ाई को वैश्विक स्तर पर उठाकर इसे जन-स्वास्थ्य और मानवाधिकार से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मुद्दे का रूप दिया।
अधिवक्ता दीपाली ओझा ने सबसे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वरिष्ठ अधिकारी डॉ. सौम्या स्वामीनाथन को कानूनी नोटिस जारी कर इस पूरे मामले में कथित वैक्सीन-फार्मा गठजोड़ और वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पर सीधा कानूनी प्रहार किया। यह कदम न केवल साहसिक था, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश दिया कि भारत से भी इस मुद्दे पर गंभीर कानूनी चुनौती उठ रही है।
उनकी इस पहल की पूरी दुनिया में सराहना हुई और उनका साक्षात्कार अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था Children’s Health Defense द्वारा प्रकाशित किया गया, जो Robert F. Kennedy Jr. से जुड़ी संस्था है। इस साक्षात्कार के माध्यम से उनके तर्क और कानूनी दृष्टिकोण वैश्विक मंच पर पहुंचे।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मिला व्यापक समर्थन
- यह आंदोलन — जो मानवता को गैरकानूनी वैक्सीन अनिवार्यताओं से बचाने, जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने, और सुनियोजित दुष्प्रचार एवं भ्रामक सूचना अभियानों का विरोध करने के लिए समर्पित है — देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, कार्यकर्ताओं और जन-प्रतिनिधियों का संयुक्त प्रयास रहा है, जिनमें शामिल हैं:
डॉ. टेस लॉरी (Dr. Tess Lawrie) (जर्मनी/वैश्विक स्वास्थ्य अधिवक्ता), डॉ. पियरे कोरी (Dr. Pierre Kory) (अमेरिका), डॉ. पीटर मैककलो (Dr. Peter McCullough) (अमेरिका), एलन मस्क (Elon Musk) (विश्व के सबसे धनी व्यक्ति), असीम मल्होत्रा (Aseem Malhotra) (यूके; सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार पहलों से जुड़े), डॉ. संजीव राय (Dr. Sanjeev Rai) (AIIMS), डॉ. अमिताव बनर्जी (Dr. Amitav Banerjee), प्रो. भास्कर रमण (Prof Bhaskar Raman), डॉ. अरविंद कुशवाहा (Dr. Arvind Kushwaha) (AIIMS), डॉ. अभय छेड़ा (Dr. Abhay Chheda), डॉ. वीना राघवा (Dr. Veena Raghava), डॉ. गायत्री पंडितराव (Dr. Gayatri Panditrao), बाबा रामदेव (Baba Ramdev), डॉ. बिस्वरूप रॉय चौधरी (Dr. Biswaroop Roy Chowdhury), डॉ. देवेंद्र बलहारा (Dr. Devendra Balhara), श्री प्रकाश पोहरे (Shri Prakash Pohare) (दैनिक देशोन्नति और राष्ट्रप्रकाश के मालिक एवं प्रधान संपादक), आशुतोष पाठक (Ashutosh Pathak) (Q Vive के मालिक एवं प्रधान संपादक), मदन दुबे (Madan Dubey) (राजीव दीक्षित फाउंडेशन), वीरेंद्र सिंह (Virendra Singh), निशा कोइरी (Nisha Koiri), अवेकन इंडिया मूवमेंट (Awaken India Movement), डॉ. माया वालेचा (Dr. Maya Walecha), अधिवक्ता साहिल गोयल (Adv. Sahil Goel), डॉ. मनीष आचार्य (Dr. Manish Acharya), HIIMS (HIIMS), रॉबर्ट सिबिस (Robert Cibis) (ओवल मीडिया, जर्मनी), तथा विवियन (Vivian) (जर्मनी)।
इनके साथ-साथ अनेक राष्ट्रवादी, मानवतावादी और जनस्वास्थ्य से जुड़े लोगों ने इस आंदोलन को मजबूती प्रदान की।
कानूनी मोर्चे पर मजबूत टीम: वरिष्ठ अधिवक्ताओं का योगदान
इस आंदोलन की कानूनी लड़ाई भी उतनी ही सशक्त रही है। इसमें देश के कई प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ताओं और विधि विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिनमें प्रमुख हैं:
- Prashant Bhushan (सीनियर एडवोकेट)
- Colin Gonsalves (सीनियर एडवोकेट)
इनके अलावा Indian Bar Association से जुड़े कई अधिवक्ताओं ने इस कानूनी संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई, जिनमें शामिल हैं:
अधिवक्ता ईश्वरलाल अग्रवाल , अधिवक्ता ओंकार काकड़े , अधिवक्ता विजय कुरले , अधिवक्ता तनवीर निजाम , अधिवक्ता पार्थो सरकार, अधिवक्ता अभिषेक मिश्रा , अधिवक्ता प्रतीक सरकार , अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय , अधिवक्ता विवेक रामटेके , अधिवक्ता विकास पवारश्री राशिद खान, श्री मुरसलीन शेख, श्री आयुष तिवारी , अधिवक्ता देवकृष्ण भामरी, शिवम गुप्ता, अनुश्का सोनावणे, निक्की पॉकर, दीपिका जायसवाल, पूनम राजभर, प्रतीक जैन, मंगेश डोंगरे, राजेश ओझा, गोपाल करहले, प्रवीण चावरे, प्रवीण चावरे, अधिवक्ता स्नेहल सुर्वे, अधिवक्ता सिद्धी धामणस्कर, अधिवक्ता शिवम मेहरा, अधिवक्ता पूजा शाह, अधिवक्ता चैतन्य रावते, श्री. परमभीत सिंग.
निष्कर्ष: एक व्यक्ति नहीं, एक वैश्विक कानूनी आंदोलन
यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक व्यापक, संगठित और बहुस्तरीय कानूनी संघर्ष है, जिसमें देश-विदेश के विशेषज्ञ, अधिवक्ता और जनहित कार्यकर्ता जुड़े हुए हैं।
यह लड़ाई अब केवल अदालतों तक सीमित नहीं रही—यह एक वैश्विक विमर्श बन चुकी है, जहाँ कानून, जनस्वास्थ्य और मौलिक अधिकारों के प्रश्न एक साथ उठ रहे हैं।