सुप्रीम कोर्ट के  कोलेजियम के अधिकार असीमित नहीं! संविधान पीठ के फैसलों ने खींची सख्त सीमा

कोलेजियम  केवल उन्हीं उम्मीदवारों को जज बनाना होगा जो संविधान पीठ द्वारा तय कड़े मानकों पर खरे उतरते हों—और जो नहीं उतरते, उन्हें निलंबित या पद से हटाकर बाहर करना होगा।

 राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी, यदि किसी जज की नियुक्ति गलत पाई जाती है, तो कोई भी नागरिक उसे रिट क्षेत्राधिकार में चुनौती दे सकता है, और ऐसी नियुक्ति निरस्त की जा सकती है। [[ S.P. Gupta v. Union of India, AIR 1982 SC 149; Kumar Padma Prasad v. Union of India, (1992) 2 SCC 428].

गलत नियुक्ति? सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया राष्ट्रपति का वारंट!- Kumar Padma Prasad केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा—अगर उम्मीदवार योग्य नहीं है, तो उसकी नियुक्ति टिक नहीं सकती। कोर्ट ने सीधे राष्ट्रपति द्वारा जारी नियुक्ति वारंट को ही रद्द कर दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि न्यायिक पद केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि योग्यता और संवैधानिक मानकों का विषय है। 

S.P. Gupta v. Union of India, AIR 1982 SC 149 केस में तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश को पक्षकार (party respondent) के रूप में शामिल किया गया तथा संविधान पीठ द्वारा उनसे उत्तर हलफनामा (reply affidavit) दाखिल करने के लिए कहा गया। प्रस्तुत हलफनामा न्यायिक परीक्षण और आलोचना के अधीन रहा, और यह टिप्पणी की गई कि मुख्य न्यायाधीश को अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होना चाहिए था, जैसा कि Union of India v. Sankalchand Himatlal Sheth, (1977) 4 SCC 193 में किया गया था, जहाँ तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश विधिवत् अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित हुए थे।

इसी पृष्ठभूमि में, इंडियन बार एसोसिएशन ने CJI और कोलेजियम को एक “Binding Precedent-Based Checklist” सौंपी है, जो सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के बाध्यकारी फैसलों पर आधारित है। इस चेकलिस्ट में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि कौन व्यक्ति जज बनने के योग्य है और कौन बिल्कुल अयोग्य है, ताकि चयन प्रक्रिया कानूनसम्मत और पारदर्शी बने।

संविधान का अनुच्छेद 141 भी यही स्पष्ट करता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पूरे देश पर बाध्यकारी हैं, और उनके विपरीत लिया गया कोई भी निर्णय अवैध माना जाएगा। इसलिए, जजों की नियुक्ति किसी भी प्रकार से मनमानी या बंद कमरे का फैसला नहीं हो सकती।

 साथ ही, संविधान पीठ के उक्त बाध्यकारी निर्देशों के अनुरूप यह प्रस्तावित किया गया है कि इस चेकलिस्ट के अनुपालन में लिए गए सभी निर्णयों को लिखित रूप में दर्ज किया जाए और उसे सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए, ताकि पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता की निगरानी सुनिश्चित हो सके।

 अंततः, स्पष्ट संदेश यही है—जजों की नियुक्ति अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संविधान, कानून और जनता के प्रति जवाबदेही का गंभीर विषय है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने K. S. Puttaswamy v. Union of India, (2017) 10 SCC 1; Asha Ranjan & Ors. v. State of Bihar & Ors., (2017) 4 SCC 397; तथा Sovaran Singh Prajapati v. State of U.P., 2025 SCC OnLine SC 351 में यह प्रतिपादित किया है कि प्रत्येक व्यक्ति को ICCPR के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है, जो न्यायालयों के समक्ष समानता तथा किसी भी वाद के निर्धारण में एक काबिल, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधीश द्वारा निष्पक्ष एवं सार्वजनिक सुनवाई का अधिकार सुनिश्चित करता है। यही सिद्धांत विधि के शासन (Rule of Law) की आधारशिला है।

यह निरंतर स्थापित किया गया है कि न्यायाधीश का पद मात्र अधिकार का पद नहीं, बल्कि एक संवैधानिक न्यास (constitutional trust) है, जिसके लिए निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, स्वतंत्रता, दक्षता तथा विधि के शासन के प्रति प्रतिबद्धता के सर्वोच्च मानकों की अपेक्षा की जाती है। इन गुणों से कोई भी विचलन न्यायपालिका में जनविश्वास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।

Supreme Court of India v. Subhash Chandra Agarwal, (2020) 5 SCC 481; S.P. Gupta v. Union of India, AIR 1982 SC 149; Shrirang Yadavrao Waghmare v. State of Maharashtra, (2019) 9 SCC 144; C. Ravichandran Iyer v. Justice A.M. Bhattacharjee, (1995) 5 SCC 457; तथा R.K. Garg v. State of Himachal Pradesh, (1981) 3 SCC 166 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीश के अपरिहार्य (non-negotiable) गुण निर्धारित किए हैं—स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, शालीनता (propriety), समानता, दक्षता एवं परिश्रम—और यह भी स्पष्ट किया है कि किसी एक न्यायाधीश का अनुचित या असभ्य आचरण भी संपूर्ण न्यायपालिका की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।

संविधान पीठ ने एक आवश्यक मूल्यांकन मानदंड (checklist) भी निर्धारित किया है, जिसमें निर्दोष चरित्र, निष्कलंक आचरण, विश्वसनीय व्यवहार, विधिक दक्षता, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, गंभीर दोषों का अभाव, खुले मन से विचार करने की क्षमता, संस्थागत उत्तरदायित्व, तीक्ष्ण बुद्धि तथा मानवीय संवेदनशीलता जैसे तत्व सम्मिलित हैं।

अतः यह स्पष्ट है कि न्यायिक पद केवल पात्रता का विषय नहीं, बल्कि उच्चतम नैतिकता, बौद्धिक क्षमता और संवैधानिक प्रतिबद्धता की मांग करता है; अन्यथा न्याय व्यवस्था की नींव ही कमजोर हो जाती है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों से यह भी स्पष्ट रूप से स्थापित है कि जो व्यक्ति इन आवश्यक गुणों से वंचित है, वह न्यायिक पद पर नियुक्त होने या बने रहने के योग्य नहीं है। न्यायिक दृष्टांतों के अनुसार निम्नलिखित परिस्थितियाँ किसी न्यायाधीश के अयोग्य होने के गंभीर आधार मानी गई हैं:

जो न्यायाधीश रूखा, अहंकारी या अशिष्ट हो, अथवा जो पक्षकारों और अधिवक्ताओं का अपमान, धमकी या उत्पीड़न करता हो, वह न्यायिक शिष्टाचार के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

जो न्यायाधीश अन्यायपूर्ण ढंग से कार्य करता हो, अपने अधिकारों का दुरुपयोग करता हो, या बाहरी प्रभावों से प्रभावित होकर निर्णय लेता हो, वह निष्पक्ष न्याय के मूल सिद्धांतों को नष्ट करता है।

जो न्यायाधीश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त हो, या कार्यवाही में हेरफेर करता हो, जैसे किसी पक्ष को लाभ पहुँचाने हेतु अनुचित स्थगन (adjournment) देना, अथवा जहाँ तत्काल हस्तक्षेप आवश्यक हो वहाँ अन्याय को न रोकना, वह अपने कर्तव्य का घोर उल्लंघन करता है। इसी प्रकार, जो न्यायाधीश स्वयं को कानून से ऊपर मानता है और असीमित विवेकाधिकार का प्रयोग करता है, वह संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता है।

विधिक समझ और बौद्धिक क्षमता का अभाव, तर्कों पर विचार न करना, प्रस्तुत दलीलों को अभिलेख में दर्ज न करना, अथवा बाध्यकारी दृष्टांतों की अवहेलना करना—ये सभी गंभीर त्रुटियाँ हैं, जो मनमाने और विधि-विरुद्ध निर्णयों को जन्म देती हैं।

किसी भी प्रकार का पक्षपात, भेदभाव या असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और न्यायपालिका में जनविश्वास को नष्ट करता है।

अतः यह निर्विवाद रूप से स्थापित है कि जो व्यक्ति इन गंभीर कमियों—चाहे वह आचरण, क्षमता, सत्यनिष्ठा, स्वतंत्रता या निष्पक्षता से संबंधित हों—से ग्रस्त है, वह न केवल न्यायिक पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य है, बल्कि उस पद पर बने रहने के लिए भी अयोग्य है, क्योंकि ऐसी स्थिति न्याय व्यवस्था की मूल आधारशिला को कमजोर करती है।

अंततः यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि कोलेजियम किसी अयोग्य या अनुपयुक्त व्यक्ति को सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अनुशंसित करता है, तो ऐसा निर्णय बाध्यकारी संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध होने के कारण शून्य (void) एवं विधि द्वारा दूषित (vitiated) होगा। ऐसी स्थिति में कोई भी नागरिक संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर ऐसी अनुशंसा या नियुक्ति को चुनौती दे सकता है।

कॉलेजियम के निर्णय भी असीमित नहीं, बल्कि संवैधानिक मानकों और न्यायिक दिशा-निर्देशों के अधीन हैं—और उनके उल्लंघन पर न्यायिक हस्तक्षेप पूरी तरह संभव है।

  Kumar Padma Prasad v. Union of India (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद हस्तक्षेप करते हुए— कॉलेजियम की सिफारिश खारिज की यहां तक कि राष्ट्रपति का नियुक्ति आदेश भी रद्द कर दिया क्यों? क्योंकि उम्मीदवार कानूनी योग्यता पूरी नहीं करता था! अब जजों की नियुक्ति सिर्फ बंद कमरों का फैसला नहीं— जनता भी निगरानी करेगी और जरूरत पड़ी तो सीधा कोर्ट में चुनौती देगी

  अब अपेक्षा है कि न्यायपालिका में “योग्यता, ईमानदारी और संवैधानिक निष्ठा” ही नियुक्ति का एकमात्र आधार होगा, यह चेकलिस्ट सुनिश्चित करेगी कि किसी भी प्रकार की अक्षमता, अनुचित आचरण, अहंकार या संस्थागत मर्यादा के विपरीत प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों का चयन प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जाए, और केवल वही व्यक्ति न्यायिक पद पर नियुक्त हों जो उच्चतम नैतिक, संवैधानिक एवं विधिक मानकों पर पूर्णतः खरे उतरते हों। यह चेकलिस्ट एक सशक्त संस्थागत सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करेगी।   अब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, पी. डी. दिनाकरण, सी. एस. कर्णन, दीपक गुप्ता, रोहिंगटन नरीमन   जैसे अयोग्य, अनुचित व्यवहार करने वाले, अत्यधिक गुस्सैल, अहंकारी या अकुशल (incompetent) न्यायिक आचरण वाले व्यक्तियों की नियुक्ति पर प्रभावी रोक लगेगी, और अब न्यायपालिका में केवल योग्य, संतुलित तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध व्यक्तियों का ही चयन संभव होगा।

परिणामस्वरूप, आम जनता को अब उन परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा जहाँ उन्हें न्याय प्राप्त करने के बजाय ऐसे आचरण से जूझना पड़ता था जो न्यायिक गरिमा, निष्पक्षता और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हो। अब न्यायालयों में प्रक्रिया अधिक सम्मानजनक, संतुलित और न्यायसंगत होगी, जिससे नागरिकों का विश्वास और भी सुदृढ़ होगा।

यह व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि न्यायालयों का वातावरण अधिक सम्मानजनक, संतुलित और न्यायसंगत हो, जहाँ प्रत्येक पक्ष को समान अवसर मिले, और सुनवाई निष्पक्ष तथा गरिमापूर्ण तरीके से हो। साथ ही, न्यायाधीशों के आचरण में संयम, विनम्रता और पेशेवर दक्षता का उच्च स्तर स्थापित होगा, जिससे न केवल न्याय की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास भी और अधिक मजबूत होगा।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के विभिन्न बाध्यकारी निर्णयों के आधार पर यह स्पष्ट है कि कॉलेजियम को अब इस चेकलिस्ट के अनुसार ही अपनी संपूर्ण चयन प्रक्रिया संचालित करनी होगी, और प्रत्येक निर्णय—चयन हो या अस्वीकृति—उक्त निर्धारित संवैधानिक मानकों एवं मापदंडों के अनुरूप ही लेना अनिवार्य होगा।

⚖️ अब कॉलेजियम को मानने होंगे निर्धारित संवैधानिक मानदंड

सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों के आलोक में कॉलेजियम के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी संपूर्ण चयन प्रक्रिया उक्त चेकलिस्ट के अनुरूप ही संचालित करे। यद्यपि अब तक इन मानकों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया, किन्तु अब प्रत्येक निर्णय—चयन हो या अस्वीकृति—पूर्वनिर्धारित संवैधानिक मानकों, न्यायिक सिद्धांतों और वस्तुनिष्ठ मापदंडों के आधार पर ही लिया जाना होगा। अन्यथा, ऐसी किसी भी प्रक्रिया को संविधान पीठ के आदेशों की अवमानना (disobedience of binding precedents) के रूप में देखा जाएगा, जिसके गंभीर विधिक परिणाम हो सकते हैं।

🔥 मनमानी और अपारदर्शिता पर लगेगा अंकुश

इस चेकलिस्ट के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में व्याप्त मनमानी, पक्षपात और अपारदर्शिता पर निर्णायक अंकुश लगेगा। अब किसी भी अयोग्य, भ्रष्ट, अहंकारी या अनुचित आचरण वाले व्यक्ति के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने की संभावना समाप्त होगी। केवल वही उम्मीदवार चयनित किए जाएँगे जो निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, संवैधानिक प्रतिबद्धता और उच्च विधिक दक्षता जैसे कठोर एवं अनिवार्य मानकों पर पूर्णतः खरे उतरते हों।

यह स्पष्ट अपेक्षा की जा रही है कि अब वे गंभीर संस्थागत त्रुटियाँ दोहराई नहीं जाएंगी, जिनके चलते अतीत में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा, न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरण, न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन, न्यायमूर्ति रोहिंगटन नरीमन, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता सहित अन्य विवादास्पद और अनुपयुक्त नियुक्तियों पर सवाल उठे थे—और जिनका खामियाजा वादकारों और वकीलों को उत्पीड़न, पूर्वाग्रह और न्याय से वंचित होने के रूप में भुगतना पड़ा।

⚖️ अब चेकलिस्ट करेगी छंटनी — शुरुआत में ही बाहर होंगे अयोग्य लोग
इस नई “Binding Precedent-Based Checklist” के सख्त और निष्ठापूर्वक क्रियान्वयन से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि—
👉 जिन व्यक्तियों में अपेक्षित न्यायिक स्वभाव (judicial temperament) नहीं है,
👉 जिनका आचरण न्यायिक पद की गरिमा के खिलाफ है,
👉 या जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के अनिवार्य मानकों पर खरे नहीं उतरते—

उन्हें चयन प्रक्रिया की पहली ही सीढ़ी पर बाहर कर दिया जाएगा

🚨 अब सिर्फ योग्य और ईमानदार ही बनेंगे जज– स्पष्ट संकेत है— अब उच्च न्यायपालिका में केवल उन्हीं लोगों को मौका मिलेगा जो प्रमाणित रूप से सक्षम, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध,  और उच्च न्यायिक पद के लिए आवश्यक संतुलन, संयम और सदाचार रखते हों।

  अब न्यायपालिका में नियुक्ति कोई “बंद कमरे का फैसला” नहीं—
बल्कि कठोर मानकों, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर होगी।

 🧾 5 महीने का व्यापक शोध — कई संगठनों की ऐतिहासिक साझेदारी

इस विस्तृत और संरचित चेकलिस्ट को तैयार करने के लिए Indian Bar Association, Rashtriya Sanvidhan Raksha Samiti, Indian Lawyers & Human Rights Activists Association, Junior Lawyers & Law Students Association, तथा Supreme Court एवं High Court Litigants Association की संयुक्त टीम ने लगभग पाँच महीनों तक गहन अध्ययन, शोध, केस-लॉ विश्लेषण और संवैधानिक परीक्षण किया।

इस पूरी पहल का नेतृत्व IBA के चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा द्वारा किया गया, जिन्होंने विभिन्न संविधान पीठ के निर्णयों, न्यायिक सिद्धांतों और व्यावहारिक अनुभवों को समेकित कर एक सुसंगत, लागू करने योग्य और वस्तुनिष्ठ ढांचा (objective framework) तैयार कराया।

इस पहल के केंद्र में यह मूल सिद्धांत रखा गया है कि एक सक्षम, निष्पक्ष, ईमानदार और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध न्यायाधीश प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक संवैधानिक अधिकार है। लंबे समय से कॉलेजियम प्रणाली की अपारदर्शिता, मनमानी और गैर-लिखित मानदंडों को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहे हैं। NJAC के माध्यम से सुधार का प्रयास अवश्य हुआ, किन्तु उसके निरस्त होने के बाद भी मूल समस्या—यानी अयोग्य या अनुपयुक्त नियुक्तियों से उत्पन्न न्यायिक अन्याय—पर ठोस और संरचनात्मक समाधान सामने नहीं आ पाया।

यह चेकलिस्ट उसी शून्य (gap) को भरने का एक ठोस प्रयास है, जो अब तक केवल सैद्धांतिक रूप से मौजूद संवैधानिक मानकों को व्यावहारिक, मापनीय और लागू करने योग्य मानदंडों में परिवर्तित करती है।

⚖️ नियुक्ति प्रक्रिया में आएगी पूर्ण पारदर्शिता

IBA द्वारा प्रस्तुत इस फ्रेमवर्क में स्पष्ट रूप से यह मांग की गई है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को अब पूरी तरह पारदर्शी, रिकॉर्ड-आधारित और जवाबदेह बनाया जाए। इसके लिए निम्नलिखित ठोस उपाय सुझाए गए हैं:

  • प्रत्येक उम्मीदवार के चयन या अस्वीकृति के स्पष्ट, तर्कसंगत और रिकॉर्डेड कारण हों, जिन्हें उचित सीमा तक सार्वजनिक किया जाए;
    • कॉलेजियम की पूरी प्रक्रिया को लिखित, संरचित और मानकीकृत नियमों (codified norms) में परिवर्तित किया जाए, ताकि मनमानी या व्यक्तिपरक निर्णय की गुंजाइश समाप्त हो;
    • हर चयन के बाद यह दर्शाना अनिवार्य किया जाए कि संबंधित उम्मीदवार ने चेकलिस्ट में निर्धारित सभी संवैधानिक, नैतिक और विधिक मानकों को किस प्रकार पूरा किया;

इन उपायों से न केवल निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट होगी, बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि प्रत्येक नियुक्ति तथ्यों, योग्यता और वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित हो, न कि किसी प्रकार के प्रभाव या गोपनीय विचार-विमर्श पर।

 📢 जनता को मिलेगा जानने का अधिकार

IBA ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक केवल न्याय के उपभोक्ता (recipient) नहीं हैं, बल्कि वे संविधान के वास्तविक हितधारक (stakeholders) हैं। इसलिए उन्हें यह जानने का पूरा अधिकार है कि—

➡️ न्यायाधीश किन मानकों, मापदंडों और प्रक्रियाओं के आधार पर चुने जा रहे हैं;
➡️ क्या संविधान पीठ द्वारा निर्धारित सिद्धांतों, न्यायिक दिशा-निर्देशों और पारदर्शिता के मानकों का वास्तविक रूप से पालन हो रहा है या नहीं;

यह पहल सुनिश्चित करती है कि न्यायपालिका केवल स्वतंत्र ही नहीं, बल्कि उत्तरदायी (accountable), पारदर्शी (transparent) और सार्वजनिक विश्वास के योग्य (trustworthy) भी बने।

जब चयन प्रक्रिया खुली, कारण-आधारित और परीक्षण योग्य होगी, तब न केवल संभावित त्रुटियों और दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा, बल्कि नागरिकों को यह भी अवसर मिलेगा कि वे आवश्यकता पड़ने पर विधिक उपायों के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित कर सकें।

 यह पहल केवल एक सुधारात्मक सुझाव नहीं, बल्कि न्यायपालिका को अधिक संवैधानिक, पारदर्शी, उत्तरदायी और जनोन्मुख (citizen-centric) बनाने की दिशा में एक संरचनात्मक परिवर्तन (structural reform) का आधार है।

यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करेगा कि न्यायालयों में केवल योग्य और निष्पक्ष व्यक्तियों का ही वर्चस्व हो, और हर नागरिक को एक गरिमापूर्ण, निष्पक्ष और भरोसेमंद न्यायिक अनुभव प्राप्त हो।

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