यशवंत वर्मा प्रकरण: FIR नहीं, कार्रवाई नहीं—देशभर में बढ़ा आक्रोश; कानूनी जगत का सवाल—जब NCERT की पुस्तक में ‘भ्रष्टाचार’ शब्द पर स्वतः संज्ञान लिया जा सकता है, तो इतने गंभीर आरोपों वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट मौन क्यों? कानूनी विशेषज्ञों ने पूछा—क्या न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा के लिए स्वतः संज्ञान आवश्यक नहीं था?
नई दिल्ली, 27 जुलाई: सर्वोच्च न्यायालय 28 जुलाई 2026 को रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 269/2026 पर सुनवाई करेगा। यह मामला न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत दायर इस याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं जनहित याचिकाकर्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय ने पूर्व दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा से जुड़े प्रकरण में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने तथा न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश देने की मांग की है। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने अपने विरुद्ध संवैधानिक पद से हटाने (इम्पीचमेंट) की प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद पद से इस्तीफा दे दिया था।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने 2 जून 2026 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के निदेशक, दिल्ली पुलिस आयुक्त तथा प्रवर्तन निदेशालय (ED) को विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की थी, किंतु आज तक इस संबंध में कोई FIR दर्ज नहीं की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि शिकायत में संज्ञेय अपराधों का स्पष्ट खुलासा किया गया था, इसके बावजूद कानून के अनुसार अनिवार्य आपराधिक प्रक्रिया प्रारंभ नहीं की गई।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है याचिका
याचिका में कहा गया है कि यह पूर्णतः सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सामग्री पर आधारित है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियाँ, इन-हाउस जांच से संबंधित दस्तावेज, सार्वजनिक किए गए फोटो एवं वीडियो तथा जांच एजेंसियों को भेजी गई याचिकाकर्ता की शिकायत शामिल है।
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित कराना नहीं है, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करना है कि कानून के अनुसार FIR दर्ज हो और उसके बाद निष्पक्ष एवं स्वतंत्र आपराधिक जांच की जाए।
14 मार्च 2025 की घटना का उल्लेख
याचिका में 14 मार्च 2025 की उस घटना का विस्तृत उल्लेख किया गया है, जब नई दिल्ली स्थित तुगलक क्रेसेंट में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगने की घटना सामने आई थी। याचिका में सार्वजनिक रूप से सामने आई उन रिपोर्टों का हवाला दिया गया है जिनमें आग बुझाने के दौरान जली एवं आंशिक रूप से जली हुई बड़ी मात्रा में मुद्रा मिलने का उल्लेख किया गया था। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति गठित किए जाने सहित अन्य आधिकारिक घटनाक्रमों का भी याचिका में उल्लेख किया गया है।
“इस्तीफा देने से आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं हो जाता”
याचिका का एक प्रमुख तर्क यह है कि किसी संवैधानिक पद से इस्तीफा देने मात्र से संभावित आपराधिक दायित्व समाप्त नहीं हो जाता।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन-हाउस जांच अथवा महाभियोग की प्रक्रिया का उद्देश्य केवल यह तय करना होता है कि संबंधित न्यायाधीश पद पर बने रहने के योग्य हैं या नहीं, जबकि आपराधिक जांच का उद्देश्य यह निर्धारित करना होता है कि क्या कोई अपराध हुआ, उसमें कौन-कौन लोग शामिल थे, धन का स्रोत क्या था, क्या साक्ष्यों से छेड़छाड़ हुई तथा किन व्यक्तियों की आपराधिक जिम्मेदारी बनती है। इसलिए दोनों प्रक्रियाएँ अलग-अलग क्षेत्र में कार्य करती हैं और एक-दूसरे का विकल्प नहीं हो सकतीं।
संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों का हवाला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 पर विशेष बल देते हुए कहा गया है कि कानून के समक्ष समानता का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध यदि संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो उसकी संवैधानिक हैसियत चाहे जो भी हो, उसके विरुद्ध समान आपराधिक प्रक्रिया लागू होनी चाहिए।
याचिका में ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल, के. वीरास्वामी बनाम भारत संघ, विनीत नारायण बनाम भारत संघ, कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स, पूजा पाल, सुब्रमण्यम स्वामी, राजेन्द्र सिंह वर्मा, आर.सी. चंदेल, तारक सिंह बनाम ज्योति बसु सहित अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन सभी निर्णयों का संयुक्त सिद्धांत यही है कि जब भी संज्ञेय अपराध की जानकारी सामने आती है, तब FIR दर्ज करना पहला वैधानिक कदम है और सत्य का निर्धारण जांच के माध्यम से ही किया जा सकता है, न कि जांच से इनकार करके।
स्वतंत्र SIT गठित करने की मांग
याचिका में FIR दर्ज करने के अतिरिक्त एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की गई है, जिसकी अगुवाई CBI के वरिष्ठ अधिकारी करें तथा जिसमें प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, दिल्ली पुलिस और फॉरेंसिक विशेषज्ञों का सहयोग लिया जाए।
याचिका के अनुसार जांच केवल कथित नकदी तक सीमित न रहकर उसके स्रोत, आवागमन, कथित रूप से हटाए जाने, वित्तीय लेन-देन, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, CCTV फुटेज, कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल उपकरणों, साक्ष्यों के संभावित विनाश, अन्य व्यक्तियों अथवा लोक सेवकों की भूमिका तथा यदि कोई व्यापक भ्रष्टाचार नेटवर्क सामने आता है तो उसकी भी जांच की जानी चाहिए। साथ ही सभी इलेक्ट्रॉनिक, वित्तीय एवं दस्तावेजी साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने की भी मांग की गई है।
न्यायपालिका की विश्वसनीयता की रक्षा उद्देश्य
याचिका में बार-बार स्पष्ट किया गया है कि इसका उद्देश्य न्यायपालिका को बदनाम करना या उसकी स्वतंत्रता को कमजोर करना नहीं है। इसके विपरीत, याचिकाकर्ता का कहना है कि गंभीर आरोपों की स्थिति में पारदर्शी, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच ही न्यायपालिका में जनता का विश्वास और अधिक मजबूत करती है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक संवैधानिक अवधारणाएँ हैं, और निष्पक्ष जांच से न्यायपालिका की गरिमा एवं विश्वसनीयता और अधिक सुदृढ़ होती है।
याचिकाकर्ता के बारे में
याचिकाकर्ता अधिवक्ता घनश्याम दयालु उपाध्याय बॉम्बे हाईकोर्ट एवं सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता हैं। वे न्यायिक जवाबदेही, पुलिस सुधार, संवैधानिक शासन, प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत सुधारों के लिए निरंतर एवं दृढ़तापूर्वक संघर्ष करने वाले जनहित याचिकाकर्ता के रूप में जाने जाते हैं। पिछले कई वर्षों में उन्होंने न्यायिक सुधार, कानून के शासन, सार्वजनिक जवाबदेही तथा संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत बनाने से जुड़े अनेक जनहित याचिकाएँ दायर की हैं।
उनसे जुड़े सबसे चर्चित मामलों में तत्कालीन महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की मांग करने वाली जनहित याचिका भी शामिल रही। उस मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अनिल देशमुख को गृह मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा तथा बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की और आगे चलकर उन्हें गिरफ्तार भी किया।
अधिवक्ता उपाध्याय ने समय-समय पर उच्च न्यायपालिका के सदस्यों से जुड़े मामलों में भी याचिकाएँ दायर की हैं, जब उनके अनुसार संवैधानिक शासन, न्यायिक जवाबदेही अथवा व्यापक जनहित के महत्वपूर्ण प्रश्न न्यायिक परीक्षण की मांग करते थे। उनका लगातार यह मत रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही एक-दूसरे की पूरक संवैधानिक अवधारणाएँ हैं तथा कानून के अनुसार निष्पक्ष जांच होने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनविश्वास दोनों मजबूत होते हैं।
स्वतंत्र जनहित याचिकाओं के अतिरिक्त अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने इंडियन बार एसोसिएशन (IBA) तथा अधिवक्ता निलेश सी. ओझा की ओर से भी अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक एवं अवमानना (Contempt) मामलों में पैरवी की है। इन मामलों में उनके तर्क मुख्यतः न्यायिक सुधार, अवमानना कानून की सीमाएँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैधानिक प्रक्रियात्मक सुरक्षा तथा संस्थागत जवाबदेही जैसे संवैधानिक प्रश्नों पर केंद्रित रहे हैं।
वर्षों से अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने विधि जगत, जनहित कार्यकर्ताओं तथा समाज के विभिन्न वर्गों में एक निर्भीक अधिवक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई है, जो सार्वजनिक जवाबदेही, न्यायिक सुधार और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर संवैधानिक उपायों का सहारा लेते रहे हैं।