सतीश सालियन ने आदित्य ठाकरे को दी जा रही सरकारी सुरक्षा की तत्काल समीक्षा की मांग की; शिकायतकर्ता, वकीलों और गवाहों को सुरक्षा देने की मांग — कहा, जानबूझकर निष्क्रियता के कारण कोई हमला हुआ तो मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों की धारा 107, 120-B IPC तथा अन्य लागू प्रावधानों के तहत भूमिका की जांच हो
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प्रतिवेदन में सतीश सालियन, अधिवक्ता निलेश सी. ओझा, समीर वानखेड़े और आशुतोष पाठक के खतरे का तत्काल एवं स्वतंत्र आकलन (Threat Assessment) कर उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने की मांग की गई है। प्रतिवेदन के अनुसार, इन व्यक्तियों के पास जांच के अधीन आरोपों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां एवं सामग्री हैं।
जांच/कार्यवाही महाराष्ट्र से बाहर स्थानांतरित करने की मांग: यदि स्थानीय प्रभाव, धमकी, हस्तक्षेप अथवा संस्थागत टकराव के कारण मुंबई में स्वतंत्र, निष्पक्ष और प्रभाव-मुक्त जांच संभव नहीं रहती है, तो प्रतिवेदन में मांग की गई है कि CBI/सक्षम प्राधिकारी सुप्रीम कोर्ट अथवा अन्य सक्षम न्यायालय के समक्ष उचित कार्यवाही कर जांच/कार्यवाही को महाराष्ट्र से बाहर—दिल्ली अथवा किसी अन्य उपयुक्त क्षेत्राधिकार में—स्थानांतरित करने की मांग करे।
पत्र में असलम शेख, सलमान खान, अरबाज़ खान, इम्तियाज़ खत्री और शेरा के नाम भी आए सामने :- प्रतिवेदन में कहा गया है कि दिशा सालियन मामले की जांच के संदर्भ में कांग्रेस विधायक असलम शेख, इम्तियाज़ खत्री, अभिनेता सलमान खान, अरबाज़ खान तथा सलमान खान के बॉडीगार्ड शेरा की भूमिका की भी जांच किए जाने की आवश्यकता है।
दिशा सालियन प्रकरण में राज्य पुलिस मशीनरी के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। 26 सितंबर को दिए गए एक विस्तृत प्रतिवेदन में शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे को दी जा रही पुलिस सुरक्षा की तत्काल समीक्षा की मांग की गई है। प्रतिवेदन में आरोप लगाया गया है कि बार-बार शिकायतें और गंभीर खतरे की आशंका बताए जाने के बावजूद दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन, उनके अधिवक्ताओं और महत्वपूर्ण गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई है।
सतीश सालियन की ओर से अधिवक्ता अभिषेक मिश्रा द्वारा संवैधानिक एवं जांच अधिकारियों को दिए गए इस प्रतिवेदन में इस स्थिति को एक गंभीर असंतुलन बताया गया है। इसमें सवाल उठाया गया है कि एक ओर आदित्य ठाकरे को Y+ श्रेणी सहित भारी सरकारी सुरक्षा उपलब्ध कराई जा रही है, जबकि दूसरी ओर CBI जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शिकायतकर्ता और गवाह कथित धमकियों एवं दबाव के बीच पर्याप्त सुरक्षा के बिना हैं।
पुलिस आयुक्त देवेन भारती की जिम्मेदारी की जांच की मांग
पूर्व चेतावनी के बावजूद पुलिस की निष्क्रियता पर आपराधिक जिम्मेदारी संभव—धारा 107/109 और 120-B IPC के तहत अधिकारियों की भूमिका की जांच हो
प्रतिवेदन में वर्तमान मुंबई पुलिस आयुक्त देवेन भारती की जिम्मेदारी पर विशेष रूप से सवाल उठाया गया है। इसके साथ ही पूर्व पुलिस आयुक्त विवेक फणसालकर तथा उन सभी वरिष्ठ और अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है जिन्होंने सुरक्षा संबंधी मांगों, शिकायतों, सबूतों अथवा पूर्व की कार्यवाही को संभाला था।
प्रतिवेदन के अनुसार, इन अधिकारियों के व्यक्तिगत कृत्यों और चूकों (acts and omissions) की जांच की जानी चाहिए। जब गंभीर अपराधों की जांच चल रही हो और आरोप राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों तथा पुलिस अधिकारियों से जुड़े हों, तब जान-माल को खतरे से संबंधित शिकायतों को सामान्य या रूटीन शिकायत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसीलिए अधिकारियों से वर्तमान तथा पूर्व में दी गई सुरक्षा संबंधी शिकायतों को खतरे की पूर्व सूचना के समकालीन साक्ष्य (contemporaneous evidence of threat perception) के रूप में सुरक्षित रखने की मांग की गई है।
सतीश सालियन, वकीलों या गवाहों के साथ कोई घटना हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो
प्रतिवेदन में गंभीर चेतावनी दी गई है कि यदि सतीश सालियन, उनके अधिवक्ताओं अथवा किसी महत्वपूर्ण गवाह पर हमला होता है, वे लापता होते हैं, संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मृत्यु होती है अथवा उनके साथ कोई अन्य अप्रिय घटना घटती है, तो जांच केवल घटना को प्रत्यक्ष रूप से अंजाम देने वालों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
ऐसी स्थिति में उन लोकसेवकों और पुलिस अधिकारियों के आचरण की भी जांच होनी चाहिए, जिन्हें खतरे की पूर्व जानकारी थी और जिन्होंने इसके बावजूद जानबूझकर आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई।
प्रतिवेदन में विशेष रूप से मांग की गई है कि ऐसी परिस्थितियों में पुलिस आयुक्त देवेन भारती सहित जिम्मेदार लोकसेवकों के acts and omissions की IPC की धारा 107, 120-B तथा अन्य लागू प्रावधानों के तहत जांच की जाए।
धारा 107 IPC: केवल प्रत्यक्ष कृत्य ही नहीं, ‘Illegal Omission’ भी बन सकता है Abetment का आधार
लेख में कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि IPC की धारा 107 के तहत दुष्प्रेरण (abetment) केवल किसी प्रत्यक्ष कृत्य के माध्यम से ही नहीं, बल्कि “illegal omission” अर्थात गैरकानूनी चूक के माध्यम से भी हो सकता है, जहां कोई व्यक्ति अपनी जानबूझकर की गई चूक के जरिए किसी अपराध को किए जाने में सहायता करता है।
इसी प्रकार, आपराधिक षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया कोई कृत्य अथवा illegal omission भी प्रासंगिक हो सकता है। IPC की धारा 120-B आपराधिक षड्यंत्र को दंडनीय बनाती है। लेख में यह भी कहा गया है कि किसी साझा आपराधिक योजना को आगे बढ़ाने वाले कृत्यों और illegal omissions से, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर, षड्यंत्र में भागीदारी का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
जानबूझकर सुरक्षा न देना केवल ‘लापरवाही’ नहीं माना जा सकता
इसलिए, यदि किसी पुलिस अधिकारी को किसी विशिष्ट और गंभीर खतरे की पहले से जानकारी हो, उस पर कानून के अनुसार तत्काल निवारक अथवा सुरक्षात्मक कार्रवाई करने का दायित्व हो और इसके बावजूद वह जानबूझकर आवश्यक कदम न उठाए, तो ऐसी निष्क्रियता को स्वतः केवल साधारण लापरवाही मानकर छोड़ा नहीं जा सकता।
यदि जांच और साक्ष्यों से यह स्थापित होता है कि ऐसी illegal omission जानबूझकर की गई थी और उसका उद्देश्य अपराध को सुगम बनाना था, अथवा वह किसी आपराधिक षड्यंत्र को आगे बढ़ाने के लिए की गई थी, तो संबंधित पुलिस अधिकारी की abetment और/or criminal conspiracy के लिए आपराधिक जिम्मेदारी IPC की धारा 107/109, 120-B तथा अन्य लागू प्रावधानों के तहत उत्पन्न हो सकती है।