नई दिल्ली: केरल उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा की गई टिप्पणियों पर कड़ा विरोध जताते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को भेजा गया सख्त शब्दों वाला पत्र अब उन्हीं के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। जिस पत्र को “संस्थागत विरोध” के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उसने बार काउंसिल नेतृत्व की विश्वसनीयता पर ही गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
26 जनवरी को भेजे गए इस पत्र में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने केरल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की टिप्पणियों पर “गंभीर संस्थागत चिंता” व्यक्त की थी। लेकिन पत्र की भाषा—खासकर यह दावा कि “बार काउंसिल न्यायपालिका के कुछ हिस्सों में हो रही अनियमितताओं, त्रुटियों और कदाचार से पूरी तरह अवगत है” और फिर भी “न्यायपालिका की गरिमा, विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए जानबूझकर चुप्पी साधे हुए है, ताकि बार और बेंच के बीच संतुलन बना रहे और न्यायिक संस्था की छवि को सार्वजनिक अविश्वास से बचाया जा सके”—पत्र में आगे यह भी कहा गया कि “ऐसी चुप्पी को कमजोरी या समर्पण के रूप में न समझा जाए, विशेष रूप से तब जब वकीलों की चुनी हुई प्रतिनिधि संस्थाओं पर अनावश्यक हमले किए जा रहे हों।” इन शब्दों के कारण अब यह पत्र गंभीर विवाद का केंद्र बन गया है और कानूनी हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। इसने पूरे कानूनी जगत में भारी नाराज़गी पैदा कर दी है।
आलोचकों का कहना है कि यह बयान सीधे तौर पर यह स्वीकार करता है कि BCI के पास कथित कदाचार से जुड़ी जानकारी मौजूद थी, लेकिन उसने उसे उजागर करने के बजाय दबाए रखा। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक यह ‘संयम’ नहीं, बल्कि वैधानिक कर्तव्य से पीछे हटना है। उनका तर्क है कि अगर सच में कोई ठोस सामग्री थी, तो उसे सामने लाना और उचित प्राधिकरण के पास शिकायत दर्ज कराना कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी थी—और अगर कोई सामग्री थी ही नहीं, तो ऐसा बयान देना न्यायपालिका पर दबाव बनाने जैसा कदम माना जाएगा।
यही शब्द अब विवाद की असली जड़ बन गए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह बयान सीधे तौर पर इस बात को स्वीकार करता है कि BCI के पास कथित कदाचार से जुड़ी जानकारी मौजूद थी, लेकिन उसने उसे उजागर करने के बजाय दबाए रखा, और यह संकेत दिया कि यदि बार काउंसिल के खिलाफ भविष्य में कोई प्रतिकूल टिप्पणी की गई, तो ऐसी जानकारियों को सार्वजनिक किया जा सकता है।कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह ‘संयम’ नहीं, बल्कि वैधानिक कर्तव्य से साफ-साफ पीछे हटना है और एक प्रकार की ब्लैकमेलिंग तकनीक भी है। उनका तर्क है कि यदि सच में कोई ठोस सामग्री उपलब्ध थी, तो उसे सामने लाना और उचित प्राधिकरण के पास शिकायत दर्ज कराना कानूनी तथा संवैधानिक जिम्मेदारी थी—और यदि ऐसी कोई सामग्री थी ही नहीं, तो इस प्रकार का बयान न्यायपालिका पर अनुचित दबाव बनाने के समान माना जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर बार काउंसिल के पास सच में कदाचार के सबूत थे, तो उसे चुप बैठने का कोई अधिकार नहीं था।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम और सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले साफ कहते हैं कि
👉 किसी भी तरह के न्यायिक कदाचार से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी सामने आने पर उसकी शिकायत करना और कार्रवाई कराना अनिवार्य है।न्यायपालिका की गरिमा बचाने के नाम पर चुप्पी साधना कानून के मुताबिक सही रास्ता नहीं है।
लेकिन BCI अध्यक्ष ने खुद स्वीकार किया कि जानकारी होने के बावजूद “चुप्पी साध ली गई।” ==दोनों ही हालात में गंभीर सवाल
कानूनी जानकारों के मुताबिक इस बयान के सिर्फ दो मतलब हो सकते हैं—
🔹 अगर उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं था, तो यह बयान न्यायपालिका को धमकाने जैसा है।
🔹 और अगर सबूत थे, लेकिन शिकायत नहीं की गई, तो यह घोर पेशेवर कदाचार और वैधानिक कर्तव्य की खुली अवहेलना है।
दोनों ही हालात में यह BCI अध्यक्ष की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कानून का संदेश बिल्कुल साफ है—न्यायपालिका में कदाचार की सच्चाई उजागर करना कोई अपराध नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने R. Muthukrishnan बनाम मद्रास हाई कोर्ट (2019) के फैसले में स्पष्ट रूप से कहा था कि वकील का यह कर्तव्य है कि वह उचित प्राधिकरण के सामने शिकायत दर्ज कराए। अदालत ने यह भी चेतावनी दी थी कि बार को डरपोक या चाटुकार बना देना न्याय के निष्पक्ष प्रशासन के लिए बेहद खतरनाक होगा। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि वकीलों की निर्भीकता, स्वतंत्रता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा से समझौता नहीं किया जा सकता, और बार का असली कर्तव्य है—ईमानदार जजों की रक्षा करना और भ्रष्ट जजों को बख्शना नहीं।
इसी कानूनी पृष्ठभूमि में बार काउंसिल अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का वह पत्र बेहद गंभीर महत्व ले लेता है, जिसमें उन्होंने यह स्वीकार किया कि बार काउंसिल “न्यायपालिका के कुछ हिस्सों में हो रही अनियमितताओं और कदाचार से अवगत है” लेकिन उसने “गरिमा बचाने के लिए जानबूझकर चुप्पी साध रखी है।” यह बयान सीधे-सीधे संविधान पीठ के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ जाता है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों ने साफ कर दिया है कि संस्थागत गरिमा के नाम पर चुप्पी साधना कोई कानूनी बचाव नहीं है। अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि भले ही सच्चाई सामने आने से किसी जज या अदालत की अस्थायी आलोचना हो, फिर भी जनहित में उसका खुलासा करना न सिर्फ वैध है बल्कि आवश्यक भी है।
ऑस्ट्रेलियाई हाई कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले Nationwide News v. Wills—जिसे भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने Subramanian Swamy v. Arun Shourie मामले में अनुमोदित किया—में स्पष्ट कहा गया था कि केवल गरिमा के नाम पर चुप्पी साधना सम्मान नहीं बढ़ाती, बल्कि अविश्वास और संदेह को जन्म देती है। इसी तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Rama Surat Singh v. Shiv Kumar Pandey में कहा था कि किसी भ्रष्ट या बेईमान जज के खिलाफ ईमानदार शिकायत करना न्याय व्यवस्था की शुद्धता बनाए रखने का काम है, न कि अवमानना।
इतना ही नहीं, संविधान पीठ ने 1952 के ऐतिहासिक फैसले Bathina Ramakrishna Reddy v. State of Madras में भी यह सिद्धांत स्थापित किया था कि अगर आरोप सच हैं तो उन्हें सामने लाना पूरी तरह जनहित में है और यह अवमानना नहीं माना जा सकता। यही सिद्धांत बाद के कई फैसलों—जैसे Subramanian Swamy v. Arun Shourie और Indirect Tax Practitioners Association v. R.K. Jain—में दोहराया गया, जहाँ साफ कहा गया कि भ्रष्टाचार उजागर करना केवल अधिकार नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 51A के तहत नागरिकों और वकीलों का कर्तव्य है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने Aniruddha Bahal v. State मामले में और भी सख्त शब्दों में कहा था कि देश की रक्षा केवल युद्ध के समय बंदूक उठाकर नहीं होती, बल्कि रोजमर्रा की सतर्कता और भ्रष्टाचार को उजागर करके होती है। अदालत ने यह तक कहा कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है कि उसे स्वच्छ और भ्रष्टाचार-मुक्त न्यायपालिका मिले, और इसके लिए भ्रष्टाचार को सामने लाना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। इन सभी फैसलों का सार यही है कि सच्चाई दबाना नहीं, बल्कि उसे सामने लाना संवैधानिक दायित्व है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है—अगर बार काउंसिल सच में कदाचार से जुड़ी जानकारी रखती थी, तो फिर शिकायत क्यों नहीं की गई? उचित प्राधिकरण के सामने कार्रवाई क्यों नहीं की गई? और अगर कोई ठोस जानकारी थी ही नहीं, तो ऐसा बयान देना न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश क्यों नहीं माना जाए? कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों ही हालात में यह बयान बेहद आपत्तिजनक है—या तो यह कर्तव्य की घोर अवहेलना है, या फिर एक तरह की ब्लैकमेलिंग तकनीक।
अब यह मुद्दा केवल एक पत्र तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल बन गया है बार काउंसिल नेतृत्व की जवाबदेही का, पेशेवर नैतिकता का और न्याय व्यवस्था में पारदर्शिता का। कानून बार-बार कहता है कि ‘गरिमा’ के नाम पर चुप्पी साधना स्वीकार्य नहीं है। इसलिए BCI अध्यक्ष का यह स्वीकार करना कि “हम जानते थे लेकिन चुप रहे”—कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर टिकता नहीं दिखता। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस विवाद पर मुख्य न्यायाधीश कार्यालय और संबंधित संस्थान क्या कदम उठाते हैं, क्योंकि यह मामला अब न्यायपालिका और बार के रिश्तों की साख से सीधे जुड़ चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के साफ–साफ आदेशों और बाध्यकारी फैसलों के बावजूद, बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की हालिया भूमिका अब पूरी तरह कानून के खिलाफ मानी जा रही है। कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर सचमुच बार काउंसिल को न्यायपालिका के भीतर कथित कदाचार की जानकारी थी, तो उस पर कार्रवाई करना उसका संवैधानिक और पेशेवर कर्तव्य था। लेकिन इसके उलट न कोई शिकायत दर्ज की गई, न किसी सक्षम प्राधिकरण के सामने मामला रखा गया, और न ही कोई ठोस कदम उठाया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, कथित जानकारी होते हुए भी चुप्पी साधना और बाद में उसी का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करना, वैधानिक कर्तव्य का सीधा उल्लंघन है।
एडवोकेट्स एक्ट, बार काउंसिल के नियम और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा–निर्देश बताते हैं कि BCI केवल एक प्रतिनिधि संस्था नहीं, बल्कि कानूनी व्यवस्था की शुचिता और विश्वसनीयता की रक्षा करने वाली नियामक संस्था है। ऐसे में कथित गलत कामों की जानकारी होते हुए भी जानबूझकर निष्क्रिय रहना “संयम” नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह जिम्मेदारी से साफ–साफ भागना है। यही कारण है कि अब यह सवाल खुलकर उठने लगा है कि क्या BCI नेतृत्व ने अपने कानूनी और नैतिक दायित्वों का सही तरीके से पालन किया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो गया है—क्या मनन कुमार मिश्रा बार काउंसिल अध्यक्ष पद पर बने रहने के योग्य हैं? या तो उन्हें इन स्थापित कानूनी सिद्धांतों की जानकारी ही नहीं थी, ऐसी स्थिति में वे वकील समुदाय की सर्वोच्च नियामक संस्था का नेतृत्व करने के लायक नहीं माने जा सकते। और अगर उन्हें इन नियमों की जानकारी थी, फिर भी उन्होंने कथित कदाचार की सूचना दबाई, तो यह और भी गंभीर मामला बन जाता है। दोनों ही हालात में उनकी भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में आ चुकी है।
कानूनी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि कोई भी वैधानिक संस्था भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करके “न्यायपालिका की गरिमा बचाने” का दावा नहीं कर सकती। न्याय व्यवस्था की असली गरिमा चुप्पी से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून के निर्भीक पालन से बनती है। यही कारण है कि अब वकील समुदाय का एक बड़ा वर्ग खुलकर मांग कर रहा है कि BCI अध्यक्ष मनन मिश्रा और इस विवादित पत्र का समर्थन करने वाले अन्य सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। उनका तर्क है कि जो व्यक्ति खुद यह स्वीकार करता है कि उसके पास कथित कदाचार की जानकारी थी लेकिन उसने उसे दबाए रखा, वह किसी नियामक पद पर बने रहने के योग्य नहीं हो सकता।
एक वरिष्ठ वकील ने इस पूरे मामले पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सम्मानजनक संस्थागत संवाद की भाषा नहीं है, बल्कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश है। फिलहाल इस पत्र पर मुख्य न्यायाधीश कार्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस विवाद ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के भीतर जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। जो पत्र शुरुआत में “संस्थागत विरोध” के रूप में भेजा गया था, वही अब कानूनी पेशे की नैतिकता और जिम्मेदारी का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि इस गंभीर विवाद पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं, क्योंकि यह मामला केवल एक व्यक्ति या पत्र तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायपालिका और बार के रिश्तों की साख से सीधे जुड़ गया है।
In R. Muthukrishnan V/s. High Court of Madras, (2019) 16 SCC 407, it is ruled as under;
“It is duty of the lawyer to lodge appropriate complaint to the concerned authorities as observed by this Court in Vinay Chandra Mishra (supra), which right cannot be totally curtailed.
……..Making the Bar too sycophant and fearful which would not be conducive for fair administration of justice. Fair criticism of judgment and its analysis is permissible. Lawyers’ fearlessness in court, independence, uprightness, honesty, equality are the virtues which cannot be sacrificed.
It is the duty of the Bar to protect honest judges and not to ruin their reputation and at the same time to ensure that corrupt judges are not spared.”
Truthful Exposure of Judicial Misconduct Is a Constitutional Duty – Silence Is Not an Option- Silence in the Name of ‘Dignity’ Is Legally Unsustainable
Against this settled legal backdrop, the recent letter issued by BCI Chairman Shri Manan Kumar Mishra assumes disturbing significance. In the said letter, he asserts that the Bar Council of India is “acutely aware of excesses, lapses and malpractices” within the judicial system but has “consciously chosen silence” to preserve the dignity of the judiciary.
This admission directly contradicts binding constitutional principles.
The Constitution Bench decisions make it abundantly clear that silence cannot be justified in the name of protecting institutional dignity. The Supreme Court has explicitly held that even if truthful disclosure may bring temporary disrepute to a particular judge or court, publication in the larger public interest remains lawful and necessary.
The Australian High Court decision in Nationwide News (Pty) Ltd. v. Wills, (1992) 177 CLR 1, cited with approval by the Supreme Court in Subramanian Swamy v. Arun Shourie, warned that:
“A silence, however limited, solely in the name of preserving the dignity of the bench, would probably engender resentment, suspicion and contempt much more than it would enhance respect.”
Further, the Allahabad High Court in Rama Surat Singh v. Shiv Kumar Pandey, 1969 SCC OnLine All 226, held that making a bona fide complaint against a dishonest or corrupt judge and malpractices is an act aimed at maintaining the purity of the administration of justice.
The law on the right to expose corruption within the judiciary is neither new nor ambiguous. A Constitution Bench of the Hon’ble Supreme Court in Bathina Ramakrishna Reddy v. State of Madras, 1952 SCR 425, laid down the foundational principle that publication of truth regarding corruption or misconduct of a Judge does not amount to contempt of court. On the contrary, such disclosure is in the larger public interest. The Court categorically held:
“If the allegations were true, obviously it would be to the benefit of the public to bring these matters into light.”
The same principle has been consistently reaffirmed in later judgments, including Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344 and Indirect Tax Practitioners’ Association v. R.K. Jain, (2010) 8 SCC 281, which recognize that truthful criticism and exposure of wrongdoing and exposing corruption is not merely a right but a constitutional obligation under Article 51A of the Constitution. Citizens and advocates alike are duty-bound to bring misconduct to light, particularly when it occurs at higher levels of governance.
The Hon’ble Delhi High Court in Aniruddha Bahal v. State, (2010) 172 DLT 268, articulated this duty in powerful constitutional terms. The Court observed:
“7… I consider that a country cannot be defended only by taking a gun and going to border at the time of war. The country is to be defended day in and day out by being vigil and alert to the needs and requirements of the country and to bring forth the corruption at higher level. The duty under Article 51A(H) is to develop a spirit of inquiry and reforms. The duty of a citizen under Article 51A(j) is to strive towards excellence in all spheres so that the national constantly rises to higher level of endeavour and achievements I consider that it is built-in duties that every citizen must strive for a corruption free society and must expose the corruption whenever it comes to his or her knowledge and try to remove corruption at all levels more so at higher levels of management of the State. 9. I consider that it is a fundamental right of citizens of this country to have a clean incorruptible judiciary, legislature, executive and other organs and in order to achieve this fundamental right, every citizen has a corresponding duty to expose corruption wherever he finds it, whenever he finds it and to expose it if possible with proof so that even if the State machinery does not act and does not take action against the corrupt people when time comes people are able to take action either by rejecting them as their representatives or by compelling the State by public awareness to take action against them.-”