“रेप-मर्डर के शक को दबाकर दुर्घटना बताया गया” — CBI जांच के आदेश. 15 साल बाद हाईकोर्ट का विस्फोट

पुलिस पर अदालत की कड़ी चोट: सच दबाने के लिए  झूठी मेडिकल रिपोर्ट तैयार की गई, मूल पोस्टमार्टम रिपोर्ट को छिपाया गया।

नग्न अवस्था में मिला शव — फिर भी ‘डूबकर मौत’ की कहानी!

Rajesh Pawar Vs State Criminal Writ Petition no 4678 of 2014 order dated 10.02.2026.

दिशा सालियन केस जैसी परिस्थितियों पर उठे बड़े सवाल

मुंबई: 13 वर्षीय बच्ची की रहस्यमय मौत के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है जिसने राज्य की जांच प्रणाली की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामले को शुरुआत से ही “दुर्घटनात्मक मृत्यु” साबित करने की दिशा में चलाया गया और दुष्कर्म व हत्या की गंभीर संभावना की समुचित जांच नहीं की गई।

न्यायमूर्ति सारंग वी. कोटवाल और न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल की खंडपीठ ने 15 वर्ष पुराने इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपते हुए कहा कि न्याय के लिए स्वतंत्र एजेंसी की जांच अनिवार्य है।

नग्न अवस्था में मिला शव

वर्ष 2010 में स्कूल कैंप के दौरान लापता हुई बच्ची का शव नदी किनारे पत्थरों पर मिला। सबसे चौंकाने वाला तथ्य — शरीर पर कपड़ों का नामोनिशान नहीं।

“मृत शरीर पर कपड़े का कोई भी टुकड़ा नहीं था।”

“पूर्वनिर्धारित दुर्घटना सिद्धांत” — हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

अदालत ने कहा कि जांच ऐसे संचालित हुई मानो लक्ष्य पहले से तय हो — घटना को दुर्घटना साबित करना। गंभीर अपराध की संभावना को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया।

तीन-तीन जांच… लेकिन सच वही?

स्थानीय पुलिस, राज्य सीआईडी और विशेष जांच दल — सभी ने अलग-अलग जांच की, लेकिन निष्कर्ष एक ही: दुर्घटना।

अदालत ने साफ कहा कि रेप और मर्डर की दिशा में गंभीर जांच ही नहीं की गई।

CBI को जांच — न्याय की आखिरी उम्मीद

अदालत ने कहा कि समय बीत जाने के बावजूद पीड़िता और उसके परिवार के लिए न्याय सुनिश्चित करना जरूरी है। इसलिए पूरे मामले को CBI के हवाले कर दिया गया।

पुलिस के लिए करारा झटका

कानूनी हलकों में इसे राज्य पुलिस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि गंभीर अपराधों को “दुर्घटना” बताकर दफन नहीं किया जा सकता।

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