यूट्यूबर गुलशन पहुजा को कोर्ट अवमानना की सज़ा पर सवाल: क्या यह सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नियमों और बाध्यकारी सिद्धांतों के विपरीत है?

दिल्ली हाई कोर्ट ने यूट्यूबर गुलशन पहुजा को कथित रूप से दो अधिवक्ताओं का एक इंटरव्यू प्रकाशित करने के मामले में कोर्ट अवमानना का दोषी ठहराते हुए दो अलग-अलग छह माह के कारावास की सज़ा सुनाई। विवादित वीडियो का शीर्षक कथित रूप से था: “यदि आपका मामला दो विशेष न्यायाधीशों की अदालत में है, तो आपको न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है।”

  1. मामले में प्रारंभिक चरण पर दिल्ली हाई कोर्ट ने नोटिस जारी किया था। जिन दो अधिवक्ताओं के इंटरव्यू प्रसारित किए गए थे, उन्होंने बाद में बिना शर्त माफ़ी मांग ली और उन्हें राहत मिल गई। लेकिन गुलशन पहुजा ने माफ़ी मांगने से इनकार किया, जिसके बाद उन्हें दोषी ठहराया गया।
  2. हालाँकि, सज़ा की मात्रा (quantum of sentence) तय करते समय श्री पहुजा ने कथित रूप से सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों पर भरोसा किया और तर्क दिया कि अवमानना का संज्ञान लेना, दोषसिद्धि और कारावास देना स्वयं बाध्यकारी न्यायनिर्णयों के विपरीत है। विशेष रूप से यह दलील दी गई कि: In Re: Prashant Bhushan, (2021) 3 SCC 160 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि बनाए रखते हुए भी मात्र Re.1 का प्रतीकात्मक जुर्माना लगाया था, जबकि वहाँ भी बिना माफ़ी के रुख बना रहा था। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या हाई कोर्ट ने सज़ा तय करते समय इन सुप्रीम कोर्ट निर्णयों पर विस्तार से विचार किया, उन्हें अलग (distinguish) किया या अस्वीकार करने के कारण दर्ज किए? यदि बाध्यकारी निर्णयों पर विचार नहीं किया गया, तो आलोचक इसे न्यायिक अनुशासन (judicial discipline) का प्रश्न मान रहे हैं।
  3. बाध्यकारी निर्णयों का पालन — न्यायिक अनुशासन का अनिवार्य हिस्सा है (Ratilal Jhaverbhai Parmar v. State of Gujarat, 2024 SCC OnLine SC 2985) – सुप्रीम कोर्ट ने इस हालिया फैसले में स्पष्ट कहा कि बाध्यकारी निर्णयों की अनदेखी न्याय व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँचाती है और न्यायिक अनुशासन के सर्वथा विरुद्ध है।
  4. संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित विधि देश की समस्त अदालतों पर बाध्यकारी है। जब कोई न्यायाधीश इन बाध्यकारी निर्णयों की जानबूझकर अनदेखी करता है — तो वह केवल न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन नहीं करता।
  5. यह उस शपथ का भंग है जो उसने संविधान के प्रति ली थी। न्यायाधीश पद ग्रहण करते समय संविधान के प्रति निष्ठा और विधि के शासन को बनाए रखने की शपथ लेता है। जब वही न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के स्थापित कानून को नज़रअंदाज़ करके मनमाने आदेश पारित करता है — तो वह अपनी शपथ से मुकरता है। और शपथ से मुकरना केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं — यह राष्ट्र के साथ विश्वासघात है।
  6. क्योंकि जनता ने न्यायाधीश पर यह भरोसा किया था कि वह कानून के अनुसार — न कि अपनी इच्छा के अनुसार — न्याय करेगा। उस भरोसे को तोड़ना — उस जनता के साथ विश्वासघात है जिसकी सेवा के लिए न्यायाधीश नियुक्त हुआ था।
  7. बाध्यकारी निर्णयों का पालन न्यायाधीश का विकल्प नहीं — उसका संवैधानिक दायित्व है। और इस दायित्व से विमुख होना — शपथ का भंग है, राष्ट्र के साथ विश्वासघात है।
  8. सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों की अवहेलना — स्वयं अवमानना है (In Re: C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1 — संविधान पीठ) Re: M.P. Dwivedi, (1996) 4 SCC 152 ; Priya Gupta Vs. Additional Secretary (2013) 11 SCC 404, ; New Delhi Municipal Council v. M/s Prominent Hotels Ltd., 2015 SCC OnLine Del 11910; Baradakant Mishra Vs. Registrar of Orissa High Court (1973) 1 SCC 374 ; Smt. Prabha Sharma Vs. Sunil Goyal and Ors. (2017) 11 SCC 77;  Legrand Pvt. Ltd. 2007 (6) Mh.L.J.146 :-
    • सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने C.S. Karnan के ऐतिहासिक फैसले में यह बाध्यकारी कानून स्थापित किया — जो न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के स्थापित और बाध्यकारी निर्णयों की जानबूझकर अवहेलना करके मनमाने आदेश पारित करता है — वह Civil Contempt of Court Act की धारा 2(b) और धारा 12 के अंतर्गत अवमानना का दोषी है और दंड का हकदार है।
    • क्योंकि धारा 2(b) के अंतर्गत — किसी न्यायालय के किसी निर्णय, आदेश या निर्देश की जानबूझकर अवज्ञा करना — सिविल अवमानना है। और यह अवज्ञा चाहे कोई सामान्य नागरिक करे या स्वयं कोई न्यायाधीश — कानून की नज़र में दोनों समान रूप से दोषी हैं।
    • कानून सबके लिए एक है — न्यायाधीश का आसन उसे कानून से ऊपर नहीं रखता। कोई भी नागरिक ऐसे न्यायाधीश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर सकता हैऔर सबसे महत्वपूर्ण बात — सुप्रीम कोर्ट ऐसी याचिका सुनने के लिए बाध्य है। यह कोई विवेकाधीन अधिकार नहीं है। यह संविधान पीठ द्वारा स्थापित कानून है। जब कोई नागरिक यह साबित करे कि किसी न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों की जानबूझकर अनदेखी की है — तो सुप्रीम कोर्ट उस याचिका को अनसुना नहीं कर सकता।
  1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने *Bathina Ramakrishna Reddy v. State of Madras*, AIR 1952 SC 149 में भारतीय अवमानना कानून का एक मूलभूत सिद्धांत स्थापित करते हुए स्पष्ट किया कि **यदि किसी न्यायाधीश के भ्रष्टाचार, दुराचार या न्यायिक कर्तव्य के दुरुपयोग के संबंध में लगाए गए आरोप सत्य हैं या जनहित में उठाए गए हैं, तो ऐसे तथ्यों का प्रकाशन लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक हित का विषय होता है।** न्यायपालिका की आलोचना या उसके विरुद्ध सत्य तथ्यों का प्रकटीकरण मात्र इसलिए अवमानना नहीं माना जा सकता कि वह न्यायपालिका के लिए असुविधाजनक या आलोचनात्मक हो।   
  2. न्यायालय ने इस सिद्धांत को स्वीका र किया कि **अवमानना कानून का उद्देश्य न्यायपालिका को वैध आलोचना, सत्य आधारित खुलासों या जनहित में किए गए विमर्श से बचाना नहीं, बल्कि न्याय प्रशासन में वास्तविक और गंभीर बाधा को रोकना है।** इसलिए न्यायिक भ्रष्टाचार या कदाचार के संबंध में सत्य आरोपों का प्रकाशन को लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका महत्वपूर्ण स्थान है।
  3. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (Indirect Tax Practitioners’ Assn. v. R.K. Jain, (2010) 8 SCC 281)  – न्यायपालिका और न्यायालयों की अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार को उजागर करना — संविधान के अनुच्छेद 51-A के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है
  • ऐसे देशभक्त नागरिक — जो न्यायिक अनियमितताओं को सार्वजनिक करते हैं — वे संविधान की रक्षा कर रहे हैं। वे अवमानना नहीं कर रहे — वे अपना संवैधानिक दायित्व निभा रहे हैं।
  • और जो लोग ऐसे संवैधानिक कार्यों में बाधा डालने के लिए अवमानना की कार्यवाही की माँग करते हैं — सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे अवमानना याचिकाकर्ता पर स्वयं ₹2,00,000 (दो लाख रुपये) का जुर्माना लगाया।
  • सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट और कड़ा संदेश — न्यायिक भ्रष्टाचार उजागर करना — अवमानना नहीं, संवैधानिक कर्तव्य है। ऐसे नागरिकों को चुप कराने की कोशिश करना — स्वयं दंडनीय है। और जो अवमानना के हथियार का दुरुपयोग करके देशभक्त नागरिकों को डराने की कोशिश करे — वह स्वयं जुर्माने का हकदार है।
  1. दिल्ली उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला (Aniruddha Bahal v. State, (2010) 172 DLT 268) :-
    • दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में एक ऐसा सत्य उद्घोषित किया जो हर नागरिक को जानना चाहिए —इस देश के प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक अधिकार है कि उसे एक स्वच्छ और भ्रष्टाचारमुक्त न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और अन्य संस्थाएँ मिलें। और इस मौलिक अधिकार को प्राप्त करने के लिए — प्रत्येक नागरिक का यह संगत कर्तव्य है कि जहाँ भी, जब भी उसे भ्रष्टाचार दिखे — वह उसे उजागर करे — यदि संभव हो तो प्रमाण सहित। और इस उद्देश्य के लिए स्टिंग ऑपरेशन का सहारा भी लिया जा सकता है।
    • न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि देश की रक्षा केवल सीमा पर बंदूक उठाकर नहीं होती। देश की रक्षा प्रतिदिन होती है — सतर्क रहकर, जागरूक रहकर, और उच्च स्तर पर फैले भ्रष्टाचार को निर्भीकता से उजागर करके।
    • संविधान के अनुच्छेद 51-A(H) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह जिज्ञासा और सुधार की भावना विकसित करे। और अनुच्छेद 51-A(J) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करे — ताकि राष्ट्र निरंतर उच्चतर लक्ष्यों की ओर बढ़ता रहे।
    • भ्रष्टाचार उजागर करना — देशद्रोह नहीं, देशभक्ति है। न्यायपालिका में भ्रष्टाचार उजागर करना —अवमानना नहीं, मौलिक अधिकार और संवैधानिक कर्तव्य है। और इसे दबाने की कोशिश — संविधान के विरुद्ध है।
  1. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने (In Re: C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1) इस ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट अभिनिर्धारित किया — अवमानना का कानून उन न्यायाधीशों की रक्षा के लिए नहीं बनाया गया है — जो संवेदनशील हों, जो जनमत की हवाओं से विचलित हो जाएँ, जो व्यक्तिगत भावनाओं के अधीन हों, और जिनमें सहनशीलता की कमी हो।
    • न्यायाधीशों से यह अपेक्षित है कि वे दृढ़निश्चयी, मज़बूत इरादों वाले और धैर्यशील व्यक्ति हों — जो आलोचना की आँधी में भी अडिग रहें। जो जनमत के दबाव में न झुकें। जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी न डगमगाएँ।
    • अवमानना का कानून न्यायाधीश की व्यक्तिगत संवेदनशीलता की ढाल नहीं है — यह न्याय प्रशासन की रक्षा का अंतिम उपाय है।
  1. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने In Re: C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1,  यह बाध्यकारी सिद्धांत प्रतिपादित किया — यदि कोई व्यक्ति किसी न्यायाधीश पर यह आरोप लगाता है कि उसने न्यायिक निर्णय देते समय — व्यक्तिगत स्वार्थ से काम लिया, पक्षपात किया, पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा, किसी बाहरी दबाव या प्रभाव में आकर फैसला दिया, या कोई दुर्भावनापूर्ण मंशा रखी — तो ऐसे आरोपों की दो स्थितियाँ हैं —
  • पहली स्थिति — जब आरोप निराधार और बिना प्रमाण के हों

यदि ऐसे आरोप ठोस साक्ष्य से रहित हों, निराधार हों और बिना किसी प्रमाण के लगाए गए हों —

तभी वे अवमानना की श्रेणी में आते हैं।

  • दूसरी स्थिति — जब आरोप ठोस साक्ष्य और सिद्ध तथ्यों पर आधारित हों

लेकिन जब वे आरोप ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पर आधारित हों और सिद्ध तथ्यों के रूप में स्थापित हों —

तो वे अवमानना की श्रेणी में नहीं आते।

  1. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का स्पष्ट और अटल संदेश (Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344-  यदि किसी सत्य के प्रकाशन से या किसी तथ्याधारित निष्पक्ष आलोचना से न्यायाधीश पर या न्यायालय पर जनता का भरोसा कम भी हो जाए — तब भी वह अवमानना नहीं है। क्योंकि अवमानना का कानून सत्य को दबाने के लिए नहीं बना। वह झूठ और दुर्भावना को रोकने के लिए बना है — सच्चाई को नहीं। इसका सीधा और निर्णायक अर्थ यह है कि जो पत्रकार सत्य लिखता है, जो नागरिक तथ्यों के आधार पर आलोचना करता है, जो यूट्यूबर सिद्ध तथ्यों पर प्रश्न उठाता है — वह अवमानना नहीं करता — चाहे उसकी बात से न्यायाधीश की छवि पर या न्यायालय की गरिमा पर कितना भी प्रभाव पड़े।

 

  1.  
  2.  सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344) सत्य और जनहित के बचाव को सुदृढ़ करते हुए ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की खंडपीठ के Nationwide News Pvt. Ltd. v. Wills, (1992) 177 CLR 1 के फैसले को सहमति के साथ उद्धृत किया — जिसमें गहन और ऐतिहासिक टिप्पणी की गई थी  की,  यह धारणा कि न्यायाधीशों को प्रकाशित आलोचना से बचाकर न्यायपालिका के प्रति सम्मान अर्जित किया जा सकता है — जनमत की प्रकृति का सर्वथा गलत मूल्यांकन है। केवल न्यायपीठ की गरिमा बचाने के नाम पर थोपी गई चुप्पी — चाहे वह कितनी भी सीमित क्यों न हो — सम्मान बढ़ाने की बजाय — रोष, संदेह और अवमानना को और अधिक जन्म देगी।
  3. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश — आलोचना को दबाकर सम्मान नहीं मिलता। चुप्पी थोपकर गरिमा नहीं बनती। और अवमानना के भय से न्यायपालिका पर भरोसा नहीं बढ़ता।
  4. सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (Nirbhay Singh Suliya v. State of M.P., 2026 SCC OnLine SC 8) :-
    • सुप्रीम कोर्ट ने इस ताज़ा और ऐतिहासिक फैसले में एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानून स्थापित किया —यदि किसी जज – न्यायाधीश  के विरुद्ध कदाचार का आरोप प्रथम दृष्टया सत्य पाया जाए — तो तुरंत अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। आरोप सिद्ध होने पर कोई भी नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। और उचित मामलों में — जहाँ आपराधिक अभियोजन आवश्यक हो — न्यायाधीश के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाने में भी संकोच नहीं होना चाहिए।    न्यायपालिका में भ्रष्टाचार किसी भी स्तर पर असहनीय है — क्योंकि भ्रष्टाचार न्याय प्रशासन की जड़ों को खोखला करता है और कानून के शासन पर जनता के भरोसे को नष्ट करता है।
    • न्यायपालिका से दागी न्यायाधीशों को बाहर निकालना — यही एकमात्र रास्ता है जिससे न्यायपालिका की निष्कलंक गरिमा की रक्षा की जा सकती है।
    • सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश — न्यायाधीश का पद कानून से ऊपर नहीं है। आरोप सिद्ध हो तो नरमी नहीं — अनुशासन। गंभीर मामलों में आपराधिक मुकदमा भी। भ्रष्टाचार असहनीय है — चाहे वह किसी भी स्तर पर हो।
  1.  सुप्रीम कोर्ट का अभिनिर्धारण (Indirect Tax Practitioners’ Assn. v. R.K. Jain, (2010) 8 SCC 281) – It is ruled by the Supreme Court as under ;
    • अदालतों पर से लोगों का भरोसा उठ गया है — और यह भरोसा जरूरतमंदों को तुरंत और वास्तविक न्याय न दे पाने की अदालतों की अपनी अक्षमता ने तोड़ा है।
    • ऐसी आलोचना जनता का संवैधानिक अधिकार है — और इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
    • न्यायाधीशों को स्वयं अपने भीतर झाँककर देखना चाहिए कि क्या सचमुच वे ऐसी गलती नहीं कर रहे। यदि न्यायाधीश स्वयं संस्थागत गिरावट का कारण बनें, तो अवमानना की शक्ति उन्हें बचा नहीं सकती -ऐसे मामलों में अवमानना का अपराध नहीं बनता — और ऐसी आलोचना के लिए कोई सज़ा नहीं दी जा सकती।
    • सुप्रीम कोर्ट ने  पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में न्यायपालिका की आलोचना करना हमेशा अवमानना (Contempt) नहीं होता। न्यायपालिका जनता से शक्ति प्राप्त करती है, इसलिए जनता को न्याय व्यवस्था में सुधार की मांग करने और उसकी कमियों पर टिप्पणी करने का अधिकार है।  
    • निर्णय में कहा गया कि:
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19(1)(a)) और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन आवश्यक है। न्यायपालिका की हर आलोचना को अवमानना मानना लोकतंत्र के खिलाफ होगा।
  • भारत में नागरिक राजा के प्रजा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिक हैं। इसलिए न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाना, सुधार की मांग करना और कार्यप्रणाली की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है।
  • न्यायपालिका आलोचना से ऊपर नहीं है। यदि न्याय व्यवस्था में कमियाँ हैं, देरी है या जनता का विश्वास कम हो रहा है, तो उस पर खुली चर्चा और सुधार की मांग की जा सकती है।
  • कानून और न्याय व्यवस्था समय के साथ बदलनी चाहिए। पुराने सिद्धांतों को बिना वर्तमान परिस्थितियों के देखे लागू करना उचित नहीं; कानून को समाज के बदलावों के साथ विकसित होना चाहिए।
  • सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि विचारों की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा (free trade of ideas) लोकतंत्र की आत्मा है। केवल इसलिए आलोचना को दबाना कि वह न्यायपालिका के खिलाफ है, लोकतांत्रिक संस्थाओं को कठोर और असंवेदनशील बना सकता है। जब तक कोई वक्तव्य न्याय के प्रशासन में तत्काल और गंभीर बाधा न डाले, आलोचना को रोका नहीं जाना चाहिए।
    • संक्षेप में: – सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण यह है कि “जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कम हो रहा है”, “न्याय व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है”, या “अदालतों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाना” — ऐसे वक्तव्य अपने आप में अवमानना नहीं हैं, (संविधान पीठ द्वारा  भी यही सिद्धांत बरकरार रखा गया।)
  1. सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने(Bar Council of India v. High Court of Kerala, (2004) 6 SCC 311, Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344) में  माना —  — अवमानना कानून सबसे अधिक दुरुपयोग किया जाने वाला कानून है। चेतावनी दी — इसका उपयोग आलोचकों को चुप कराने के लिए नहीं किया जा सकता
    • सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं माना है कि अवमानना कानून भारत का सबसे अधिक गलत व्याख्या किया गया और सबसे अधिक दुरुपयोग किया गया कानून है। कानून की किसी भी शाखा का जितना दुरुपयोग और गलत व्याख्या अवमानना के क्षेत्र में हुई है — उतनी किसी और कानून की नहीं हुई।
    • और न्यायालय यहीं नहीं रुका। उसने स्पष्ट चेतावनी दी कि इस शक्ति का उपयोग कभी भी आलोचकों को चुप कराने, स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने, या वकालत के तरीकों को कुचलने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
    • अवमानना के लिए दंड देने की यह शक्ति केवल गंभीर मामलों में और बहुत संयम के साथ उपयोग की जानी चाहिए। यह शक्ति न्यायालय के पास होनी चाहिए — लेकिन इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि इसे कितनी बुद्धिमानी और संयम के साथ प्रयोग किया जाता है।
    • अवमानना — आलोचना दबाने का औजार नहीं है। आवाज़ चुप कराने का हथियार नहीं है। जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं है।
    • जो न्यायालय इस शक्ति का उपयोग लापरवाही से, व्यापक रूप से या प्रतिशोध की भावना से करता है — वह न्यायपालिका को मजबूत नहीं करता। वह उसे कमज़ोर करता है।
  1. सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला (Rajesh Kumar Singh v. High Court of Judicature of M.P., (2007) 14 SCC 126)
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कहा कि कुछ न्यायाधीश अवमानना कानून का इस्तेमाल सम्मान पाने के लिए करते हैं — लेकिन न्यायाधीशों को भी हर किसी की तरह अपने अच्छे कामों से और न्याय करके सम्मान कमाना होगा। वे अवमानना कानून की शक्ति के प्रदर्शन से सम्मान की माँग नहीं कर सकते।
    • न्यायाधीश का रोब उसकी कुर्सी से नहीं आता। उसके आदेश की ताकत से नहीं आता। अवमानना की धमकी से तो बिल्कुल नहीं आता।
    • सम्मान कमाया जाता है — न्याय देकर, निष्पक्षता से, और जनता के भरोसे से।
    • न्यायालय ने साफ कहा — “न्यायपालिका की शक्ति अवमानना के लिए दंड देने में नहीं है — बल्कि आम आदमी के विश्वास, भरोसे और आस्था में है।” और यह भी कहा — “यदि न्यायालय तकनीकी मुद्दों पर या किसी भी छोटी-मोटी बातों पर मनमाने तरीके से अवमानना की कार्यवाही शुरू करेंगे — तो उनका यह कदम जनता का न्यायपालिका पर से भरोसा उठा देगा।”
    • अवमानना का अनावश्यक और अति-उत्साही उपयोग न्यायपालिका की रक्षा नहीं करता। यह उसे कमज़ोर करता है। यह जनता का भरोसा तोड़ता है।
    • निष्कर्ष :- जो न्यायाधीश आलोचना को सुनकर न्यायव्यवस्था में सुधार लाने की बजाय — खुद को राजा समझकर अपनी ताकत दिखाने के लिए हर आलोचना पर अवमानना का हथियार उठा लेता है — वह न्यायपालिका को मजबूत नहीं करता, बल्कि उसकी नींव को खोखला करता है।
    • जो न्यायाधीश तकनीकी उल्लंघनों पर भी अति-संवेदनशीलता दिखाता है — वह सम्मान नहीं पाता, बल्कि जनता की नज़रों में न्यायपालिका की साख गिराता है।
    • और जो न्यायव्यवस्था जनता को त्वरित और वास्तविक न्याय नहीं दे पाती — उस पर से भरोसा उठ जाता है। न्यायालय जनता के उसी भरोसे पर टिके हैं। यह भरोसा किसी अवमानना के आदेश से वापस नहीं आता — बल्कि खुद गलत रहते हुए की गई अनुचित अवमानना की कार्यवाही जनता के विश्वास को और कमज़ोर करती है।
    • यह न्यायालय की जिम्मेदारी है कि वह अपने उचित आचरण से, निष्पक्ष न्यायिक फैसलों से और जनता की पीड़ा को समझकर — जनता का विश्वास कमाए। क्योंकि विश्वास माँगा नहीं जाता — अर्जित किया जाता है।
    • यह सब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है — अपने फैसलों में, अपने शब्दों में, अपने अधिकार से।
    • और इसे कहना अवमानना नहीं है। बल्कि — इसे कहने से रोकना — यही असली अवमानना है। जो न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित इन सुस्पष्ट कानूनी सिद्धांतों के विरुद्ध जाकर — मनमाने ढंग से, बिना किसी गंभीर कारण के — अवमानना की कार्यवाही करते हैं, वे स्वयं कानून की अवहेलना करते हैं। ऐसे न्यायाधीश Civil Contempt — धारा 2(b) और धारा 12 के अंतर्गत दंड के हकदार हैं — क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित विधि का उल्लंघन करना स्वयं में अवमानना है। कानून सबके लिए एक है — न्यायाधीश भी इसके अपवाद नहीं।
  1. सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ ने संविधान के अंतर्गत न्यायालयों की आलोचना के अधिकार के बारे में (State of M.P. v. Narmada Bachao Andolan, (2011) 7 SCC 639) फैसले में  यह ऐतिहासिक घोषणा की —
    • अदालतों के निर्णयों की बाहरी आलोचना, बहस और चर्चा — न्यायपालिका को जवाबदेह बनाने का एक संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त और पूर्णतः वैध तंत्र है।
    • यह बाहरी जाँच उतनी ही महत्वपूर्ण और उतनी ही वैध है — जितनी अपील, पुनर्विचार और खुली सुनवाई जैसी आंतरिक व्यवस्थाएँ।
    • इसलिए — जो पत्रकार किसी निर्णय की समीक्षा करता है, जो यूट्यूबर न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाता है, जो वकील न्यायिक फैसलों की आलोचना करता है, और जो नागरिक अदालत के फैसले पर बहस करता है — वे सब न्यायपालिका की जवाबदेही के उस संवैधानिक तंत्र का अनिवार्य हिस्सा हैं — जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने मान्यता दी है। यह अवमानना नहीं — यह संविधान प्रदत्त अधिकार है। और जो न्यायाधीश इस बाहरी आलोचना को अवमानना कहकर दबाने की कोशिश करता है — वह न केवल संविधान का उल्लंघन करता है, बल्कि उस जवाबदेही के तंत्र को नष्ट करता है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं स्थापित किया है।
  2. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Special Reference No. 1 of 1964, (1965) 1 SCR 413 : AIR 1965 SC 745 में सभी न्यायाधीशों को अवमानना (Contempt) की शक्ति के प्रयोग को लेकर गंभीर और ऐतिहासिक चेतावनी दी थी। संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि अवमानना की शक्ति असाधारण और व्यापक है, इसलिए उसका प्रयोग केवल अत्यंत सावधानी, विवेक, संयम और न्यायिक धैर्य के साथ ही किया जाना चाहिए।
    • संविधान पीठ ने आगाह किया कि क्रोध, नाराज़गी, आलोचना से असहज होकर या हर छोटी-मोटी टिप्पणी पर बार-बार अवमानना की कार्रवाई करना न्यायालय की गरिमा की रक्षा नहीं करता, बल्कि कई परिस्थितियों में उसकी प्रतिष्ठा को कमज़ोर कर सकता है। हर बात पर अवमानना की तलवार उठाना न्यायिक परिपक्वता की निशानी नहीं है। अदालतों का सम्मान भय, दंड या अवमानना की शक्ति से स्थायी रूप से स्थापित नहीं होता।
    • संविधान पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बुद्धिमान न्यायाधीश यह कभी नहीं भूलते कि उनके पद की वास्तविक गरिमा जनता से अर्जित सम्मान पर निर्भर करती है —  संविधान पीठ ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह कही कि न्यायाधीश का सम्मान उसकी दंड देने की शक्ति से नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की गुणवत्ता, निर्भीकता, निष्पक्षता और संयमित आचरण से अर्जित होता है। न कि आलोचकों को दंडित करने से।  
    • लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च सम्मान की अधिकारी है, किंतु सम्मान आदेश देकर नहीं लिया जा सकता, उसे न्यायपूर्ण आचरण से अर्जित करना पड़ता है। जनता का विश्वास अवमानना की सज़ाओं से नहीं, बल्कि इस भरोसे से बनता है कि न्यायालय निष्पक्ष, निर्भीक और आत्मसंयमित रहकर न्याय करेंगे।
    • अवमानना की शक्ति का अत्यधिक, आवेशपूर्ण या असंतुलित प्रयोग न्यायपालिका की गरिमा को सुरक्षित करने के बजाय स्वयं उसकी निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास पर प्रश्न खड़े कर सकता है। न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति दंड नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है।
    • अवमानना की शक्ति न्यायालय के पास एक असाधारण अधिकार है — यह शक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए दी गई है, न कि न्यायाधीशों की व्यक्तिगत संवेदनशीलता की ढाल बनने के लिए।
  3. “अदालतें इतनी नाजुक नहीं कि आलोचना से मुरझा जाएँ” — सुप्रीम कोर्ट -सुप्रीम कोर्ट ने Vishal Tiwari v. Union of India & Ors., 2025 INSC 647 में न्यायपालिका की आलोचना और अवमानना कानून के उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराए।
    • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि:“अदालतें इतनी नाजुक नहीं हैं कि हास्यास्पद या अविवेकपूर्ण बयानों से मुरझा जाएँ या उनकी गरिमा समाप्त हो जाए। ऐसे निरर्थक बयानों से जनता की नजरों में अदालतों की विश्वसनीयता आसानी से नहीं हिलती, भले ही ऐसा करने का प्रयास किया गया हो।”
    • सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अवमानना की कार्रवाई करने से इनकार करते हुए कहा कि हर आलोचना या अनुचित टिप्पणी पर दंडात्मक कार्रवाई आवश्यक नहीं होती। अदालतों की गरिमा केवल अवमानना की शक्ति से सुरक्षित नहीं रहती।
    • न्यायालय ने In Re: S. Mulgaonkar, AIR 1978 SC 727 का हवाला देते हुए दोहराया कि न्यायपालिका आलोचना से परे नहीं है। यदि आलोचना तथ्यात्मक रूप से विकृत या दुर्भावनापूर्ण हो तो उसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन फिर भी अवमानना की शक्ति का प्रयोग विवेक, संयम और न्यायिक धैर्य के साथ होना चाहिए।
    • सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
  • हर अवमानना पर सज़ा देना जरूरी नहीं है।
  • अदालतें स्वतंत्र प्रेस, निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक निर्भीकता और जनता के विश्वास जैसे संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखती हैं।
  • न्यायाधीशों की ताकत आलोचकों को दंडित करने में नहीं, बल्कि संयम और विवेक दिखाने में है।
  • अदालतों और न्यायाधीशों के “कंधे इतने मजबूत” होने चाहिए कि वे समझ सकें कि जनता स्वयं पहचान लेगी कि कौन-सी आलोचना निष्पक्ष है और कौन-सी दुर्भावनापूर्ण।
    • सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की वैधता और विश्वसनीयता का वास्तविक आधार जनता का विश्वास है, और यह विश्वास निष्पक्ष, पारदर्शी और निर्भीक निर्णयों से बनता है — न कि केवल अवमानना की कार्यवाही से।
  1. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ऐतिहासिक निर्णय (Regina v. Kopyto, [1987] O.J. No. 1052; (1987) 39 CCC (3d) 1)
    •  In  Regina v. Kopyto, [1987] O.J. No. 1052; (1987) 39 CCC (3d) 1),  it is ruled as under;

“Some criticism may be well founded, some suggestions for change worth adopting. But the courts are not fragile flowers that will wither in the hot heat of controversy. They need not fear criticism nor need they seek to sustain unnecessary barriers to complaints about their operations or decisions.”

  • “कुछ आलोचनाएँ सुआधारित हो सकती हैं, सुधार के कुछ सुझाव अपनाने योग्य हो सकते हैं। लेकिन अदालतें नाज़ुक फूल नहीं हैं जो विवाद की तेज़ गर्मी में मुरझा जाएँ। उन्हें आलोचना से डरने की ज़रूरत नहीं — और न ही उन्हें अपने कार्यों या निर्णयों के बारे में शिकायतों के रास्ते में अनावश्यक बाधाएँ खड़ी करने की कोशिश करनी चाहिए।”
  • इस निर्णय का सार — अदालतें इतनी सशक्त और इतनी दृढ़ हैं कि आलोचना की आँधी उन्हें हिला नहीं सकती। जो अदालत हर आलोचना पर अवमानना का हथियार उठाती है — वह अपनी कमज़ोरी प्रकट करती है, अपनी ताकत नहीं।
  • आलोचना से भागना न्यायपालिका की कायरता है। आलोचना को सुनना और उससे सुधार करना — न्यायपालिका की परिपक्वता है। और आलोचना के रास्ते में बाधाएँ खड़ी करना — लोकतंत्र के साथ विश्वासघात है।
  1. सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ के निर्णय In Re: S. Mulgaokar, (1978) 3 SCC 339 में न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर ने अवमानना (Contempt) की शक्ति के प्रयोग को लेकर छह महत्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए हैं ।
    • इन सिद्धांतों का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालतें आलोचना के प्रति असहिष्णु न बनें तथा अवमानना की शक्ति का प्रयोग केवल अपवादस्वरूप, सार्वजनिक हित में और अत्यंत संयम के साथ करें।चूँकि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट का है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत इसमें प्रतिपादित विधिक सिद्धांत देश की सभी अदालतों और न्यायाधीशों पर बाध्यकारी हैं.
    • इन सिद्धांतों का सार इस प्रकार है: अवमानना अंतिम उपाय है, पहली प्रतिक्रिया नहीं।
    • पहला सिद्धांत — अवमानना की शक्ति का संयमित और दुर्लभ प्रयोग :- न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि अवमानना की शक्ति का प्रयोग केवल तभी हो जब न्याय प्रशासन को वास्तविक और गंभीर खतरा हो। छोटी-मोटी आलोचनाओं, तकनीकी उल्लंघनों और मामूली टिप्पणियों को उदारतापूर्वक नज़रअंदाज़ किया जाना चाहिए।
    • न्यायालय ने इसके लिए एक अविस्मरणीय वाक्य कहा — “The dogs may bark, the caravan will pass.” “कुत्ते भौंकते रहें — काफिला आगे बढ़ता रहेगा।” अर्थात — न्यायाधीशों को आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए। जो न्यायाधीश हर भौंकने पर रुक जाता है — वह काफिले का नेतृत्व नहीं कर सकता।
    • सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा — “अदालत आसानी से नाराज़ होकर प्रतिक्रिया नहीं देगी।”
    • दूसरा सिद्धांत — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा में संतुलन :- स्वतंत्र आलोचना के संवैधानिक मूल्यों — जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है — और निर्भीक न्यायिक प्रक्रिया तथा उसकी अध्यक्षता करने वाले न्यायाधीश की आवश्यकता के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए। एक सुखद संतुलन बनाना होगा — जहाँ संदेह का लाभ उदारतापूर्वक न्यायाधीश के विरुद्ध दिया जाए, सीमांत विचलनों को नज़रअंदाज़ किया जाए — किंतु उन अवमाननाकर्ताओं पर कानून की सर्वोच्चता कठोरता से सिद्ध की जाए जो झगड़ालू, दुष्ट, अश्रांत और दुर्भावनापूर्ण हों — चाहे वे शक्तिशाली प्रेस हो, निहित स्वार्थों का गिरोह हो, या प्रतिष्ठानवादी व्यवस्था के अनुभवी स्तंभकार हों।और यह इसलिए नहीं कि न्यायाधीश — जो एक उच्च मूल्य का मानवीय प्रतीक है — किसी राजसी विशेषाधिकार से व्यक्तिगत रूप से सुरक्षित है — बल्कि इसलिए कि — “तुम — अवमाननाकर्ता — चाहे कितने भी ऊँचे हो — कानून — जो जनता की न्याय की अभिव्यक्ति है — तुमसे ऊपर है।”
    • न्यायिक साहस अहंकारी शक्ति पर विजय पाता है — ठीक वैसे ही जैसे न्यायिक उदारता भटके हुए या अतिशयोक्तिपूर्ण आलोचकों को क्षमा कर देती है।
    • वास्तव में — किसी न्यायाधीश की निष्पक्ष आलोचना — चाहे वह कितनी भी तीखी हो — अपराध नहीं, बल्कि एक आवश्यक अधिकार है। लोकतंत्र में यह अधिकार दोहरा आशीर्वाद है — क्योंकि यह उसे भी आशीर्वाद देता है जो आलोचना करता है — और उसे भी जो उसे सुनता है। जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — उचित रूप से प्रयोग की जाए — और जनहित की सेवा करे — वहाँ सार्वजनिक न्याय उसे संवैधानिक रूप से न तो दबा सकता है और न ही जंजीरों में जकड़ सकता है।
    • एक स्वतंत्र जनता ही निर्भीक न्याय की अंतिम गारंटर है। यही हमारे संविधान की आधारशिला है। यही हमारी अवमानना शक्ति की कसौटी है — जो स्वतंत्र वाणी और निष्पक्ष न्याय के संगम पर आधारित है — और यही हमारे मूल कानून का मर्म है।
    • अवमानना के संदर्भ में सामाजिक दर्शन और विधि-दर्शन को एकीकृत रूप से देखें तो —यहाँ कोई वैचारिक विरोध नहीं है — बल्कि एक नाजुक संतुलन है — और वह रेखा न्यायिक विवेक खींचता है।
    • तीसरा सिद्धांत — न्यायाधीश का व्यक्तिगत अपमान और न्याय व्यवस्था में बाधा — दोनों अलग हैं – किसी न्यायाधीश पर व्यक्तिगत टिप्पणी स्वतः अवमानना नहीं बनती। अवमानना तभी होगी जब उससे न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो या जनता का न्यायव्यवस्था पर विश्वास नष्ट हो। व्यक्तिगत मानहानि का उपचार सामान्य मानहानि कानून से होगा — अवमानना कानून से नहीं।
    • चौथा सिद्धांत — न्यायाधीश के निजी जीवन पर टिप्पणी हर बार अवमानना नहीं- यदि आलोचना न्यायाधीश के न्यायिक कार्य से नहीं, बल्कि उनके निजी व्यक्तित्व से जुड़ी है — तो उसका उपचार सामान्य कानून के अंतर्गत होगा। हर अपमानजनक शब्द अवमानना नहीं बन जाता।
    • पाँचवाँ सिद्धांत — न्यायाधीश अति-संवेदनशील न बनें – सुप्रीम कोर्ट ने सीधे शब्दों में चेतावनी दी — न्यायाधीश अति-संवेदनशील (Hypersensitive) न बनें। आलोचना, अतिशयोक्ति या कठोर टिप्पणी पर तुरंत दंडात्मक प्रतिक्रिया देना न्यायाधीश की कमज़ोरी की निशानी है — शक्ति की नहीं। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में गरिमापूर्ण उपेक्षा और न्यायिक संयम — अवमानना की कार्यवाही से कहीं अधिक प्रभावी उत्तर है।
    • छठा सिद्धांत — केवल गंभीर, दुर्भावनापूर्ण और न्याय व्यवस्था को नष्ट करने वाले मामलों में कठोर कार्रवाई – यदि हमला अश्लील, धमकीपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण हो और न्याय व्यवस्था की जड़ें कमजोर करने के स्पष्ट इरादे से किया गया हो — तभी और केवल तभी — अवमानना की कठोर शक्ति का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में किया जाना चाहिए।
  2. Mulgaokar कसौटी पर Vishal Tiwari फैसला — 2025 –
    • इन्हीं छह सिद्धांतों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने Vishal Tiwari v. Union of India & Ors., 2025 INSC 647 में एक और ऐतिहासिक उद्घोषणा की —”अदालतें फूल की तरह नाजुक नहीं हैं कि आलोचना से मुरझा जाएँ।”
    • न्यायालय ने साफ कहा कि हास्यास्पद, अविवेकपूर्ण या निरर्थक बयानों से जनता की नजरों में अदालतों की विश्वसनीयता नहीं हिलती। न्यायाधीशों और अदालतों की प्रतिष्ठा इतनी कमज़ोर नहीं कि हर आलोचना से उस पर आँच आए। न्यायालय ने ऐसे मामलों में अवमानना की कार्यवाही करने से साफ इनकार करते हुए कहा — “अदालतों के कंधे इतने मजबूत होने चाहिए कि जनता खुद पहचान ले — कौन-सी आलोचना निष्पक्ष है और कौन-सी दुर्भावनापूर्ण।”
    • निष्कर्ष — Mulgaokar का अमर संदेश – सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण खंडपीठ ने जो कसौटी दी — उसका सार तीन वाक्यों में है — “कुत्ते भौंकते रहें — काफिला आगे बढ़ता रहेगा।” न्यायाधीश योग की तरह सहनशीलता विकसित करें — आलोचना से विचलित न हों। अदालत की असली ताकत अवमानना के आदेश में नहीं — जनता के उस अटूट विश्वास में है जो निष्पक्ष न्याय से अर्जित होता है।
    • जो न्यायाधीश इस कसौटी को नज़रअंदाज़ करके मनमाने ढंग से अवमानना की कार्यवाही करते हैं — वे न केवल सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी कानून का उल्लंघन करते हैं, बल्कि उस न्यायिक परंपरा को भी आघात पहुँचाते हैं जो न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर जैसे महान न्यायाधीशों ने दशकों की साधना से गढ़ी है।

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