दोषी न्यायाधीशों के विरुद्ध विभागीय (Disciplinary) कार्रवाई के अतिरिक्त, परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक मुकदमे, दीवानी हर्जाने के दावे तथा न्यायालय की अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही भी हो सकती है। विभिन्न मामलों में न्यायाधीशों को कारावास, निलंबन, सेवा से हटाने तथा अन्य दंडात्मक एवं अनुशासनात्मक कार्रवाइयों का भी सामना करना पड़ा है।
सबसे प्रमुख उदाहरण In Re: C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1 का है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तत्कालीन कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का दोषी ठहराते हुए छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी। यह निर्णय इस सिद्धांत की पुष्टि करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) का अर्थ न्यायिक दण्डमुक्ति (Judicial Impunity) नहीं है और न्यायाधीश भी संविधान तथा कानून के अधीन हैं।
Mohammed Nazer M.P., 2022 SCC OnLine Ker 7434; Raman Lal vs. State of Rajasthan 2001 CRI. L. J. 800, Nirbhay Singh Suliya v State of Madhya Pradesh 2026 INSC 7, In Re M.P. Dwivedi, (1996) 4 SCC 152; Barad Kanta Mishra v. State of Orissa, (1973) 1 SCC 446; Supdt. of Central Excise v. Somabhai Ranchhodhbhai Patel, (2001) 5 SCC 65; R.R. Parekh v. High Court of Gujarat, (2016) 14 SCC 1; Shrirang Waghmare v. State of Maharashtra, (2019) 9 SCC 144; तथा Yogesh Waman Athavale v. Vikram Abasaheb Jadhav, 2020 SCC OnLine Bom 3443 सहित अनेक निर्णयों में न्यायिक जवाबदेही, अनुशासनात्मक कार्यवाही तथा विधि के शासन (Rule of Law) के सिद्धांतों को सुदृढ़ किया गया है।
इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा का वकीलों एवं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को संबोधन
अब तक आम धारणा यही रही है कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फँसाया जाता है, गैरकानूनी रूप से गिरफ्तार किया जाता है या वर्षों तक जेल में रखा जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल पुलिस या जांच एजेंसियों की होती है। लेकिन संवैधानिक न्यायशास्त्र (Constitutional Jurisprudence) अब बहुत आगे बढ़ चुका है। आज न्यायालयों के अनेक निर्णय यह स्पष्ट कर चुके हैं कि न्याय प्रशासन (Administration of Justice) से जुड़े प्रत्येक सार्वजनिक पदाधिकारी—चाहे वह पुलिस अधिकारी हो, सरकारी वकील हो या उपयुक्त मामलों में न्यायाधीश ही क्यों न हों—सभी विधि के शासन (Rule of Law) के अधीन उत्तरदायी हैं।
“आज तक आम धारणा यही रही है कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मुकदमे में फँसाया जाता है, तो केवल पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। लेकिन न्यायालयों के हालिया निर्णय यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि यदि कोई न्यायिक अधिकारी कानून की अनदेखी करते हुए किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध संज्ञान लेता है, जिसे कानूनन अभियोजित ही नहीं किया जा सकता, या डिस्चार्ज किए जाने योग्य व्यक्ति को अनावश्यक रूप से ट्रायल में भेज देता है, तो उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रश्न भी उठ सकता है।
न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को कानून के विपरीत आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ता है, तो संबंधित न्यायिक अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है।
Sunil Pandit v. State of Bihar, 2024 SCC OnLine Pat 959 में न्यायमूर्ति Bibek Chaudhuri ने उस न्यायिक मजिस्ट्रेट, जिन्होंने विधि के विपरीत संज्ञान लिया था, तथा उस अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जिन्होंने पुनरीक्षण (Revision) में उस आदेश की पुष्टि कर दी थी, दोनों को याचिकाकर्ता को प्रतीकात्मक (Token) मुआवजे के रूप में ₹100-₹100 व्यक्तिगत रूप से अदा करने का निर्देश दिया।
मामले में याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत मुकदमा चलाया गया था। जबकि शिकायत में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि वह पति का रिश्तेदार नहीं था, बल्कि केवल अन्य आरोपियों का “सलाहकार” (Advisor) था। इसके बावजूद उसके विरुद्ध संज्ञान लिया गया, मुकदमा चलाया गया और उसे विभिन्न अवसरों पर जेल भी जाना पड़ा।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को ऐसे आपराधिक मुकदमे की पीड़ा, सामाजिक अपमान और हिरासत का सामना करना पड़ा जो उसके विरुद्ध कानूनन बनाए रखने योग्य ही नहीं था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ₹100-₹100 का मुआवजा वास्तविक क्षतिपूर्ति नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक चेतावनी (Token Compensation) है, जिससे न्यायिक अधिकारियों को यह स्मरण कराया जा सके कि संज्ञान लेने से पहले शिकायत और उपलब्ध सामग्री का सावधानीपूर्वक परीक्षण करना उनका अनिवार्य दायित्व है।
सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण ऐतिहासिक निर्णय McLeod v. St. Aubyn, [1899] AC 549 का है। इस मामले में Supreme Court of St. Vincent के “सुप्रीम कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश” St. Aubyn ने अधिवक्ता McLeod को कथित अवमानना के लिए 14 दिनों के कारावास की सजा दी थी। Privy Council ने उस आदेश को रद्द कर अपील स्वीकार की। विशेष रूप से, गलत आदेश पारित करने वाले “सुप्रीम कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश” स्वयं मामले में प्रतिवादी थे और Privy Council ने उनके विरुद्ध अपील का खर्च—costs—अदा करने का आदेश दिया। यह निर्णय इस ऐतिहासिक सिद्धांत को रेखांकित करता है कि सर्वोच्च न्यायिक पद पर बैठा न्यायाधीश भी कानून से ऊपर नहीं है और उसके गैरकानूनी न्यायिक आदेश से पीड़ित व्यक्ति को हुई हानि के मामले में व्यक्तिगत आर्थिक जवाबदेही का आदेश पारित किया जा सकता है।
एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि Ankush Maruti Shinde v. State of Maharashtra, (2019) 15 SCC 470 भी न्यायिक त्रुटियों और झूठे अभियोजन के कारण निर्दोष व्यक्तियों को हुए गंभीर अन्याय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस मामले में छह गरीब मजदूरों को हत्या के एक मामले में झूठा फँसाया गया था। पहले सर्वोच्च न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने उनकी दोषसिद्धि और मृत्युदंड की पुष्टि कर दी थी। बाद में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने संपूर्ण साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल रहा, दोषसिद्धि और मृत्युदंड दोनों को निरस्त कर दिया तथा सभी छह अभियुक्तों को बरी कर दिया।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह मानते हुए कि इन निर्दोष व्यक्तियों ने वर्षों तक कारावास, मृत्युदंड की यातना तथा अपने मौलिक अधिकारों के गंभीर उल्लंघन का सामना किया, महाराष्ट्र सरकार को प्रत्येक निर्दोष व्यक्ति को ₹50 लाख की क्षतिपूर्ति (Compensation) देने का निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि जब राज्य की आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलताओं के कारण निर्दोष नागरिकों को असाधारण पीड़ा और अन्याय सहना पड़ता है, तब संविधान के अनुच्छेद 21 के संरक्षण के लिए उपयुक्त प्रतिकर (Constitutional Compensation) प्रदान करना न्यायालय का दायित्व है।
एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि Ramesh Lawrence Maharaj v. Attorney General of Trinidad & Tobago, (1978) 2 WLR 902 तथा Walmik Bobde v. State of Maharashtra, 2001 ALL MR (Cri) 1731 जैसे मामलों में न्यायालयों ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि यदि किसी न्यायाधीश के गैरकानूनी न्यायिक आदेश के कारण किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उसके लिए राज्य उत्तरदायी हो सकता है। इन निर्णयों में यह माना गया कि न्यायाधीश राज्य के न्यायिक तंत्र का अभिन्न अंग हैं और उनके आधिकारिक कृत्यों के कारण नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होने पर राज्य संवैधानिक मुआवजा (Constitutional Compensation) देने के दायित्व से बच नहीं सकता। परिणामस्वरूप, पीड़ित को मुआवजा देने के आदेश पारित किए गए।
उन्होंने कहा कि इन निर्णयों का मूल सिद्धांत यह है कि विधि के शासन (Rule of Law) के अंतर्गत किसी भी निर्दोष नागरिक को गैरकानूनी न्यायिक आदेश, अवैध हिरासत, गलत अभियोजन या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का शिकार होने पर प्रभावी प्रतिकर (Effective Remedy) मिलना चाहिए। राज्य द्वारा मुआवजा दिए जाने के बाद, कानून के अनुसार उपलब्ध उपायों के तहत संबंधित दोषी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही का प्रश्न भी उठाया जा सकता है।
एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि Mahabir v. State of Haryana, 2025 SCC OnLine SC 184 का निर्णय स्पष्ट करता है कि सरकारी वकीलों (Public Prosecutors) की गलती भी कानून में माफ नहीं की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लोक अभियोजक का दायित्व केवल दोषसिद्धि सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि न्यायालय के समक्ष सही और बाध्यकारी कानून प्रस्तुत कर उसकी निष्पक्ष सहायता करना है। लोक अभियोजक की इस चूक के कारण निर्दोष व्यक्तियों को दोषसिद्धि और कारावास का सामना करना पड़ा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार को तीनों निर्दोष अपीलकर्ताओं को प्रत्येकी ₹5 लाख मुआवजा देने का निर्देश देते हुए कहा कि राज्य अपने नियुक्त लोक अभियोजकों के कृत्यों और चूकों के लिए उत्तरदायी है।
अॅड. निलेश ओझा ने आगे कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने Nirbhay Singh Suliya v. State of Madhya Pradesh, 2026 INSC 7 के निर्णय में पुनः स्पष्ट किया है कि न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) विधि के शासन (Rule of Law) का अभिन्न अंग है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध दुराचार (Misconduct) की शिकायत प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सही पाई जाती है, तो उसके विरुद्ध तत्काल विभागीय कार्यवाही (Disciplinary Proceedings) प्रारंभ की जानी चाहिए और आरोप सिद्ध होने पर किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि जिन उपयुक्त मामलों में किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध आपराधिक अभियोजन (Criminal Prosecution) आवश्यक हो, वहाँ संबंधित उच्च न्यायालय को ऐसी कार्यवाही प्रारंभ करने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि को धूमिल करने वाली ‘काली भेड़ों’ (Black Sheep) को न्यायपालिका से बाहर करने का यही एक प्रभावी उपाय है।
केवल यही निर्णय नहीं, कई न्यायालयों ने अपनाया है यही सिद्धांत
यह कोई अकेला निर्णय नहीं है। उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने समय-समय पर यह सिद्धांत स्थापित किया है कि यदि किसी नागरिक को अवैध गिरफ्तारी, गैरकानूनी हिरासत, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) अथवा कानून के विपरीत न्यायिक कार्यवाही के कारण मौलिक अधिकारों का हनन झेलना पड़े, तो उसे सार्वजनिक विधि (Public Law) के तहत संवैधानिक न्यायालयों द्वारा मुआवजा दिया जा सकता है।
इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के अनेक निर्णय यह स्थापित कर चुके हैं कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को गैरकानूनी गिरफ्तारी, झूठे अभियोजन, अवैध हिरासत या कानून के विपरीत आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ता है, तो उसे केवल संवैधानिक न्यायालय से अंतरिम मुआवजा (Public Law Compensation) ही नहीं मिल सकता, बल्कि वह अलग से दीवानी न्यायालय में हर्जाने (Damages) का दावा भी कर सकता है।
उन्होंने कहा कि S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews, (2018) 10 SCC 804 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसरो के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. नंबी नारायणन को अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए केरल सरकार को ₹50 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया। साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मुआवजा अंतिम नहीं है और यदि याचिकाकर्ता चाहे तो अधिक मुआवजे के लिए अलग से दीवानी वाद (Civil Suit) जारी रख सकता है। न्यायालय ने उस वाद के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की।
इसी सिद्धांत को बॉम्बे हाईकोर्ट ने Veena Sippy v. Narayan Dumbre, 2012 SCC OnLine Bom 339 में भी दोहराया। उस मामले में न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को याचिकाकर्ता को ₹2.50 लाख का मुआवजा, उस पर 8% वार्षिक ब्याज तथा ₹25,000 की लागत (Costs) अदा करने का निर्देश दिया।
महत्वपूर्ण रूप से, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
- राज्य सरकार पीड़ित को मुआवजा देने के बाद दोषी अधिकारियों से उक्त राशि की वसूली (Recovery) करने के लिए स्वतंत्र होगी, यदि वह ऐसा उचित समझे।
- इसके अतिरिक्त, पीड़ित को यह स्वतंत्रता भी रहेगी कि वह अलग से नियमित दीवानी वाद (Civil Suit) दायर कर वास्तविक नुकसान, मानसिक पीड़ा, प्रतिष्ठा की क्षति तथा अन्य हानियों के लिए अतिरिक्त मुआवजा एवं हर्जाना (Damages) प्राप्त करने का दावा करे।
लाखों या करोड़ों रुपये के हर्जाने का भी दावा संभव
रिट याचिका में दिया गया संवैधानिक मुआवजा अंतिम उपचार नहीं होता। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को गैरकानूनी मुकदमे, गलत अभियोजन, न्यायिक त्रुटि, अवैध हिरासत या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के कारण गंभीर आर्थिक, मानसिक अथवा सामाजिक क्षति हुई है, तो वह सक्षम दीवानी न्यायालय में हर्जाने (Damages) के लिए स्वतंत्र वाद दायर कर तथ्यों एवं विधि के आधार पर लाखों अथवा करोड़ों रुपये तक का दावा कर सकता है।
इन निर्णयों से यह सिद्धांत और अधिक स्पष्ट होता है कि न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही, कानून की अनदेखी अथवा अधिकारों के उल्लंघन के कारण निर्दोष नागरिकों को होने वाली क्षति के लिए केवल राज्य ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी निर्धारित की जा सकती है। साथ ही, संवैधानिक मुआवजा और दीवानी हर्जाना—दोनों उपचार एक-दूसरे से स्वतंत्र हो सकते हैं।
एडवोकेट निलेश ओझा ने आगे कहा कि किसी भी परिस्थिति में न्यायपालिका, पुलिस, लोक अभियोजन तंत्र अथवा किसी अन्य सार्वजनिक संस्था की छवि धूमिल करने या उन्हें कमजोर करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। आज भी देश में बड़ी संख्या में अत्यंत ईमानदार, निष्पक्ष, कर्तव्यनिष्ठ और संविधान के प्रति समर्पित न्यायाधीश, पुलिस अधिकारी तथा सरकारी वकील अपनी जिम्मेदारियों का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। इन संस्थाओं को मजबूत बनाना देश, न्याय व्यवस्था और प्रत्येक नागरिक के हित में है। इसलिए इन संस्थाओं को अधिक सक्षम, पारदर्शी और जवाबदेह बनाकर उनमें जनता का विश्वास और अधिक सुदृढ़ करने के लिए हम सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
अपना सुप्रसिद्ध सिद्धांत दोहराते हुए एडवोकेट ओझा ने कहा—“यह मत देखो कि कौन सही है, बल्कि यह देखो कि क्या सही है।” उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति, पद, संस्था या विचारधारा के प्रति अंध-समर्थन या अंध-विरोध के बजाय प्रत्येक नागरिक, अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता को केवल संविधान, कानून, तथ्यों और न्याय के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।
साथ ही, यह भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए कि प्रत्येक सार्वजनिक पदाधिकारी—चाहे वह न्यायाधीश हो, सरकारी वकील हो, पुलिस अधिकारी हो अथवा कोई अन्य अधिकारी—संविधान और कानून के अधीन है। जिस प्रकार कोई सामान्य नागरिक कानून का उल्लंघन करने पर दंडित होता है, उसी प्रकार कानून का उल्लंघन करने वाले किसी भी सार्वजनिक पदाधिकारी के विरुद्ध भी निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए तथा दोष सिद्ध होने पर उसे कानून के अनुसार उचित दंड अवश्य मिलना चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Judicial Independence) लोकतंत्र का मूल आधार है, किंतु न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायिक दण्डमुक्ति (Judicial Impunity) नहीं हो सकता। न्यायपालिका की गरिमा, विश्वसनीयता और जनता का विश्वास तभी अक्षुण्ण रह सकता है, जब न्यायिक स्वतंत्रता के साथ-साथ न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) भी समान रूप से सुनिश्चित की जाए।
यदि किसी निर्दोष नागरिक को त्रुटिपूर्ण जांच, झूठे अभियोजन, गैरकानूनी न्यायिक आदेश या न्यायिक दुराचार के कारण वर्षों तक कारावास, सामाजिक अपमान और मानसिक पीड़ा सहनी पड़े तथा उसके लिए किसी की भी जवाबदेही निर्धारित न हो, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 द्वारा प्रदत्त समानता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के साथ गंभीर अन्याय होगा।
एडवोकेट ओझा ने सभी अधिवक्ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिकों से आह्वान किया कि वे मिलकर ऐसी न्याय व्यवस्था के निर्माण के लिए कार्य करें, जहाँ निर्दोष का संरक्षण हो, दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिले, पीड़ितों को प्रभावी न्याय और समुचित क्षतिपूर्ति प्राप्त हो तथा प्रत्येक सार्वजनिक पदाधिकारी संविधान, कानून और विधि के शासन (Rule of Law) के प्रति पूर्णतः उत्तरदायी रहे।
उन्होंने अंत में कहा कि न्याय का अर्थ केवल दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी निर्दोष के साथ अन्याय न हो। यदि दोषी दंड से बच जाते हैं तो कानून का भय कमजोर पड़ता है, और यदि निर्दोष व्यक्ति अन्याय का शिकार होकर भी न्याय से वंचित रह जाता है, तो न्यायपालिका में जनता का विश्वास डगमगा जाता है। इसलिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना ही सच्चे संवैधानिक लोकतंत्र और विधि के शासन की पहचान है।