दिशा सालियन प्रकरण में झूठा शपथपत्र दाखिल करने के आरोपों से आदित्य ठाकरे गंभीर मुश्किलों में? 24 अगस्त को हाईकोर्ट में होगी निर्णायक सुनवाई; कथित झूठे शपथपत्र के मामले में आपराधिक मुकदमा और न्यायिक हिरासत की मांग पर सुनवाई। स्वयं दायर किया गया हस्तक्षेप आवेदन अब आदित्य ठाकरे के लिए गले की फांस बन गया। CBI ने ही आदित्य ठाकरे के कथित झूठ का पर्दाफाश किया।

आदित्य ठाकरे ने दिशा सालियन प्रकरण में दावा किया कि CBI ने उन्हें क्लीन चिट (दोषमुक्त) दे दी है। किंतु CBI ने लिखित स्पष्टीकरण देकर स्पष्ट किया कि उसने दिशा सालियन मामले की जांच ही नहीं की है और न ही आदित्य ठाकरे को किसी प्रकार की क्लीन चिट दी है। इसके बाद यह दावा किया गया कि आदित्य ठाकरे के शपथपत्र में किए गए दावे झूठे साबित हो गए।

इसके अलावा, MP/MLA मामलों की त्वरित सुनवाई से बचने के लिए शपथपत्र में अपना व्यवसाय केवल व्यवसायी” (Businessman) बताया गया तथा स्वयं विधायक (MLA) होने की पहचान छिपाई गई, जिससे शपथपत्र में कथित असत्य का एक और उदाहरण सामने आया है.

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जो कोई भी न्यायालय को गुमराह करने के उद्देश्य से झूठा शपथपत्र दाखिल करता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है अथवा झूठे या फर्जी दस्तावेज तैयार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करता है, वह केवल न्यायालय ही नहीं बल्कि विपक्षी पक्ष के साथ भी धोखाधड़ी (Fraud upon the Court) करता है। इस प्रकार का कृत्य न्याय प्रशासन की जड़ों पर प्रहार करता है तथा कानून के शासन और समाज—दोनों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।

ऐसे आरोपी के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई करना न्यायालय का कर्तव्य है। ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अभियोजन चलाने का आदेश न देना न्यायालय द्वारा अपने संवैधानिक एवं विधिक दायित्व का निर्वहन न करने के समान होगा। अपराध करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करना न्याय व्यवस्था की समाज के प्रति जिम्मेदारी है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अपराध करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई करना समाज की एक अनिवार्य आवश्यकता है। समाज यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई अपराधी अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच निकले। अन्यथा, यदि अपराधियों को खुलेआम घूमने और कानून से बच निकलने दिया गया, तो समाज में सामाजिक प्रदूषण जैसी घातक स्थिति उत्पन्न होगी, जो तो वांछनीय है और ही स्वीकार्य।

कानून से ऊपर कोई नहीं है। चाहे अपराध करने वाला व्यक्ति कोई सामान्य नागरिक हो, पुलिस अधिकारी हो, अधिवक्ता हो, लोक अभियोजक हो या कोई अन्य लोक सेवक, ऐसे कृत्य के लिए कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई करते हुए उसके विरुद्ध आपराधिक अभियोजन चलाया जाना आवश्यक है।

ABCD v. Union of India, (2020) 2 SCC 52; Sundar v. State, 2023 SCC OnLine SC 310; State of Maharashtra v. Mangesh Chavan, 2020 SCC OnLine Bom 672; Koppala Venkataswami v. Satrasala Lakshminarayana Chetti, AIR 1959 AP 204; Naveen Singh v. State of U.P., (2021) 6 SCC 191; Ashok Kumar Sarogi v. State of Maharashtra, 2016 ALL MR (Cri) 3400; K. Rama Reddy v. State of A.P., 1997 SCC OnLine AP 1210; Kusha Duruka v. State of Odisha, (2024) 4 SCC 432.

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि के अनुसार, FIR दर्ज कराने अथवा CBI जांच की मांग करने वाली याचिका में किसी आरोपी या संभावित आरोपी को हस्तक्षेप (Intervention) करने का कोई अधिकार नहीं है। आदित्य ठाकरे द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन के समान ही एक हस्तक्षेप आवेदन सांसद श्री अभिषेक बनर्जी (पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे) ने भी दायर किया था। किंतु कलकत्ता हाईकोर्ट ने उक्त हस्तक्षेप आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि किसी आरोपी अथवा संभावित आरोपी को जांच संबंधी कार्यवाही में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इतना ही नहीं, ऐसा आवेदन दायर करने पर हाईकोर्ट ने अभिषेक बनर्जी पर ₹50 लाख का भारी जुर्माना (Costs) भी लगाया। याचिकाकर्ता का कहना है कि आदित्य ठाकरे द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन भी इसी विधिक सिद्धांत से पूर्णतः आच्छादित है और इसलिए उसे भी खारिज किया जाना चाहिए। (Soumen Nandy v. State of West Bengal & Ors., 2023 SCC OnLine Cal 1191).

दिशा सालियन मृत्यु प्रकरण की न्यायिक लड़ाई अब अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को दोपहर 3 बजे सुनवाई निर्धारित करते हुए आदित्य ठाकरे के वकीलों को उनके Intervention Application (हस्तक्षेप आवेदन) तथा दिशा सालियन के पिता सतीश सालियन द्वारा दायर कथित झूठे शपथपत्र (False Affidavit) और न्यायालय के साथ धोखाधड़ी (Fraud upon the Court) संबंधी आवेदन पर बहस के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए हैं।

इस सुनवाई में केवल यह प्रश्न नहीं होगा कि हस्तक्षेप आवेदन सुनवाई योग्य है या नहीं, बल्कि यह भी तय होना है कि क्या न्यायालय को गुमराह करने के उद्देश्य से कथित रूप से झूठा शपथपत्र दाखिल किया गया और यदि ऐसा पाया जाता है तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई तथा न्यायिक हिरासत के आदेश दिए जाने चाहिए या नहीं।

सतीश सालियन का गंभीर आरोपन्यायालय को जानबूझकर गुमराह किया गया

सतीश सालियन द्वारा दायर IA No. 2393 of 2025 में आरोप लगाया गया है कि आदित्य ठाकरे द्वारा न्यायालय में दाखिल किया गया शपथपत्र वस्तुनिष्ठ रूप से झूठा है तथा उसी के आधार पर दायर किया गया हस्तक्षेप आवेदन टिक नहीं सकता। इसलिए उनके विरुद्ध झूठा शपथपत्र दाखिल करने के अपराध में आपराधिक कार्रवाई प्रारंभ कर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजने की मांग की गई है। इस आवेदन में संबंधित अधिवक्ताओं की भूमिका का भी उल्लेख किए जाने की बात कही गई है।

 

मुख्य आरोप क्या हैं?

याचिका के अनुसार आदित्य ठाकरे के शपथपत्र में किए गए प्रमुख कथित झूठे दावे इस प्रकार हैं—

उन्होंने न्यायालय में दावा किया कि CBI और बिहार पुलिस ने उन्हें दिशा सालियन प्रकरण में क्लीन चिट दे दी है, इसलिए FIR दर्ज करने अथवा CBI जांच की मांग करने वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

किंतु याचिका के अनुसार CBI ने अपने आधिकारिक प्रेस नोट में स्पष्ट किया था कि उसने दिशा सालियन मामले की जांच ही नहीं की है और किसी भी व्यक्ति को क्लीन चिट नहीं दी है। इसलिए न्यायालय में किया गया यह दावा तथ्य के विपरीत होने का आरोप लगाया गया है।

शपथपत्र में अपना व्यवसाय “Businessman” बताते हुए यह तथ्य कथित रूप से जानबूझकर छिपाया गया कि वे एक विधायक (MLA) हैं। याचिका के अनुसार ऐसा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सांसदों एवं विधायकों के विरुद्ध लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई संबंधी निर्देशों के प्रभाव से बचने के उद्देश्य से किया गया।

इसके अतिरिक्त गलत आयु बताने तथा अन्य अनेक तथ्यात्मक विसंगतियों का भी आरोप लगाया गया है। “अपना ही आवेदन, लेकिन एक वर्ष से सुनवाई टालने का आरोप” 24 अगस्त पर सबकी निगाहें

 

24 अगस्त की सुनवाई इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकती है। हस्तक्षेप आवेदन की वैधता, कथित झूठे शपथपत्र के आरोप, न्यायालय को गुमराह करने के आरोप तथा आगे की आपराधिक कार्रवाई के संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट क्या रुख अपनाता है, इस पर पूरे राज्य की नजरें टिकी हुई हैं।

याचिकाकर्ता का कहना है कि झूठे शपथपत्र संबंधी आवेदन दायर होने के बाद से लगभग एक वर्ष से आदित्य ठाकरे और उनके अधिवक्ता स्वयं उनके द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन की प्रभावी सुनवाई से बचते रहे हैं।

याचिकाकर्ता का दावा है कि जो आवेदन शुरुआत में एक कानूनी रणनीति माना जा रहा था, वही अब गंभीर आपराधिक और न्यायिक परिणामों का कारण बन सकता है। उनके अनुसार जो कभी “Legal Adventure” था, वह अब “Legal Misadventure” में बदल चुका है।

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