लंबित विवाद पर सार्वजनिक टिप्पणी, हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली कथित टिप्पणी और आरोपियों को अप्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने का संदेश देने का आरोप; न्यायिक मर्यादा, जजेज एथिक्स कोड तथा सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के उल्लंघन का हवाला देते हुए एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय ने जस्टिस उज्जल भुइयां को भेजा विस्तृत कानूनी नोटिस।
हाल ही में एडवोकेट उपाध्याय ने न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) यशवंत वर्मा के विरुद्ध एफआईआर दर्ज न किए जाने को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका भी दायर की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उस याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है। इससे पहले भी एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ को उनके एक सार्वजनिक वक्तव्य के संबंध में कानूनी नोटिस भेज चुके हैं। उस नोटिस में यह आरोप लगाया गया था कि गणेश पूजा के संदर्भ में की गई उनकी टिप्पणी से करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश से अपेक्षित न्यायिक मर्यादा एवं सार्वजनिक संयम के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। इसके अतिरिक्त, एडवोकेट उपाध्याय पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के पुत्र एवं वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ तथा सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (सेवानिवृत्त) मार्कंडेय काटजू को भी उनके सार्वजनिक वक्तव्यों के संबंध में कानूनी नोटिस भेज चुके हैं।
कई विधि विशेषज्ञों का मत है कि एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय द्वारा जारी किए जाने वाले कानूनी नोटिस, याचिकाएँ और अन्य विधिक दस्तावेज सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्णयों तथा लागू वैधानिक प्रावधानों के गहन अध्ययन पर आधारित होते हैं। उनके अनुसार, इन्हीं कारणों से ऐसे नोटिसों और याचिकाओं में उठाए गए विधिक प्रश्नों का प्रभावी उत्तर देना या उनका विधिक प्रतिवाद करना आसान नहीं होता।
GenZ Lawyers Association के एडवोकेट आयुष तिवारी ने बताया कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन के एक सार्वजनिक भाषण के संबंध में भी आपराधिक अभियोजन सहित अन्य सभी वैधानिक कानूनी कार्यवाही शुरू करने पर गंभीरता से विचार कर रही है और इस संबंध में आवश्यक कानूनी प्रक्रिया जारी है। तिवारी का आरोप है कि उक्त भाषण में मुगल शासक अकबर का ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत महिमामंडन किया गया तथा उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज से भी अधिक महान और अधिक धर्मनिरपेक्ष शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता और करोड़ों छत्रपति शिवाजी महाराज के अनुयायियों एवं श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला है। तिवारी ने आरोप लगाया कि किसी सार्वजनिक मंच से ऐतिहासिक तथ्यों का कथित रूप से विकृत चित्रण कर समाज में भ्रम उत्पन्न करना तथा विभिन्न वर्गों की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भावनाओं को आहत करने वाला वक्तव्य देना गंभीर विधिक प्रश्न उत्पन्न करता है।
GenZ Lawyers Association के एडवोकेट आयुष तिवारी ने कहा कि अकबर को ‘महान’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शासक के रूप में प्रस्तुत करने वाले प्रचलित नैरेटिव को भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने सार्वजनिक रूप से चुनौती दी है। तिवारी के अनुसार, डॉ. त्रिवेदी ने अपने वक्तव्य में विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, दस्तावेजों तथा अकबरकालीन अभिलेखों का हवाला देते हुए दावा किया है कि अकबर के शासनकाल में अनेक हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किए जाने के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं।
उन्होंने कहा कि कुछ लोग सार्वजनिक मंचों से ऐतिहासिक स्रोतों की उपेक्षा कर कथित रूप से भ्रामक और झूठे नैरेटिव फैलाते हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत कर समाज में भ्रम उत्पन्न करता है अथवा विभिन्न वर्गों की धार्मिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक भावनाओं को आहत करने वाले कथित झूठे तथ्य प्रसारित करता है, तो ऐसे मामलों में लागू कानून के अनुसार आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दोषियों के विरुद्ध कठोर वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
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Title :- Sudhanshu Trivedi: अकबर को ‘महान’ बताने पर क्या बोले सुधांशु … Sudhanshu Trivedi: अकबर को ‘महान’ बताने पर क्या बोले सुधांशु त्रिवेदी? #sudhanshutrivedi #zeenews #viralshorts #akhbar
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने Subramanian Swamy v. Arun Shourie, (2014) 12 SCC 344 में स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को उनके सार्वजनिक वक्तव्यों या न्यायिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर किए गए कार्यों के लिए कोई सामान्य या असीमित कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं है। न्यायाधीशों को उपलब्ध विधिक संरक्षण केवल उनके विधिसम्मत न्यायिक कृत्यों (Judicial Acts) तक सीमित है। न्यायिक कार्यों के दायरे से बाहर किए गए कृत्यों या वक्तव्यों के संबंध में, विधि के अनुसार उनकी उत्तरदायित्व (Liability) का प्रश्न उसी प्रकार उठ सकता है, जैसा किसी अन्य नागरिक के संबंध में उठता है।
इसी सिद्धांत को संविधान पीठ ने K. Veeraswami v. Union of India, (1991) 3 SCC 655 में और अधिक स्पष्ट करते हुए कहा:
“But we know of no law providing protection for Judges from criminal prosecution. Article 361(2) confers immunity from criminal prosecution only to the President and Governors of States and to no others. Even that immunity has been limited during their term of office. The Judges are liable to be dealt with just the same way as any other person in respect of criminal offence. It is only in taking of bribes or with regard to the offence of corruption the sanction for criminal prosecution is required.”
अर्थात, संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपालों को छोड़कर किसी भी न्यायाधीश को आपराधिक अभियोजन से सामान्य संवैधानिक प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है। यदि कोई न्यायाधीश न्यायिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर ऐसा कृत्य करता है जिससे किसी आपराधिक अपराध का प्रश्न उत्पन्न होता है, तो वह भी अन्य नागरिक की भाँति कानून के अधीन उत्तरदायी हो सकता है। केवल रिश्वतखोरी अथवा भ्रष्टाचार संबंधी अपराधों के मामलों में अभियोजन प्रारम्भ करने से पूर्व विधि द्वारा निर्धारित स्वीकृति (Sanction) की आवश्यकता होती है।
देश की सर्वोच्च अदालत के एक वर्तमान न्यायाधीश के सार्वजनिक भाषण को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां को उनके एक रिपोर्टेड सार्वजनिक वक्तव्य के संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने विस्तृत कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक मंच से ऐसे विषय पर टिप्पणी करना, जो न्यायिक विचाराधीन है अथवा भविष्य में न्यायालय के समक्ष आ सकता है, न्यायिक मर्यादा, न्यायाधीशों की आचार संहिता (Judges’ Ethics Code), ‘Restatement of Values of Judicial Life’, ‘Bangalore Principles of Judicial Conduct’ तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
नोटिस का आधार उस रिपोर्टेड टिप्पणी को बनाया गया है जिसमें कहा गया कि “गंगा पर चिकन खाने से रोकने वाला कोई कानून नहीं है।” एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय का कहना है कि यह विवाद केवल भोजन करने का नहीं था। उनके अनुसार मामले में गंगा में मांस के अवशेष, हड्डियाँ एवं अन्य अपशिष्ट फेंकने, पर्यावरण प्रदूषण, सार्वजनिक उपद्रव तथा धार्मिक भावनाओं से जुड़े आरोप भी शामिल थे। इसलिए पूरे विवाद को केवल “चिकन खाने” तक सीमित कर प्रस्तुत करना कानून और तथ्यों की अधूरी तस्वीर पेश करता है।
नोटिस में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश जब सार्वजनिक मंच से कोई टिप्पणी करता है तो वह मात्र व्यक्तिगत राय नहीं रहती, बल्कि उसे सर्वोच्च न्यायालय की संस्थागत प्रतिष्ठा और नैतिक अधिकार के साथ देखा जाता है। ऐसे में न्यायाधीशों से सार्वजनिक वक्तव्यों में असाधारण सावधानी, निष्पक्षता और न्यायिक संयम अपेक्षित है।
‘जजेज एथिक्स कोड’ का हवाला
एडवोकेट उपाध्याय ने अपने नोटिस में ‘Restatement of Values of Judicial Life’ तथा ‘Bangalore Principles of Judicial Conduct’ का विस्तृत उल्लेख करते हुए कहा है कि इन सिद्धांतों का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी निष्पक्षता के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखना है। नोटिस में कहा गया है कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणी से बचना चाहिए जो न्यायिक विचाराधीन हों या भविष्य में न्यायालय के समक्ष आ सकते हों, क्योंकि ऐसी टिप्पणियाँ न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक प्रश्न खड़े कर सकती हैं।
‘न्यायिक स्वतंत्रता, लेकिन न्यायिक उत्तरदायित्व भी’
नोटिस में आगे कहा गया है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय संविधान की मूल संरचना का अभिन्न अंग है, किन्तु उसी प्रकार न्यायिक संयम और सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी न्यायिक संस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इसलिए न्यायाधीशों द्वारा दिए जाने वाले सार्वजनिक वक्तव्यों को भी उन्हीं संवैधानिक मानकों पर परखा जाना चाहिए, जिनकी अपेक्षा न्यायपालिका स्वयं अन्य संवैधानिक संस्थाओं से करती है।
पहले भी भेज चुके हैं नोटिस
यह पहली बार नहीं है जब एडवोकेट घनश्याम उपाध्याय ने किसी वर्तमान या पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को सार्वजनिक वक्तव्य के संबंध में कानूनी नोटिस भेजा हो। इससे पहले उन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ को भी उनके एक सार्वजनिक वक्तव्य को लेकर नोटिस भेजा था। अब जस्टिस उज्जल भुइयां को भेजे गए इस नोटिस ने न्यायिक मर्यादा, सार्वजनिक वक्तव्यों की सीमाओं और न्यायिक जवाबदेही पर एक नई संवैधानिक बहस छेड़ दी है।
‘सुप्रीम कोर्ट के जज की सार्वजनिक टिप्पणी का निचली अदालतों पर भी पड़ सकता है प्रभाव’
इंडियन बार एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय का कोई वर्तमान न्यायाधीश किसी विवादित अथवा न्यायिक विचाराधीन विषय पर सार्वजनिक मंच से अपना दृष्टिकोण व्यक्त करता है, तो उसका अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों पर मनोवैज्ञानिक और संस्थागत प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। उनके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सार्वजनिक टिप्पणी को अधीनस्थ न्यायपालिका एक संस्थागत संकेत के रूप में देख सकती है, जिससे ऐसे मामलों में पूर्णतः स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक धारणा प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न हो सकती है।
ओझा ने कहा कि न्यायपालिका की वास्तविक निष्पक्षता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि न्यायपालिका निष्पक्ष दिखाई भी दे। इसी कारण न्यायाधीशों से सार्वजनिक वक्तव्यों में सर्वोच्च स्तर के न्यायिक संयम की अपेक्षा की जाती है।
‘न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने का प्रयास अवमानना के दायरे में आ सकता है’
एडवोकेट निलेश ओझा ने कहा कि Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c) के अनुसार ऐसा कोई भी कृत्य, प्रकाशन या वक्तव्य, जो न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करे या न्याय के प्रशासन में बाधा डालने अथवा उसे प्रभावित करने की प्रवृत्ति रखता हो, आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
उन्होंने कहा कि Nilesh Navalakha v. Union of India, 2021 SCC OnLine Bom 56 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी यह सिद्धांत स्पष्ट किया कि न्यायिक विचाराधीन मामलों के संबंध में ऐसे सार्वजनिक वक्तव्य, समाचार टिप्पणियाँ अथवा अन्य सार्वजनिक अभिव्यक्तियाँ, जिनमें लंबित न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने या उस पर प्रभाव डालने की प्रवृत्ति हो, न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप का प्रश्न उत्पन्न कर सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अतीत में न्यायाधीशों द्वारा दिए गए सार्वजनिक साक्षात्कारों और टिप्पणियों को लेकर भी न्यायिक संस्थाओं द्वारा संज्ञान लिया गया है।
ओझा के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीशों के सार्वजनिक वक्तव्य सामान्य नागरिकों या अन्य सार्वजनिक पदाधिकारियों के वक्तव्यों से भिन्न प्रभाव रखते हैं। इसलिए न्यायिक मर्यादा, निष्पक्षता और न्यायपालिका में जनविश्वास बनाए रखने की दृष्टि से ऐसे वक्तव्यों का परीक्षण अत्यंत कठोर संवैधानिक मानकों पर किया जाना आवश्यक है।