केंद्र ने हाईकोर्ट में माना—BNSS की धारा 218 के तहत 120 दिनों में शिकायत पर निर्णय न होने पर ‘Deemed Sanction’ का प्रावधान लागू होता है। राशिद खान पठान का दावा—उनकी सभी शिकायतों में 120 दिनों की वैधानिक अवधि बहुत पहले ही समाप्त हो चुकी है। इसलिए कानूनन राष्ट्रपति कार्यालय से अभियोजन स्वीकृति (Deemed Sanction) प्राप्त मानी जाएगी और अब उन्हें डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के खिलाफ सीधे सक्षम अदालत में आपराधिक मामला दायर करने का कानूनी अधिकार प्राप्त हो गया है। [रिट याचिका संख्या WP/4443/2024 (Rashid Khan Pathan v. Shri Niraj Kumar Gayagi & Ors.)]
राशिद खान पठान की ओर से इंडियन बार एसोसिएशन के चेयरमैन एडवोकेट निलेश ओझा सहित कई अधिवक्ता न्यायालय में उपस्थित हुए। याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य कानूनी दलीलें एडवोकेट निलेश ओझा ने प्रस्तुत कीं।
न्यायिक भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई में ऐतिहासिक सफलता: 4 वर्षों के अथक संघर्ष को मिली बड़ी सफलता राशिद खान पठान का विभिन्न वकील संगठनों एवं मानवाधिकार संगठनों ने किया सम्मान एवं अभिनंदन; इसे न्यायपालिका में सुधार की दिशा में ‘मील का पत्थर’ बताया।
अन्य आरोपों में यह भी दावा किया गया है कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कथित रूप से कोविड-19 वैक्सीन निर्माताओं को लाभ पहुँचाने के लिए अपनी न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग किया तथा इस प्रक्रिया में गर्भवती महिलाओं सहित नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन आरोपों के संबंध में Awaken India Movement द्वारा व्यापक जन-जागरूकता अभियान भी चलाया गया है।
मुंबई, 17 जुलाई: बॉम्बे हाईकोर्ट में लंबित रिट याचिका संख्या WP/4443/2024 (Rashid Khan Pathan v. Shri Niraj Kumar Gayagi & Ors.) की सुनवाई के दौरान आज एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त भारत के मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति (Sanction) एवं FIR से संबंधित तीन शिकायतों पर अंतिम निर्णय लेने के लिए न्यायालय से चार सप्ताह का अतिरिक्त समय मांगा।
सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष यह स्वीकार किया गया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 के अनुसार यदि सक्षम प्राधिकारी 120 दिनों के भीतर अभियोजन स्वीकृति के प्रश्न पर निर्णय नहीं लेता, तो कानून में ‘Deemed Sanction’ (मानी हुई स्वीकृति) का प्रावधान लागू होता है।
याचिकाकर्ता राशिद खान पठान का कहना है कि उनकी शिकायतें वर्ष 2022 में ही संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर दी गई थीं। उनका दावा है कि शिकायतों के समर्थन में विस्तृत दस्तावेज़, न्यायालयीन अभिलेख तथा अन्य साक्ष्य उपलब्ध कराने के बावजूद पिछले कई वर्षों से संबंधित केंद्रीय अधिकारियों द्वारा जानबूझकर निर्णय टाला जाता रहा।
उनका कहना है कि जब स्वयं केंद्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष यह स्वीकार किया है कि BNSS की धारा 218 के अंतर्गत निर्धारित 120 दिनों की अवधि में अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय न होने की स्थिति में ‘Deemed Sanction’ का प्रावधान लागू होता है, तब उनके मामले में भी विधिक रूप से अभियोजन स्वीकृति प्राप्त मानी जाएगी और वे सक्षम आपराधिक न्यायालय के समक्ष सीधे परिवाद (Complaint Case) दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि इस कानूनी स्थिति का उल्लेख स्वयं बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने 1.05.2026 के आदेश में भी किया है। उनके अनुसार, चूँकि उनकी सभी शिकायतों में 120 दिनों की वैधानिक अवधि वर्षों पहले ही समाप्त हो चुकी है, इसलिए अब उन्हें राष्ट्रपति कार्यालय से अभियोजन स्वीकृति (Deemed Sanction) प्राप्त मानते हुए डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के विरुद्ध सक्षम न्यायालय में आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करने का विधिक अधिकार प्राप्त हो गया है.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसी ही कानूनी स्थिति बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रियाज़ आई. छागला से संबंधित मामले में भी उत्पन्न हुई है। उनके अनुसार, Awaken India Movement के श्री अम्बर कोईरी तथा श्री योहान तेंगरा ने राष्ट्रपति के समक्ष दस्तावेज़ों के साथ एक शिकायत प्रस्तुत की, जिसमें आरोप लगाया गया कि न्यायमूर्ति छागला ने कथित रूप से Serum Institute से संबंधित मामले की सुनवाई की और आदेश पारित किया, जबकि उनके अनुसार ऐसे तथ्यों का पूर्व प्रकटीकरण किया जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ताओं का यह भी दावा है कि न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान Serum Institute की ओर से यह स्वीकार किया गया कि उसके और न्यायमूर्ति छागला के बीच संबंध थे। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यदि ऐसा था, तो इस तथ्य का सुनवाई से पहले खुलासा न किया जाना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित recusal एवं disclosure संबंधी सिद्धांतों के आलोक में गंभीर दुराचार के अपराध का विधिक प्रश्न उत्पन्न करता है।
इन्हीं आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने राष्ट्रपति के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की। उनका कहना है कि उस शिकायत पर भी BNSS की धारा 218 में निर्धारित 120 दिनों की अवधि के भीतर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसलिए उनका दावा है कि उस मामले में भी ‘Deemed Sanction’ का सिद्धांत लागू हो चुका है और वे विधि के अनुसार सक्षम न्यायालय के समक्ष आगे की कार्यवाही प्रारंभ करने के अधिकारी हैं।
शिकायतें 2022 से लंबित, फिर भी नहीं हुआ अंतिम निर्णय
याचिकाकर्ता का कहना है कि उनकी तीनों शिकायतें पिछले लगभग 4 वर्षों से विभिन्न केंद्रीय अधिकारियों के पास लंबित हैं। उनका आरोप है कि इतने लंबे समय तक निर्णय न लेना न केवल वैधानिक दायित्व की अवहेलना है, बल्कि इससे न्यायिक प्रक्रिया भी अनावश्यक रूप से प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि यदि कानून 120 दिनों की समय-सीमा निर्धारित करता है, तो वर्षों तक फाइल लंबित रखना विधायी मंशा के विपरीत है।
डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के विरुद्ध 13 अलग-अलग गंभीर आरोप
याचिका में सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ के विरुद्ध 13 अलग-अलग कथित अपराधों एवं गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार ये आरोप विभिन्न न्यायिक आदेशों, कथित प्रक्रियागत अनियमितताओं, बाध्यकारी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की कथित अवहेलना, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन तथा न्यायिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से संबंधित हैं।
मुख्य आरोप: बिना सुनवाई आदेश पारित करने का
याचिकाकर्ता का आरोप है कि अपराध क्रमांक–9 न्यायिक निष्पक्षता (Judicial Impartiality) और न्यायाधीशों की आचार संहिता के कथित उल्लंघन से संबंधित है। उनके अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा State of Punjab v. Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770 तथा Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India, (2016) 5 SCC 808 सहित विभिन्न निर्णयों में निर्धारित Recusal एवं Conflict of Interest के सिद्धांतों के बावजूद, न्यायमूर्ति डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कथित रूप से अपने पुत्र डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ द्वारा संबंधित विवाद में पैरवी किए जाने के बाद भी उसी मूल लेन-देन और उससे जुड़ी FIR संख्या 806/2019 एवं FIR संख्या 243/2021 से संबंधित मामलों की बार-बार सुनवाई की।
याचिकाकर्ता का कहना है कि बॉम्बे हाईकोर्ट के 20 सितम्बर 2021 के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि डॉ. अभिनव चंद्रचूड़ उक्त विवाद से संबंधित मामले में अधिवक्ता के रूप में उपस्थित थे। इसके बावजूद, बाद में SLP (Cri.) No. 9131 of 2021 तथा SLP (Cri.) No. 9092 of 2022 सहित उसी विवाद और समान लेन-देन से जुड़े मामलों में 29 नवम्बर 2021, 9 सितम्बर 2022 तथा 10 अक्टूबर 2022 को न्यायमूर्ति डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ द्वारा आदेश पारित किए गए।
याचिकाकर्ता का दावा है कि उस समय इस विषय पर बार एवं आम जनता के बीच हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर व्यापक चर्चा चल रही थी तथा 5 अक्टूबर 2022 को राष्ट्रपति के समक्ष इस संबंध में शिकायत भी प्रस्तुत की जा चुकी थी। इसके बावजूद संबंधित मामलों की सुनवाई जारी रखना, उनके अनुसार, न्यायिक नैतिकता, निष्पक्षता तथा Recusal संबंधी स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है और न्यायिक शक्ति के कथित दुरुपयोग (Fraud on Power) का मामला बनता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस पूरे प्रकरण का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि संबंधित SLP पर प्रथम ही दिन एकपक्षीय (ex parte) सुनवाई हुई और राज्य सरकार अथवा लोक अभियोजक को सुने बिना तथा प्रतिवादियों को कोई नोटिस जारी किए बिना आदेश पारित कर दिया गया। याचिकाकर्ता का आगे दावा है कि उक्त आदेश में हाईकोर्ट को एक आवेदन का समयबद्ध (time-bound) निर्णय करने का निर्देश दिया गया, जबकि उस समय ऐसा कोई आवेदन हाईकोर्ट के समक्ष लंबित ही नहीं था। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन उपस्थित थीं। इससे यह साबित होता है कि वह इस साजिश में शामिल है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि आदेश पारित करने की प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता पर गंभीर विधिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं। इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि संबंधित आदेश न्यायिक शक्ति के कथित दुरुपयोग (fraud on power) का उदाहरण है तथा उन्होंने स्वतंत्र जांच की मांग की है.
याचिकाकर्ता के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण आरोप यह है कि Maneka Gandhi v. Union of India, (1978) 1 SCC 248 में प्रतिपादित Audi Alteram Partem (दूसरे पक्ष को सुनने) के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए कथित रूप से संबंधित आदेश राज्य एवं अन्य आवश्यक पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि ABCD v. Union of India, (2020) 2 SCC 52 तथा Pushpa Devi M. Jatia v. M.L. Wadhawan, (1987) 3 SCC 367 में निर्धारित सिद्धांतों के विपरीत, कथित रूप से ऐसे तथ्यों और दस्तावेज़ों पर विचार किया गया जो मूल न्यायालयीन अभिलेख का हिस्सा नहीं थे। याचिकाकर्ता का दावा है कि इस संबंध में कोई विधिक कार्रवाई नहीं की गई।
स्वतंत्र जांच की मांग
याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह मामला न्यायिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग तथा बहु-करोड़ रुपये के कथित उगाही (Extortion) प्रकरण से जुड़ा है। इन आरोपों की सत्यता पर इस स्तर पर किसी न्यायालय द्वारा कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है और इनकी पुष्टि अथवा खंडन केवल विधि के अनुसार सक्षम जांच के बाद ही हो सकता है।
इसी आधार पर उन्होंने पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 340 एवं 344 (वर्तमान विधिक व्यवस्था के समकक्ष प्रावधानों) के अनुरूप स्वतंत्र जांच की मांग की है तथा Gobind Mehta v. State (AIR 1971 SC 1708), State of Maharashtra v. Kamlakar Nandram Bhawsar तथा K. Ram Reddy v. State of A.P. सहित विभिन्न निर्णयों पर भरोसा किया है।
अब आगे क्या?
केंद्र सरकार द्वारा चार सप्ताह का समय मांगने के बाद यह मामला एक नए कानूनी प्रश्न के केंद्र में आ गया है। एक ओर केंद्र सरकार ने अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय लेने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है, वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ता का कहना है कि BNSS की धारा 218 के तहत निर्धारित 120 दिनों की अवधि वर्षों पहले ही समाप्त हो चुकी है, इसलिए उनके मामले में Deemed Sanction पहले ही प्रभावी हो चुका है। इसी आधार पर उनका दावा है कि अब उन्हें सक्षम न्यायालय के समक्ष सीधे आपराधिक कार्यवाही प्रारंभ करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
अब इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की आगामी कार्यवाही, केंद्र सरकार का अंतिम निर्णय तथा अभियोजन स्वीकृति से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।