सबसे बड़ा खुलासा—जिस समय पुलिस रिकॉर्ड में दिशा को जिंदा और फोन पर बात करते बताया गया, उससे पहले ही हो चुकी थी उसकी मौत; पुलिस की रिपोर्ट फर्जी, ‘सुसाइड थ्योरी’ का झूठ उजागर!
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CCTV अकेला सबूत नहीं है। CCTV फुटेज को देखने, जांचने और उसके संबंध में आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करने वाले पुलिस कॉन्स्टेबल, PI तथा अन्य पुलिस अधिकारियों की पहचान और उनके बयान भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध हैं।
क्या थी पुलिस की ‘सुसाइड स्टोरी’?
पुलिस द्वारा तैयार रिकॉर्ड के अनुसार, दिशा सालियन, रोहन राय, हिमांशु शुक्ला, इंद्रनील वैद्य, दीप अजमेरा और रेशा पाडवाल रात करीब 7:30 बजे से साथ थे, शराब पी रहे थे और टीवी देख रहे थे। इसी पुलिस संस्करण के अनुसार, रात 12:06 बजे से 1:21 बजे तक, यानी लगभग 1 घंटा 15 मिनट, दिशा अपनी लंदन स्थित सहेली से फोन पर बातचीत कर रही थीं।
इसके बाद दावा किया गया कि दिशा ने फोन रखा, स्वयं को कमरे में बंद कर लिया और जब काफी देर तक दरवाजा नहीं खोला तो बाहर मौजूद लोगों ने आवाज लगाई, दरवाजा खोलने/तोड़ने की कोशिश की और किसी तरह अंदर पहुंचे।
पुलिस की कहानी के अनुसार, तब तक दिशा बिल्डिंग से नीचे गिर चुकी थीं।
इतना ही नहीं, पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज 11वीं मंजिल की निवासी श्रीमती प्रीति राणे के बयान के अनुसार, रात लगभग 1:20 बजे उन्हें ऊपर से कुछ नीचे गिरने की आवाज सुनाई दी। इसके बाद उन्होंने इंटरकॉम पर फोन करके सिक्योरिटी ऑफिसर शिवमूरत गौतम उर्फ “मुन्ना” को नीचे जाकर जांच करने के लिए कहा। जब मुन्ना मौके पर पहुंचा और उसने जांच की, तो उसे दिशा सालियन की बॉडी नीचे गिरी हुई मिली।
इसके बाद पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज घटनाक्रम के अनुसार, दीप अजमेरा, हिमांशु शिखरे और इंद्रनील वैद्य दिशा सालियन की बॉडी को अस्पताल लेकर गए।
यही वह टाइमलाइन है, जिस पर पुलिस की पूरी ‘सुसाइड स्टोरी’ खड़ी की गई।
लेकिन अब ORIGINAL CCTV और POLICE RECORD ने पूरी ‘सुसाइड स्टोरी’ का झूठ उजागर कर दिया!
अब उपलब्ध मूल CCTV फुटेज, आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड और पुलिस अधिकारियों के बयान पुलिस द्वारा तैयार की गई पूरी टाइमलाइन को झूठा साबित करते हैं।
पुलिस की कहानी यह थी कि दिशा सालियन रात 1:21 बजे तक जिंदा थीं और फोन पर बात कर रही थीं। उसके बाद उन्होंने कथित रूप से खुद को कमरे में बंद किया, फिर नीचे गिरीं, उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उसके बाद पुलिस को घटना की जानकारी मिली।
लेकिन ORIGINAL CCTV इस कहानी का झूठ खोल देता है।
CCTV फुटेज में रोहन राय, हिमांशु शिखरे, सिक्योरिटी गार्ड, गवाह प्रीति राणे और सोसायटी से जुड़े अन्य लोग रात करीब 12:30 बजे से ही लिफ्ट और सोसायटी परिसर में भागदौड़ करते दिखाई देते हैं।
और सबसे बड़ा खुलासा—उनके साथ पुलिसकर्मी भी दिखाई दे रहे हैं!
यानी जिस समय पुलिस के रिकॉर्ड में दिशा को जिंदा और फोन पर बात करते हुए दिखाया जा रहा था, उससे पहले ही सोसायटी में असामान्य गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं और पुलिस भी वहां मौजूद थी।
इसके बावजूद बाद में पुलिस ने ऐसी टाइमलाइन तैयार की कि पहले दिशा 1:21 बजे तक जिंदा थीं, उसके बाद नीचे गिरीं, फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उसके बाद पुलिस को सूचना मिली।
इतना ही नहीं, पुलिस द्वारा न्यायालय में दाखिल एफिडेविट में पुलिस के वहां पहुंचने का समय CCTV में दिखाई दे रही पुलिस की मौजूदगी से काफी बाद का बताया गया है।
यानी CCTV ने पुलिस की अपनी कहानी का झूठ उसी के रिकॉर्ड से उजागर कर दिया।
जब पुलिस पहले से सोसायटी में मौजूद थी, तो बाद में दिशा को 1:21 बजे तक जिंदा दिखाकर उसके बाद ‘सुसाइड’ की कहानी क्यों बनाई गई—अब इसका जवाब ORIGINAL CCTV और POLICE RECORD दे रहे हैं।
CCTV कुछ और नहीं, बल्कि पुलिस की बनाई ‘सुसाइड थ्योरी’ के खिलाफ उसका अपना सबसे बड़ा सबूत बनकर सामने आया है।
CCTV से भी बड़ा सबूत—CCTV की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी खुद बने गवाह!
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संबंधित CCTV फुटेज को पुलिस के अपने अधिकारियों ने स्वयं देखा, उसकी जांच की और उसके आधार पर आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड तैयार किया।
यानी यह मामला किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा आज पेश की गई किसी वीडियो क्लिप पर निर्भर नहीं है।
CCTV की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों का विवरण, उनके बयान और उससे संबंधित आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड उपलब्ध हो चुके हैं।
इनमें पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार निम्न पुलिस अधिकारी/कर्मचारी शामिल हैं:
- पुलिस इंस्पेक्टर कनावजे
- असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर (API) मुलानी
- पुलिस हेड कॉन्स्टेबल रोडे — बक्कल नं. 01151
- पुलिस हेड कॉन्स्टेबल मईगडे — बक्कल नं. 961369
- पुलिस कॉन्स्टेबल जाधव — बक्कल नं. 092613
- पुलिस कॉन्स्टेबल हीरेमठ — बक्कल नं. 090613
- पुलिस कॉन्स्टेबल भोजबल — बक्कल नं. 110172
- पुलिस कॉन्स्टेबल वाळतकर (Walatkar) — बक्कल नं. 113198
यानी CCTV खुद बोल रहा है और CCTV देखने-जांचने वाले पुलिस अधिकारी उसके प्रत्यक्ष आधिकारिक गवाह हैं।
किस अधिकारी ने CCTV देखा, कब देखा, उसमें क्या देखा और उसके आधार पर पुलिस रिकॉर्ड में क्या दर्ज किया—इसकी पूरी श्रृंखला पुलिस के अपने रिकॉर्ड में मौजूद है।
इसलिए बाद में CCTV की वास्तविकता या उसमें दिखाई देने वाले घटनाक्रम से इनकार करना आसान नहीं होगा, क्योंकि CCTV की जांच किसी निजी व्यक्ति ने नहीं, बल्कि पुलिस विभाग के अपने अधिकारियों ने की थी।
अब सबूत बाहर से नहीं आया है—सबूत पुलिस के अपने रिकॉर्ड से निकला है और उसके गवाह भी पुलिस के अपने अधिकारी हैं।
यही इस खुलासे की सबसे बड़ी ताकत है:
ORIGINAL CCTV + OFFICIAL POLICE RECORD + POLICE WITNESSES
अब CCTV बोलेगा, पुलिस का मूल रिकॉर्ड बोलेगा और CCTV की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी स्वयं गवाही देंगे कि उन्होंने उस समय क्या देखा और पुलिस रिकॉर्ड में क्या दर्ज किया था।
जो रिकॉर्ड अब तक दबे थे, वे आखिरकार बाहर कैसे आए?
इन अत्यंत महत्वपूर्ण रिकॉर्ड्स को सामने लाने में कुछ ईमानदार पुलिस अधिकारियों—जिनमें वरिष्ठ स्तर के अधिकारी भी बताए जा रहे हैं—के सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
करीब 20 पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में?
उपलब्ध बताए जा रहे रिकॉर्ड के आधार पर करीब 20 पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी गंभीर जांच आवश्यक हो सकती है।
यदि किसी अधिकारी के संबंध में यह प्रमाणित होता है कि उसने जानबूझकर—
झूठा रिकॉर्ड तैयार किया, वास्तविक साक्ष्य दबाया या नष्ट किया, गलत घटनाक्रम को आधिकारिक रूप दिया, असली समय-रेखा छिपाई, या किसी अपराधी को बचाने के उद्देश्य से रिकॉर्ड में हेरफेर की,
तो उसकी भूमिका केवल विभागीय लापरवाही का विषय नहीं रह जाएगी; उसके विरुद्ध लागू कानून के अनुसार आपराधिक अभियोजन का प्रश्न भी उठेगा।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि दिशा की मौत कैसे हुई
अब उससे भी बड़े सवाल हैं— दिशा की वास्तविक मृत्यु का समय क्या था? असल घटनाक्रम किसने छिपाया? ‘सुसाइड स्टोरी’ किसने तैयार की? उसे आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड का रूप किसने दिया?
और यदि ORIGINAL CCTV कुछ और बता रहा था, तो देश के सामने अलग कहानी क्यों रखी गई?
कोर्ट के सामने झूठा एफिडेविट क्यों दाखिल किया गया?
तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को खुद प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘सुसाइड थ्योरी’ को सही साबित करने की जरूरत क्यों पड़ी?
आखिर ऐसा क्या छिपाना था कि एक आरोपी को बचाने के लिए पूरे पुलिस विभाग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी गई?
और सबसे बड़ा सवाल—
जब ORIGINAL CCTV और पुलिस के अपने अधिकारी ही असली घटनाक्रम के गवाह थे, तो उसके विपरीत कहानी को आधिकारिक पुलिस रिकॉर्ड का रूप किसने दिया और क्यों?
अब इन सवालों का जवाब बयानबाजी से नहीं—ORIGINAL CCTV, ORIGINAL POLICE RECORD और POLICE WITNESSES से मिलेगा।
परमबीर सिंह और अन्य आरोपियों का खेल खत्म
दिशा सालियन मामले की ‘सुसाइड स्टोरी’ और उसके समर्थन में तैयार पुलिस रिकॉर्ड की असलियत अब ORIGINAL CCTV और पुलिस के अपने रिकॉर्ड से उजागर हो रही है।
तत्कालीन मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि CCTV की जांच हो चुकी है, रोहन राय और अन्य गवाहों के बयान CCTV से मेल खाते हैं और वहां किसी बड़े नेता या संदिग्ध व्यक्ति की मौजूदगी नहीं थी।
लेकिन अब ORIGINAL CCTV + OFFICIAL POLICE RECORD + POLICE WITNESSES ने इस कहानी का झूठ उजागर कर दिया है।
CCTV मौजूद है।
ORIGINAL POLICE RECORD मौजूद हैं।
पुलिस अधिकारियों के बयान मौजूद हैं।
और CCTV देखने व उसकी जांच करने वाले पुलिस अधिकारी स्वयं महत्वपूर्ण गवाह हैं।
अब मामला किसी के दावे के खिलाफ किसी दूसरे के दावे का नहीं है।
अब मामला है—CCTV + ORIGINAL POLICE RECORD + POLICE WITNESSES बनाम झूठी कहानी और झूठे साक्ष्य गढ़ने वालों का!
कानून में आरोपी को बचाने के लिए पुलिस पद, सरकारी मशीनरी और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग कर झूठे साक्ष्य या रिकॉर्ड तैयार करने तथा असली साक्ष्य दबाने या नष्ट करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक अभियोजन का प्रावधान है; और लागू अपराध सिद्ध होने पर सजा उम्रकैद तक जा सकती है।
अब रिकॉर्ड बोलेगा। CCTV बोलेगा। गवाह बोलेंगे। और सच का फैसला कानून करेगा।
जो भी कानूनन दोषी सिद्ध होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई और सजा का रास्ता कोई नहीं रोक सकेगा।