भारत के मुख्य न्यायाधीश को जेन ज़ी लॉयर्स एसोसिएशन का 27 पन्नों का ज्ञापन! संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए आम नागरिकों की तरह दोनों नेताओं को भी छह महीने के कारावास की सजा देने की मांग!
महाराष्ट्र के कांग्रेस के पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वरूपसिंह नाईक को भी पहले न्यायालय की अवमानना के मामले में एक महीने के कारावास की सजा सुनाए जाने की याद दिलाई!
न्यायालय की अवमानना सिद्ध होने पर कठोर कारावास की सजा दी जाए; जेन ज़ी लॉयर्स एसोसिएशन की मुख्य न्यायाधीश से मांग!
‘नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, कानून से बड़ा कोई नहीं!’ सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए राजनीतिक नेताओं को विशेष रियायत न देने की मांग!
मुंबई, 16 अक्टूबर 2026: देश की न्यायपालिका के विरुद्ध कथित रूप से बार-बार गंभीर आरोप लगाने वाले राजनीतिक नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत, पत्रकार निखिल वागले और अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना के आरोपों पर सख्त कार्रवाई करने की मांग जेन ज़ी लॉयर्स एसोसिएशन ने सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश से की है।
16 अक्टूबर को प्रस्तुत 27 पन्नों के ज्ञापन में संगठन ने सर्वोच्च न्यायालय के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है कि ‘पहले न्यायालय की अवमानना करो, फिर माफी मांगो और उसके बाद फिर से बच निकलो’—इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का समय आ गया है।
‘कानून के जाल में छोटे फंसते हैं, बड़े बच निकलते हैं’ — सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला!
संगठन ने T.N. Godavarman Thirumulpad v. Ashok Khot, (2006) 5 SCC 1 के निर्णय का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को रेखांकित किया है।
‘व्यक्ति कितना भी बड़ा हो, कितना भी धनवान या शक्तिशाली हो, वह कानून के अधीन ही है। कानून सर्वोच्च है!’
इसी प्रकार National Human Rights Commission v. State, (2009) 6 SCC 767 के निर्णय का आधार लेते हुए संगठन ने सवाल उठाया है कि क्या कानून का जाल केवल आम नागरिकों को ही पकड़ेगा और प्रभावशाली व्यक्ति उससे बच निकलेंगे? ऐसी स्थिति पैदा नहीं होने दी जानी चाहिए।
‘आम नागरिकों के लिए एक कानून और राजनीतिक नेताओं के लिए दूसरा कानून, यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा,’ ऐसा संगठन का तर्क है।
संजय राउत के बयानों से न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर प्रहार? ‘न्यायाधीशों को दलाल कहने तक पहुंच गई बात!’ कठोर कार्रवाई की मांग!
मुंबई: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत द्वारा न्यायपालिका के संबंध में दिए गए कथित बयानों को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है।
देश की न्यायपालिका पर बेलगाम आरोप लगाना, न्यायालयों की ‘सुलभ शौचालयों’ से तुलना करना और वर्तमान तथा पूर्व मुख्य न्यायाधीशों को ‘जस्टिस’ के बजाय ‘दलाल’ कहने जैसी भाषा का प्रयोग करना न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर सीधा हमला है, ऐसा गंभीर आरोप जेन ज़ी लॉयर्स एसोसिएशन ने लगाया है।
संगठन ने मुख्य न्यायाधीश को दिए गए ज्ञापन में संजय राउत के विरुद्ध तीन गंभीर आरोप प्रस्तुत किए हैं।
पहला आरोप: देश की न्यायपालिका सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के प्रभाव या नियंत्रण में काम कर रही है, ऐसा आरोप लगाकर न्यायालयों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाना।
दूसरा आरोप: न्यायालयों की सीधे ‘सुलभ शौचालयों’ से तुलना करते हुए यह कथित बयान देना कि पैसे दिए बिना न्यायालय में कोई काम नहीं होता।
तीसरा और सबसे गंभीर आरोप: देश के वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों को अपने नाम के आगे ‘जस्टिस’ के बजाय ‘दलाल’ शब्द लगाने की कथित सलाह देना और न्याय प्रदान करने वाले न्यायाधीशों को दलाली करने वाले व्यक्तियों की तरह चित्रित करना।
‘न्यायालय के फैसले की आलोचना करना अलग बात है और पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट, बिकाऊ तथा राजनीतिक सत्ता की दलाल बताना अलग बात! अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिलाने का लाइसेंस किसी को नहीं मिल सकता,’ ऐसा आक्रामक रुख संगठन ने अपनाया है।
संगठन के ज्ञापन के अनुसार, संजय राउत के विरुद्ध बॉम्बे हाई कोर्ट की प्रधान पीठ में न्यायालय की अवमानना की दो याचिकाएं दाखिल की गई हैं और औरंगाबाद पीठ में भी अवमानना संबंधी कार्यवाही चलने का उल्लेख किया गया है।
संगठन ने इन मामलों के मूल वीडियो, बयानों के प्रतिलेख और न्यायालयीन आदेशों की जांच करने की मांग की है।
‘यदि कोई सामान्य वकील या नागरिक न्यायालय की गंभीर अवमानना करता है, तो उसके खिलाफ कानून का डंडा चलता है। फिर सांसद होने के कारण संजय राउत को अलग न्याय क्यों? यदि कानून सभी के लिए समान है, तो राजनीतिक प्रभाव से अधिक महत्व न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को मिलना चाहिए!’ ऐसा सवाल संगठन ने उठाया है।
सर्वोच्च न्यायालय के In Re: S. Mulgaokar और L.D. Jaikwal के निर्णयों का आधार लेते हुए संगठन ने मांग की है कि यदि संजय राउत पर लगाए गए आरोप सबूतों के आधार पर सिद्ध होते हैं, तो केवल औपचारिक माफी स्वीकार करके मामला समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय अवमानना कानून के अनुसार आवश्यकता पड़ने पर कारावास सहित कठोर और निवारक सजा दी जानी चाहिए।
‘न्यायालय राजनीतिक आरोपबाजी का अखाड़ा नहीं है और न्यायाधीश किसी राजनीतिक नेता की आलोचना के लिए आसान निशाना नहीं हैं। न्यायपालिका पर गंभीर हमले सिद्ध होने पर कानून का कड़ा प्रहार होना ही चाहिए!’ ऐसा संदेश संगठन ने अपने ज्ञापन में दिया है।
राहुल गांधी को 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने दी थी स्पष्ट चेतावनी!
राहुल गांधी के संबंध में संगठन ने 2019 के राफेल प्रकरण में हुई न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही का विशेष उल्लेख किया है।
Yashwant Sinha v. CBI, (2020) 2 SCC 338 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राहुल गांधी द्वारा न्यायालय के आदेश का गलत अर्थ राजनीतिक प्रचार में प्रस्तुत किए जाने पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की थी।
उस समय राहुल गांधी ने शुरुआत में अपने बयानों का बचाव करने का प्रयास किया था। हालांकि, बाद में उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी। सर्वोच्च न्यायालय ने उस माफी को ध्यान में रखते हुए अवमानना की कार्यवाही समाप्त कर दी थी।
इसके बावजूद न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी थी कि राजनीतिक विवादों में सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय का नाम नहीं घसीटा जाना चाहिए और न्यायालय ने जो निष्कर्ष कभी दर्ज ही नहीं किए, उन्हें न्यायालय के नाम पर प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
‘राहुल गांधी को भविष्य में अधिक सावधान रहना चाहिए,’ ऐसा भी सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था।
संगठन ने अब सीधा सवाल उठाया है कि एक बार सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्ट चेतावनी मिलने के बाद यदि दोबारा जानबूझकर न्यायालय की गंभीर अवमानना करना सिद्ध होता है, तो क्या एक और औपचारिक माफीनामा स्वीकार करके उन्हें छोड़ देना उचित होगा?
संगठन के अनुसार, ऐसी परिस्थिति में केवल सजा से बचने के उद्देश्य से दिया गया दिखावटी माफीनामा कानूनी रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
यदि गंभीर और जानबूझकर की गई अवमानना सिद्ध होती है, तो कानून के अनुसार कठोर सजा और आवश्यक होने पर कारावास की सजा भी सुनाई जानी चाहिए!
15 अक्टूबर के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर नजर!
संगठन ने अपने ज्ञापन में 15 अक्टूबर 2026 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का भी उल्लेख किया है।
W.P. (Civil) Nos. 1353/2026, 1351/2026 और 1356/2026 के मामलों में जारी आदेश के अनुसार नोटिस जारी किया गया है और अगली सुनवाई की तारीख 27 अक्टूबर 2026 निर्धारित की गई है।
विशेष रूप से W.P. (C) No. 1351/2026 में याचिकाकर्ता क्रमांक 6 की याचिका उसके आचरण के संबंध में स्पष्टीकरण देने की शर्त पर अस्थायी रूप से स्वीकार किए जाने का उल्लेख आदेश में होने का संगठन ने दावा किया है।
संगठन ने इस आदेश की पृष्ठभूमि में राहुल गांधी के कथित आचरण की विस्तृत जांच करने की मांग की है।
‘न्यायालय के फैसले की आलोचना करना एक अधिकार है, लेकिन बिना सबूत न्यायाधीशों की ईमानदारी पर गंभीर आरोप लगाकर न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास डगमगाने का प्रयास करना बिल्कुल अलग विषय है,’ ऐसा संगठन का कहना है।
पत्रकार निखिल वागले के कथित बयानों और प्रकाशनों की भी सबूतों के आधार पर जांच करने की मांग की गई है।
‘स्लैप, से सॉरी एंड गो स्कॉट-फ्री’ अब नहीं चलेगा!
संगठन ने L.D. Jaikwal v. State of U.P., (1984) 3 SCC 405 के निर्णय का हवाला देते हुए न्यायालय की गंभीर अवमानना करने के बाद केवल औपचारिक माफी मांगकर बच निकलने की प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई है।
‘माफी वास्तविक पश्चात्ताप से प्रेरित होनी चाहिए। वह सजा से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कानूनी हथियार नहीं बननी चाहिए,’ ऐसा संगठन ने कहा है।
इसी प्रकार In Re: S. Mulgaokar, (1978) 3 SCC 339 के निर्णय में प्रतिपादित छठे सिद्धांत का हवाला देते हुए संगठन ने कहा है कि जब न्यायपालिका पर हमले सहनशीलता की सीमा पार कर जाएं, तब कानून का कठोरता से पालन आवश्यक है।
न्यायमूर्ति कर्णन को छह महीने का कारावास; फिर राजनीतिक नेताओं को अलग न्याय क्यों?
संगठन ने In Re: Justice C.S. Karnan, (2017) 7 SCC 1 के मामले की याद दिलाई है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अवमानना के लिए छह महीने के कारावास की सजा सुनाई थी।
‘यदि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को भी अवमानना के लिए सजा हो सकती है, तो राजनीतिक नेता, सांसद या प्रभावशाली पत्रकार केवल अपने पद के कारण विशेष संरक्षण का दावा कैसे कर सकते हैं?’ ऐसा सवाल संगठन ने उठाया है।
संगठन ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले में एक जैसी सजा दी जाए, ऐसी उसकी मांग नहीं है। बल्कि सभी व्यक्तियों पर समान कानूनी मानदंड लागू किए जाने चाहिए, यही संवैधानिक अपेक्षा है।
वरिष्ठ वकीलों और राजनीतिक नेताओं की भूमिका की भी जांच हो!
राहुल गांधी से संबंधित कथित घटनाओं में शामिल राजनीतिक नेताओं, आयोजकों और कानून की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों की भूमिका की जांच करने की भी संगठन ने मांग की है।
ज्ञापन में अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल और डी. के. शिवकुमार सहित अन्य व्यक्तियों की कथित भागीदारी का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, केवल किसी स्थान पर उपस्थित होना या राजनीतिक संबंध होना न्यायालय की अवमानना सिद्ध नहीं करता। वास्तविक सहभागिता या जानबूझकर सहायता करना सबूतों से सिद्ध होना आवश्यक है।
‘न्यायालय का सम्मान करो, अन्यथा कानून की कठोर कार्रवाई!’ — संगठन की चेतावनी
संगठन ने मुख्य न्यायाधीश से मांग की है कि संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का पूरा अवसर देकर आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए।
यदि न्यायालय की गंभीर और जानबूझकर की गई अवमानना सिद्ध होती है, तो केवल दिखावटी माफीनामे से संतुष्ट होने के बजाय अवमानना कानून की धारा 12 के अंतर्गत आवश्यकतानुसार कारावास सहित कठोर और निवारक सजा सुनाई जाए।
‘चाहे राजनीतिक सत्ता हो, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद हो या पत्रकारिता का प्रभाव—न्यायालय से बड़ा कोई नहीं है। कानून का भय केवल आम आदमी को ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली व्यक्तियों को भी समान रूप से होना चाहिए!’
ऐसा स्पष्ट संदेश इस ज्ञापन के माध्यम से दिया गया है।
अब इस गंभीर मांग पर सर्वोच्च न्यायालय में आगे क्या होता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।