जब आदित्य ठाकरे ने सतीश सालियन द्वारा भेजे गए कानूनी नोटिस का जवाब दिया था, तब प्रिंट मीडिया के एक बड़े वर्ग ने उस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था।
लेकिन अब, जब आदित्य ठाकरे सहित अन्य प्रतिवादियों के विरुद्ध न्यायालय में मानहानि का मुकदमा दायर हो चुका है और न्यायालय द्वारा सूट समन्स तथा कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं, तब उसी प्रिंट मीडिया के एक वर्ग ने इस महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम को अपेक्षित प्रमुखता नहीं दी है।
सवाल यह है कि जब एक पक्ष के कानूनी नोटिस के जवाब को प्रमुखता से प्रकाशित किया जा सकता है, तो उसी मामले में न्यायालय द्वारा जारी समन्स और नोटिस को समान महत्व क्यों नहीं दिया जा रहा है?
यह केवल समाचार प्रकाशित करने या न करने का विषय नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की निष्पक्षता, पारदर्शिता और संपादकीय जवाबदेही का प्रश्न है।
इस विषय में क्या कानूनी कदम उठाए जाने चाहिए, यह एक अलग विषय है। लेकिन संबंधित पत्रकारों और संपादकों को स्वयं से यह सवाल अवश्य पूछना चाहिए कि इस असमान संपादकीय व्यवहार के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं।
क्या यह केवल संपादकीय निर्णय है, या इसके पीछे कोई दबाव, प्रभाव अथवा निहित स्वार्थ (Vested Interests) काम कर रहे हैं?
हम किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहे हैं, लेकिन यह अपेक्षा अवश्य करते हैं कि संबंधित समाचार संस्थान इस अंतर का संतोषजनक स्पष्टीकरण दें।
मीडिया की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उसकी निष्पक्षता और जनता के प्रति जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि एक ही मामले में दोनों पक्षों और न्यायिक घटनाक्रमों की रिपोर्टिंग के लिए अलग-अलग मानदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं।