दिल्ली हाई कोर्ट के तीन जजों पर राष्ट्रपति को शिकायत — सोशल एक्टिविस्ट ने लगाए न्यायिक धोखाधड़ी, रिकॉर्ड में हेरफेर और संविधान के उल्लंघन के गंभीर आरोप — सीबीआई जाँच व आपराधिक मुकदमे की अनुमति, अटॉर्नी जनरल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर करने, जस्टिस यशवंत वर्मा की तर्ज पर तीनों जजों से न्यायिक काम वापस लेने, तथा  याचिकाकर्ता के मौलिक संवैधानिक अधिकारों के हनन के एवज में उचित मुआवज़ा की माँग  [Case No: PRSEC/E/2026/ /0038577]

दिल्ली  के सोशल एक्टिविस्ट और यूट्यूबर  गुलशन पाहुजा की अवमानना सज़ा में गंभीर कानूनी भूल — सज़ा देने वाले जज खुद कठघरे में – सुप्रीम कोर्ट के कानून की खुली अवहेलना के आरोप

दिल्ली हाई कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों — जस्टिस नवीन चावला, जस्टिस रविंदर दुदेजा तथा जस्टिस चंद्र धारी सिंह — के विरुद्ध राष्ट्रपति को एक विस्तृत शिकायत भेजी गई है-  शपथपत्र पर दायर यह शिकायत न्यायालय के अभिलेखों तथा सुदृढ़ डिजिटल साक्ष्यों पर आधारित है — जिसे कोई झुठला नहीं सकता।

पाहुजा का कहना है कि शपथपत्र पर दायर उनकी शिकायत न्यायालयीन अभिलेखों, दस्तावेजी साक्ष्यों और डिजिटल प्रमाणों पर आधारित है। जिसे कोई न्यायालय झुठला नहीं सकता। यदि शिकायत का कोई भी आरोप असत्य या मनगढ़ंत पाया जाता है, तो वे कानून के अनुसार किसी भी कार्रवाई या दंड का सामना करने के लिए तैयार हैं। वहीं, यदि आरोप सत्य सिद्ध होते हैं, तो संबंधित न्यायाधीशों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।

शिकायत में संबंधित न्यायाधीशों पर स्थापित विधि एवं बाध्यकारी न्यायिक दृष्टांतों की जानबूझकर अवहेलना के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। 

 पूर्व में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश Justice Shameet Mukherjee को भ्रष्टाचार के एक मामले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने अवैध लाभ एवं अनुचित प्रतिफल के बदले अनुकूल न्यायिक आदेश पारित किए। उक्त मामले में न्यायालय के अभिलेखों में स्वयं यह आरोप दर्ज था कि कथित प्रलोभनों का स्वरूप “money, women and wine” (धन, महिलाएँ और मदिरा) था। [Shameet Mukherjee v. CBI, 2003 (70) DRJ 327].

नई दिल्ली। दिल्ली के सोशल एक्टिविस्ट और न्यायिक सुधार आंदोलन के अगुआ गुलशन पाहुजा ने राष्ट्रपति भवन को एक अत्यंत विस्फोटक और बहु-आयामी शिकायत भेजी है, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के तीन वरिष्ठ जजों — जस्टिस नवीन चावला, जस्टिस रविंदर दुदेजा और जस्टिस चंद्र धारी सिंह — पर न्यायिक अधिकार का जानबूझकर दुरुपयोग, आपराधिक षड्यंत्र, न्यायिक रिकॉर्ड में मिलावट, सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों की सचेत और बार-बार अवज्ञा, तथा एक निर्दोष नागरिक को गैरकानूनी तरीके से छह महीने की कैद की सजा सुनाने जैसे अत्यंत संगीन और दंडनीय आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में राष्ट्रपति से चार ऐतिहासिक माँगें की गई हैं — पहली, सीबीआई द्वारा आपराधिक अभियोजन की अनुमति; दूसरी, अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर करने के निर्देश; तीसरी, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की ही तर्ज पर मुख्य न्यायाधीश के माध्यम से तीनों जजों से तत्काल समस्त न्यायिक काम वापस लेना और “इन-हाउस प्रोसीजर” के तहत जाँच; तथा चौथी, राज्य से संवैधानिक मुआवजा। यह मामला 2024 में शुरू किए गए यूट्यूब चैनल “Fight 4 Judicial Reforms” से जुड़ा है, जिस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की — और जो अंततः 16 मई 2026 को छह महीने की साधारण कैद और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा पर जाकर समाप्त हुई।       

📌 राष्ट्रपति से की गई चार बड़ी और ऐतिहासिक माँगें

पहली माँग — सीबीआई जाँच और आपराधिक मुकदमे की अनुमति: शिकायत में के. वीरास्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (1991) और हाल ही में आए निर्भय सिंह सुलिया बनाम स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश, 2026 SCC OnLine SC 8 के सुप्रीम कोर्ट निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति से अनुरोध किया गया है कि तीनों जजों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 198, 199, 201, 228, 229, 255, 256, 257, 258, 336, 337 और 340 के अंतर्गत — जिनमें सात साल तक की कैद का प्रावधान है — सीबीआई द्वारा आपराधिक अभियोजन शुरू करने की अनुमति और स्वीकृति दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने निर्भय सिंह सुलिया में स्वयं कहा है कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध दुराचार की शिकायत प्रथम दृष्टया सत्य पाई जाए तो आपराधिक अभियोजन शुरू करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए — यही न्यायपालिका की शुचिता और जनविश्वास की रक्षा का एकमात्र रास्ता है।

दूसरी माँग — अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का मुकदमा दायर करने के निर्देश: सी.एस. कर्णन, इन रे (2017) 7 SCC 1 और बाराडाकांत मिश्र बनाम रजिस्ट्रार (1973) 1 SCC 374 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जब कोई जज सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों की जानबूझकर, बार-बार और सचेत रूप से अवज्ञा करता है, तो यह अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2(b), 12 और 16 के अंतर्गत दंडनीय आपराधिक अवमानना है — जिसमें छह महीने तक के कारावास का प्रावधान है। शिकायत में कहा गया है कि तीनों जजों ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक बाध्यकारी निर्णयों — विशेषकर विटुसाह ओबेरॉय (2017), आर.एस. शेरावत (2018), बाल ठाकरे (2005) और एस. तिरुपति राव (2024) State of Punjab Vs. Davinder Pal Singh Bhullar and Ors. (2011) 14 SCC 770,   — की न केवल अनदेखी की, बल्कि उनके सीधे विपरीत कार्यवाही जारी रखी। यह केवल न्यायिक भूल नहीं — यह सुप्रीम कोर्ट के प्रति जानबूझकर की गई आदतन अवज्ञा है, जो स्वयं एक गंभीर आपराधिक अवमानना है। अतः राष्ट्रपति से निवेदन किया गया है कि वे अटॉर्नी जनरल अथवा सॉलिसिटर जनरल को निर्देश दिलाएँ कि वे इन तीनों जजों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का औपचारिक मुकदमा दायर करें और संपूर्ण कानूनी कार्यवाही आरंभ करें —   कोई भी व्यक्ति, चाहे वह जज ही क्यों न हो, सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्णयों से ऊपर नहीं है।

तीसरी माँग — जस्टिस यशवंत वर्मा की तर्ज पर तीनों जजों से न्यायिक काम की तत्काल वापसी और “इन-हाउस” जाँच: शिकायत की यह माँग सबसे अधिक चर्चा का विषय बन रही है। शिकायतकर्ता ने स्पष्ट रूप से जस्टिस यशवंत वर्मा मामले का हवाला देते हुए कहा है कि जिस प्रकार गंभीर आरोप लगने पर जस्टिस यशवंत वर्मा से उनका संपूर्ण न्यायिक काम वापस लेकर उन्हें केवल प्रशासनिक कार्य तक सीमित कर दिया गया था और “इन-हाउस प्रोसीजर” के तहत जाँच बैठाई गई थी — ठीक उसी प्रकार इस मामले में भी तीनों संबंधित जजों के विरुद्ध तत्काल वही कार्यवाही होनी चाहिए। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज ‘X’ बनाम रजिस्ट्रार जनरल (2015) 4 SCC 91 में सुप्रीम कोर्ट ने इस “इन-हाउस प्रोसीजर” को संवैधानिक मान्यता दी है। शिकायत में राष्ट्रपति से निवेदन किया गया है कि वे भारत के मुख्य न्यायाधीश को इस आशय का संदेश भेजें कि जाँच पूरी होने तक तीनों जजों से समस्त न्यायिक काम तत्काल वापस लिया जाए। इससे भी आगे बढ़ते हुए शिकायत में के. वीरास्वामी (1991) का हवाला देते हुए यह भी कहा गया है कि यदि आरोप इतने गंभीर हों कि न्यायपालिका की संस्थागत विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाए, तो संबंधित जजों को स्वेच्छा से इस्तीफा देना चाहिए — और यदि वे ऐसा न करें, तो राज्यसभा में महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया प्रारंभ की जानी चाहिए।

चौथी माँग — राज्य से संवैधानिक मुआवजा और व्यक्तिगत दावे:

शिकायत की चौथी और अंतिम माँग आर्थिक न्याय और संवैधानिक क्षतिपूर्ति से संबंधित है। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के एक सुदीर्घ और सुस्थापित न्यायशास्त्र के आधार पर राज्य से संवैधानिक मुआवजे की माँग की है। रुदल शाह बनाम स्टेट ऑफ बिहार (1983) में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार यह ऐतिहासिक सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जब किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का राज्य के किसी अंग द्वारा उल्लंघन किया जाए, तो अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत मौद्रिक मुआवजा देना न्यायालय की संवैधानिक शक्ति का अभिन्न हिस्सा है। इस सिद्धांत को भीम सिंह बनाम स्टेट ऑफ जम्मू-कश्मीर (1985), नीलाबती बेहरा बनाम स्टेट ऑफ उड़ीसा (1993) और डी.के. बासु बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल (1997) में और अधिक विस्तारित और सुदृढ़ किया गया — जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह मुआवजा किसी दीवानी वाद में हर्जाने की भाँति नहीं, बल्कि एक संवैधानिक उपचार के रूप में दिया जाता है — जिसका उद्देश्य कानून के शासन को बनाए रखना, भविष्य के उल्लंघनों को रोकना और राज्य की शक्ति के सामने नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना है।

सबसे महत्वपूर्ण और सीधे लागू होने वाला उदाहरण हाल का महाबीर बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा, 2025 SCC OnLine SC 184 है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी दोषसिद्धि और कारावास के लिए 5 लाख रुपये का मुआवजा इसलिए दिया क्योंकि अदालत को सही कानूनी स्थिति से अवगत नहीं कराया गया था और अभियोजन पक्ष ने न्यायालय के समक्ष कानून को निष्पक्ष रूप से रखने का अपना कर्तव्य नहीं निभाया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में यह सिद्धांत पुनः दोहराया कि किसी के भी अधिकारों का हनन न्यायालय की गलती के कारण नहीं होना चाहिए — और जहाँ स्वतंत्रता का हनन कानून के विपरीत हो, वहाँ मुआवजा एक उचित और अनिवार्य संवैधानिक उपचार है।

शिकायतकर्ता का तर्क है कि उनका मामला महाबीर से भी कहीं अधिक गंभीर और संगीन है — क्योंकि महाबीर में अदालत को सही कानून से अवगत नहीं कराया गया था, जबकि पाहुजा के मामले में सही कानून, बाध्यकारी निर्णय और स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान बार-बार और विशेष रूप से न्यायालय के समक्ष रखे गए — और उनकी सचेत, जानबूझकर और आदतन अनदेखी की गई। यह केवल न्यायिक भूल नहीं, बल्कि एक ऐसा संस्थागत अन्याय है जिसने शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और आर्थिक संसाधनों को गहरी और अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। इसके अतिरिक्त शिकायत में संबंधित जजों और सरकारी वकीलों के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से — पदीय दुराचार, न्यायिक अधिकार के दुरुपयोग और गैरकानूनी कारावास के आधार पर — दीवानी न्यायालय में हर्जाने के दावे की भी माँग की गई है, जिसे प्रिवी काउंसिल के रमेश महाराज बनाम अटॉर्नी जनरल (1978) और मैकलियॉड बनाम सेंट ऑबिन (1899) के निर्णयों से बल मिलता है — जिनमें कहा गया था कि जहाँ किसी जज ने उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी नागरिक को सजा सुनाई हो, वहाँ सरकार को मुआवजा देना होगा और दोषी न्यायिक अधिकारी से उसकी वसूली की जा सकती है।

📌 वह घटनाक्रम जो इस पूरे मामले की जड़ है

2014 से न्यायिक सुधारों के लिए सक्रिय गुलशन पाहुजा ने अक्टूबर 2024 में यूट्यूब चैनल “Fight 4 Judicial Reforms” शुरू किया, जिस पर उन्होंने वकीलों और वादियों के साथ कोर्ट कार्यवाही के अनुभवों पर साक्षात्कार प्रसारित किए। इन वीडियो में तीन मजिस्ट्रेटों की कार्यशैली पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ की गई थीं। इसी आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की। परंतु शिकायत में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि जिस जज — जस्टिस चंद्र धारी सिंह — ने पहले चीफ जस्टिस को रिपोर्ट देकर कहा कि “प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना बनती है और कार्यवाही शुरू की जाए”, वही जज बाद में उस बेंच की अध्यक्षता करते हुए 28 मार्च 2025 का संज्ञान आदेश भी पारित करने वाले जज बन गए — यानी एक ही व्यक्ति जाँचकर्ता भी, सिफारिशकर्ता भी और निर्णायक भी। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार ऐसे आदेश “void ab initio” — अर्थात् शुरू से ही शून्य और अस्तित्वहीन — होते हैं।

📌 अब आगे क्या?

गुलशन पाहुजा की सजा 60 दिनों के लिए स्थगित है और वे सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की तैयारी में हैं। यह मामला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक असाधारण और अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है — जहाँ एक सोशल एक्टिविस्ट न केवल अपनी सजा को चुनौती दे रहा है, बल्कि उन जजों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे, सुप्रीम कोर्ट में अवमानना कार्यवाही, न्यायिक काम की वापसी और महाभियोग तक की माँग कर रहा है जिन्होंने उसे सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में आने वाला फैसला — न्यायपालिका की जवाबदेही, न्यायिक अनुशासन और एक आम नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में — भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुलशन पाहुजा को सुप्रीम कोर्ट तथा अन्य न्यायालयों की कथित अवमानना के आरोप में 6 महीने की सज़ा सुनाई — लेकिन यहीं पर वह बुनियादी और गंभीर कानूनी चूक हो गई, जो पूरे निर्णय की वैधता की नींव को ही हिला देती है। यदि आरोप सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से संबंधित था, तो सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी कानून के अनुसार ऐसी अवमानना पर संज्ञान लेने और दंड देने का अधिकार हाई कोर्ट को प्राप्त नहीं है। यही कारण है कि यह आदेश प्रथम दृष्टया अधिकार-क्षेत्र, प्रक्रिया और संवैधानिक वैधता—तीनों स्तरों पर गंभीर चुनौती के घेरे में आ गया है।

सुप्रीम कोर्ट स्वयं Vitusah Oberoi v. Court of Its Own Motion, (2017) 2 SCC 314 में यह घोषित कर चुका है कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के लिए सज़ा देने का अधिकार हाई कोर्ट को है ही नहीं। हाई कोर्ट केवल अपनी और अपने अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिए कार्रवाई कर सकता है — सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के लिए नहीं। यह संवैधानिक सीमा है, कोई तकनीकी विवाद नहीं।    सुप्रीम कोर्ट ने न संज्ञान लिया, न नोटिस जारी किया, न कार्रवाई की। इसका अर्थ केवल दो में से एक हो सकता है — या तो सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं माना कि उसकी अवमानना हुई, या उसने विवेकपूर्वक यह तय किया कि कार्रवाई आवश्यक नहीं।  जब  सुप्रीम कोर्ट — ने स्वयं कदम नहीं उठाया, तो हाई कोर्ट न तो संज्ञान ले सकता था, न सज़ा सुना सकता था। हाई कोर्ट न सुप्रीम कोर्ट के बराबर है, न उससे ऊपर। 

पाहुजा के वीडियो में सुप्रीम कोर्ट से संबंधित हिस्से के लिए दी गई सज़ा इसीलिए jurisdiction-शून्य (void ab initio) है। और जो सज़ा अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर दी जाए, वह न केवल अवैध है — बल्कि हाई कोर्ट  द्वारा  स्वयं एक कानूनी अतिक्रमण है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश  की अवमानना  है

इस मामले में अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट के जज जस्टिस चंद्र धारी सिंह पर एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण आरोप लगाया है — कि उन्होंने न केवल प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की अनदेखी की, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सुस्थापित कानूनी मानकों तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन किया है। अपीलकर्ता का कहना है कि 28 मार्च 2025 को पारित अवमानना संज्ञान आदेश न केवल प्रक्रियागत दृष्टि से दोषपूर्ण है, बल्कि यह न्याय के सबसे मूलभूत सिद्धांत का सरासर उल्लंघन है — क्योंकि हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस मामले को सर्वप्रथम जस्टिस चंद्र धारी सिंह के पास रिपोर्ट और टिप्पणी के लिए भेजा था, जिन्होंने संपूर्ण सामग्री की जाँच करने के बाद विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए यह सुनिश्चित मत व्यक्त किया कि प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना बनती है और कार्यवाही शुरू की जाए। चीफ जस्टिस ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर मामले को रोस्टर बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया — और इसके बाद वही जस्टिस चंद्र धारी सिंह उस बेंच की अध्यक्षता करते हुए संज्ञान आदेश पारित करने वाले जज भी बन गए। यानी एक ही न्यायिक व्यक्तित्व ने पहले ‘अन्वेषक’ की भूमिका निभाई, फिर ‘सिफारिशकर्ता’ बने, और अंततः ‘निर्णायक’ की कुर्सी पर भी जा बैठे — जो किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में सर्वथा अस्वीकार्य है और जिसे सुप्रीम कोर्ट “कोरम नॉन जुडिसे” मानते हुए ऐसे आदेशों को “void ab initio” — अर्थात् अपनी उत्पत्ति से ही शून्य और कानूनी दृष्टि से अस्तित्वहीन — घोषित करता आया है। [State of Punjab Vs. Davinder Pal Singh Bhullar and Ors. (2011) 14 SCC 770,   Suo Motu v. Nilesh Chandrabhushan Ojha, 2019 SCC OnLine Bom 3908; R. v. Commissioners for Special Purposes of the Income Tax, (1888) 21 QBD 313; R. v. Commissioner of Pawing, (1941) 1 QB 467; R. v. Lee, (1882) 9 QBD 394; Leeson v. General Council of Medical Education and Registration, (1889) 43 Ch D 366 at p. 384; Allinson v. General Council of Medical Education and Registration, (1894) 1 QB 750 at p. 758]

 आदेश में तथ्यों से खिलवाड़ — न्यायिक ईमानदारी पर सवाल

मामला केवल jurisdiction तक सीमित नहीं है। पाहुजा का आरोप है कि दोनों न्यायाधीशों (Justice Naveen Chawla and Justice Ravinder Judeja) ने अपने आदेश में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया। महत्वपूर्ण कानूनी दलीलों और सुप्रीम कोर्ट के binding judgments को न केवल नज़रअंदाज़ किया गया, बल्कि उनका उल्लेख तक आदेश में नहीं किया गया — मानो वे अदालत के सामने रखी ही न गई हों। यह न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर विफलता है।

 चार अनिवार्य प्रक्रियाएं — एक भी पूरी नहीं की गई

अवमानना कानून के तहत criminal contempt की कार्रवाई में कुछ प्रक्रियाएं अनिवार्य हैं। इन्हें छोड़ा नहीं जा सकता — ये आरोपी के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती हैं। इस मामले में इनमें से एक भी नहीं अपनाई गई:

  • संज्ञान के आदेश में कोई आरोप तय नहीं किया गया — बिना आरोप के कार्रवाई कैसे?
  • Form-II के अनुसार वैध नोटिस जारी नहीं हुआ — नोटिस ही अवैध, तो कार्रवाई किस आधार पर?
  • Form-I के अनुसार आरोप पढ़कर सुनाने और समझाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई — आरोपी को पता ही नहीं कि उस पर क्या आरोप है
  • Recording of Plea नहीं की गई — आरोप स्वीकार है या नहीं, यह दर्ज करना कानूनी अनिवार्यता है

सुप्रीम कोर्ट इन प्रक्रियागत उल्लंघनों को गंभीरता से लेता है। वह ऐसी सज़ाओं को गैरकानूनी घोषित करके पीड़ितों को मुआवज़ा दिलवा चुका है। जिन जजों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया, उनके विरुद्ध स्वयं अवमानना की कार्रवाई की गई है — कुछ को सज़ा दी गई, कुछ के विरुद्ध disciplinary action शुरू किया गया, कुछ को suspend या बर्खास्त तक किया गया।

 हाल की नज़ीर — Justice Paldiwala की Bench का ऐतिहासिक आदेश

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की Justice Paldiwala की Bench ने एक हाई कोर्ट जज की कानून समझने की योग्यता पर सवाल उठाते हुए उन्हें कोई भी न्यायिक कार्य न सौंपने का आदेश संबंधित हाई कोर्ट के Chief Justice को दिया था।

गुलशन पाहुजा अब ठीक ऐसी ही मांग कर रहे हैं।

  न्यायालय ने पाहुजा को वादी नहीं, दुश्मन समझा — और यही सबसे बड़ी न्यायिक विफलता है

एक सभ्य न्यायतंत्र की सबसे बुनियादी परीक्षा यह है कि जब कोई आम नागरिक व्यवस्था से टकराता है — तो न्यायालय उसे क्या मानता है: एक आहत इंसान जो न्याय की गुहार लगा रहा है, या एक खतरा जिसे कुचल देना है?

गुलशन पाहुजा के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दूसरा रास्ता चुना — और इसी चुनाव ने पूरी कार्यवाही को न्यायिक प्रक्रिया से बदलकर संस्थागत प्रतिशोध में तब्दील कर दिया।

पाहुजा एक आम नागरिक थे जो न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार, मनमानी और आम आदमी की पीड़ा की बात कर रहे थे। उनकी भाषा कड़ी थी — लेकिन वह भाषा उस इंसान की थी जो व्यवस्था से टूटा हुआ था, डरा हुआ नहीं। उनके शब्दों में गुस्सा था — लेकिन वह गुस्सा किसी अपराधी का नहीं, एक निराश नागरिक का था जो महसूस करता था कि उसकी आवाज़ सुनी नहीं जा रही।

सुप्रीम कोर्ट ने In Re: S. Mulgaokar (AIR 1978 SC 727) में कहा था कि न्यायाधीश को किसी नागरिक की आलोचना सुनते समय “उदार और संयमित दृष्टि” रखनी चाहिए — यह देखना चाहिए कि क्या यह न्याय-व्यवस्था में सुधार की पुकार है। P.N. Duda v. V.P. Shiv Shankar (1988) 3 SCC 167 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि एक लोकतंत्र में न्यायपालिका की आलोचना नागरिक समाज की जीवनी-शक्ति है — उसे दबाना न्यायतंत्र को मज़बूत नहीं, कमज़ोर बनाता है।

लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने पाहुजा की पीड़ा को न्यायिक सुधार की माँग के रूप में नहीं पढ़ा। उनकी निराशा को संवेदनशीलता से नहीं सुना। उनके क्रोध को एक टूटे हुए नागरिक की आवाज़ नहीं माना।

बल्कि — उन्हें संस्था का शत्रु घोषित कर दिया गया।

और जब न्यायालय किसी को शत्रु मान लेता है, तो कार्यवाही न्याय की नहीं रहती — वह दमन का औज़ार बन जाती है। आरोप तय नहीं किए जाते, प्रक्रिया छोड़ दी जाती है, बचाव का अवसर नहीं दिया जाता, और अंत में — अधिकतम सज़ा सुना दी जाती है। वह भी तब, जब न अभियोजन ने अधिकतम सज़ा माँगी थी, न अमिकस क्यूरी ने।

यह न्याय नहीं है। यह संस्थागत क्रोध है जिसे न्यायिक वस्त्र पहना दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने Vishal Tiwari v. Union of India (2025 INSC 647) में — जहाँ स्वयं मुख्य न्यायाधीश पर “सिविल वॉर” के लिए ज़िम्मेदार होने जैसे अत्यंत गंभीर आरोप लगाए गए थे — कहा था: “अदालतें इतनी नाज़ुक नहीं हैं कि ऐसे बयानों से मुरझा जाएँ।” और अवमानना की कार्रवाई से इनकार कर दिया था।

यदि सुप्रीम कोर्ट इतनी परिपक्वता और संयम दिखा सकता है — तो एक हाई कोर्ट को एक आम नागरिक की कड़ी आलोचना पर अधिकतम सज़ा देने का क्या औचित्य था?

कानून कहता है कि न्यायाधीश पक्षकार नहीं बन सकता। न्यायालय अभियोजक नहीं बन सकता। और जो संस्था स्वयं आहत महसूस करे, वह उसी व्यक्ति की जज नहीं बन सकती जिसने उसे आहत किया।

जब ये तीनों भूमिकाएँ एक ही कार्यवाही में घुलमिल जाती हैं — तो वह न्याय नहीं, प्रतिशोध है।

और प्रतिशोध — चाहे न्यायालय की कुर्सी से ही क्यों न हो — भारत के संविधान में कोई जगह नहीं रखता।

अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है

सज़ा 60 दिनों के लिए suspend की जा चुकी है। पाहुजा सुप्रीम कोर्ट जाएंगे — और उनके पास तर्कों की कमी नहीं है:

Vitusah Oberoi की सीधी नज़ीर, प्रक्रियागत उल्लंघनों की लंबी सूची, आदेश में तथ्यों की कथित तोड़-मरोड़, और मुआवज़े की मांग — यह सब मिलाकर एक ऐसा मामला बनता है जो सुप्रीम कोर्ट में गंभीरता से सुना जाएगा।

सवाल यह नहीं कि पाहुजा के वीडियो उचित थे या नहीं। सवाल यह है कि जब कानून ने हाई कोर्ट को एक सीमा में बांधा है, तो उस सीमा को लांघकर दी गई सज़ा — कानून की नज़र में सज़ा है या अपराध?

अब गुलशन पाहुजा का पक्ष यह कह रहा है कि यदि उनकी सज़ा वास्तव में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी कानून और अनिवार्य प्रक्रियाओं की अवहेलना करके दी गई है, तो न केवल उक्त निर्णय निरस्त किया जाना चाहिए बल्कि उनके मौलिक एवं वैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए उन्हें उचित क्षतिपूर्ति (Compensation) भी प्रदान की जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

यह मामला अब केवल एक अवमानना सज़ा का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि न्यायिक जवाबदेही, विधि के शासन (Rule of Law) तथा बाध्यकारी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के पालन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बनता जा रहा है।

गैरकानूनी सज़ा के लिए संबंधित न्यायाधीशों और सरकारी वकील पर भी गंभीर सवाल उठे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का दावा    है कि  यदि किसी नागरिक की स्वतंत्रता अधिकार-क्षेत्र से परे जाकर या विधिसम्मत प्रक्रिया का उल्लंघन करके छीनी जाती है, तो राज्य उसे क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य है। अनुच्छेद 21 के उल्लंघन, अवैध हिरासत या गलत दोषसिद्धि की स्थिति में यह दायित्व राज्य पर स्वतः उत्पन्न होता है — और यह दायित्व तब भी लागू होता है जब अवैध हनन किसी न्यायिक आदेश के माध्यम से हुआ हो।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ऐसे मामलों में राज्य द्वारा दी गई क्षतिपूर्ति की वसूली संबंधित न्यायाधीशों, सरकारी वकीलों या अन्य जिम्मेदार अधिकारियों से भी की जा सकती है — यदि उनकी गंभीर लापरवाही या अधिकार-क्षेत्र से बाहर की कार्यवाही से नागरिक को यह क्षति पहुँची हो। 

 सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि के अंतर्गत पीड़ित पाहुजा इस गैरकानूनी सज़ा के लिए सरकार से मुआवजे की माँग कर सकते हैं, जो संबंधित न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों से वसूल किया जाएगा।   

इस विषय में एक और ऐतिहासिक मिसाल अत्यंत प्रासंगिक है। मैकलॉड बनाम सेंट ऑबिन [(1899) AC 549] के मामले में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने अवमानना की गलत सज़ा सुनाई थी — और विधि के समक्ष यह तथ्य कोई ढाल नहीं बन सका। प्रिवी काउंसिल ने स्वयं उन्हीं कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश को आदेश दिया कि वे अवमानना की उस गलत सज़ा के पीड़ित व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से मुआवजा अदा करें।   

प्रिवी काउंसिल ने रमेश महाराज बनाम अटॉर्नी जनरल [(1978) 2 WLR 902] के ऐतिहासिक मामले में यह सिद्धांत दृढ़तापूर्वक स्थापित किया कि जब किसी हाई कोर्ट या अन्य न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा किसी व्यक्ति पर आरोप तय किए बिना, विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन किए बिना और अभियुक्त का पक्ष सुने बिना ही सज़ा सुना दी जाती है — तो ऐसी अवमानना की सज़ा सर्वथा अवैध और शून्य है। प्रिवी काउंसिल ने स्पष्ट अभिनिर्धारित किया कि न्यायाधीश भी राज्य की कार्यपालिका शाखा का ही एक अंग हैं — इसलिए न्यायाधीश की इस विधि-विरुद्ध कार्यवाही के कारण पीड़ित को हुई क्षति की भरपाई करने का दायित्व सरकार पर आता है और सरकार को उसे मुआवजा देना होगा।

 See also:-   Parashuram Detaram Shamdasani v. King-Emperor, [1945] A.C. 264 ; Walmik Bobde v. State of Maharashtra, 2001 ALL MR (Cri) 1731; Mahabir v. State of Haryana, 2025 SCC OnLine SC 184; McLeod v. St. Aubyn, [1899] AC 549,  Directions in the Matter of Demolition of Structures, In re, (2025) 5 SCC 1; Lucknow Development Authority v. M.K. Gupta, AIR 1994 SC 787; and Shiv Sagar Tiwari v. Union of India, (1996) 6 SCC 558 ]

  कानूनी जानकारों का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने यह कानून पहले ही स्पष्ट रूप से स्थापित कर दिया था कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मामले में हाई कोर्ट सज़ा नहीं सुना सकता, तो संबंधित न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों ने इस मामले को चलाया कैसे — और सज़ा सुना भी दी। यह दोनों के लिए गंभीर संवैधानिक और व्यावसायिक जवाबदेही का प्रश्न है।

विशेषज्ञों के अनुसार न तो संबंधित न्यायाधीशों को और न ही सरकारी वकीलों को यह बचाव उपलब्ध है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के इस सुस्थापित कानून की जानकारी नहीं थी। कानून की अज्ञानता यहाँ कोई ढाल नहीं बन सकती — बल्कि ऐसे मामले में इसे विधिक दुर्भावना (Legal Malice) माना जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 166, 219, 220, 120(B), 34 तथा 107 एवं भारतीय न्याय संहिता की धारा 257 और 258 के अंतर्गत संबंधित न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों पर सात वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान भी लागू हो सकता है। [   Sama Aruna v. State of Telangana, (2018) 12 SCC 150, State Bank of Travancore V/s. Mathew K.C., (2018) 3 SCC 85]

आरोपी के पक्ष के कानूनों पर रही चुप्पी — अपील में गंभीर आरोप – हाई कोर्ट की रिकॉर्डिंग से बड़ा खुलासा!

आदेश में सच नहीं, बल्कि तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। कई महत्वपूर्ण घटनाओं और कानूनी दलीलों का उल्लेख तक नहीं किया गया। और अब अपील में यह भी दावा किया गया है कि न्यायिक आदेश में असत्य तथ्य दर्ज करना भारतीय दंड संहिता की धारा 192, 193 और 167 के अंतर्गत एक गंभीर आपराधिक कृत्य है — जिसके लिए सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी न्यायिक आदेश में मिथ्या तथ्यों का अभिलेखन — चाहे वह जानबूझकर हो या घोर लापरवाही से — केवल उस आदेश को विधिक दृष्टि से शून्य नहीं बनाता, बल्कि यह उन अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही का द्वार भी खोलता है जिन्होंने उसे तैयार किया या उस पर हस्ताक्षर किए। न्यायाधीश का पद इस दायित्व से मुक्ति नहीं देता — विधि के समक्ष असत्य का अभिलेखन अपराध है, चाहे वह किसी भी कलम से हुआ हो।

 पूरा मामला क्या है

गुलशन पाहुजा दिल्ली के एक सामाजिक कार्यकर्ता है जिनकी प्राथमिकता देश की जनता को अदालतों से जल्द और उचित न्याय मिलता देखने की है. इसके लिए 2014 से अदालतों में पारदर्शिता,जवाबदेही के लिए ऑडियो वीडियो रिकॉर्डिंग और Time Bound Judiciary system की मांग कर रहें है. अपनी इन मांगों के चलते जंतर मंतर पर प्रदर्शन के अलावा जागरूकता अभियान के मद्देनजर विभिन्न अदालतों के बाहर अपने पोस्टर लेकर खड़े होना, पर्चे बाटना पीड़ितों की पीड़ा व्यथा न्याय की राह की परेशानियों को सुनने समझने के साथ व्यवस्थागत कमियों की पर चर्चा करते है. अपने मांगों के समर्थन में जागरूकता के लिए अक्टूबर 2024 में एक Youtube चैनल Fight 4 Judicial Reforms नाम से प्रारम्भ किया जिसमें पाहुजा पीड़ितों और वकीलों के अदालती अनुभव और अदालतों में दैनिक कार्यवाही, सुनवाई की ऑडियो विडियो रिकॉर्डिंग के फायदे नुकसान पर चर्चा करते है। चैनल प्रारम्भ करने के मात्र तीन चार महीनें के भीतर ही उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अदालत की गिरमा को नुकसान पहुँचाया है. गुलशन पाहुजा ने अपने YouTube चैनल पर दो वकीलों के दो इंटरव्यू प्रकाशित जिसमें जिसमें वकीलों ने कुल तीन मजिस्ट्रेटों की कार्य प्रणाली, अदालती कार्यवाही के कडवे अनुभव बताये। इसके अलावा, उन पर सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध भी गंभीर और अवमाननापूर्ण आरोप लगाने का इल्ज़ाम था। इसी आधार पर दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की।

21 अप्रैल 2026 को हाई कोर्ट ने गुलशन पाहुजा को दोषी करार दिया और 16 मई 2026 को अधिकतम सज़ा — छह महीने का साधारण कारावास — सुना दी। यह उल्लेखनीय है कि जिन दो वकीलों के इंटरव्यू को इस पूरी कार्यवाही का आधार बनाया गया था, उन्हें माफी स्वीकार होने के बाद पहले ही छोड़ दिया गया था — जबकि पाहुजा, जो एक आम नागरिक हैं और किसी न्यायालय में पेश नहीं होते, उन्हें सर्वाधिक सज़ा भुगतनी पड़ी।

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सोशल एक्टिविस्ट और यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को अवमानना मामले में दोषी ठहराकर छह माह की अधिकतम सज़ा सुनाने के आदेश को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है। पाहुजा की ओर से दायर की जा रही विस्तृत अपील में न केवल दोषसिद्धि और सज़ा को रद्द करने की मांग की गई है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन के कारण मुआवज़ा (Compensation) देने की भी मांग की गई है।

इस अपील ने एक बड़ा संवैधानिक और न्यायिक विवाद खड़ा कर दिया है। अपील में दावा किया गया है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे मामले में सज़ा सुनाई, जिसे स्वयं उसके आदेश के अनुसार “सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों की गरिमा कम करने वाला” बताया गया है। अर्थात आरोप का मूल आधार सुप्रीम कोर्ट की कथित अवमानना भी था। अपील में कहा गया है कि ऐसी स्थिति में दिल्ली हाईकोर्ट को कार्रवाई करने का कोई अधिकार ही नहीं था।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय Vitusah Oberoi v. Court of Its Own Motion, (2017) 2 SCC 314 का हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि हाईकोर्ट की अवमानना शक्ति केवल अपनी अथवा अपने अधीनस्थ न्यायालयों तक सीमित है। सुप्रीम कोर्ट की कथित अवमानना पर कार्रवाई करने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा था:

“यदि सुप्रीम कोर्ट स्वयं अपनी अवमानना के लिए कार्रवाई नहीं करता, तो कोई अधीनस्थ न्यायालय ऐसा नहीं कर सकता।”

इसी आधार पर उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया, फिर हाईकोर्ट ने क्यों लिया?

अपील में यह भी कहा गया है कि जिस वीडियो को आधार बनाकर कार्यवाही शुरू की गई, वह सार्वजनिक डोमेन में व्यापक रूप से उपलब्ध था और लंबे समय तक वायरल रहा। यदि उसमें वास्तव में सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली सामग्री थी, तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत अपनी अवमानना शक्ति का प्रयोग कर सकता था।

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा कोई संज्ञान नहीं लिया।

अपील में सवाल उठाया गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कार्रवाई आवश्यक नहीं समझी, तो दिल्ली हाईकोर्ट ने किस अधिकार और किस आधार पर संज्ञान लिया?

आरोप तय किए बिना ही शुरू हो गई कार्यवाही?

अपील में दूसरा गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि 28 मार्च 2025 को जब दिल्ली हाईकोर्ट ने अवमानना का संज्ञान लिया और नोटिस जारी करने का आदेश पारित किया, तब उसने कोई स्पष्ट और विशिष्ट आरोप (Specific Charge) तय ही नहीं किया। जबकि अवमानना कानून तथा Delhi High Court Contempt Rules, 2025 के तहत यह एक अनिवार्य प्रक्रिया बताई गई है।

 अपील के अनुसार:

  • संज्ञान लेते समय कोई विधिवत आरोप तय नहीं किया गया;
  • Form-II के अनुसार वैध नोटिस जारी नहीं हुआ;
  • Form-I के अनुसार आरोप पढ़कर सुनाने और समझाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई;
  • आरोप स्वीकार है या नहीं, इसके लिए आवश्यक Recording of Plea की प्रक्रिया भी नहीं की गई।

अपील में दावा किया गया है कि इन अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन न होने से पूरी कार्यवाही शुरू से ही अवैध हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी रद्द कर चुका है ऐसी सज़ाएँ

अपील में कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया है, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने आरोप तय न करने या निर्धारित प्रक्रिया का पालन न होने पर अवमानना की सज़ा रद्द कर दी थी।

इनमें प्रमुख रूप से:

  • S. Sherawat v. Rajeev Malhotra, (2018) 10 SCC 574
  • S. Sujatha v. State of Karnataka, (2011) 5 SCC 689
  • Bal Thackrey v. Harish Pimpalkhute, (2005) 1 SCC 254
  • Suo Motu v. Nandlal Thakkar, 2013 Cri LJ 3391
  • Tirupathi Rao v. M. Lingamaiah, 2024 SCC OnLine SC 1764.

का उल्लेख किया गया है।

अपील में कहा गया है कि इन सभी निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अवमानना कार्यवाही अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) प्रकृति की होती है, इसलिए आरोप, नोटिस, जवाब, और दोष स्वीकार या अस्वीकार करने की पूरी प्रक्रिया का कठोरता से पालन किया जाना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो पूरी कार्यवाही और उसके आधार पर दी गई सज़ा कानूनन टिक नहीं सकती।

पाहुजा की अपील में यह भी दावा किया गया है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की सज़ा का नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक जवाबदेही और अवमानना कानून की संवैधानिक सीमाओं से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई पर कानूनी जगत की नज़रें टिकी हुई हैं।

इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल सामने आती है। प्रिवी काउंसिल ने रमेश महाराज बनाम अटॉर्नी जनरल [(1978) 2 WLR 902] के ऐतिहासिक मामले में यह सिद्धांत स्थापित किया था कि जब किसी व्यक्ति पर आरोप तय किए बिना ही कार्यवाही की जाती है, आरोप पढ़कर सुनाए नहीं जाते, और दोष स्वीकार है या नहीं — इसके लिए अपेक्षित Recording of Plea की प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता — तो ऐसी अवमानना की सज़ा सर्वथा अवैध है और सरकार को पीड़ित को मुआवजा देना होगा।

प्रिवी काउंसिल ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया कि न्यायाधीश राज्य की कार्यपालिका शाखा का अंग हैं — इसलिए किसी न्यायाधीश द्वारा नागरिक के मूल अधिकारों का हनन होने पर मुआवजे का दायित्व सरकार पर आता है। और कानून यह भी है कि ऐसी क्षतिपूर्ति की राशि अंततः उन संबंधित न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों से वसूल की जा सकती है जिनकी विधि-विरुद्ध कार्यवाही के कारण नागरिक को यह क्षति उठानी पड़ी।

लेकिन विवाद यहीं नहीं रुकता। हाई कोर्ट के सज़ा के आदेश में और भी गंभीर कानूनी खामियाँ हैं —

अपील में हाल के फैसले Vishal Tiwari v. Union of India, 2025 INSC 647 का हवाला दिया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऐसी टिप्पणियाँ आई थीं जिनमें सीधे मुख्य न्यायाधीश पर गंभीर आरोप लगाए गए थे और उन्हें देश में “सिविल वॉर” के लिए जिम्मेदार बताया गया था।

इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:

“अदालतें इतनी नाज़ुक नहीं हैं कि ऐसे बयानों से मुरझा जाएँ।”

और अवमानना की कार्रवाई से इंकार कर दिया था।

अपील में दावा किया गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इतने गंभीर आरोपों पर भी संयम बरता, तब दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा अपेक्षाकृत कम गंभीर टिप्पणियों पर अधिकतम सज़ा देना न्यायिक संयम के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।

छह महीने की अधिकतम सज़ा पर भी उठे गंभीर सवाल

अपील में यह भी कहा गया है कि न तो सरकारी पक्ष ने और न ही अदालत द्वारा नियुक्त अमिकस क्यूरी ने अधिकतम सज़ा की माँग की थी — फिर भी हाई कोर्ट ने सीधे छह महीने के अधिकतम कारावास की सज़ा सुना दी। अपील में तर्क दिया गया है कि न कोई गवाह प्रभावित हुआ, न किसी मुकदमे में बाधा आई, और न ही न्याय प्रशासन में वास्तविक अवरोध का कोई प्रमाण था — फिर भी कानून के तहत मिलने वाली सर्वाधिक कठोर सज़ा दे दी गई।

निष्पक्ष न्याय की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन

अपील में आरोप लगाया गया है कि पूरी कार्यवाही ऐसी प्रतीत होती है मानो मुकदमा अदालत संस्था बनाम गुलशन पाहुजा के बीच चल रहा हो। न्यायाधीश, अभियोजन और शिकायतकर्ता की भूमिकाओं का अंतर धुंधला हो गया, जिससे निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार प्रभावित हुआ।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यह गंभीर आशंका उत्पन्न होती है कि कार्यवाही एक निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया न रहकर “संस्था बनाम व्यक्ति” का रूप ले चुकी थी। अपील में यह भी आरोप लगाया गया है कि संबंधित न्यायाधीशों ने तटस्थता और न्यायिक संयम का परित्याग करते हुए न्यायपालिका की आलोचना को व्यक्तिगत रूप से लिया — और उसी आहत भावना से प्रेरित होकर अधिकतम सज़ा सुना दी। यदि यह आरोप सही है, तो यह न केवल निष्पक्ष सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक पूर्वाग्रह का वह रूप है जो स्वयं अवमानना के सिद्धांत की नींव को कमज़ोर करता है।

और कानून यह भी है कि केवल इसी आधार पर — अर्थात् न्यायिक पूर्वाग्रह और संस्थागत पक्षपात की आशंका मात्र से — आदेश निरस्त और खारिज हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक निर्णयों में यह सुस्पष्ट किया है कि न्यायाधीश केवल कानून के प्रति नहीं, बल्कि निष्पक्षता की उस शपथ के प्रति भी बाध्य हैं जो उन्होंने पद ग्रहण करते समय ली थी। न्यायालय न तो स्वयं पक्षकार बन सकता है, न अभियोजक की भूमिका निभा सकता है, और न ही व्यक्तिगत आहत भावना से न्याय कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह घोषित किया है कि जहाँ न्यायाधीश की निष्पक्षता संदिग्ध हो, जहाँ कार्यवाही में संस्थागत पूर्वाग्रह की उचित आशंका हो — वहाँ उस कार्यवाही से उत्पन्न प्रत्येक आदेश विधि की दृष्टि में शून्य और अप्रवर्तनीय है। न्याय केवल होना नहीं चाहिए — प्रत्येक निष्पक्ष पर्यवेक्षक को यह दिखना भी चाहिए कि न्याय हुआ है।

4. अवमाननाकर्ता के अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत प्राप्त Right to Silence तथा अभियोजन को अपना मामला स्वयं सिद्ध करने देने के अधिकार का उल्लंघन

अपील में कहा गया है कि आरोप तय किए बिना ही पाहुजा को जवाबी हलफनामा दाखिल करने और अपना पक्ष प्रकट करने के लिए कहा गया। इससे उन पर मुकदमे के प्रारंभिक चरण में ही अपना बचाव उजागर करने का दबाव बनाया गया, जबकि आपराधिक एवं अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) कार्यवाहियों में अभियोजन का दायित्व होता है कि वह अपने साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध करे।

अपील के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत किसी भी आरोपी या कथित अवमाननाकर्ता को Protection Against Self-Incrimination अर्थात स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य न किए जाने का अधिकार प्राप्त है। इसी अधिकार का एक महत्वपूर्ण अंग Right to Silence भी है, जिसके अंतर्गत आरोपी को यह अधिकार है कि वह मुकदमे के अंत तक मौन रहे और अभियोजन को अपने साक्ष्यों की शक्ति या कमजोरियों के आधार पर अपना मामला सिद्ध करने दे।

पाहुजा का कहना है कि कानून उन्हें यह अधिकार देता है कि वे अभियोजन की कमियों, विरोधाभासों और साक्ष्यों की अपर्याप्तता के आधार पर अपना बचाव करें, बिना इस बाध्यता के कि वे प्रारंभिक चरण में ही अपनी पूरी रक्षा रणनीति या तथ्यात्मक बचाव का खुलासा करें। आरोप तय होने से पहले जवाबी हलफनामा मांगना और बचाव प्रकट करने के लिए बाध्य करना न केवल अनुच्छेद 20(3) के विपरीत है, बल्कि निर्दोषता की धारणा (Presumption of Innocence) तथा निष्पक्ष सुनवाई के मूल सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।

अपील में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार की प्रक्रिया ने अभियोजन पर मौजूद कानूनी बोझ (Burden of Proof) को अप्रत्यक्ष रूप से आरोपी पर स्थानांतरित कर दिया, जो भारतीय संविधान और स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र दोनों के विरुद्ध है।

5. गवाहों से जिरह और बचाव साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया गया

अपील में कहा गया है कि गुलशन पाहुजा ने अपने बचाव में साक्ष्य प्रस्तुत करने, गवाहों को बुलाने तथा आवश्यक गवाहों से जिरह (Cross-Examination) करने की अनुमति मांगी थी, ताकि वे अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का प्रभावी ढंग से खंडन कर सकें। किन्तु यह अवसर प्रदान नहीं किया गया और बिना पूर्ण परीक्षण (Trial) के ही उन्हें दोषी ठहरा दिया गया।

अपील का दावा है कि अवमानना कार्यवाही भले ही विशेष प्रकृति की हो, लेकिन वह अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) कार्यवाही है और जब उसका परिणाम कारावास हो सकता है, तब आरोपी को अपनी निर्दोषता सिद्ध करने तथा अभियोजन के आरोपों को चुनौती देने का पूर्ण अवसर दिया जाना अनिवार्य है। किसी व्यक्ति को गवाहों से जिरह करने या अपने पक्ष के साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिए बिना दोषी ठहराना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) तथा निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

अपील में विशेष रूप से Rajiv Dawar v. High Court of Delhi, (2018) 12 SCC 437 का हवाला दिया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा पारित अवमानना की दोषसिद्धि और सज़ा को रद्द कर दिया था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि अवमाननाकर्ता को आरोपों का खंडन करने, अपनी निर्दोषता स्थापित करने और आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत करने का वास्तविक एवं प्रभावी अवसर दिया जाना चाहिए। केवल आरोपों या हलफनामों के आधार पर, बिना उचित अवसर दिए, दोषसिद्धि दर्ज नहीं की जा सकती।

अपील में कहा गया है कि पाहुजा के मामले में भी यही मूलभूत त्रुटि हुई, जिसके कारण पूरी दोषसिद्धि और उसके आधार पर दी गई सज़ा कानूनन अस्थिर और असंवैधानिक हो जाती है।

6. रिकॉल आवेदन पर पहले फैसला नहीं किया गया

अपील में कहा गया है कि दोषसिद्धि के बाद दाखिल रिकॉल आवेदन में अधिकार-क्षेत्र, प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष सुनवाई और अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया के उल्लंघन जैसे गंभीर संवैधानिक एवं कानूनी प्रश्न उठाए गए थे। कानून के अनुसार पहले यह तय किया जाना आवश्यक था कि दोषसिद्धि का आदेश विधिसम्मत है भी या नहीं। लेकिन इसके विपरीत हाईकोर्ट ने रिकॉल आवेदन और सज़ा की सुनवाई को एक साथ जोड़ दिया। अपील का दावा है कि इससे यह आभास उत्पन्न हुआ कि अदालत ने रिकॉल आवेदन पर निर्णय लेने से पहले ही सज़ा देने का मन बना लिया था। अपील में कहा गया है कि यदि रिकॉल आवेदन स्वीकार हो जाता, तो सज़ा का प्रश्न ही समाप्त हो जाता। इसलिए पहले रिकॉल आवेदन का स्वतंत्र और कारणयुक्त निर्णय होना आवश्यक था। इस प्रक्रिया का पालन न होने से पूरी सज़ा कार्यवाही गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

7. अपील का अधिकार प्रभावहीन बना दिया गया

अपील में कहा गया है कि 21 अप्रैल 2026 को दोषसिद्धि दर्ज होने के बाद पाहुजा को उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का वैधानिक अधिकार प्राप्त हो गया था। लेकिन रिकॉल आवेदन खारिज करते ही अदालत ने उन्हें कोई उचित समय दिए बिना सीधे सज़ा सुना दी। अपील का दावा है कि इससे उनका वैधानिक अपील का अधिकार केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह गया। यदि किसी व्यक्ति को दोषसिद्धि के विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाने का वास्तविक अवसर ही न मिले और उससे पहले उसकी स्वतंत्रता छीन ली जाए, तो यह अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन है। अपील में कहा गया है कि न्यायिक जल्दबाज़ी के कारण अपील का अधिकार व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर दिया गया।

8. रिकॉल आवेदन बिना कारण बताए खारिज

अपील में आरोप लगाया गया है कि रिकॉल आवेदन में अनेक बाध्यकारी सुप्रीम कोर्ट निर्णयों, संवैधानिक प्रावधानों और अधिकार-क्षेत्र संबंधी आपत्तियों का विस्तार से उल्लेख किया गया था, लेकिन हाईकोर्ट ने उन तर्कों का विधिवत परीक्षण नहीं किया। आदेश में अधिकांश महत्वपूर्ण आपत्तियों का उत्तर दिए बिना केवल निष्कर्ष दर्ज कर दिए गए। अपील में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट बार-बार यह सिद्धांत स्थापित कर चुका है कि न्यायिक आदेशों में कारण दर्ज करना अनिवार्य है और “कारण न्यायिक निष्कर्षों की आत्मा (heartbeat of judicial conclusions) होते हैं।” यदि कोई अदालत केवल निष्कर्ष लिखकर गंभीर कानूनी आपत्तियों को अस्वीकार कर देती है, तो ऐसा आदेश मनमाना माना जाता है और न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकता। अपील के अनुसार रिकॉल आवेदन को इस प्रकार खारिज किया जाना स्वयं आदेश को अवैध और अस्थिर बनाता है।

9. अधिकतम सज़ा संविधान पीठ के निर्णयों और स्थापित कानून के विपरीत

अपील में कहा गया है कि मान भी लिया जाए कि अवमानना का कोई तकनीकी मामला बनता था, तब भी छह माह की अधिकतम कारावास की सज़ा कानूनन टिक नहीं सकती। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों और बाद के अनेक निर्णयों ने स्पष्ट किया है कि अवमानना मामलों में कारावास अंतिम और अपवादस्वरूप उपाय (Exceptional Measure) है, जबकि सामान्यतः न्यायालयों को संयम बरतते हुए जुर्माने (Fine) या अन्य कम कठोर उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

अपील में विशेष रूप से Brahma Prakash Sharma v. State of U.P., AIR 1954 SC 10, Baradakanta Mishra v. Registrar of Orissa High Court, (1974) 1 SCC 374, Murray & Co. v. Ashok Kumar Newatia, (2000) 2 SCC 367 तथा Prashant Bhushan, In Re, (2021) 3 SCC 160 का हवाला दिया गया है। इन निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि अवमानना कानून का उद्देश्य प्रतिशोध लेना नहीं बल्कि न्याय प्रशासन की रक्षा करना है।

अपील में कहा गया है कि प्रशांत भूषण मामले में सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध गंभीर, व्यापक और तीखी टिप्पणियाँ किए जाने तथा माफी न मांगने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने कारावास की सज़ा नहीं दी और मात्र जुर्माना लगाना पर्याप्त समझा। इसी प्रकार अन्य मामलों में भी यह सिद्धांत अपनाया गया कि केवल माफी न मांगना, न्यायालय से असहमति व्यक्त करना या कठोर आलोचना करना अपने आप में कारावास का आधार नहीं बन सकता।

इसके विपरीत, गुलशन पाहुजा के मामले में न तो किसी न्यायिक कार्यवाही में वास्तविक बाधा सिद्ध हुई, न किसी गवाह को प्रभावित किए जाने का प्रमाण है, और न ही न्याय प्रशासन को कोई ठोस नुकसान दिखाया गया। इसके बावजूद अधिकतम छह माह की सज़ा सुनाई गई। अपील का दावा है कि यह दंड न केवल असंगत और अनुपातहीन (Disproportionate) है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित बाध्यकारी कानून की प्रत्यक्ष अवहेलना भी है। इसलिए केवल इस आधार पर भी सज़ा का आदेश रद्द किए जाने योग्य है।

10. प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिली, इसलिए गलत दोषसिद्धि और सज़ा सुनाई गई

अपील में कहा गया है कि जिस मुकदमे का परिणाम कारावास हो सकता था, उसमें अदालत का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि वह आरोपी के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता दांव पर हो और उसे जेल भेजे जाने की संभावना हो, तब अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध हो। यदि आरोपी स्वयं वकील रखने से इंकार भी करे, तब भी अदालत आवश्यक होने पर Standby Counsel अथवा ऐसे Amicus Curiae की नियुक्ति कर सकती है, जिसका दायित्व आरोपी के अधिकारों की रक्षा करना हो। हाल के चर्चित मामलों में भी इस सिद्धांत का पालन किया गया है।

अपील का दावा है कि इस मामले में अमिकस क्यूरी की नियुक्ति तो की गई, लेकिन उनका दायित्व मुख्यतः अदालत की सहायता करना था। गुलशन पाहुजा के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई स्वतंत्र वकील, स्टैंडबाय काउंसिल या विधिक सहायक नियुक्त नहीं किया गया। परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे, बाध्यकारी निर्णय और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय अदालत के समक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रखे गए। अपील में कहा गया है कि सरकारी पक्ष और अमिकस क्यूरी दोनों ही कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों पर मौन रहे, जिसके कारण अदालत को एकतरफा तस्वीर प्रस्तुत हुई और अंततः गलत दोषसिद्धि तथा कठोर सज़ा सुनाई गई।

11. मूल आरोपों के बजाय बाद में दिए गए बयानों को सज़ा का आधार बनाया गया

अपील में कहा गया है कि अदालत ने सज़ा निर्धारित करते समय मूल आरोपों से आगे बढ़कर सुनवाई के दौरान कथित रूप से दिए गए कुछ बाद के बयानों को भी अपने निर्णय का आधार बनाया। यदि अदालत की दृष्टि में वे बयान स्वयं अवमाननापूर्ण थे, तो कानूनन उनके लिए अलग अवमानना कार्यवाही शुरू करना, अलग आरोप तय करना और आरोपी को अलग से जवाब देने का अवसर देना आवश्यक था। [  J.R. Parashar, Advocate v. Prashant Bhushan, Advocate, AIR 2001 SC 3395]

अपील का तर्क है कि किसी व्यक्ति को ऐसे कथनों के आधार पर दंडित नहीं किया जा सकता जिनके संबंध में उसे पहले से आरोपित ही नहीं किया गया हो। बिना आरोप, बिना नोटिस और बिना सुनवाई किसी कथन को सज़ा बढ़ाने का आधार बनाना प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के विपरीत है। इसलिए अपील के अनुसार सज़ा का आदेश इस कारण भी कानूनन अस्थिर हो जाता है।

13. आलोचना को अवमानना मान लिया गया

अपील में कहा गया है कि गुलशन पाहुजा द्वारा व्यक्त की गई न्याय व्यवस्था के प्रति निराशा, न्यायिक विवेकाधिकार के कथित दुरुपयोग की आलोचना तथा न्यायिक कार्यप्रणाली पर की गई टिप्पणियों को अदालत ने सज़ा बढ़ाने का आधार बना लिया। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने In Re: S. Mulgaokar, AIR 1978 SC 727, P.N. Duda v. V.P. Shiv Shankar, (1988) 3 SCC 167, Indirect Tax Practitioners’ Assn. v. R.K. Jain, (2010) 8 SCC 281 तथा हाल ही में Vishal Tiwari v. Union of India, 2025 INSC 647 में स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका की आलोचना, न्यायिक निर्णयों पर असहमति अथवा न्याय व्यवस्था के प्रति निराशा व्यक्त करना अपने आप में अवमानना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि न्यायालयों को आलोचना के प्रति सहिष्णुता दिखानी चाहिए और ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्रवाई अपवादस्वरूप ही हो सकती है। अपील का दावा है कि जिन कथनों को आधार बनाकर सज़ा बढ़ाई गई, वे अधिकतम आलोचना की श्रेणी में आते थे, न कि ऐसे कृत्य जिनके लिए कारावास जैसी सज़ा दी जा सके।

 14. न्याय प्रशासन में वास्तविक बाधा का कोई प्रमाण नहीं

अपील में कहा गया है कि आपराधिक अवमानना का सबसे महत्वपूर्ण तत्व यह है कि कथित कृत्य से न्याय प्रशासन में वास्तविक, ठोस और पर्याप्त बाधा उत्पन्न हुई हो। लेकिन इस मामले में न कोई गवाह प्रभावित हुआ, न कोई मुकदमा बाधित हुआ, न किसी न्यायिक अधिकारी के कार्य में व्यवधान आया और न ही किसी न्यायिक कार्यवाही के प्रभावित होने का कोई प्रमाण प्रस्तुत किया गया। अपील के अनुसार केवल कठोर, अप्रिय या अतिरंजित टिप्पणी करना आपराधिक अवमानना नहीं बन जाता। Brahma Prakash Sharma v. State of U.P., AIR 1954 SC 10 तथा Baradakanta Mishra v. Registrar of Orissa High Court, (1974) 1 SCC 374 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वास्तविक और पर्याप्त हस्तक्षेप (Real and Substantial Interference) सिद्ध किए बिना आपराधिक अवमानना की दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इसलिए अपील का दावा है कि इस मामले में अवमानना का मूल तत्व ही सिद्ध नहीं हुआ।

15. बयानों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया

पाहुजा का दावा है कि उनके कथनों को पूर्ण संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया गया। विशेष रूप से “अदालतों की मनमर्जी बढ़ रही है और मनमर्जी का दूसरा नाम तानाशाही है” जैसी टिप्पणी को अलग से उद्धृत कर कठोर दृष्टि से देखा गया, जबकि पाहुजा का कहना है कि वे न्याय व्यवस्था या अदालतों के विरुद्ध नहीं हैं, बल्कि उन प्रवृत्तियों के विरुद्ध हैं जो न्यायिक विवेकाधिकार के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार, अन्याय और नागरिकों के अधिकारों के हनन को बढ़ावा देती हैं।

पाहुजा का कहना है कि न्याय व्यवस्था में सुधार की मांग करना, भ्रष्टाचार और मनमानी के खिलाफ आवाज उठाना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करना उनका संवैधानिक अधिकार है। उनके अनुसार, अदालत को उनकी पीड़ा, उद्देश्य और सुधार की भावना को समझना चाहिए था, लेकिन उनके कथनों को गलत अर्थ में लेकर अवमानना और सज़ा का आधार बना दिया गया।

अपील में यह भी कहा गया है कि उसी सुनवाई में पाहुजा ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं यह सिद्धांत स्वीकार किया है कि यदि कोई व्यक्ति न्याय पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की बात करता है, तो यह न्याय व्यवस्था में उसके विश्वास का प्रमाण है, न कि अविश्वास का।

इसलिए अपील में दावा किया गया है कि किसी एक वाक्य को संदर्भ से काटकर पढ़ना, उसके पीछे की मंशा और पूरे बयान को नज़रअंदाज़ करना तथा उसी आधार पर कठोर निष्कर्ष निकालना तथ्यात्मक और कानूनी दोनों दृष्टियों से गलत है।

16. संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 20(3) और 21 का समग्र उल्लंघन

अपील का अंतिम और व्यापक आधार यह है कि पूरी कार्यवाही को समग्र रूप से देखने पर अनेक गंभीर संवैधानिक उल्लंघन सामने आते हैं। आरोप तय नहीं किए गए, वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, आत्मदोषारोपण के विरुद्ध अधिकार का उल्लंघन हुआ, बचाव साक्ष्य और जिरह का अवसर नहीं दिया गया, प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई, अपील का वास्तविक अवसर नहीं दिया गया, आलोचना को अवमानना माना गया और अंततः अधिकतम सज़ा सुना दी गई। अपील का दावा है कि इन सभी त्रुटियों का संयुक्त प्रभाव यह है कि पूरी कार्यवाही निष्पक्ष, न्यायसंगत और विधिसम्मत प्रक्रिया की संवैधानिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती। इसलिए दोषसिद्धि और सज़ा दोनों अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 20(3) और 21 के विपरीत होने के कारण रद्द किए जाने योग्य हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि जो न्यायाधीश जानबूझकर बाध्यकारी कानून तथा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की अवहेलना करते हैं, वे मात्र एक साधारण विधिक त्रुटि नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी संवैधानिक शपथ का उल्लंघन कर रहे होते हैं। ऐसे न्यायाधीश उस विश्वास (Public Trust) को भी आघात पहुँचाते हैं जो संविधान और देश के नागरिकों ने उन पर न्याय के निष्पक्ष प्रशासन के लिए रखा है।

Ratilal Jhaverbhai Parmar v. State of Gujarat, 2024 SCC OnLine SC 2985, Re: M.P. Dwivedi, (1996) 4 SCC 152, Sama Aruna v. State of Telangana, (2018) 12 SCC 150 तथा अन्य निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रत्येक न्यायाधीश को विधि का ज्ञान होना माना जाता है और वह यह कहकर उत्तरदायित्व से नहीं बच सकता कि उसे बाध्यकारी निर्णयों की जानकारी नहीं थी। न्यायिक पद पर बैठा व्यक्ति संविधान, विधि तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून का पालन करने की शपथ लेता है और उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा, न कि उनका हनन।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब कोई न्यायिक अधिकारी जानबूझकर बाध्यकारी कानून की अवहेलना करता है, तो वह न केवल अपनी शपथ का उल्लंघन करता है बल्कि जनता द्वारा न्यायपालिका में रखे गए विश्वास के साथ भी विश्वासघात करता है। न्यायिक शक्ति एक पवित्र सार्वजनिक न्यास (Sacred Public Trust) है और उसका विधि-विरुद्ध प्रयोग उस न्यास के दुरुपयोग के समान है।

अपील में यह भी कहा गया है कि यदि किसी न्यायालय द्वारा बाध्यकारी निर्णयों और वैधानिक प्रक्रियाओं की जानबूझकर अवहेलना की जाती है, तो ऐसा आचरण Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(b) के अंतर्गत सिविल अवमानना (Civil Contempt) के सिद्धांतों को भी आकर्षित कर सकता है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत देश के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अनेक अवसरों पर कहा है कि न्यायाधीशों से अपेक्षित मानक सामान्य लोक सेवकों से कहीं अधिक ऊँचे होते हैं, क्योंकि नागरिकों की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और मौलिक अधिकार उनके निर्णयों पर निर्भर करते हैं। इसलिए जब किसी नागरिक की स्वतंत्रता बाध्यकारी कानून की अवहेलना कर छीनी जाती है, तो मामला केवल एक न्यायिक त्रुटि का नहीं रह जाता, बल्कि संविधान, विधि के शासन (Rule of Law) और जनता के विश्वास से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।

न्यायमूर्ति पारदीवाला पीठ का ऐतिहासिक दृष्टांत : Shikhar Chemicals v. State of U.P., 2025 SCC OnLine SC 1653

अपील में Shikhar Chemicals v. State of U.P., 2025 SCC OnLine SC 1653 में माननीय न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला की पीठ द्वारा पारित उस ऐतिहासिक आदेश का विशेष उल्लेख किया गया है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा पारित आदेशों पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए उनकी विधिक क्षमता एवं न्यायिक योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाया था तथा माननीय मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया था कि उक्त न्यायाधीश को कोई न्यायिक कार्य आवंटित न किया जाए।

गुलशन पाहुजा ने अपनी शिकायत में कहा है कि जिन तीन न्यायाधीशों के विरुद्ध उन्होंने शिकायत की है, उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप कहीं अधिक गंभीर प्रकृति के हैं। शिकायत के अनुसार उन पर बाध्यकारी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की जानबूझकर अवहेलना करने, न्यायिक अभिलेखों में हेरफेर करने, न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने तथा विधि के शासन के विपरीत कार्य करने के आरोप हैं। पाहुजा का कहना है कि यदि Shikhar Chemicals प्रकरण में न्यायिक क्षमता पर प्रश्न उठने मात्र से न्यायिक कार्य वापस लिया जा सकता है, तो ऐसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे न्यायाधीशों के विरुद्ध भी तत्काल समान कार्रवाई होना आवश्यक है।

इसी आधार पर पाहुजा ने राष्ट्रपति महोदय से मांग की है कि आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच पूर्ण होने तक संबंधित तीनों न्यायाधीशों से तत्काल न्यायिक कार्य वापस लिया जाए, उनके विरुद्ध इन-हाउस प्रक्रिया के अंतर्गत कार्रवाई प्रारंभ की जाए, तथा आवश्यकता पड़ने पर अभियोजन, अवमानना और अन्य वैधानिक कार्यवाहियों की संस्तुति की जाए।

पाहुजा ने अपनी शिकायत में कहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है।   

पाहुजा की शिकायत माननीय सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के निर्णय Supreme Court of India v. Subhash Chandra Agarwal, (2020) 5 SCC 481 पर भी आधारित है, जिसमें स्पष्ट और प्रामाणिक रूप से यह प्रतिपादित किया गया है कि न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) और न्यायिक जवाबदेही (Judicial Accountability) परस्पर पूरक संवैधानिक मूल्य हैं, न कि एक-दूसरे के विरोधी सिद्धांत।

उक्त निर्णय के पैरा 221, 227, 228 और 230 का उल्लेख करते हुए पाहुजा का कहना है कि संविधान न्यायिक स्वतंत्रता को जांच, समीक्षा, जवाबदेही अथवा विधिसम्मत अन्वेषण से बचने के लिए एक कवच के रूप में नहीं देखता। इसके विपरीत, संविधान पीठ ने स्पष्ट रूप से माना है कि न्यायपालिका भी अन्य सभी संवैधानिक संस्थाओं की भाँति इस बात के लिए उत्तरदायी है कि उसे प्रदत्त संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है। निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक शक्ति केवल न्याय के प्रशासन के लिए प्रदान की गई है और उसका उपयोग किसी निजी लाभ, बाह्य उद्देश्य अथवा अनुचित हित की पूर्ति के लिए नहीं किया जा सकता।

संविधान पीठ की इस टिप्पणी पर भरोसा करते हुए कि “संस्था का संरक्षण-कवच ऐसे कृत्यों को जांच से बचाने के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता” तथा “संस्था को किसी न्यायाधीश को उन कार्यों के लिए संरक्षण प्रदान करने हेतु नहीं बुलाया जा सकता जिनका उसके आधिकारिक न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन से कोई संबंध नहीं है”, पाहुजा ने कहा है कि व्यक्तिगत आपराधिक कृत्यों के आरोपों का सामना कर रहे न्यायाधीश केवल न्यायिक पद पर आसीन होने के कारण संस्थागत संरक्षण का दावा नहीं कर सकते।

शिकायत के अनुसार न्यायिक स्वतंत्रता का उद्देश्य ईमानदार, निष्पक्ष और निर्भीक न्यायिक निर्णयों की रक्षा करना है, न कि कानून के जानबूझकर उल्लंघन, न्यायिक अभिलेखों में हेरफेर, न्यायिक अधिकारों के दुरुपयोग अथवा आपराधिक कदाचार को संरक्षण प्रदान करना। जहाँ आरोप व्यक्तिगत आपराधिक कृत्यों, शक्ति के दुरुपयोग अथवा ऐसे आचरण से संबंधित हों जिनका न्यायिक कर्तव्यों के bona fide निर्वहन से कोई संबंध न हो, वहाँ संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका के संस्थागत संरक्षण का उपयोग जांच, अन्वेषण, अभियोजन अथवा जवाबदेही से बचने के लिए नहीं किया जा सकता।

अतः पाहुजा का कहना है कि गंभीर आपराधिक कदाचार के आरोपों का सामना कर रहे न्यायाधीशों को संस्थागत संरक्षण प्रदान करना स्वयं संविधान पीठ द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के विपरीत होगा तथा विधि के शासन (Rule of Law) को कमजोर करेगा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि विधि का शासन यह अपेक्षा करता है कि कानून का पालन बिना किसी अपवाद के किया जाए तथा नागरिकों को सार्वजनिक पदाधिकारियों की अनियंत्रित एवं निरंकुश शक्ति से संरक्षित रखा जाए। किसी भी न्यायाधीश को केवल उसके पद के कारण जांच, अभियोजन या जवाबदेही से ऊपर मानना संविधान, लोकतंत्र और विधि के शासन—तीनों की मूल भावना के प्रतिकूल होगा।

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