कानूनी टिप्पणी में न्यायालय में विचाराधीन मामलों पर विपक्षी नेताओं से मिलने से प्रधान न्यायाधीश के इनकार का समर्थन, लेकिन उनके लिखित आवेदन पर अपनाए गए रुख पर सवाल; न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता की उद्धव ठाकरे से मुलाकात पर भी चिंता व्यक्त
राष्ट्रीय संविधान रक्षा समिति के अध्यक्ष अधिवक्ता निलेश ओझा का विश्लेषण
राहुल गांधी द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत से मुलाकात का अनुरोध और उस पर प्रधान न्यायाधीश के जवाब ने कानूनी बहस को जन्म दिया है। एक कानूनी टिप्पणी में सवाल उठाया गया है कि क्या इस मामले से जुड़े संवैधानिक और कानूनी सिद्धांतों पर पर्याप्त विचार किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों के संबंध में मुलाकात से इनकार करने के प्रधान न्यायाधीश के निर्णय का समर्थन करते हुए टिप्पणी में तर्क दिया गया है कि विपक्षी नेताओं द्वारा प्रस्तुत लिखित अभ्यावेदन पर उचित न्यायिक कार्रवाई के लिए विचार किया जा सकता था।
LiveLaw में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश ने विपक्ष के नेताओं के आधिकारिक ईमेल का जवाब देते हुए कहा कि ऐसी मुलाकात अनुचित होगी, क्योंकि वे जिन मुद्दों को उठाना चाहते थे, वे पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, जवाब में आगे यह भी कहा गया कि संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय अपने प्रशासनिक अधिकारक्षेत्र में कार्यपालिका के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। हालांकि, नेताओं को न्यायिक पक्ष में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता है।
लिखित अभ्यावेदन पर विचार किया जा सकता था
टिप्पणी में कहा गया है कि मुलाकात से इनकार करना उचित और कानून के अनुरूप था। हालांकि, इसमें तर्क दिया गया है कि प्रशासनिक स्तर पर प्राप्त लिखित आवेदन को संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत रिट याचिका के रूप में स्वीकार करने अथवा उस पर स्वतः संज्ञान लेने पर विचार किया जा सकता था।
इस संदर्भ में टिप्पणी में एनसीईआरटी मामले और न्यायाधीश मधु बाला से जुड़े मामले का उल्लेख हाल के ऐसे उदाहरणों के रूप में किया गया है, जिनमें प्रधान न्यायाधीश ने स्वतः संज्ञान लेने की शक्तियों का प्रयोग किया।
इसमें आगे तर्क दिया गया है कि यदि आवेदन को निराधार पाया था फिर की उसका उद्देश्य न्यायालय पर दबाव डालना अथवा किसी लंबित मामले की सुनवाई को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करना था, तो प्रधान न्यायाधीश राहुल गांधी के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना की कार्यवाही शुरू करने पर विचार कर सकते थे।
इस तर्क के समर्थन में टिप्पणी में [Bal Thackeray v. Pimplekhute, (2005) 1 SCC 254 और Nilesh Navalakha v. Union of India, 2021 SCC OnLine Bom 56] का हवाला दिया गया है।
न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता की उद्धव ठाकरे से मुलाकात पर सवाल
टिप्पणी में इस सिद्धांत के पालन को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है कि किसी न्यायाधीश को न्यायालय में लंबित मामले के संबंध में किसी पक्षकार या तीसरे पक्ष से मुलाकात नहीं करनी चाहिए।
इस संदर्भ में कई न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें [Re J.R.L.; Ex parte C.J.L., (1986) 162 CLR 342; Gullapalli Nageswara Rao v. A.P. State Road Transport Corpn., 1958 SCC OnLine SC 49; State of Punjab v. Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770; और Supreme Court Advocates-on-Record Assn. (Recusal Matter) v. Union of India, (2016) 5 SCC 808] शामिल हैं।
तुलना करते हुए टिप्पणी में उस प्रसंग का उल्लेख किया गया है, जब न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता ने बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यरत रहते हुए महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। इसमें आगे कहा गया है कि न्यायमूर्ति दत्ता ने इसके बाद न्यायिक पक्ष में ठाकरे और संजय राउत से संबंधित मामलों की सुनवाई की।
टिप्पणी में न्यायमूर्ति दत्ता के आचरण को उद्धृत कानूनी और संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत बताया गया है। न्यायिक निष्पक्षता के मानकों और न्यायिक तथा गैर-न्यायिक संवाद के बीच अंतर के मद्देनजर इस मुलाकात पर सवाल उठाए गए हैं।
उठाई गई ये चिंताएं न्यायिक मर्यादा, संस्थागत स्वतंत्रता और संवैधानिक न्यायालयों में लंबित मामलों से संबंधित अभ्यावेदनों पर विचार करने के उचित तरीके को लेकर व्यापक प्रश्नों को केंद्र में लाती हैं।