‘केजरीवाल को नरमी, मुझे कठोरता क्यों?’ जस्टिस नवीन चावला एवं जस्टिस रवींद्र दुडेजा की अदालतों से मामला स्थानांतरित करने की मांग

डॉ. कपिल कक्कड़ ने कहा—  दोनों मामलों में अलगअलग प्रक्रियात्मक व्यवहार से निष्पक्षता पर उचित आशंका उत्पन्न होती है; न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित आपराधिक अवमानना (क्रिमिनल कंटेम्प्ट) मामले में डॉ. कपिल कक्कड़ ने न्यायमूर्ति नवीन चावला (Justice Naveen Chawla) से स्वयं को सुनवाई से अलग (Recuse) करने का अनुरोध करते हुए विस्तृत आवेदन दायर किया है। आवेदन में दावा किया गया है कि कार्यवाही के दौरान अपनाई गई कुछ प्रक्रियात्मक परिस्थितियों से एक निष्पक्ष एवं सूचित व्यक्ति के मन में यह उचित आशंका उत्पन्न हो सकती है कि उन्हें उसी पीठ के समक्ष लंबित एक अन्य आपराधिक अवमानना मामले की तुलना में समान प्रक्रियात्मक संरक्षण (Procedural Fairness) प्राप्त नहीं हो रहा है।

न्यायाधीश पर व्यक्तिगत पक्षपात का आरोप नहीं

आवेदन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं जस्टिस रवींद्र दुडेजा के विरुद्ध किसी प्रकार के वास्तविक पक्षपात (Actual Bias), दुर्भावना (Mala Fides) अथवा ईमानदारी पर कोई आरोप नहीं लगाया जा रहा है। आवेदन का आधार केवल वह स्थापित संवैधानिक सिद्धांत है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

आवेदन में कहा गया है कि यदि किसी निष्पक्ष एवं विवेकशील व्यक्ति के मन में परिस्थितियों के आधार पर पक्षपात की उचित आशंका उत्पन्न होती है, तो न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायाधीश द्वारा स्वयं को मामले की सुनवाई से अलग करना उचित हो सकता है। इस संबंध में Krishnadatt Awasthy v. State of M.P., (2025) 7 SCC 545, State of Punjab v. Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770 तथा National Human Rights Commission v. State of Gujarat, (2009) 6 SCC 767 सहित विभिन्न निर्णयों का उल्लेख किया गया है।

अरविंद केजरीवाल के अवमानना मामले से अलग व्यवहार पर सवाल

रिक्यूज़ल आवेदन का प्रमुख आधार यह है कि वर्तमान अवमानना कार्यवाही तथा पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एवं अन्य के विरुद्ध लंबित आपराधिक अवमानना मामले में अपनाई गई प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

 

आवेदन में दोनों अवमानना मामलों के बीच कथित प्रक्रियात्मक अंतर को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। आवेदन के अनुसार, अरविंद केजरीवाल के अवमानना मामले में उत्तरशपथपत्र (Reply Affidavit) दाखिल करने के लिए लगभग चार सप्ताह का समय दिया गया, जबकि डॉ. कपिल कक्कड़ को उत्तर दाखिल करने के लिए केवल दो सप्ताह का समय प्रदान किया गया।

आवेदन में यह भी कहा गया है कि अरविंद केजरीवाल के मामले में व्यक्तिगत उपस्थिति (Personal Appearance) का कोई निर्देश जारी नहीं किया गया, जबकि डॉ. कपिल कक्कड़ को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया गया, जबकि उनकी डिस्चार्ज अर्जी, जिसमें स्वयं अवमानना कार्यवाही की विचारणीयता (Maintainability) को चुनौती दी गई है, अभी भी लंबित है।

इस संबंध में आवेदन में Agyapaul Singh v. State Bank of India, (2017) 5 SCC 235 पर भरोसा करते हुए कहा गया है कि जब प्रारंभिक स्तर पर ही कार्यवाही की वैधानिकता (Maintainability) पर प्रश्न उठाया गया हो, तब सामान्यतः कथित अवमाननाकर्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति पर तब तक जोर नहीं दिया जाना चाहिए, जब तक न्यायालय प्रारंभिक आपत्तियों पर विचार कर यह निर्णय न ले कि कार्यवाही आगे बढ़ाई जानी चाहिए, और इसके लिए कारण भी दर्ज न करे।

आवेदन में आगे तर्क दिया गया है कि अरविंद केजरीवाल द्वारा ऐसी कोई डिस्चार्ज अथवा विचारणीयता संबंधी प्रारंभिक आपत्ति भी नहीं उठाई गई थी, इसके बावजूद उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति का निर्देश नहीं दिया गया, जबकि डॉ. कपिल कक्कड़ के मामले में, जहाँ प्रारंभिक स्तर पर ही कार्यवाही की वैधानिकता को चुनौती दी गई है, व्यक्तिगत उपस्थिति का आदेश पारित किया गया। आवेदन के अनुसार, समान प्रकृति की दो कार्यवाहियों में अपनाए गए इस भिन्न प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण ने ही निष्पक्षता के संबंध में उचित आशंका (Reasonable Apprehension of Bias) उत्पन्न की है।

 

 

अधिक गंभीर आरोप वाले मामले में अधिक समय, फिर अलग व्यवहार क्यों?”

आवेदन में यह भी कहा गया है कि यह अंतर इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि आवेदक के अनुसार अरविंद केजरीवाल वाले अवमानना मामले में आरोप कहीं अधिक गंभीर प्रकृति के हैं, फिर भी वहाँ अपेक्षाकृत अधिक समय और व्यापक प्रक्रियात्मक अवसर प्रदान किए गए।

आवेदन का तर्क है कि समान प्रकृति की कार्यवाहियों में बिना कोई कारण दर्ज किए अलग-अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अंतर्गत समानता एवं निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार के संबंध में उचित आशंका उत्पन्न कर सकता है।

पहले डिस्चार्ज अर्जी पर निर्णय हो

डॉ. कक्कड़ ने अपने आवेदन में कहा है कि उनकी लंबित डिस्चार्ज अर्जी आपराधिक अवमानना कार्यवाही की वैधानिकता एवं विचारणीयता (Maintainability) से जुड़े प्रारंभिक प्रश्न उठाती है। इसलिए उस पर निर्णय किए बिना गुण-दोष (Merits) पर विस्तृत उत्तर दाखिल करने का निर्देश देना विधिसम्मत नहीं है।

आवेदन के अनुसार यदि डिस्चार्ज अर्जी स्वीकार हो जाती है तो पूरी कार्यवाही समाप्त हो जाएगी और यदि अस्वीकार होती है तो आवेदक को Contempt of Courts Act की धारा 19 के अंतर्गत अपील का वैधानिक अधिकार प्राप्त होगा। इसलिए पहले डिस्चार्ज आवेदन का निस्तारण किया जाना चाहिए।

अनिवार्य प्रक्रिया का पालन होने का आरोप

आवेदन में Contempt of Courts (Delhi High Court) Rules, 2025 के कई अनिवार्य प्रावधानों का पालन न किए जाने का भी आरोप लगाया गया है। इनमें मुख्यतः—

  • विधिवत आरोप (Charge) निर्धारित न किया जाना,
  • निर्धारित प्रारूप में वैधानिक नोटिस की सेवा न होना,
  • वैधानिक चरण आने से पहले ही उत्तर-शपथपत्र दाखिल करने पर जोर देना,
  • तथा आपराधिक अवमानना मामलों के लिए निर्धारित प्रक्रिया से अन्य कथित विचलन शामिल हैं।

आवेदन में कहा गया है कि चूँकि आपराधिक अवमानना की कार्यवाही अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) प्रकृति की होती है, इसलिए इन प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन अनिवार्य है।

 

व्यक्तिगत पक्षपात का आरोप नहीं, केवल ‘Reasonable Apprehension’ का आधार

आवेदन में बार-बार स्पष्ट किया गया है कि न्यायमूर्ति नवीन चावला के विरुद्ध किसी प्रकार के व्यक्तिगत पक्षपात, पूर्वाग्रह अथवा निष्पक्षता पर कोई आरोप नहीं लगाया गया है। पूरा आवेदन केवल “Reasonable Apprehension of Bias” के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार यदि किसी निष्पक्ष पर्यवेक्षक को परिस्थितियों के कारण प्रक्रियात्मक असमानता का उचित आभास हो, तो न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए न्यायाधीश द्वारा स्वयं को मामले से अलग करना उचित हो सकता है।

दूसरी पीठ के समक्ष सुनवाई की मांग

अंततः आवेदन में प्रार्थना की गई है कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और न्यायपालिका में जनता के विश्वास को बनाए रखने के हित में यह आपराधिक अवमानना मामला किसी अन्य पीठ के समक्ष सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया जाए।

 

सुप्रीम कोर्ट का स्थापित सिद्धांत: वास्तविक पक्षपात (Actual Bias) सिद्ध करना आवश्यक नहीं; केवल पक्षपात की उचित आशंका (Appearance of Bias) भी मामले के स्थानांतरण के लिए पर्याप्त हो सकती है

आवेदन का आधार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित वह संवैधानिक सिद्धांत है कि किसी न्यायाधीश के विरुद्ध वास्तविक पक्षपात (Actual Bias) सिद्ध करना, रिक्यूज़ल (Recusal) अथवा मामले को दूसरी पीठ के समक्ष स्थानांतरित (Transfer) करने के लिए अनिवार्य नहीं है।

आवेदन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न्यायमूर्ति नवीन चावला तथा न्यायमूर्ति रवींद्र दुडेजा के विरुद्ध किसी प्रकार के वास्तविक पक्षपात, दुर्भावना (Mala Fides), पूर्वाग्रह (Prejudice) अथवा ईमानदारी (Integrity) पर कोई आरोप नहीं लगाया जा रहा है।

हालाँकि, आवेदन में यह तर्क दिया गया है कि वर्तमान अवमानना कार्यवाही में अपनाई गई भिन्न प्रक्रियात्मक पद्धति (Differential Procedural Treatment), उसी समय लंबित एक अन्य आपराधिक अवमानना मामले की तुलना में, किसी निष्पक्ष एवं विवेकशील पर्यवेक्षक (Fair-minded and Informed Observer) के मन में पक्षपात की उचित आशंका (Reasonable Apprehension of Bias) उत्पन्न करती है।

आवेदन के अनुसार, भले ही वास्तविक पक्षपात सिद्ध हो, लेकिन यदि परिस्थितियाँ ऐसी प्रतीत होती हों कि न्यायिक निष्पक्षता पर उचित संदेह उत्पन्न हो सकता है, तो मात्र ऐसी आशंका (Appearance of Bias) ही न्यायाधीश के स्वयं को मामले की सुनवाई से अलग करने (Recusal) अथवा मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष स्थानांतरित करने के लिए पर्याप्त आधार हो सकती है, ताकि न्यायपालिका की निष्पक्षता, विश्वसनीयता तथा न्याय प्रशासन में जनता का विश्वास अक्षुण्ण बना रहे।

इस विधिक सिद्धांत के समर्थन में आवेदन में Krishnadatt Awasthy v. State of M.P., (2025) 7 SCC 545, State of Punjab v. Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770, तथा National Human Rights Commission v. State of Gujarat, (2009) 6 SCC 767 सहित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया गया है।

आवेदन में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उस सुप्रतिष्ठित संवैधानिक सिद्धांत का भी उल्लेख किया गया है कि—

न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि यदि परिस्थितियाँ किसी निष्पक्ष एवं विवेकशील व्यक्ति के मन में न्यायिक निष्पक्षता के संबंध में उचित आशंका उत्पन्न करती हैं, तो वास्तविक पक्षपात का प्रमाण आवश्यक नहीं होता। ऐसे मामलों में न्यायपालिका की निष्पक्षता, विश्वसनीयता तथा जनविश्वास बनाए रखने के लिए मामले का दूसरी पीठ के समक्ष स्थानांतरण न्यायसंगत एवं विधिसम्मत माना गया है।

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